Wednesday, October 26, 2011

काजल की कोठरी

 प्रिय दोस्तों,

आपने ढपोर  संख की  कहानी तो सुनी ही  होगी. अरे वही जो हमेशा दूना देने की बात करता है . लेकिन वोह आपसे वोह बात कभी नहीं करेगा जो व्याहारिक हो और संभव हो.नतीजा बड़ी-बड़ी बाते और काम ,बस यही मत पूछो(कहानी पढने के लिए यहाँ क्लिक करे) .चलो अगर आपने अबतक न देखा और सुना हो तो हम आपको बताते है . आज के अनेक राजनीतिज्ञ भी ढपोर संखी है. आपने जन लोकपाल बिल माँगा तो उन्होंने संवैधानिक शक्तिओ से युक्त शक्तिशाली जन लोकपाल बनाने का वादा कर के जनता को ऐसा सपना दिखा कर बात टाली की अब बस करते रहो इंतिजार .क्योंकि इसकी संवेधानिक प्रक्रिया इतनी लम्बी होगी की यह एक सत्र तो छोडिये ४ में भी होने वाला नहीं तब तक चुनाव आ जायेंगे फिर आसान होगा जनता के सामने जाना और यह कहना  की हमने वादा तो कर दिया है लेकिन यह मिलीजुली सरकार में संभव नहीं तो हमें पूर्ण बहुमत दो फिर बनायेगे हम जन लोकपाल .बस फिर क्या अभी अगले तीन साल मौज मनाओ और अगले इलेक्शन  को जीतने की भी तैयारी हो गयी .क्या आप अब भी राहुल गाँधी को प्रधान मंत्री बनने के लायक नहीं मानते ?आप अब भी अमूल बेबी समझते है ? अमूल बड़ा हो कर  के अब मूल (मुख्य) हो गया है .


दुनिया में ४२ साल राजाओ की तरह रहने और २०० अरब डालर का बैंक बैलेंस बनाने वाले  कर्नल गद्दाफी की दुनिया से बिदाई  जिस तरह से हुई उस से पैसे को भगवान मानने और पैसे से सबकुछ हो सकता है यह समझने वालो की समझ में कुछ परिवर्तन आए और इस दिवाली हमारे देश के ए राजा और रानी की तरह रहने वाली कनिमोझी और इनके जैसे लोग जो एन कें प्रकारेण धन कमाने की चेष्टा में है उनको इस दीपावली में भगवान सद्दबुधी प्रदान करे  मेरी येही प्रार्थना है . हालाँकि यह इतना आसान भी नहीं है क्योकिं विनाश के समय भगवान बुद्धि भी विपरीत कर देता है .यदि ऐसा नहीं होता तो जनाब  सलमान खुर्शीद  साहेब जो इस देश का कानून मंत्री भी है , देश के साथ विश्वाश घात करने वाले कॉर्पोरेट जगत के जेल में बंद दिग्गजों के साथ सहानभूति   यह दलील दे कर न दिखाते की यदि इन लोगो को जेल में रखा गया तो देश में लोग व्यापार करने में डरेंगे और विदेशो से भी धन का प्रवाह रुकेगा.

लेकिन श्रीमान दिग्विजय सिंह जी की हस्ती तो वास्तव में अद्वितीय है और उनसे किसी भी सद्दाम या गद्दाफी को भी रस्क हो सकता है क्योंकि उनके ऊपर अन्तराष्ट्रीय दबाव थे और अपने देश में राजा होते हुए भी दुनिया में चौधराहट करने वाले अमरीका से डरते थे  .लेकिन दिग्विजय सिंह को तो कोई डर नहीं . तभी तो  कलमान्दी जो ८ महीने से जेल में बंद है की तरफदारी करते हुए उनकी जमानत की वकालत की है और किरण बेदी जिनके ऊपर हवाई  टिकटों  के किराये में ज्यादा पैसे वसूलने का आरोप लगा है और उन्होंने उसे वापस करने का भी वादा  किया है के बारे में बयान    दिया है की वापस करने से भी गुनाह कम नहीं होता ऐसे तो राजा भी वापस करके के  गुनाह बन सकते है .वाह भाई वाह करवा दीजिये एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ इस गरीब मुल्क के जहाँ अभी भी एक तिहाई जनता केवल एक बार का खाना जुटा पाती है.

आखिर अन्ना  साहेब और उनकी टीम भी राजनीत  और राजनीतिज्ञों के चक्कर में आ ही गए . और अब इन पर इतने दाग यह  राजनीतिज्ञ  खिलाडी लगा देंगे की थोड़े दिन बाद इनको भी लगने लगेगा की मेरे गुनाह भी उतने ही है जितने इनके तो फिर किस बात का झगड़ा . इसको कहते है राजनीत .अगर मेरी कमीज तेरी कमीज  से ज्यादा साफ़ नहीं तो क्या ,मैं तेरी कमीज अपनी कमीज से ज्यादा गन्दी तो कर ही सकता हूँ . तो अन्ना जी अब आप राजनीत के अखाड़े में आगये है और ये तो है कोठरी काजल की ,इसमें कितना भी सयाना  आदमी जाये मुश्किल ही है यदि  बिना दाग के निकल आए .इसलिए तैयार हो जाइये अपनी कमीज को साफ़ करने के बजाये दूसरो की गन्दा करना शुरू कीजये तभी मुक्ति मिलेगी.

 एक और दिवाली आ गयी लोग फिर खुशिया मनाएंगे ,बच्चे पटाके बजायेंगे लेकिन देश की ७० प्रतिशत जनता की आवाज कैसे मुल्क के रहनुमाओ तक पहुचाई जाये यह प्रश्न अभी भी मुहं फाड़े खड़ा है .


और अंत में मुल्क के रहनुमाओ से प्रार्थना :

  अधेरे में जो बैठे है , नज़र उन पर भी कुछ डालो

अरे  ओ  रोशनी  वालो  
बुरे  हम  है  नहीं  इतने , ज़रा  देखो  हमें  भालो                        
अरे  ओ  रोशनी  वालो  ... 

कफ़न  से  ओढ़  कर  बैठे  है , हम  सपनों  की  लाशो  को  
जो  किस्मत  ने  दिखाए , देखते  है  उन  तमाशो  को  
हमें  नफ़रत  से  मत  देखो , ज़रा  हम  पर  रहम  खालो   
अरे  ओ  रोशनी  वालो  ... 

हमारे  भी  थे  कुछ  साथी , हमारे  भी   थे  कुछ  सपने  
सभी  वो  राह  में  छूटे , वो  सब  रूठे  जो  थे  अपने  
जो  रोते  है  कई  दिन  से , ज़रा  उनको  भी  समझा  लो  
अरे  ओ  रोशनी  वालो  ... 

दीपावली की शुभकामनाओ सहित,
अजय सिंह "एकल" 


   

Saturday, October 8, 2011

और रावन फिर मर गया

मित्रो,
एक और दशहरा मन गया देश में , एक और रावण मारा गया . सैकड़ो वर्षो से यह खेल चल रहा है फिर भी रावन मर नहीं रहा है . पौराणिक कथाये बताती है की रावण तभी मरेगा जब तीर रावण की नाभि में लगेगा लेकिन यह

अकेले राम  के बस की बात नहीं है , इसके लिए एक अदद विभीषण चाहिए जो राम को बता सके की अमृत कहाँ छुपा है . लेकिन अब समस्या यह है की विभिषनो को रावण ने पटा लिया है . रावण ने जो गलती सतयुग में विभीषण को अपने दरबार से निकाल कर की थी उसका नतीजा उसने भोग कर यह सीख लिया की अब विभिषनो को जैसे भी हो सके अपने साथ ही रखना है अन्यथा यह यदि दूसरी तरफ चले गए तो फिर भेद खुल जायेगा .पर राम और उनकी सेना अभी भी सतयुग में अजमाए हुए तरीके को कलयुग में यह सोच कर अपना रही है की शायद रावण विभीषण को फिर धक्के मार कर अपने दरबार से निकलेगा और वोह आकर रावण का भेद बता देगा .यही फर्क  है राम और रावण में. एक गलती कर के सीख गया और दूसरा कलयुग में भी   सतयुग के चमत्कार का इंतजार कर रहा है. श्री राम को पता ही नहीं की  समय के साथ खेल के नियम भी बदल गए है.


