Saturday, May 9, 2015

अँधा नहीं है कानून

दोस्तों ,
समय के साथ सब कुछ बदलता है। सुना था की कानून अँधा होता है वोह अमीर गरीब नहीं देखता , यह भी सुना था की कानून के हाथ बहुत लम्बे होते है और शातिर से शातिर आदमी तक कानून के लम्बे हाथ देर सबेर  पहुंच ही जाते है।  समय के साथ जो अनुभव आये तो पता चला की सब समीकरण बदल चुके है। कानून  भी अमीर गरीब देख कर न्याय करता है।  जैसा की आज मुंबई हाई कोर्ट  की अदालत ने सलमान खान के केस में किया। 

तेरह साल तक शेशन कोर्ट ने "हिट और रन"नाम के जिस मुकदमे को सुना और अपना निर्णय सुनाया उसे हाई कोर्ट ने एक दिन में पलट दिया। इस मुक़दमे को खतम करने की एक बार पहले भी नाकाम कोशिश सेशन कोर्ट के लेवल  भी हुई थी, लेकिन न्याय मूर्ति ने उसे फिर जिन्दा किया दुबारा गवाहियाँ हुई और अंत में निर्णय भी दे दिया। सेशन कोर्ट ने  कानून के अंधे होने के सिद्धांत को माना और बिना यह जाने की उसका मुजरिम बड़ा अभिनेता है और मुसलमान भी (सपा के सांसद श्री नरेश अग्रवाल ने कहा की अदालत ने सलमान की मुसलमान  होने की वजह से
सजा दी है, हालाँकि बाद में उन्होंने इस पर माफ़ी भी मांगी) अपना निर्णय दे कर अदालत के लिए सब एक बराबर होते है के नियम की पुष्टि भी की।  किन्तु यह ज्यादा दूर तक नहीं जा पाया और ८ किलोमीटर दूर स्थित माननीय  बड़े न्यायालय के न्यायाधीश ने सलमान को सजा से फोरी राहत भी दी और उसे पुनः सुनकर निर्णय दिया जायेगा ये घोषणा भी कर दी।  चलो अच्छा है कानून का बहुत दिनों तक अँधा रहना ठीक नहीं न्याय देख सुन कर ही  करना चाहिए।  

लेकिन ऐसा नहीं है की ऐसा केवल सलमान के केस में हुआ, कल यानि ८ मई को ही गुजरात में एक और मुक़दमे का निर्णय आया है और यह है "सत्य मेव जयते " के निर्माता निर्देशक जनाब आमिर खान।  लगान  फिल्म की शूटिंग के समय आमिर खान को प्रतिबंधित चिकारा नाम के एक जानवर के शिकार को फिलमाने में हुई मृत्यु के सिलसिले में गुजरात के वन विभाग ने  आमिर पर मुकदमा किया था, सन २००० में हुए इस हादसे का मुकदमा २००८ से गुजरात हाई कोर्ट में चल रहा था , कल ही आमिर भाई को कोर्ट ने राहत देते हुए न्यायाधीश महोदय ने आरोप से मुक्त कर दिया।  

