Tuesday, November 6, 2018

हर कोई माँगे आजादी

दोस्तों ,



देश में जब से मोदी राज आया है तब से हर कोई आजादी माँग  रहा है। कभी कभी तो ऐसा लगता  है की मानों देश में किसी विदेशी का शासन गया है।  अख़बार, टीवी  और पत्रिकाओं को पढ़ने से तो ऐसा ही लगता है। मई २०१४ में मोदी जी के प्रधान मंत्री बनने के तुरंत बाद ही बहुत से लोगो को घुटन महसूस होनी शुरू हो गयी थी। इसके खिलाफ अपनी भावनाओं  को व्यक्त करने सबसे पहला बड़ा हमला बोला देश के उन लेखक और बुध्जीविओ ने जिनकी रोजी रोटी और दुकानदारी   सरकार के पैसो पर चल रही थी जब इन लोगो पर अंकुश लगा तो इन का दम  घुटने लगा और करीब ३२-३३ लोगों ने अपने पुरुष्कार वापसी का अभियान चला कर आजादी मांगने का स्वांग रचा।

- महीने में जैसे ही इन महान लेखकों को लगा की इनका  अभियान बिहार चुनाव में  अपेक्षित परिणामों को  लाने में सफल  हो गया तो इस अभियान का पार्ट दो शुरू हुआ देश के उत्तर में देश- विदेश में विख्यात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में।  जहाँ कन्हैया कुमार जिनका पढ़ने लिखने से कोई वास्ता होकर   केवल नेतागिरी  करने के लिए पढाई कर रहे थे कुछ कश्मीरी छात्रों के साथ आजादी माँगने का आन्दोलन चलाया और इसे राहुल गाँधी के नेतृत्व में खूब हवा मिली। और साथ ही दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश में कमान संभाली  रोहित वेमुला ने जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी की खिलाफत का आंदोलन शुरू कर दिया। और गुण्डा गर्दी में सफल हो पाने के कारण आंदोलन चलाने वालों ने रोहित की बली चढ़ा कर मामले को गरमाना शुरू किया। मुश्किल से -  महीने ही निकले थे की   जे एन यू में ही पढ़ने वाले एक और छात्र  नजीब अहमद गायब हो गए   जिनके  तार कश्मीर से जुड़े थे और आजादी की बेसब्री से माँग कर रहे थे। 


देश में यह सबकुछ चल ही रहा था मोदी जी  ने  छोटे -छोटे दर्दो के इलाज में देश में नोट बंदी लागू  कर दी यह एक ऐसी चाल  थी जिसका  पूर्वानुमान ही नहीं था। नतीजतन लोग आजादी मांगने के बजाय अपनी सम्पत्ति बचाने में लग गए और मोदी जी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में अप्रत्याशित विजय हासिल करके यह दिखा दिया की भले ही उन्हें राष्ट्रीय राजनीत का अनुभव दूसरे बड़े नेताओं खास कर के कांग्रेसी और समाजवादी नेताओं से कम  हो    लेकिन उन्हें रावण की नाभि के अमृत का पता है और उन्होंने एक वार  से सारा मामला ठंडे बस्ते में डालने में सफलता प्राप्त कर ली । 
देश में एक बार फिर चुनाव का माहौल बना है पहले पांच राज्यों के चुनाव फिर केंद्र के शासन के लिए चुनाव। एक बार फिर माहौल गर्माने की पुरजोर कोशिश शुरू हो गई है। सीबीआई हो या रिज़र्व बैंक  यहाँ तक की फिल्म और टेलेविज़न इंस्टिट्यूट के निदेशक अनुपम खेर समेत देश के अनेक संस्थानों में लोगो ने अपने अपने स्थान पर शोर मचाना शुरू कर दिया है। राफेल की खरीद में कल्पित घोटाले का शोर बिना किसी सबूत  के कांग्रेस अध्यक्ष  राहुल ने उठा रखा है। और यह सबकुछ चुनाव तक तो चलने वाला है ही। क्योकि इस बार के चुनाव कांग्रेस के लिए अस्तित्व का प्रश्न है तो भाजपा के लिये  प्रतिष्ठा का। 