वैसे भी सुना है रावण ब्राह्मण था , विद्वान  था और शिव का परम भक्त भी.इसलिए हिमाचल से लगा कर सुदूर तमिल तक बहुत सी राम लीलाए है जहाँ रावण मारा नहीं जाता उलटे उसकी पूजा होती है . इसके बहुत से कारण होंगे शायद कुछ रावण वंशी होने की वजह से, तो कुछ ब्राह्मण होने की वजह से या फिर शायद विद्वान होने वजह से रावण की पूजा करते होंगे .रावण वंशी और ब्राहमण होने के कारण रावण पूजा जाये तो इसमें  कोई आपत्ती नहीं लेकिन विद्वान होने की वजह से पूजा जाये तो  यह बात कुछ अजीब लगती है .

क्योकिं विद्वान तो इस देश का प्रधान मंत्री भी है और मोंटेक सिंह अहलुवालिया भी जो योजना आयोग   के उपाध्यक्ष है.  इनको  पूजने वाले कुछ विभीषण
तो हो  सकते है जिनको साथ रखना मनमोहन की मज़बूरी हो  और कुछ
विभीषण जो इनके राज जानते  है वोह इनकी तारीफ करते भी नजर आ सकते है पर देश की अधिसंख्य जनता  जिसको रोज कमा कर खाना पड़ता है और जो  जीने के लिए तिल तिल कर मर रही है इन विद्वानों की  पूजा नहीं कर सकती है . इसलिए  मनमोहन की टीम जिसमे ७०% लोग करोड़ पति है और  जिनके  लिए हवाई जहाज में इकोनोमी क्लास की यात्रा जानवर क्लास की यात्रा जैसा हो उनसे आप यदि इससे बेहतर व्यहार या नीति  निर्धारण की अपेक्षा कर रहे है तो   यह निश्चित ही गलती जनता की है जो विद्वान   रावण और स्वामिभक्त विभिषनो को अभी भी पहचान नहीं पा रही है.  

एक और फर्क  हो गया है सतयुग और कलयुग में . सतयुग में श्री हनुमान ने श्री राम की  सेवा की ,तो प्रसन्न  हो  प्रभु श्री राम ने आशीर्वाद दे दिया की मुझसे पहले तुम्हारी पूजा होगी  और तुम्हारे भजन  गाने वालो को भी मुझसे वैसा ही आशीर्वाद मिलेगा जैसा मेरी भक्ति करने वालो को .लेकिन कलयुग में जब अमर सिंह ने हनुमान बन मुलायम सिंह की तरफ से कांग्रेस पार्टी को अणु विद्युत् मसले पर दूसरी पार्टी के सांसदों को पैसे दे और मन मनौती कर तोड़ा और सरकार   बचवा दिया ,  तो राम ने   हनुमान को आशीर्वाद देने के बजाय उनको पहले तो पार्टी से निकाला और फिर जिनलोगो को  उनकी हनुमानगिरी से लाभ मिला उन्होंने अमर सिंह को    जेल भिजवाने का  इंतजाम  करवा दिया . यह है कलयुग का प्रभाव .इसका एक मतलब यह भी है की जो दावँ सतयुग में बड़े सफल रहे है वोह अब चलने वाले नहीं है . 

दरअसल सालो से हम यह भ्रम पाले हुए है रावण के मरने से रावणवत्व भी ख़तम हो जायेगा पर वास्तविकता यह है की  मर केवल रावण रहा और रावणवत्व जिसकी वजह से रावण ब्राहमण,विद्व्वान और भक्त होने के बावजूद मारे जाने योग्य माना गया  था वोह अभी भी जीवित है और विभीसनो ने भी यह समझ लिया है की राम का साथ देने से सोने की लंका तो भस्म हो जाएगी और जब सोना (धन- दौलत,चमक- धमक, मोहकता )   ही नहीं बचा तो फिर उस लंका का राजा अगर राम ने बना भी दिया तो क्या फायदा क्योंकि असली मजा लंका का राजा बन ने में नहीं बल्कि  सोने की लंका का राजा बन ने में है.इसलिए बेहतर है रावण का साथ दो और राजा भी उसे ही रहने दो अपन तो उसके मंत्री बन कर ही खुश  है. 
 और अंत में 

दरिया के किनारे गर,
 सिआसी लोग बस जाये ,
तो प्यासे लोग एक- एक,
 बूँद पानी को तरस जाये      
गनीमत है की मौसम पर,
इनकी  हुकूमत नहीं चलती
नहीं तो सारे बदल इनके,
 खेतो में बरस जाये.

अजय सिंह "एकल" 

Sunday, October 2, 2011

सूत न कपास जुलाहों का लट्ठम -लट्ठा

प्रिय दोस्तों ,

अगर आपने अबतक बिना सूत कपास के जुलाहों का लट्ठम -लट्ठा न देखा हो तो भाजपा के नेताओ में प्रधान मंत्री पद के लिए मचे घमासान को देख लीजिये ,हर कोई जल्दी  से जल्दी कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर खेले जा रहे खेल कौन बनेगा प्रधानमंत्री की हॉट सीट पर पहुँचने  के लिए जुगत में लगा हुआ है. कोई इन नेताओ से पूछे की जरा यह बताने का भी कष्ट करे की भूख ,आतंकवाद ,महंगाई से पीड़ित जनता को निजात दिलवाने में आप का  क्या योगदान  है . जनता को भय ,भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए आपके पास क्या योजनाए है इस पर कोई चर्चा ,कोई व्याहारिक नीत जिससे जनता को कोई राहत मिल सके   इस पर कोई श्वेत पत्र ,पर यह सब सोचने की फुर्सत कहाँ है ? यह तो केवल यह सोच -सोच कर खुश है जनता कांग्रेस से परेशान   है इसलिए इनको बहुमत मिल जायेगा.अब आखिर कर दूरदर्शन में बहस करने जिन नेताओ को बार -बार बुलाया जा रहा है उन्हें लगता की जनता बार-बार इनको देख रही है तो चुनते वक्त भूल थोड़ी जाएगी  . आडवानी जी को लगता है की अबकी नहीं तो कभी नहीं हालाँकि आला कमान ने संकेत दे दिए है, बयान आडवानी जी का भी आगया है लेकिन फिर भी लग रहा है की शायद रथ यात्रा से कुछ  बात बन जाये ,मोदी जी उपवास से शुरुवात  करके यात्रा भी कर लेना चाहते है कहीं ऐसा न हो रथ यात्रा के महारथी बाजी न मार ले जाये ,तो गडकरी जी सोचते है जब खुदा की मेहरबानी एक बार हो चुकी है तो दुबारा भी चमत्कार हो सकता है .डा. जोशी से लगा कर अरुण जेटली और सुषमा स्वराज मन ही मन गुलगुले पका रहे है और एक दुसरे को झटका देने को बेताब नजर आ रहे है.