अब इसे इत्तिफ़ाक़ माने या खुदा का रहम की दोनों खान बंधुओ को गुजरात और महाराष्ट्र के हाई कोर्ट ने एक ही दिन एक ही समय पर राहत दी। कुछ भी हो सलमान और आमिर दोनों सुपरस्टार है और फिल्म में ही नहीं असल जिंदगी में भी दबंग और ऐसे थ्री में से एक इडियट है जी कुछ भी कर सकते है, कुछ भी। इनके चाहने वाले बहुत है ये बड़े मानवता वादी काम करते है बड़े उदार दिल के है, सजा की आशंका होने और जेल जाने की सम्भावनाओ को देखते हुए सजा सुनाये जाने के एक दिन पहले से ही मिडिया और फ़िल्मी हस्तियों ने वातावरण बनाना शुरू कर दिया था ऐसे लग रहा था मानो यदि सलमान को सजा हो गई तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जायेगा। मिडिया के इस अभियान के बीच एक खबर यह भी आई की जिन पांच लोगो को सलमान की कार से चोट लगी थी वह लोग अभी भी राहत का इन्तजार कर रहे है,सलमान के बत्तीस करोड़ रूपये जो गरीबो के बीच खर्च हुआ बताते है उन लोगो तक क्यों नहीं पहुंचे यह शक पैदा करता है की दाल में काला नहीं ,काली दाल पकाई जा रही है। 
अभी जोधपुर में काले हिरन के शिकार के केस में सलमान पर एक मुकदमा और चल रहा है जिस पर निर्णय दो - तीन महीने में आने की सम्भावना है देखते है कानून तब भी अँधा बना रहेगा या आखे खोल कर न्याय करेगा जैसा की हिट एंड रन केस में हुआ है। 

अजय सिंह "एकल "

Sunday, May 3, 2015

अच्छे दिनों के इंतजार का एक साल

मोदी सरकार कुछ दिनों में अपने एक साल पूरे करने वाली है,आम आदमी के लिए इसके दो मायने है।  एक तो आम आदमी की उम्मीदों के इंतजार का एक साल खत्म होने को है और उम्मीदे अभी भी सर उठाये है, दूसरा
मोदी सरकार को मिले पांच साल में से एक कम हो गया है। जिन वादों पर सरकार बनाने के लिए अपार जन समर्थन भारत की जनता ने दिया था उनका क्या हुआ उसका सिंघावलोकन कर कमिओं को दूर कर नयी ऊर्जा के साथ पुनः लग जाया जाये ताकि देश की दशा और दिशा में वांछित परिवर्तन की सार्थक शुरुवात हो और हम खोई हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त कर विश्व में अपना स्थान बना सके।  चलिए एक एक कर वादो और उपलब्धियों का विश्लेषण करते है :