मोदी अमित शाह की जोड़ी ने जिस तरह से पिछले साढ़े चार साल  शासन देश में किया है उससे पुराने भाजपाई भी नाराज है। यशवंत सिन्हा,शत्रुघन सिन्हा अरुण शौरी तो खुलेआम अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे है। गुपचुप नाराजगी वालो की लिस्ट तो और भी लम्बी है। इसका एक बड़ा कारण बना है देश के अंदर का माहौल।कुछ लोगो ने कुछ इस तरह का माहौल बना दिया है की यदि आप मोदी भक्त नहीं है तो फिर आप देश द्रोही की श्रेणी में आते है।  देश भक्त होना और मोदी भक्त होना पर्यायवाची हो गए है। ये स्थिति ठीक नहीं है। अतिउत्साह में यही काम डी के बरुआ इन्द्रा गाँधी के लिए भी करचुके है। असल में इस तरह का वातावरण बना कर कुछ लोग अपनी स्वार्थसिद्धि तो कर सकते है पर ये न तो देश का भला करता है न उस व्यक्ति का जिस के लिए यह सबकुछ किया जा रहा है। बल्कि यह वस्तुस्थित से दूर कर देता है जो चुनाव में परिणामो की पूर्व कल्पना भी करने के लिए केवल जीत का विकल्प  ही दिखाता है नतीजा परिणाम उलटे आते है। इसलिए जो कोई भी मोदी नीतियों से असहमत है उसके लिए घुटन का माहौल बन गया है। हालांकि मोदी नीतियों से असहमत व्यक्ति भी देश के बारे में ठीक सोच रखने वाला हो सकता है इस बात को अगर ध्यान नहीं रखा गया तो भविष्य में कुछ और लोग भी आजादी की मांग उठाते हुए दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं। 
अजय सिंह "एकल"

और अन्त  में 


प्रश्नपत्र है जिंदगी

जस की तस स्वीकार्य

कुछ भी वैकल्पिक नहीं,

सभी प्रश्न अनिवार्य....   







Tuesday, October 2, 2018

मोदी और महात्मा

दोस्तों,
मोदी जी ने प्रधान मंत्री बनने के बाद लालकिले के अपने पहले ही भाषण में जिस  एक बात का जिक्र महात्मा गाँधी के साथ किया था वह थी  स्वच्छ्ता अभियान की शुरुवात। गांव  में  शौचालयों के न होने से महिलाओं को जिन समस्याओं से जूझना पड़ता है वह वास्तव किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म है और  पीड़ा देने वाला है। उसी मंच पर मोदी जी ने घोष्णा किया की हम जब गाँधी जयंती का १५०वा वर्ष मनायें तो  भारत को स्वच्छता का उपहार दे कर गाँधी जी के आदर्शों का पालन करें। और पिछले चार सालों में इस पर बड़ी गंभीरता से काम भी हुआ है और लगभग ८० प्रतिशत लक्ष्य को पूरा किया गया है।  पूरे देश ने मोदी जी के आह्वान को हाथो हाथ लेते हुए इसमें अपनी क्षमता अनुसार स्वछता अभियान में  योगदान किया है ।इसे मोदी जी के कार्यकाल की एक विशेष उपलब्धि मानना      चाहिए।  

मोदी जी और गाँधी जी दोनों गुजरात राज्य से आते है। स्वाभाविक रूप से दोनों के बहुत से व्यक्तिगत  गुण परम्परानुसार मिलते है। मोदी और गाँधी दोनों के  नेतृत्व के गुण  भी काफी मिलते है। गाँधी जी छोटी छोटी बातों और आदतों का विशेष जिक्र अपने लेखन और व्यहार में करते थे।  उदाहरण  के लिए चरखा चला कर सूत कातना और खादी के वस्त्र को स्वदेशी  पहचान बना कर लोगो को प्रेरित करना। इस एक बात से पूरे देश में खादी की पहचान गाँधी के साथ भी जुडी और गांधीवादियों के साथ भी। ऐसा ही एक उदाहरण अपने हाथ स्वयं  अपना शौचालय साफ़ करने का है और भी पता नहीं कितने ऐसे काम है जिन्हे लोगो ने गाँधी के अनुयायी होने के तोर पर स्वीकार किया और उसे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी शामिल कर लिया। और इस तरह से गाँधी जी ने देश के  आम आदमी को एक तरह से आजादी के आंदोलन के साथ जोड़ दिया। यह गुण मोदी जी के अंदर भी भरपूर है।  स्वच्छ्ता अभियान, जनधन अभियान ,बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओं  जैसे पता नहीं कितने अभियानों के साथ मोदी जी ने अपने प्रयासों से आम नागरिकों  जोड़ा है और उनके मन में देश की उन्नति में मेरा भी सहयोग है यह भाव भरने में सफल हुए है। अर्थात देश की आम जनता के सामने छोटे छोटे लक्ष्य रख कर देश प्रेम का भाव जगाना और फिर निरंतर जगाये रखना मोदी जी और गाँधी जी दोनों ने बखूबी किया है । इस तरह के जीवन्त नेतृत्व के लिए देश निश्चित रूप से दोनों का आभारी रहेगा।