सबसे बढ़िया खेल तो किया चिदम्बरम और प्रणव दादा ने. २ जी की आंच जब चिदम्बरम तक पहुंची तो मंत्री मंडल के वरिष्ठ  सहयोगी प्रणव दादा ने पहले तो तोप का मुंह चिदम्बरम की तरफ  घुमा  दिया ,लेकिन रिंग मालकिन सोनिया  ने जब दोनों को हंटर दिखाया तो दादा ने फटाफट बयान दे के चिदम्बरम की जान और अपनी लाज बचाई  .इस सारे खेल में जनता और विपक्ष देखते ही नहीं बल्कि  हाथ मलते रह गए मानो सारा झगड़ा २ जी घोटाले का न हो कर प्रणव और चिदम्बरम का रह गया हो, इसलिए इनका समझोता होते ही घोटाला भी ख़तम हो गया और जाँच की जरुरत भी. जनता हतप्रभ है बंदरो की लड़ाई में बिल्ली का रोल देख कर . चिदम्बरम तो इतने खुश है की उन्होंने सार्वजनिक बयान दे दिया है की अब उन्हें यह भी याद नहीं है की उन्होंने पद से इस्तीफा देने की पेशकश भी की थी,  है न कमाल आदमी ख़ुशी में सब कुछ भूल जाता है  और जनता  दुःख भरे दिन जो बेकाबू महगांई ,  आए दिन होने वाली       आतंकवादी घटनाओ और  रोज मर्रा की परेशानियों से निजात पाने के लिए एक-एक कर काट रही है और यह  सोच रही है की आधी तो कट गयी और  अब तो आधी ही बची है वोह भी जल्दी ही कट जाएगी .

भारत देश आज अपने दो महान सपूतो को याद कर रहा है .महात्मा गाँधी जो पैदा तो भारत में हुए लेकिन अपने काम से  विश्व धरोहर बन गए . गाँधी द्वारा पढाया गया  अहिंसा  का पाठ पूरे  विश्व में एक मिसाल बन गया है और इसकी ताकत समझ कर दुनिया में अनेक देशो ने अहिंसात्मक  तरीको  को अपना कर  सत्ता परिवर्तन किया है.और  भारत  में तो गाँधी नाम की ब्रांड इक्विटी इतनी है की यह नाम पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता पाने  की  गारंटी हो  गया है. खैर गाँधी  ने इस देश को जो दिया है वोह इस देश के लोग कभी भुला नहीं सकेंगे .

भारत के द्वितीय   प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दे कर देश की  खादान्य जरूरतों में भी  आत्मनिर्भर बनाया और सैन्य जरूरतों में भी .नतीजतन भारत १९६५ के युद्ध के बाद कोई युद्ध नहीं हारा. एक बात जो शास्त्री जी के प्रधान मंत्री बनने से सिद्ध हुई वोह यह की साधारण परिवार में पैदा हुआ और साधारण कद काठी का भी कोई आदमी यदि दृढ निश्चय के साथ कुछ करना चाहता है तो उसकी सहायता भगवान भी करते है और देश की जनता भी.

 हम सब भारत वासी शास्त्री जी के मार्ग दर्शन के लिए आभारी है और चाहते है की फिर शास्त्री जी जैसा साधारण लेकिन देश हित की बात सोचने वाला ,देश के लिए परिवार त्यागने वाला और देश हितो पर मर मिटने के तैआर व्यक्ति फिर देश का नेतृत्व करे .

और अंत में 
समय समय की बात है,समय समय का योग 
लाखो में बिकने लगे ,दो कौड़ी  के लोग 
अजय सिंह "एकल"

Sunday, September 25, 2011

हंगामा है क्यों बरपा

प्रिय मित्रो,

पिछले   कई   सप्ताहों से  देश और दुनिया में हंगामा मचा हुआ है .पहले एक भारतीय  ने जो  स्टैण्डर्ड और पुअर नामक अमरीकी संस्था के प्रमुख हुआ करते थे ,ने अमरीका में रहते और  अमरीकी कम्पनी में काम करते हुए उसकी रेटिंग कम कर के  कालीदास       की तरह उस डाली को ही निशाना बना दिया जिस पर वोह खुद  भी बैठे हुए थे और महाकवी कालीदास  की तरह ही अपना नाम इतिहास में दर्ज करा दिया .फिर बाबा रामदेव ने काले लोगो के धन (धन काला या सफ़ेद नहीं होता) को निशाना बनाया तो कई हफ्ते इस चर्चा में निकल गए . पिछले महीने अन्ना हजारे जी के आन्दोलन और अनशन  ने  भारत में  ही नहीं  दुनिया भर  में  हंगामा मचाया और लोगो को फिर गुजरात  में पैदा हुए  गाँधी की  याद दिला दी .

इस क्रम में सबसे ताजा हंगामा मचाया है गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेन्द्र मोदी के उपवास ने .कुछ कहते की यह उपवास प्रधानमंत्री बन ने के लिए मोदी का नाटक है और कुछ की निगाह में यह २०१२ के चुनाव में दुबारा सत्ता हासिल करने का हथकंडा .देश  के नेताओ  द्वारा तरह -तरह से देश का तमाम  धन खाने से भी  शायद इतना हंगामा नहीं मचा होगा जितना मोदी के उपवास से. कोई कहता है की इससे कलंक नहीं धुलेगा और कोई कहता है की नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को जा रही है. कोई इन बुद्धजीविओं     से पूछे की भाई बिल्ली चूहे खा कर भी अगर हज को चली जाये तो क्या बुराई है , इनके हिसाब से  तो बिल्ली को जिन्दगी भर चूहे ही खाते रहना चाहिए और गलती समझ आ जाये तो भी करते रहना चाहिए  क्योंकि इन नेताओ में इतना साहस नहीं है की जो दिखता महसूस होता है उसको भी स्वीकार कर सके  . नहीं तो पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की महबूबा मोदी  गुजरात में हुए विकास की  तारीफ  कर फिर मुकर न जाती और अब्दुल्ला को ट्विट करके उन्हें याद न दिलाना पड़ता.वैसे  इस तरह की बाते करने वालो में वही लोग आगे है जिनका पेट साठ साल देश को लूट के अपना और अपने रिश्तेदारों के  घर भरने  के बाद  भी नहीं भरा है और वह खाली  का  खाली है बिलकुल लैटर बॉक्स की तरह जो  सुबह से शाम तक भरने के बाद भी  अगले दिन फिर खाली का खाली ही रहता है. 

ये तो अच्छा हुआ ये कांग्रेसी नेता भगवान राम के ज़माने में नहीं हुए,  नहीं तो महर्षि   बाल्मीकि जो अपने आरम्भिक दिनों में लूटपाट किया करते थे और ज्ञान मिलने के बाद  राम-राम जप करके अपने समय के सबसे बड़े ऋषि भी कहलाये और राम कथा लिखने के साथ ही राम के दोनों पुत्रो और सीता माता  का भरण पोषण भी  किया और लव कुश को युद्ध में इतना कुशल बनाया की वोह दोनों बच्चे भगवान राम के अश्वमेधयुद्ध के घोड़े को पकड़ कर राम जो पुरषोत्तम भी थे और भगवान भी की  सत्ता को  चेलेंज कर सके और सीता माता के साथ हुए अन्याय   का एहसास भी  करवा दिया . ऐसे अनेक उदहारण इतिहास में मिल जायंगे जहाँ नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को भी गयी  और लोगो के लिए आदर्श भी रखा आखिर ये उनसे तो अच्छे ही  है जो नौसो क्या नौ हजार खाने के बाद भी हज नहीं जाना  चाहते है.