१. काले धन की वापसी :   इस देश की ख़राब आर्थिक स्थितियों के लिए जो नीतियाँ जिम्मेदार है उनमे  से एक अत्यंत  महत्व पूर्ण है देश के धन को विदेशों में जमा रखना।  बाबा रामदेव ने इस मुद्दे  के विभिन्न पहलुओं को पिछले पांच से भी अधिक वर्षो से आम जनता के सामने उठाया हुआ है।  भाजपा ने भी इसे समय समय पर खूब उछाला ,और मोदी जी ने अपने चुनावी अभियान का एक प्रमुख मुद्दा बना कर पेश किया। नतीजा आम आदमी का यह मुद्दा बड़ी आसानी से बहुत बड़ी आबादी को आकर्षित करने में सफल तो रहा,किन्तु पिछले एक साल में
जो प्रगति इस मुद्दे पर हुई है वह केवल सांकेतिक है।  पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली चुनाव  के पहले एक इंटरव्यू में यह कह कर की "यह वादा तो केवल चुनावी जुमला था " आम आदमी को बहुत निराश किया।  और इसका नतीजा तुरंत दिल्ली  के चुनाव में दिखाई भी पड़ गया है तो भी ऐसा नहीं दिखता है की सरकार कुछ विशेष कर रही है। यह सभी लोगो को मालूम है की यह अन्तराष्ट्रीय विषय है तथा कई बड़े कार्पोरेशन इससे प्रभावित होने वाले है  इसलिए भारत सरकार चाह कर भी बहुत तेज एक्शन  नहीं ले सकती है तो भी यदि सरकार के स्तर पर यदि कुछ प्रभावी कदमों के बारे में चर्चा हो और वह दिखाई भी पड़े तो जनता में खोया विश्वास लौट सकता है।
2. सब के लिए मकान :  सबके लिए रोटी, कपडा और मकान का वादा अच्छे दिनों के लिए दूसरा ऐसा चुनावी मुद्दा था जिसने मोदी की राह चुनाव में आसान बनाई थी । एक साल बीतने के बाद भी इस दिशा में कोई उलेखनीय प्रगति हुई है ऐसा आम आदमी को दिखाई नहीं पड़  रहा है। उलटे जमीन अधिग्रहण का मसला किसानों के लिए और सबके लिए घर योजना  सरकार के गले की हड्डी बनती  दिखाई दे रही है। सरकारी योजनाये, बजट में व्यस्थाएं ,बिल्डर को सुविधाएँ और नियम  न पालन करने पर कड़ी सजा का प्राविधान इत्यादि में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। आम आदमी की आशा के अनुरूप अभी कुछ खास नहीं हुआ है। दरअसल यदि सरकार कुछ कड़े निर्णय लेने का साहस करे और जो घर बने हुए है इनका उपयोग सुनिश्चित करने की योजना पर अमल करे तो समस्या का बड़ा हिस्सा तेजी से काबू आ सकता है। लेकिन इसके लिए सरकार को यह तय  करना होगा की वह इसका पालन कड़ाई से कर सकती है चाहे उसके अमीर समर्थक नाराज भी हो तो भी। करना केवल यह है की एक संस्था बना कर खाली पड़े सभी  मकानों को रहने के लिए उपलब्ध करना बाध्यकारी  होगा  और सरकार सुनिश्चित करेगी की जो भी मकान उपलब्द्ध कराये जायँगे उनकी भौतिक स्थिति और मालिक को आवश्यकता पड़ने पर तय समय में वापस हो जायेंगे। साथ ही मकानों में लगी पूंजी पर उचित फायदा मालिक को होगा।
३. विदेश नीति : विदेश नीति पर मोदी सरकार को कुछ अपवादों को छोड़ दे तो कह सकते है की आशातीत सफलता मिली है। पश्चिम में अमेरिका ,कनाडा ,जर्मनी फ़्रांस पूर्व में ऑस्ट्रेलिया ,जापान, चीन ,फिजी इत्यादि पडोसी देशो में  श्रीलंका ,विएतनाम लगभग सभी देशों में मोदी जी  भारत के प्रमुख के नाते न केवल अपनी मौजूदगी का एहसास करवाने में सफल रहे है बल्कि देशो के साथ सम्बन्धो में गर्मजोशी, और वहां रह रहे भारत वंशियो में उत्साह एवं उनका सक्रिय सहयोग भारत के उत्थान में हो इसको सुनिश्चित करने के सभी उपाय मोदी सरकार ने किये है। भारत में  व्यापार नियमो को सरल एवं तर्कसंगत बनाना ,आने जाने के लिए आसानी से वीसा
की उपलब्धता ,विदेशी कम्पनियो के द्वारा लगाई जाने वाली पूंजी एवं उसपर मुनाफे के वापस ले जाने के नियम जैसे कई महत्व पूर्ण निर्णय मोदी सरकार ने पिछले एक साल में किया . अमेरिका के राष्ट्रपति का गणतंत्र दिवस पर मुख्य अथिती  बनना और वर्षो से लंबित सुगम व्यापार के  लिए मार्ग प्रशस्त करना ,फ्रांस के साथ रक्षा सौदा ,कनाडा का अणु बिजली के लिए अणु ईंधन इत्यादि कुछ ऐसी उपलब्धियाँ है जिन्हे कोई नकार नहीं सकता और यह भारत को विश्व पटल  पर एक शाक्तिशाली राष्ट्र के रूप में खड़ी करने में सहायक होंगी।
४. मेक इन इंडिया : मोदी सरकार द्वारा उद्घोषित  किया गया एक ऐसा अभियान है जिसके सफल होने पर देश की कई समस्याओं का निराकरण एक साथ संभव हो  सकता है।  भारत नौजवानों का देश है इनकी ऊर्जा का इस्तेमाल भारत निर्माण में होने से नौजवानों को काम और देश की जी डी पी में पॉजिटिव   बढ़ोत्तरी होंगी , व्यापारिओं को निवेश के नए उद्यम ,विदेश व्यापार में अपेक्षित तेजी ,विदेशी पूंजी को आकर्षित करने जैसी 
अनगिनत संभावनाओं को संभव करने की क्षमता वाला यह अभियान निश्चित रूप से गेम चेंजर साबित हो सकता है। मंत्रालयों के स्तर पर अनेक घोस्णाए इस सम्बन्ध में हुई है। मुद्रा बैंक का उद्घाटन भी इस दिशा  में एक अच्छा कदम तो है लेकिन घोषणा के एक माह बाद भी अभी इसकी नीतियाँ आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं है। वेब साइट बनी नहीं है यानि अभी मामला आधा अधूरा सा  है।  सिडबी के माध्यम से मुद्रा बैंक काम करने वाला है लेकिन पूरी और स्प्ष्ट जानकारी वहां पर भी नहीं है।  यह जल्दी में उद्घटिक एक प्रोग्राम लगता है। सरकार को अपनी ऊर्जा लगा कर ऐसे मसलो को प्रार्थमिकता के आधार पर करना चाहिये ताकि जनता के बीच में सही सन्देश जाये और जनता का पूरा समर्थन योजना को प्राप्त हो सके।  
5. स्वच्छता  अभियान :  स्वतन्त्रता दिवस पर मोदी सरकार ने देश में स्वच्छता अभियान के शुरुवात की घोषणा कर भारत की जनता और खास कर गरीब तबके के लिए मानों वरदान ही मिल गया है ऐसा ऐहसास दिलवाया था। तबसे अनेक घोषणाएं इस अभियान को सफल बनाने  गयी है, उदहारण के लिए कंपनियों द्वारा इस अभियान पर निवेश   किया जाने वाले धन पर आयकर में छूट, गांवों में बनने वाले सार्वजानिक एवं वयक्तिगत शौचालय पर सरकार के द्वारा सब्सिडी देना , शहरी कूड़े से ऊर्जा उत्पादन के लिए कम ब्याज पर धन उपलब्ध करवाना इत्यादि इत्यादि। हालांकि सरकार के अभियान की घोषणा करते है बड़े औद्योगिक घरानो ने भी सहयोग
करने की अपनी इच्छा का ऐलान किया था ,यह ऐलान कितना प्रभावी हुआ है और इसके क्या नतीजे आये है इसके कोई आकंड़े अभी उपलब्ध नहीं है  तो भी दिन प्रतिदिन आने वाली सूचनाओं के आधार   कह सकते है की अच्छे नतीजों की उम्मीद की जानी चाहिये।