एक और बात जिसमे दोनों के बीच  समानता दिखती है वह है जो मुझे समझ आये वही ठीक है फिर उसे मनवाने  के लिए तथा  ठीक सिद्ध करने के लिए साम दाम दंड भेद किसी भी हथियार को इस्तेमाल करना पड़े तो उसे निःसंकोच इस्तेमाल करना । जैसे सुभाष चंद्र बोस के योगदान को नकारना और उन्हें हाशिये पर पंहुचा देना। हालांकि सुभाष चंद्र बोस ने १९३८ और १९३९ दो  बार कांग्रेस अध्यक्ष  का चुनाव जीता किन्तु गाँधी जी की   नीतियों से असहमति के कारण उन्हें कांग्रेस को छोड़ना पड़ा। अन्य ऐसे कई और  उदहारण भी  है जहाँ गाँधी जी  ने अपनी बात मनवाने के लिए कुछ ऐसे  काम भी किये जिन्हे बहुत से लोग देश हित में ठीक नहीं   मानते है और शायद वह सही भी होंगे। किन्तु उन्होने इसे व्यहार में  किया और किसी भी आलोचना से डरे हुए किया। इसी तरह का व्यहार मोदी जी और उनके सहयोगी कर  है। यह ठीक है या गलत यह तो समय ही बतायेगा किन्तु इस वजह से जो कटुता का वातावरण निर्माण हो जाता  है वह कष्ट प्रद है।

व्यक्तिगत जीवन में भी दोनों में समानता  है।  मोदी  जी ने देश के लिए काम करना है इस हेतु अपनी ब्याहता पत्नी का त्याग किया और सार्वजनिक जीवन के ऊंचे मानदंडों को स्थापित करने के लिए परिवार का किसी भी प्रकार का हित   करने में कोई रूचि नहीं लिया। नतीजतन माँ और भाई तथा परिवार के अन्य लोग  आज भी छोटे से घर में साधारण जीवन बिता रहे है।  गाँधी जी की पत्नी और पुत्र दोनों ने गाँधी जी के परिवार के प्रति कर्त्तव्य निर्वहन ठीक से न करने की बात का जिक्र कई जगह किया है। दोनों का यह व्यहार किन मानदंडों पर अच्छा या खराब है यह तो कोई समाज शास्त्री ही बता सकता है। लेकिन महानता प्राप्त करने के लिए  आप के जीवन में जो लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है उनकी अनदेखी करना उचित है अथवा अनुचित यह प्रश्न निश्चित रूप से विचार योग्य है। और स्वस्थ  समाज के निर्माण में इसकी भूमिका भी है। 

आज गाँधी जी के साथ ही देश के दूसरे प्रधान मंत्री स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का भी जन्म दिन है। वही लाल बहादुर जिन्होंने देश में सादगी और ईमानदारी के नए प्रतिमान स्थापित किये और देश को तमाम मुश्किलों जिसमे पाकिस्तान के आक्रमण का मुहतोड़ जवाब देकर युद्ध जीतना और देश को अन्न की कमी से बाहर निकल कर  खाद्यान्न में आत्म निर्भर बनाना शामिल है का भी जन्म दिन है। देश के ऐसे महान सपूत को जन्म दिन की बधाई।

आज दिल्ली में किसान आंदोलनकारी होने माँगो को लेकर राजघाट पर प्रदर्शन करने के लिए आने का प्रयास करने पर पुलिस द्वारा उनकी पिटाई की गई जिसमे १०० से अधिक लोगो  चोट लगी है।  सरकार को इस स्थिति का अनुमान लगा कर इसे शाँति पूर्ण ढंग से निपटने की योजना बनानी चाहिए थी जिसमे सरकार फेल हो गई है। अहिंसा के पुजारी गाँधी के जन्म दिन पर ऐसी घटना केवल यह दिखा रही है की देश अभी भी हैव और हैव नाट्स के बीच बटा हुआ है। अंग्रेज बेशक देश से चले गए है लेकिन जो कोई भी शासन में आता  है उसपर उसी मानसिकता का असर आ जाता है।  नहीं तो अन्नदाता किसानों पर बर्बरता क्यों की जा रही है।  यही इस देश के नेतृत्व की परीक्षा है क्या हम वास्तव में गाँधी के सिद्धांतो पर चल रहे है या गाँधी के नाम पर व्यसाय कर रहे है ।   
  