इस क्रम में एक और बात जिसने हंगामा मचाया है वोह है लाल कृष्ण अडवाणी की यात्रा .वैसे तो कृष्ण का एक नाम ही पार्थ सारथी है. पार्थ यानि अर्जुन के सारथी अर्थात  रथ को चलाने वाले .इस नाते से तो लाल कृष्ण अडवाणी जी का रथ यात्रा एक विशेषा अधिकार है (यथा नाम तथा गुण ) , और जब उन्होंने पार्थ सारथी की तरह अर्जुन रूपी  धर्म का रथ चलाया तो मोक्ष यानि सत्ता भी प्राप्त की और खूब आन्नद भी उठाया लेकिन यह बात तब की है जब एक तरफ कौरव थे और दूसरी तरफ पांडव .परन्तु  अब समस्या यह है की इस देश के पांडव (अर्थात धर्म मार्ग पर चलने वाले )  तो अज्ञात वास में  है इसलिए लड़ाई अब कौरव और पांडवो के बीच न होकर केवल  कौरवो के बीच है यानि दोनों ही तरफ कौरव है तो अब भगवान ही बता सकते है अबकी लाल कृष्ण किसका रथ हाकेंगे दुर्योधन का या फिर दुशाशन का. और अबकी बार युद्ध में विजय के बावजूद मोक्ष यानि प्रधान मंत्री की कुर्सी नहीं मिलेगी यह भी पहले ही  तय हो गया है तो रथ यात्रा और रथ यात्री का क्या होगा भगवान जाने.


 यानि और कुछ हो न हो हंगामा तो बरपे गा ही और कुछ दिन  और निकल जायेंगे भूखे पेट लोगो के इस हंगामे के बीच, जिनकी आमदनी 32 रुपये रोज से ज्यादा है और पेट भर के खाना भी नहीं खा  पाते है  और सरकारी सुविधाएँ  भी नहीं क्योंकि सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत में हलफनामा दाखिल कर दिया है की इतने रुपये कमाने वाले को इसमें जितना मिलता है उतना ही खाना चाहिए तो  सरकार की जिम्मेदारी खतम हो गयी  ,गरीबी  रेखा से नीचे लोगो की  जीवन की मूल आवश्यकताओं  की पूर्ति में सर खपाने की जिसका अधिकार उन्हें भारत के संविधान से मिला है . इसलिए अब सरकार के मुखिया और अधिकारी आराम से अपनी गरीबी दूर करने में अपना दिमाग और  श्रम लगा सकते है .
  और अंत में 
तब्दीलिया बस इतनी हुई,इन्क़लाब से 
कुछ नाम हट गए पुरानी किताब से .

अजय सिंह "एकल"









Sunday, September 18, 2011

जाके पैर न फटी बिवाई

प्रिय दोस्तों ,

ठीक समझा आपने ,इस देश ७० प्रतिशत लोग गरीब है और देश की संसद में ७० प्रतिशत करोड़पति है यानि संसद में ७० प्रतिशत जनता को ३० प्रतिशत संसद रिप्रेजेंट करते है और ३० प्रतिशत जनता को ७० प्रतिशत .और संसद में तो खेल नम्बरों का है यानि जिसके पाले में ज्यादा लोग वह ही जीतेगा और निर्णय उसके पक्ष में ही होंगे .मतलब  यह  की  जिनके हाथो में जिम्मेदारी है गरीबों  के  लिए पालसी बनाने की और उसको  लागू करवाने  की उन्हें न तो यह पता है की गरीबी क्या होती है और न यह की  वह  अपना जीवन चलाने के लिए कितना संघर्ष करता है  . तभी तो प्लानिंग कमीशन  के उप प्रधान श्री मोंटेक सिंह जो वर्ल्ड बैंक के पेंसनर भी है ,फरमाते है की २० रुपये रोज कमाने वाला आदमी गरीबी रेखा के ऊपर है यानि सरकार की कसौटियो  पर गरीब नहीं माना जाना चाहिए. ठीक ही तो है जिन लोगो की कमाई डालर में होती है और जीवन की सारी जरूरते   सरकारी सुविधाओ से मुफ्त में प्राप्त हो,एयर कंडीशन  दफ्तर से निकल कर एयर कंडीशन घर शानदार   एवं  आरामदेय लाल बत्ती लगी काली शीशे वाली विदेशी कार से  घर जाते है उन्हें  सड़क पर पैदल चलती और न पब्लिक वाहनों  में  धक्के खाती जनता  नजर आती है और न सब्जी या पेट्रोल के दाम बढ़ने का असर .ठीक ही तो कहा है की "जाके पैर न फटी बेवाई सो क्या जाने पीर पराई"

 कितनी विचित्र बात है  और  सबको पता है की  अमीर आदमी अपनी ताकत या तो धन बढाने में लगता है या फिर उसको बचाने   में. हाँ यदि इस उद्देश्य की पूर्ति में कुछ धन और समय खर्च हो जाये तो उतना वह इन्वेस्टमेंट  कर देता है लेकिन यह सूद समेत कैसे वापस आएगा इसकी व्यवस्था भी साथ -साथ करता जाता है. तो जब इनके हाथ खजाना लग गया तो फिर दूसरे लोगो को  लाभ क्यों लेने देंगे ,इसीलिए अन्ना हजारे को  अपने भ्रष्टाचार के खिलाफ  आन्दोलन  में मंच से यह घोषणा करनी पड़ी की जो आज मंत्री और सांसद बन बैठे है लुटेरे भी इन्ही में से है.अब यह बात जिनके लिए कही गयी  उन्हें बुरा तो लगना ही था .क्योकिं अब तक सार्वजनिक मंच पर यह चर्चा नहीं हुई थी इसलिए कहने वालो को नोटिस भी दी जा रही है और उत्पीड़न भी किया जा रहा है नहीं तो जनता इसको नेताओ की मौन स्वीकृत मान लेगी.

अब यह तो मानना तर्क संगत ही होगा की यदि माननीय सांसद करोड़ो रुपये  खर्च कर के संसद में पहुचेंगे तो उसको सूद सहित वापस प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.इसलिए चुनाव सुधार को अन्ना ने जन लोकपाल के बाद प्राथमिकता दी है.इस सम्बन्ध में कुछ सुझावों नीचे दे रहा ,इनमे  जो उचित लगे उनपर विस्तृत चर्चा की जा सकती है:



  1. ५०-७० प्रतिशत सीटे उनलोगों के आरक्षित हो जिनकी सालाना आमदनी २-३ लाख से ज्यादा न हो,ताकि यह अपने और अपनों को लाभ देने वाली योजनाये बनाये और उसका प्रभाव भी जल्द से जल्द पता लग सके.
  2. जो लोग एक से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हो उन्हें अतरिक्त  सीट पर होने वाले  खर्च को चुनाव आयोग के पास जमा करवा देने का विधान बने. पिछले चुनाव में लोकसभा की ५४२ सीटों पर करीब १० हजार करोड़ खर्च हुए थे इस हिसाब से प्रति सीट खर्च २० करोड़ के औसत से जमा करने से दुबारा होने वाले चुनाव का खर्चा सरकार को  नहीं उठाना पड़ेगा. और किसी की  व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का बोझ देश के कर देने वाले लोगो की जेब पर नहीं पड़ेगा .
  3. राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे को कर मुक्त करने के बजाये इसे  पार्टी की कर योग्य  आए माना जाये और उस पर टैक्स लगना चाहिए . आखिर अब राजनीत करने वाले लोग पेशेवर है और पार्टिया कंपनी की तरह तनख्वा भी देती है और अतिरिक्त सुविधाए भी, इसलिए इन्हें कर मुक्त करना न तो तर्क संगत है न न्याय संगत.
  4. जो कॉर्पोरेट घराने पार्टियों को चंदा देते है वह  वास्तव में कंपनी के खातो से होता है,जिसकी मालिक शेयर होल्डर जनता है न की कुछ शेयर ज्यादा होने की वजह से बने हुए मालिक ,इसलिए इन्हें अपनी मर्जी से उन उद्देश्यों के लिए पैसे खर्च करने का अधिकार नहीं है जो कंपनी के मूल उद्देश्यों  से मेल नहीं खाते है.इतना ही नहीं इनकी पहली जिम्मेदारी  नियमानुसार कानून के मुताबिक टैक्स भरने की है न की राजनैतिक पार्टियो को चंदा देकर उस से  किसी तरह बचने की.  इसलिए जिन कंपनियो ने सरकार के करोड़ो रुपये  आय कर, एक्साइज ड्यूटी ,कस्टम ड्यूटी इत्यादि न चुकाए हो उन्हें चन्दा देने के पहले टैक्स चुकाना चाहिए तथा  चंदा देने वाली कंपनियों को अनापत्ति प्रमाण पत्र चंदे के साथ देना चाहिए अन्यथा इनके द्वारा दिया जाने वाला पैसा टैक्स बचाने की नियत का हिस्सा बन जाता है और इस खर्चे को आय कर विभाग ख़ारिज कर ,कर योग्य आय मन सकता है,इस खर्चे  की स्वीकृत शेयर धारको  से भी ली जानी चाहिए.
  5. राजनैतिक पार्टियों का आय -व्यय खाता भी आम जनता के लिए इनकी वेब साईट पर  हो और इससे सम्बंधित प्रश्न सूचना  के अधिकार नियम के तहत दिए जाये.
  6. सार्वजनिक जीवन में काम करने  वाले सभी  व्यक्तियों की  सालाना आए व्यय जानकारी भी सार्वजनिक हो और इस से सम्बंधित जानकारी भी सूचना के अधिकार के तहत दी जानी चाहिए. सूचना गलत दिए जाने पर कड़े दंड का प्राविधान हो. उदहारण के लिए जिन मंत्रियो की संपत्ति में २०० से १००० प्रतिशत की वृधि दो सालो में हुई है वह यह बताये की इस आए का श्रोत क्या है और क्या इस पर नियम अनुसार टैक्स दिया गया है.इसमें कुछ भी अवैधानिक नहीं है आम आदमी को ऐसा करना पड़ता है तो सांसदों और मंत्रियो को इस से छूट देने का कोई कारण नजर नहीं आता है.
  7. राइट  टू रीकाल लागु हो और इसको प्रभावी एवं इकोनोमिकल बनाने के लिए मतदान में एक के बजाये दो उम्मीदवारों को  वरीयता के क्रम से विजयी घोषित किया जाये ,यानि किसी क्षेत्र के सांसद या विधायक को यदि उस इलाके की जनता वापस बुला ले तो दूसरी वरीयता प्राप्त विजेता को पहले के स्थान पर नियुक्ति मिले ,ताकि तुरंत दुबारा चुनाव करवाने के खर्च एवं प्रशासनिक कार्यो की जरुरत न पड़े.


और अंतिम बात:

ये तो तय था की मंजर बदल जायेंगे 
हालत जो बे काबू थे सुधर जायेंगे 
इक तुम जो खालो कसम इन्कलाब की 
वतन में हर तरफ बस अन्ना नजर आएंगे l 

अजय सिंह "एकल"
  












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Monday, August 15, 2011

डंडा ऊँचा रहे तुम्हारा

प्रिय पाठको,
६५वे  स्वतंत्रता दिवस  की बधाई देने में हर्ष भी हो रहा है और दुःख भी.हर्ष इसलिए की६४ वर्ष हो गए अंग्रेजो  को भारत छोड़े हुए और हमने इतनी उन्नत कर ली है की ऊंट और सपेरो का देश समझा जाने वाला  भारत आज दुनिया में एक आर्थिक महाशक्ति बन कर उभर रहा है.शिक्षा के क्षेत्र मे ,रक्षा के क्षेत्र में,सेवा के क्षेत्र में भारत ने नए मानदंड स्थापित कर दिए है .परन्तु शर्म इसलिए आ रही है आज भी  अन्ना हजारे  और स्वामी रामदेव को सरकार से उसी तरह लड़ना पड़ रहा  है  जैसे कभी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए महत्मा गाँधी ने  अंग्रेजो के खिलाफ जनमत तेयार   कर लड़ाई लड़ी थी . सरकार में बैठे लोगो को ऐसा लग रहा है जैसे अन्ना हजारे की लड़ाई देश हित में न होकर उनकी सरकार के खिलाफ है इसलिए पुलिसिया हथकंडे अपना कर और इनके खिलाफ दुष्प्रचार करके ही इनका अस्तित्व बना रहेगा .एक साधारण सी बात जो इनकी समझ के बाहर है की ये सदा के लिए न तो सरकार है और न हमेशा के लिए  मंत्री .अतः ऐसी बाते जो  तुम्हे अपने लिए अच्छी  न लगती हो वोह दूसरो  को कैसे कह सकते है.

 परन्तु सच है की आदमी को चीजे दो स्थितियो में छोटी दिखाई देती है एक जब वोह दूर से देखता है और दूसरा जब गरूर से देखता है. रावन को जब श्री हनुमान जी ने सीता माता को सम्मान पूर्वक  प्रभु  श्री राम के पास भेजने की बात कही  तो रावन ने अपने  मंत्रियो से सलाह  करने  के बाद श्री हनुमान की पूछ में आग लगवा दिया .जब सोने की लंका जल गयी तब पता चला की यह कोई मामूली बन्दर नहीं बल्कि प्रभु श्री राम का सेवक श्री हनुमान है .कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी और माननीय मंत्री एवं प्रमुख रणनीतिकार  श्री कपिल सिब्बल को भी मामूली बन्दर एवं श्री हनुमान का फर्क नजर नहीं आ रहा है और पद के प्रभाव में इतने मदांध हो चले है की लगता ही नहीं की यह भी इस देश के साधारण नागरिक है जिनको कुछ समय के लिए देश के मंत्री पद की जिम्मेदारी इस देश की आम जनता ने ही दी है और यह सदा के लिए नहीं है.इसलिए हे मानव श्रेष्ठ मंत्री जी स्वतंत्रता की६५वे वर्षगांठ पर झंडा ऊँचा रहे हमारा का ही गीत गाइये और डंडा ऊँचा रहे हमारा को भूल  जाइये .नहीं तो याद रखियेगा समय बड़ा निर्दयी होता है .
प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले की प्राचीर से  झंडा फिर फहरा दिया और कुछ वादे भी कर दिए ,साथ में यह भी बताना नहीं भूले की वह जादूगर नहीं,जो पिछले कई सालो से सरकार के वित् मंत्री और स्वयं प्रधानमंत्री भारत की जनता को अपनी सरकार की विफलताओ के दोष से बचाने के लिए कहते आ रहे है. तो जनता इनको जादूगर न मान कर सपेरा मानने लग गई है जिसके पिटारे में हर क़िस्म के साँप है जो अभी जनता को डस रहे है और मौका लगते ही मंत्री परिषद् में भी अपना हुनर दिखा सकते है.अतः जनता को तैआर रहना होगा इन सापों से डँसे जाने से.

स्वतंत्रता संग्राम में जिन लोगो ने तरह -तरह की आहूतिया दी उनमे एक नाम श्री श्याम लाल गुप्त का है जिन्होंने एक प्रसिद्ध गीत तिरंगे झंडे पर लिखा था .यह गीत १९३८  में कांग्रेस के अधिवेशन में प्रेरक गीत की तरह गाया गया था.इस अवसर पर उन्हें याद कर में देशवासियो की ओर से श्रधांजली देना चाहता हूँ .साथ ही आंध्र प्रदेश केश्री प.वेंकैया जिन के बनाये हुए तिरंगे को इस देश ने राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार किया किया है ऐसे दोनों स्वतंत्रता सेनानियो को मेरा नमन.

                                             विजयी  विश्व तीरगा   प्यारा 
                                              झंडा ऊंचा रहे  हमारा!!
         सदा  शक्ति  सरसाने  वाला , प्रेम  सुधा  बरसाने वाला
वीरों  को हरषाने  वाला, मातृभूमि  का  तन -मन   सारा ;
विजयी विश्व तिरंगा  प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे  हमारा!!
आओ  प्यारे  वीरों आओ , देश -धर्म  पर  बलि  बलि जाओ 
एक  साथ  सब  मिलकर  गाओ , प्यारा भारत  देश हमारा;
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा!!
शान  न  इसकी  जाने  पाए , चाहे  जान  भले  ही जाए 
सत्य  की विजय  कर  दिखलाये , तब  होवे  प्रण पूर्ण   हमारा

विजयी  विश्व तीरगा   प्यारा ,
झंडा  ऊंचा  रहें   हमारा ;

लेखक : श्री श्याम लाल गुप्त, कानपुर
             


अजय सिंह "एकल"

Friday, July 22, 2011

तो दाग भी अच्छे है.......और दागी भी..