मोदी सरकार का एक साल २६ मई को पूरा होगा ,इसलिए हम इस लेख को  चार अंको में समापन करंगे।

अजय सिंह " एकल "










Thursday, April 2, 2015

क्या गलत और क्या सही ?

लो जी हो गया अशोक खेमका का ट्रान्सफर। ४६ वां ट्रांसफर है २२ साल की नौकरी में। काम ही ऐसा करते है तो कोई क्या करे। अब आखिर क्या भाजपा वालों के रिश्तेदार नहीं है दामाद न सही पर भाई बंधू ,साले , सालियाँ कोई तो होगा और व्यापार भी करता होगा,अगर उसने अपने समधी के चुनाव में पैसे लगाये है तो सूद समेत क्यों न वसूले।  भाजपा की सरकार बन जाने का यह मतलब तो नहीं अब खाना नहीं खाया जायेगा।
जब सब कुछ वही है तो खेल के नियम कैसे बदल जायेंगे। ये तो हमारी ही गलती है अब हम न समझे तो इसमें कोई क्या कर सकता है। बस इसीलिए एक और ट्रांसफर कर दिया गया।  अरे भइया इंजीनियरिंग पढ़ने और आई ए  एस बन जाने से ही अकल नहीं आ जाती है खेमका जी कुछ व्याहारिक बनिये। क्या आपको पता नहीं है "साहब से सब होत है, बन्दे से कुछ नहीँ,राई से परबत करे, परबत राई माहीं" यही है साहबी माया। साहब के लिए क्या गलत और क्या सही।