अजय सिंह "एकल "


      

Wednesday, September 19, 2018

संघ का बदलता चेहरा : इति श्री भागवत कथा

दोस्तों ,

पिछले तीन दिनों से दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय स्वं सेवक संघ का 'भविष्य के भारत' संवाद के नाम से एक परिचर्चा का आयोजन चल रहा था जिसका समापन आज शाम को लगभग ९० मिनट प्रश्नोत्तर के साथ हुआ। इस तरह समाज के विशिस्ट लोगो के साथ बैठ कर खुली चर्चा और फिर तमाम सवालों के जवाब जिनसे संघ अधिकारी अक्सर कतराते दिखते थे, का जवाब खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत  ने दिया। यह अपनी तरह का पहला प्रयास संघ के द्वारा किया गया है। यह अति स्वागत योग्य कदम है। दुनिया के सबसे बड़े समाज सेवी संगठन जिसने समाज के सभी वर्गों में काम करके अपनी जगह बनाई है और अनेक वर्षो तक देश की सरकारों के विरोध के बावजूद उत्तरोत्तर प्रगति की है।  यह आयोजन  निश्चित रूप से  संघ के बारे में निहित स्वार्थी लोगो द्वारा राजनैतिक कारणों  से  अथवा व्यक्तिगत लाभ से प्रेरित  हो कर दुष्प्रचार का प्रभाव कम करने में सहायक सिद्ध होगा। शायद कार्यक्रम आयोजित करने के पीछे यह  एक महत्व पूर्ण कारण  भी होगा ऐसा मेरा मानना है। 

कई लोगो का कहना  है कि इस कार्यक्रम का एक उद्देश्य भाजपा को राजनैतिक लाभ पहुँचाना है परन्तु मुझे लगता है यह सोच बहुत संकीर्ण है।  हाँ इसका लाभ भाजपा को इसलिए मिल जाए की संघ के बारे में बहुत से लोग जो इसके बारे में सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करते थे उन  की राय बदल गयी है तो इसको कार्यक्रम आयोजित करने का कारण न मान कर केवल इसका प्रभाव मानना ज्यादा उचित होगा। 

दुनिया में बहुत कम संगठन है जिनकी आयु पचास वर्ष से अधिक है ख़ास तौर  पर सामाजिक संगठन जिसमे सीधा व्यक्तिगत लाभ हो की  सम्भवना नहीं रहती है, आर एस एस एक अपवाद माना जा सकता। जिसने तिरानवे वर्ष की आयु पूरी की है कोई संगठनात्मक विववाद या  बॅटवारा इत्यादि नहीं हुआ जबकि संगठन का कोई औपचारिक पंजीकरण तक
नहीं है। इतना बड़ा संगठन केवल आपसी विश्वास और ध्येय प्राप्ति के लक्ष्य को ध्यान में रख कर सब काम करता है। हालाँकि सरसंघ चालक जी ने प्रश्नोत्तर में यह साफ़ कर दिया की संगठन किसी अन्य पंजीकृत संगठन के लिए बने नियमो का कड़ाई से केवल पालन ही नहीं करता है अपितु उसमे श्रेष्टता भी हासिल किये हुए है। चाहे अर्थ व्यहार के खातों का ऑडिट हो अथवा संगठन का चुनाव जो हर तीसरे साल होते हे केवल एक बार आपात काल के दौरान विशेष परिस्थितयों में ही देरी हुई  है और उसे भी आपात काल के हटते ही १९७७ में करवाया गया। यानि हर स्तर पर अनुशासन का पालन। 


एक बात जो बड़ी महत्व पूर्ण है वह है किसी भी संगठन खास तोर पर सामाजिक संगठन उसको बहते पानी की तरह नए विचारों को अपनाना और जो समय के साथ अनुपयोगी हो गया है उसको बदलना या छोड़ना संगठन की प्रगति के लिए आवशयक है। इस विषय पर बोलते हुए संघ चालक जी ने  पूजनीय गुरु जी के भाषणों पर आधारित "बंच ऑफ थॉट्स" के बारे में भी कहा की उसको समय की आवश्यकता और परिस्थित के अनुसार की परखना चाहिए इसलिए इस पुस्तक में दिए गए विचारो में जो शास्वत है उनका एक अलग संग्रह प्रकाशित किया गया उस को पढ़ना चाहिए। अन्य महत्वपूर्ण बातो में संघ का नजरिया जो समय के साथ बदला है उस पर चर्चा करके न केवल आलोचकों को बल्कि  पुराने स्वयं सेवकों को भी चौंकाया है।