प्रिय जनों,
"अरे मौसी बसंती का हाथ मेरे दोस्त  वीरू के हाथ में दे दो" , "अरे तुम का कहत हो सगी माँ ना सही पर हूँ तो बसंती की मौसी ऐसे वैसे के हाथ में कैसे दे दूँ" ."मगर  मेरा दोस्त तो  निहायत ही शरीफ है ,केवल एक ही लत है जुएँ में हारने के बाद थोड़ी सी पी लेता है और पीने के बाद मनोरंजन के लिए कोठे पर चला जा जाता है बस . "अब ये लो दोस्त जुआ खेलता है शराब पीता है कोठे पर जाता है और फिर भी शरीफ है वाह भई  वाह दोस्त हो तो ऐसा " मनमोहन सरकार की कहानी भी कुछ-कुछ  रमेश सिप्पी की पिक्चर "शोले " की तरह ही  लगती है .

मनमोहन सरकार के   मंत्रियो  और  कार्पोरेट की मिली भगत अब जग  जाहिर हो चुकी है,कामन वेल्थ खेलो के मुखिया के टीम सहित अंदर  हैं , कनिमोझी को अदालत जमानत देने में घबरा रही है ,चिदंबरम के ऊपर भी कई  आरोप लग रहे हैं  , वित् मंत्री के कार्यालय की जासूसी करने में  भी सरकार में शामिल लोगो के हाथ का शक है ,प्रधान मंत्री के सबसे काबिल और प्रिय मंत्री सिब्बल का रिलाएंस प्रेम जाहिर हो गया है ,इसके पहले भी वे 2G घोटाले में भी बयान  दे कर राजा को भी पाक साफ़ साबित करने की कोशिश कर चुके है. रामदेव के साथ जो खेल उन्होंने देश के सामने किया उस पर मनमोहन जी खेद तो     प्रगट कर रहे है लेकिन कहते है की कोई और उपाय नहीं  था. 

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में फिर बम  धमाके होने के बाद गृह मंत्री ने बड़ा संतोष जाहिर किया की उनकी वजह से आतंकवादी हमला ३२ महीनो बाद हुआ इसके लिए उन्होंने आतंकियों का भी धन्यवाद किया और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिस और सुरक्षा कर्मियों का भी.केवल यह नहीं बताया की जो योजनाये २६ /११ के बाद बनी थी उसमे कितनी शुरू हुयी है . और भविष्य में आतंकी हमले न हो इसके क्या उपाए सरकार ने किया है.   राहुल  गाँधी ने भी सरकार की तरफ से देश को यह बता दिया की हालाकिं सरकार ९९ प्रतिशत हमले रोक लेती है लेकिन १ प्रतिशत को रोकना मुश्किल ही नहीं असंभव है इसलिए जब भी कोई आतंकी हमला देश पर हो तो वोह १% ही माना जाये और जो नहीं हुए उनको यह मान लिया जाये की ९९% हैं. यानि खेल के नए नियम भावी प्रधान मंत्री ने लिखने शुरू करदिये .   आप के बाकी   के सिपाह सालारो ने भी हमेशा की तरह पुराने डायलागों को दोहरा कर अपने कर्तव्य की इत्श्री करली .दो मंत्री हमलो की खबर के बाद फैशन शो देखने चले गए और जब उनसे लोगो ने सवाल किया तो जवाब बिलकुल सीधा था की पहले से प्रोग्राम तय था और अपने वचन का पालन भी तो करना था ,इतने बड़े देश में कुछ न कुछ तो होता ही रहता है .

श्रीमान दिग्विजय सिंह जी ने भी हमेशा की तरह  अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए मुसलमानों के  आतंकी घटना में शामिल   होने पर भी  लगे हाथ अपनी शंका जाहिर कर के संघ को भी घेरे में ले लिया और  कांग्रेस के पक्ष में  सबसे ज्यादा वोटो को प्रभावित कर के नंबर कमा लिए, और दल के बाहर  ही नहीं अन्दर के विरोधिओं को धोबी पाट लगा दिया . इतना ही नहीं कलमाड़ी और ए राजा को कोर्ट जमानत दे इसकी भी वकालत करदी और सुर्ख़ियों में छा गए . मैं तो सोच रहा था की मंत्रिमंडल विस्तार में इनको "बयान मंत्री" की कुर्सी तो पक्का  मिल जाएगी .

लेकिन सबसे ज्यादा धन्यवाद के पात्र तो आप है जो सोनिया जी को लेकर मुंबई के दुखी लोगो को बातों का मरहम (lip service) लगाया और जनता के साथ नेताओं को खुश कर फिर अपनी साफ और सुन्दर छवि को बरक़रार   रखा .


वैसे भी भारत सरकार जिसके की आप मुखिया है उसको चलाने की जिम्मेदारी आपने  राष्ट्रीय सलाहकार समित बना कर उसकी चेयर पर्सन  सोनिया जी को दे रखी है . आपके  मंत्रिमंडल में शामिल नवजवान मंत्री राहुल गाँधी की देख रेख में काम करते है और गटबंधन के मंत्री अपने -अपने आकाओं की सुनते है, हाल में हुई कालका मेल दुर्घटना में घायलों  का हालचाल पूछने को जब आपने रेल राज्य मंत्री मुकुल राय को  निर्देश दिया तो उन्होंने आपकी राय को अनदेखा कर के अपने बॉस यानि ममता बनर्जी के लिए काम करना बेहतर माना.ठीक है आप अपने को मजबूर प्रधान मंत्री चाहे न माने लेकिन सच्चाई तो यही है यानि यह भी मज़बूरी की इसको सार्वजानिक रूप से स्वीकार नहीं करसकते है. चलिए आप ने भी अपना मन ठीक ही बना रखा है जब तक गद्दी है मौज करों ,इतनी राजनीत  तो ७ साल में आप भी सीख   गए है की दूसरो  के सर पर कैसे दोष मढना है. अगर केवल अख़बार और टीवी  संपादको को चाय पर बुला के बयान देने से ,और राहुल के लिए रात्रि रक्षक (night guard) की तरह काम करके  सरकार का मुखिया बने रहा जा सकता है तो दाग भी अच्छे है और दागी भी .


जरा चाटुकारों की भीड़ को पास से हटा कर तो  देखिए की इस देश के दामाद श्री राबर्ट बढेरा कैसे सबसे तेजी से अरबपति बनने में कामयाब हो    गए है और देश के भावी प्रधान मंत्री राहुल गाँधी जी अपने नवजवान साथियों के साथ क्या -क्या रंगरेलिया कर रहे है . कहीं ऐसा न हो की पिछले स्वतन्त्रा दिवस पर दिया गया  आपका बयान की आप की कैबिनेट जवाहर लाल की कैबिनेट से बेहतर है  का मतलब यह निकले की जवाहर लाल के मंत्रियो की जो कोशिशे देश का सत्यानाश करने में कामयाब न हो पाई उनको आप के काबिल मंत्रियो की फ़ौज ने कर दिखाया  और आप भी देश को लूटने वालो के सरताज बन जाये . अभी भी समय है कांग्रेस का हाथ को   गरीब के साथ ही रहने दीजिये उसको  गरीब के गाल पर चपत न बनाइये . संप्रग सरकार के ७ साल के सुशासन ने गरीब की जिन्दगी वैसे ही महंगाई के कारण नरक हो गई है. आपके मंत्री महंगाई की तुलना करते हुए कहते है की यह नेपाल और बंगला देश में भी बढ़ी है लेकिन जब आतंकी हमलो की बात होती है महा सचिव  दिग्विजय जी कहते है यहाँ से ज्यादा हमले पाकिस्तान में हो रहे है .वाह भई वाह महंगाई की तुलना नेपाल से और आतंक की पाकिस्तान से .मतलब यह  की जहाँ से जो अच्छी चीज मिली ले ली. वाकई आप और आपकी कैबिनेट  दोनों लाजवाब है .