आपके कालेज के एक सीनियर  अभी अभी चीफ मिनिस्टर बने है दिल्ली के।  पहले आपकी तरह नौकरी करते थे तब छोटे साहब थे अब बड़े हो गए है।  उन्होंने सीख लिये खेल के नियम। कैसे -कैसे खेल खेलने पड़े बड़ी होशियारी से खेला और अपने से बड़े खिलाडी को हरा दिया। ऐसी पटखनी दी की चारो खाने चित्त हो गये, न अच्छी किस्मत काम आयी और न पुलिस अफसर की क़ाबलियत। इतना ही जिनके कंधे पर बैठ कर आगे बढे उनको जैसे ही गलतफहमी हुई और अपना हिस्सा माँगा तो बस दिखा दिया अपनी साहेबी निकल के बाहर किया पद देना तो दूर पार्टी से भी निकाल  के दम  लिया . इसे कहते है क़ाबलियत। सारी प्रोफ़ेसरी और वकालत निकाल दिया। ऐसा धोबी पाट लगाया की औकात में आ गए,आखिर वह साहेब भी क्या जो अपनी ताकत न पहचाने।
बिहार में भिखारी  बैंक में जब अपना अकाउंट नहीं खुलवा पाये तो अपना बैंक बना लिया। जनाब इसे कहते
है चाणक्य की तरह चोटी  बांधना जब तक चन्द्र गुप्त के वंश का नाश नहीं कर लूंगा तब तक चोटी  नहीं बाँधूँगा अब उठा ली  कसम तो फिर पूरी करके ही दम  लेँगे . पर यह पहली बार नहीं है ये तो प्रकृति का नियम है आपके पास जो नहीं है उसे पाने की चेस्टा करना ही मनुष्य का स्वभाव है , इसे कभी उद्यमता कहते है और कभी जूनून।तो बांध ली बिहार के भिखारिओ ने चोटी और बैंक खोल डाला। अब समस्या तो उन लोगो के लिए हो गयी जो बड़े भिखारी है और बैंक खोलने का लाइसेंस लेने के लिए रिजर्व बैंक में प्रार्थना पत्र लगा रखा  था। उन्हें समझ नहीं आ रहा कैसे करे इस कम्पटीसन का मुकाबला ऐसा कोई केस भी तो किसी एम बी ये नहीं पढ़ाया  गया तो कैसे करे सामना समस्या का।  इसको फेस करने के लिए खोज जारी है।
और अंत में

ट्रांसफर पर बहस से, हाकिम है हलकान 
तरह तरह के कारण है, खोज रहे  समाधान

अजय सिंह "एकल"

Saturday, March 21, 2015

जहाँ हुये बलिदान मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है

दोस्तों,
दो दिन पहले यह दिल छू लेने वाली कविता मुझे व्हाट्स अप पर प्राप्त हुयी है. कविता सम - सामायिक है.कश्मीर में भाजपा और पी डी पी की सरकार बनने के बाद से ही आये  दिन वहां पर कुछ न कुछ अनहोना ऐसा हो रहा है जो देश हिट में नहीं है। पिछले दो दिनों से तो साम्भा सेक्टर में आतंक वादीओं के हमले भी हो रहे है.कविता के रचेता का नाम कविता में नहीं लिखा था, इसलिए जिस किसी ने भी लिखी है उसे बधाई देते हुए नीचे दे रहा हूँ :

                                              

हे भारत के मुखिया मोदी ,बेशक समर्थक तुम्हारा हूँ
पर अपने मन के भीतर ,  उठते  प्रश्नो    से हारा   हूँ .

मेरे सारे  मित्र मुझे, मोदी का भक्त बताते है
 पर मुझको परवाह नहीं,बेशक हसीँ  उड़ाते है।

मुझे संघ ने यही सिखाया ,व्यक्ति नहीं पर देश बड़ा 
व्यक्ति  आते  जाते ,          मैँ  विचार  के साथ खड़ा



बचपन से ही मेरे मन में ,रहा गूंजता नारा है 
जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है.