संघ का यह सराहनीय प्रयास है। उम्मीद करना चाहिए की संघ की इस पहल का समाज के उन वर्गों द्वारा जो ज़्यादातर कही सुनी बातो से अपनी राय बनलेते है उनकी समझ बढ़ेगी।  संघ में अधिक पारदर्शिता आएगी और समय के साथ  मूल सिद्धांतो से बिना समझौता किये हुए देश हित  में  अपना अनुपम योगदान देता रहेगा।  और यह प्रयास उन भ्रमों को दूर करने में सहायक सिद्ध होगा जिनका कई दशकों से सामना करना पद रहा है। 

अजय सिंह "एकल"










Saturday, September 15, 2018

*बड़े बावरे हिन्दी के मुहावरे*

हिंदी दिवस पर खास 


         
हिंदी के मुहावरे, बड़े ही बावरे है,
खाने पीने की चीजों से भरे है...
कहीं पर फल है तो कहीं आटा-दालें है,
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले है ,
फलों की ही बात ले लो...
 
 
आम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं,
कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं,
कहीं दाल में काला है,
तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती,
 
 
कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है,
तो कोई लोहे के चने चबाता है,
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है,
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है,
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है,
 
 
सफलता के लिए बेलने पड़ते है कई पापड़,
आटे में नमक तो जाता है चल,
पर गेंहू के साथ, घुन भी पिस जाता है,
अपना हाल तो बेहाल है, ये मुंह और मसूर की दाल है,
 
 
गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं,
और कभी गुड़ का गोबर कर बैठते हैं,
कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है,
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है,
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है,
किसी के दांत दूध के हैं,
तो कई दूध के धुले हैं,
 
 
कोई जामुन के रंग सी चमड़ी पा के रोई है,
तो किसी की चमड़ी जैसे मैदे की लोई है,
किसी को छटी का दूध याद आ जाता है,
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है,
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है,
 
 
शादी बूरे के लड्डू हैं, जिसने खाए वो भी पछताए,
और जिसने नहीं खाए, वो भी पछताते हैं,
पर शादी की बात सुन, मन में लड्डू फूटते है,
और शादी के बाद, दोनों हाथों में लड्डू आते हैं,
 
 
कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सबकी अपनी अपनी तकदीर है...
कभी कोई चाय-पानी करवाता है,
कोई मख्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है,
तो सभी के मुंह में पानी आता है,
 
भाई साहब अब कुछ भी हो,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है,
जितने मुंह है, उतनी बातें हैं,
सब अपनी-अपनी बीन बजाते है,
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है,
सभी बहरे है, बावरें है
ये सब हिंदी के मुहावरें हैं...
 
ये गज़ब मुहावरे नहीं बुजुर्गों के अनुभवों की खान हैं...
सच पूछो तो हिन्दी भाषा की जान हैं.







*कड़वा सच*

तारीफ किये बिना*
*कोई खुश होता नहीं ।*

*और*

*झूठ बोले बिना*
*किसी की तारीफ होती नहीं ।* 

Sunday, February 18, 2018

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा

युवाओं के मन मे एक प्रश्न का बना हुआ था *"कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा ?"*

अब इसका उत्तर मिल गया है और सिनेमा चला भी अच्छा है जो चलना ही चाहिऐ था ।

अब इस देश के लिए ये जानना जरूरी है कि 

*नेताजी सुभाष चन्द्र बोस* को क्यूँ और किसने मारा, 

*श्री लाल बहादुर शास्त्री* को किसने और क्यों मारा? 

*महात्मा गांधी* की हत्या के वह कारण क्या थे? 

इन दुर्भाग्यशाली घटनाओं से देश की पटरी ही बदल गयी।

युवाओं! ज़रा विचारो कि कहाँ कहाँ गलतियां हुई हैं.. काल्पनिक चरित्र कटप्पा से बाहर निकलो और *वो_पूछो_जो_तुमसे_जुड़ा_हुआ_है.....*

पता करो कि हम लगभग 1000 साल तक गुलाम क्यों रहे..