अजय सिंह "एकल"

Sunday, June 5, 2011

दिल्ली के ठग

जनाब,
दिल्ली का ठग नाम से एक पिक्चर आई  थी १९५८ में कलाकार थे, किशोर   कुमार  और नूतन .अब इसका      री मेक बना है ४ जून २०११ में .फिल्म का एक टेलर अप्रेल २०११ को भी हुआ था जंतर मंतर में  जिसमे अन्ना   हजारे ने हीरो प्ले किया ,परन्तु  जब दिल्ली के राम लीला मैदान में योग गुरु राम देव  के नेतृत्व में देश दुनिया से आए हुए लोगो को लेकर काले धन के खिलाफ भक्तो की अपार भीड़ के साथ   पिक्चर  शुरू हुई तो दिल्ली के ठगों जो बिहार ,बंगाल पंजाब तमिलनाडु इत्यादि के साथ दिल्ली में आ मंत्री बन बैठे है  का भी दिल मुश्किल  में पड गया ,हालांकि बाबा के ३ जून को हवाई जहाज से उतरते ही  दिल्ली के ठगों    ने बाबा को हैंडिल करने की कोशिश की और जब हैंडिल नहीं हुए तो मैन-हैंडल कर दिया . नतीजतन राम देव के खिलाफ कपिल सिब्बल का  विलेन प्ले सबके सामने आगया .

कहते है की जब रोम जल रहा था तो वहां का  राजा  नीरो बंसी बजा रहा  था , (यहाँ सोनिया चैन की बंसी बजा रही है लगता है रोम वाले ऐसे ही होते है) मुझे नहीं पता की जब दिल्ली के राम लीला मैदान में लाठिया चल रही थी तो इस महान    लोकतान्त्रिक देश का प्रधान मंत्री कहाँ चैन की नींद सो रहा था और देश का गृह  मंत्री कहाँ कपड़े    बदल रहा था अथवा ठगी का प्लान बना रहा  था, क्योंकि कार्यवाही रात में एक बजे शुरू हुयी लेकिन  ९ बजे सुबह तक केवल दिग्विजय सिंह जो ओसामा को ओसामा जी कहते हैं,अफ्जलं गुरु को फांसी न होने पाए इसके लिए तरह -तरह के बयान देते है,आजमगढ़ जा कर आतंक वादियो को विश्वास दिलाते है की उनके रहते उन्हें चिंता की जरुरत नहीं , वोह सबसे पहले करोडो लोगो के पूज्य एवं श्रद्धा के पात्र   स्वामी को ठग कहते और उनकी संपत्ति की जाँच की मांग करते हुए नजर आए . अब मुझे समझ आरहा है की खून के रिश्ते कितने असर कारक होते हैं .

इतिहास में पढ़ा था की अंग्रेजो के साम्राज्य में  सूरज कभी डूबता नहीं था.अंग्रेज अभी भी निश्चिन्त रह सकते है की उनका सूरज कम -से - कम भारत में अभी डूबा नहीं है .बेशक चमड़ी का रंग कुछ श्यामल हुआ हो और शक्ले हिन्दुस्तानियो जैसे लगती हो पर जून ७४ का आपातकाल और आज दिल्ली के राम लीला मैदान ने फिर याद दिला दिया है की जलिया  वाला बाग़ में गोली चाहे इंग्लैण्ड से आये हुए जनरल डायेर ने चलवाई हो ,लेकिन अब जनरल जैसो को इंग्लॅण्ड से आने की जरुरत नहीं पिछले ६० वर्षो में अब हम अब हमारा देश इतना समर्थ(self sufficient) हो गया है की हमने अंग्रेजो की पूरी नस्ल यही पैदा करनी शुरू कर दी है. 

वैसे ठगने की घटनाये अतीत में भी हुई है मसलन सावित्री के पति सत्यवान की जान ले कर जब यमराज जा रहे थे तो सावित्री ने एक ऐसा वरदान मांग लिया जिसको देने के बाद यमराज अपने को ठगा महसूस करने लगे परन्तु वरदान देने का बाद उसका पालन करने हेतु उन्हें सत्यवान को जिन्दा करना पड़ा. ऐसी ही योजना बाबा रामदेव ने भी बनाई थी ,लेकिन इस बार मामला उल्टा पड़ गया .अब आप ही बताइए की अपने डेथ वारंट पर बाबा के कहने से कोई कैसे साइन कर सकता है .जरा गंभीर मसला है सो ध्यान से समझना होगा . विदेशो में जमा धन ८० फीसदी नेताओ का है और २० फीसदी व्यापारियो का .बात ये है की व्यापारी अपने पैसे को  आइडल यानि अन प्रोडक्टिव  नहीं रखता , उसके पास काले धन को इन्वेस्ट करने के मौके है इसलिए उसको इन्वेस्ट  कर वोह उससे और धन पैदा करता है ,जबकि आम तौर पर  नेताओ के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती और थोडा बहुत अपने विश्वाशपात्रो की मदद से इन्वेस्ट करने के अलावा धन को सुरक्षित जगहों (Tax haven) पर जमा करना उनकी मज़बूरी है .हर रोज डील पर डील होती है और पैसे का जेनेरेशन  लगातार होता है ,अब बाबा कहते है की ऐसा विधान बना दो की पैसा राष्ट्रीय सम्पति घोषित हो जाये और ऐसा करने वालो को मृत्यु दंड अथवा आजीवन कारावास मिले, एक बार को तो सरकार भुलावे में आ ही गयी थी और ऐसा दिखावा किया की मानो वोह समझ  नहीं पाई  और बाबा ने भी ९० प्रतिशत बातें सरकार ने  मानली है ऐसी  घोषणा भी कर दी , दरअसल ये यह छोटे ठग पर बड़े का दावं था  .सरकार ने सोचा की एक बार ऐसा दिखाने से कि बाबा की सारी मांगे मान ली है बाबा का अनशन  ख़तम हो जायेगा लोग चले जाएँगे और फिर बात ख़तम . लेकिन बाबा शातिर निकल गया उन्हें ये बात समझ आगई  और उन्होंने चिठ्ठी से मानने से मना कर दिया और कहा कि विधान लाओ , जैसा की अन्ना ने भी सावधान किया था , तब सरकार में बैठे ठगों को लगा की बाबा को ठगना आसान नहीं है तो फिर आगे वही किया सरकार ने जो होना चाहिए था अर्थात सोते हुए निहथ्थे लोगो को डंडा ,लाठी और गोली के द्वारा डरा धमका कर आम लोगो लो भगा दिया और बाबा के खिलाफ  तड़ी - पार के आदेश कर दिए गए तथा १५ दिन दिल्ली में बाबा के  प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है . जो सरकार देशद्रोहियो को बिरयानी खिलाने के लिए जिन्दा भी रखती है और पास भी ,उसी सरकार को बाबा के दिल्ली में रहने पर खतरा महसूस होता है .बात सिंपल है  जिस दिल्ली में बड़े -बड़े ठग रहते हो वहां छोटे ठगों का प्रवेश वर्जित होना ही चाहिए ,तभी दिल्ली का अंतर्राष्ट्रीय स्टैण्डर्ड बनेगा. 
अभी लड़ाई जारी है .अब लड़ाई में दूसरे दलों के नेताओ ने जो थोड़े छोटे ठग है उन्होंने भी हाथ बटाने का निर्णय किया है .भाजपा के लोग राज घाट पर  गाँधी की समाधी पर अनशन करेंगे मुलायम और मायावती भी बाबा का लड़ाई में साथ देंगी यानि अब मोर और सांप एक डाली पर रहेंगे .और भी कई रणनीतिया  बनेगी देखना है की निर्णायक लड़ाई की बाजी किसके हाथ लगती है.