*पता करो कि जो देश आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, और वैज्ञानिक रूप से सशक्त था.. विश्व गुरु था ...वो सब ज्ञान कहाँ और कैसे खत्म हो गया..*

पता करो कि सोने की चिड़िया के पंख कैसे कतर दिए गए...

पता करो कि हमारे बच्चों को आजादी के बाद भी क्या और क्यूँ पढ़ाया जाता है...

पता करो! पाकिस्तान का स्थायी रोग किसने भारत को दिया? तब हुआ क्या-क्या था?

पता करो..! कि कश्मीर को नासूर बनाने का बीज नेहरू ने क्यों और कैसे बोया..?

*पता करो..! नेपाल के महाराजा के भारत में विलय के प्रस्ताव को 1952 में नेहरू ने क्यों ठुकरा दिया था?*

पता करो..! कि 1953 में UNO में भारत को स्थायी सीट देने के ख़ुद अमेरिका के प्रस्ताव को नेहरू ने क्यों गुमा दिया था? और वह सदस्यता चीन को क्यों दिला दी?

*पता करो कि 1954 में नेहरू ने तिब्बत को चीन का हिस्सा भारत की ओर से मान लिया था? बाद में 1962 में उसी रास्ते से चीन ने भारत पर हमला किया, हम हारे, बेइज़्ज़त हुए।*

पता करो ..! तिब्बत हारने के बाद नेहरू ने क्यों कहा था कि वो तो बंजर जमीन है, कोई बात नही.. जाने दो

ज़रा मालूम करो कि चीन से भारत की हार का दोषी नेहरू को मन्त्रालय की संयुक्त समिति ने सिद्ध किया था? उसके बाद भी नेहरू को जरा भी लाज नहीं आई थी 

यह भी जानो कि जब चीनी सेना अरुणाचल, असम, सिक्किम में घुस आयी थी, तब भी 'हिन्दी चीनी भाई भाई' का राग अलापते हुए भारतीय सेना को ऐक्शन लेने से नेहरू ने क्यों रोका था?

आप ख़ुद बाहुबली बनकर कारण जानो कि हमारा कैलास पर्वत और मानसरोवर तीर्थ चीन के हिस्से में नेहरू की ग़लती से चले गए?

और भी बहुत सारी गलतियां हैं जिनमें कांग्रेस को जरा भी शर्म क्यों नहीं आती है?

हे_युवा_देश...! अपनी दिशा और दशा बदलो। यह समय मज़ाक़ों का नहीं है,  वह करो जो करणीय है।

चिन्तन का विषय है-

देश के लोग ये तो जानते है कि चीन ने हमें 1962 में हराया पर ये नहीं जानते कि 1967 में हमने भी चीन को हराया था।  

चीन ने "सिक्किम" पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी. नाथू ला और चो ला फ्रंट पर ये युद्ध लड़ा गया था. चीन को एसा करारा जवाब मिला था कि चीनी भाग खड़े हुये थे.  इस युद्ध में, 88 भारतीय सैनिक बलिदान हुये थे और 400 चीनी सैनिक मारे गए थे. इस युद्ध के बाद ही सिक्किम, "भारत का हिस्सा" बना था !

इस युद्ध में "पूर्वी कमान" को वही सैम मानेक शॉ संभाल रहे थे जिन्होंने बांग्लादेश बनवाया था।

इस युद्ध के हीरो थे राजपुताना रेजिमेंट के मेजर जोशी, कर्नल राय सिंह , मेजर हरभजन सिंह.

गोरखा रेजिमेंट के कृष्ण बहादुर , देवीप्रसाद ने कमाल कर दिया था !! जब गोलिया ख़तम हो गयी थी तो इन गोरखों ने कई चीनियों को अपनी "खुखरी" से ही काट डाला था ! कई गोलियाँ शरीर में लिए हुए मेजर जोशी ने चार चीनी ऑफिसर को मारा ! वैसे तो कई और हीरो भी है पर ये कुछ वो नाम है जिन्हें वीर चक्र मिला और इनकी वीरगाथा इतिहास बनी !!

 

 

अंतमे 

परिंदे रुक मत तुझ में जान बाकी है।
मंजिल दूर है, बहुतों उड़ान बाकी है।।

यूँ ही नहीं मिलती रब की मेहरबानी 
एक से बढ़कर एक इम्तेहान बाकी है

जिंदगी की जंग में है हौसला जरुरी
जीतने के लिए सारा जहान बाकी है..।।