अजय सिंह "एकल"














Thursday, May 19, 2011

मुंबई मे छोरा,पाकिस्तान मे ढिंढोरा .

  
दोस्तों, 
इसे कहते हैं सफलता ,इसे कहते है तेजी .भारत सरकार ने आखिरकार ५० ऐसे आतंकियो की सूची जारी कर दी जिनकी अरसे से देश को तलाश थी .जारी लिस्ट के कम से कम दो लोग पहले से ही हिंदुस्तान में थे. 

फिरोज अब्दुल खान नामक आतंकी पहले से ही भारत
 की जेल में बंद है और वजाहुल कमर खान नाम का  दूसरा आतंकी  जरा जेल के बाहर था और अपने परिवार के साथ मुंबई के पास में जिला ठाणे में रह रहा था ,और  बाकायदा अपनी अदालती तारीखों में पिछले कई वर्षो से अदालत में जा रहा था यानि पुलिस और अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज था .

अब लोग ये कह रहें है की गृह मंत्री चिदंबरम की गलती है और उनकी टीम नाकारा है , कल दबाव में उन्होंने भी यह कह दिया की चलो मानवीय गलती हो गए होगी  ,जब बड़े काम करने हो तो छोटी -मोटी गलती हो  ही जाती है.
पर मै तो कहता हूँ  इससे ज्यादा अच्छा क्या हो सकता है की  जिसे वोह  पाकिस्तान से लाना चाहते थे वो 
इनकी ही जेल मे बंद  था. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता चेतक मे राणा प्रताप के   प्रिय एवं स्वामिभक्त घोड़े का जिक्र कुछ यों किया है "राणा की पुतली फिरी नहीं तबतक चेतक मुड़ जाता था " उसी तरह अब हम निश्चिन्त  हो कर कह सकते है की गृह मंत्री  चिदम्बरम के हाथो में देश सुरक्षित है और उनकी टीम इतनी प्रतिभाशाली है की सूची जारी होने से पहले ही अपराधी जेल मे आ जाता है .वैसे फिल्म स्टार मनोज कुमार की  एक पिक्चर थी " दस नम्बरी"  उनका कहना भी यही था की ऊँगली देखते ही ताला खुल जाता था  और इशारा  पाते ही मॉल उधर का इधर हो जाता था वगैरा -वगैरा .तो भाई साहेब अब आपने देख लिया न चिदम्बरम की टीम के चेतक और दस नंबरियो की करामत इसलिए इसे अब उनकी गलती बताने के बजाये इसको राष्ट्रीय  अभिमान बताना चाहिए .और इनको हिंदुस्तान का प्रधान मंत्री बनाने के लिए प्रयास होना चाहिए .आप विश्वास कीजिये  पाकिस्तान और अमरीका मिलकर यह कर सकते है .आखिर जब इनके कहने पर दूसरे  मंत्री बन सकते है तो प्रधान मंत्री क्यों नहीं. और अब तो लादेन भी जिन्दा नहीं है अमरीका के मंसूबो को रोकने के लिए .हालाँकि अमरीका को पता है की मनमोहन कौन निर्णय अपने आप करते है वो भी तो हिंदुस्तान मे विदेशियो का ही हित साधते है नहीं तो कात्रोची कैसे छूट जाता और विदेशो मे जमा धन वापस लाने के लिए क्यों प्रयास नहीं किये जाते. इसे कहते है की मुंबई मे छोरा और पाकिस्तान मे ढिंढोरा .

राष्ट्रीय शर्म की बात तो राहुल गाँधी ने पहले ही मान ली  है भट्टा परसोल मे .राहुल का कहना है की ग्रेटर नॉएडा के भट्टा परसोल मे जितनी ज्यादती किसानो के साथ हुयी है इससे उन्हें अपने को  भारतीय कहने कहने मे शर्म आ रही है .मुझे थोडा भ्रम हो गया यह सुनकर .मैं सोंच में पद गया  की उन्हें  शर्म तब क्यों नहीं आई जब जैतपुर मे किसानो की उपजाऊ जमीन बिजली संयंत्र लगाने के लिए ली गयी , किसानो पर लाठी चलाई गयी और किसान मारे गए क्योंकि वहा प्रदेश मे सरकार कांग्रेस की है , और काग्रेस राज मे ये तो आम बात है दरअसल शर्म इस बात पर है की कांग्रेस के रहते किसानो की पिटाई और लूट का काम माया वती की पार्टी ने कैसे कर दिया .और उस पर तुर्रा यह १९ मई को प्रदेश सम्मलेन मे राहुल ने यह घोषणा भी कर दी की अब हम उत्तर प्रदेश के हर गाँव -गाँव मे वो करंगे जो ग्रेनो मे हुआ .मेरी तो रूह कॉप रही है राहुल की बात सुन कर.

कांग्रेस सम्मलेनके समापनमे सोनिया कहती है जिनके घर शीशे के
होवो दूसरो  पर पत्थर नहीं फेकते  है ,मुझे नहीं पता नहीं की वक्त पिक्चर मे यह 
 डायलाग जब बोला गया थातो उसका मतलब क्या रहा होगा पर इतना पक्का है इस डायलाग को राजनीतिज्ञ बखूबी इस्तेमाल कर रहे है और वो विरोधी पार्टी को यह ही बताना चाहते है की भाई न तुम मेरी कहो न मै तुम्हारी कहूँ , जनता का क्या वो तो है ही आम जनता जिसको आम की तरह चूस कर   राजनीतिज्ञ गुठली की तरह कभी भी फेंक सकते है ,इसलिए जब सत्ता मे तुम  हो तो तुम और जब मेरी बारी हो तो हम .अगर ऐसा नहीं होता तो अंतर्राष्टीय बाज़ार मे कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर भी हमने  देश मे इलेक्शन ख़तम होने के पहले तेल के दाम बढ़ने नहीं दिया और इलेक्शन परणामो के २४ घंटे ख़तम होने के पहले दाम बढ़ा दिए और ये तो तब है जब हमने पेट्रोल की कीमतों पर से सरकार का नियंत्रण हटा दिया हैऔर तेल कंपनियो को दाम तय करने का अधिकार दे दिया है  . अब हम जनता की सोचे की अपने सत्ता मे रहने का जुगाड़ करे .जनता का क्या है थोड़े दिन मे भूल जाएगी वैसे भी हमने इतनी परेशानिया जनता के लिए खड़ी कर रखी है की वो उनको सुलझाने मे ही निपट जाएगी  .और फिर इलेक्शन मे तो अभी बहुत दिन है . इलेक्शन होगा तो फिर कोई लाली पाप थमा देंगे.लेकिन हम और तुम तो शीशे के घर मे है इसलिये पत्थर न फेके और न दूसरे को ऐसा करने को उकसाएँ नहीं तो जनता जान जाएगी हमारा  सच . 

अब इतना  सबकुछ जानने के बाद हम तो केवल ये ही कह सकते है की "बर्बाद गुलिश्ता (प्रदेश ) करने को बस एक ही उल्लू  काफी है ,अंजामे गुलिश्ता क्या होगा हर साख पर उल्लू बैठा है". इसको पढ़ कर आप बुरा न माने उल्लू लक्ष्मी की सवारी है और हर समझदार आदमी चाहता है की लक्ष्मी उसके पास रहे यानि सवारी करे.  



अजय सिंह "एकल"