इसीलिए तुमको कुछ कसमें , याद दिलाना वाजिब है 
मेरी आत्मा कहती है ,ये प्रश्न उठाना वाजिब है 

ये सौगंध तुम्हारी थी ,तुम देश नहीं झुकने दोंगे 
इस माटी को वचन दिया था ,देश नहीं मिटने दोगे

ये सौगंध उठा कर तुमने, वन्दे मातरम बोला था 
जिसको सुनकर दिल्ली का ,सत्ता सिंहासन डोला था 





 आस जगी थी  किरणों की ,लगता था अंधकार खो जायेगा
काश्मीर की पीड़ा का ,अब समाधान  हो जायेगा

जग उठे कश्मीरी पंडित ,और विस्थापित जाग उठे
जो हिंसा के मरे थे वो सब विस्थापित जाग उठे

नई  दिल्ली से जम्मू तक, सब  मोदी मोदी दिखता  था              
कितना था अनुकूल समय जो मोदी मोदी दीखता था

फिर ऐसी क्या बात हुई ,जो तुम विश्वास हिला बैठे
जो पाकिस्तान समर्थक है तुम उनसे हाथ मिला बैठे



गद्दी पर आते ही उसने ,रंग बदलना शुरू किया 
पहली प्रेस वार्ता से ही ,जहर उगलना शुरू किया 

जिस चुनाव को खेल जान पर सेना ने करवाया है 
उस चुनाव का सेहरा उसने पाक के सर बंधवाया है

संविधान की उदा धज्जियाँ ,अलगावी सुर बोल दिए 
जिनमे आतंकी बंद थे, वे सब दरवाजे खोल दिये 

अब बोलो क्या रहा शेष, बोलो क्या मन में ठाना है 
देर अगर हो गयी समझ लो , जीवन भर पछताना है

गर भारत की धरती पर ,आतंकी छोड़े जायेंगे
तो लखवी के मुद्दे पर ,दुनिया को क्या समझाएंगे

घटी को दर कार नहीं है ,नेहरू वाले खेल की
यहाँ मुखर्जी की धारा  हो,नीति चले पटेल की

अब भी वक्त बहुत बाकी है ,अपनी भूल सुधार  करो
 ये फुंसी नासूर बने न ,जल्दी से उपचार करो                       







जिस शिव की नगरी से जीते तुम ,उस शिव का कुछ ध्यान करो 
इस मंथन से विष निकला है,आगे बढ़ कर पान करो 

गर मैं हूँ भक्त तुम्हारा तो, अधिकार मुझे है लड़ने का 
नहीं इरादा है कोई,अपमान तुम्हारा करने का 

केवल याद दिलाना तुमको है वही पुराना नारा है
जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी ,वो कश्मीर हमारा है 

                                      जय हिन्द,जय भारत




अजय सिंह "एकल "



Monday, February 16, 2015

AK 49 to AK 67

दोस्तों,
यह राजनीत भी बड़ी अजीब चीज है। द्वापर  में हुए महाभारत से कलयुग में संपन्न दिल्ली के चुनाव तक कुछ भी नहीं बदला। भगवान श्री कृष्ण  ने अर्जुन को जो   उपदेश  महाभारत  के मैदान कुरुक्षेत्र में दिल्ली से करीब १५० किलोमीटर दूर ५००० साल पहले दिया था उसे कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी  ने ठीक  से समझा  और आत्मसात  भी कर लिया और किसी को  पता  तक न चला . एक बार तो  बात को अरविन्द केजरीवाल ने  प्रचार के दौरान  कहा भी था की मोदी  पास तमाम साधन है पूरी केंद्र सरकार है लेकिन मेरे पास जनता  का आशीर्वाद है , बस लोगों ने  समझा नही ।

इसलिए हे राहुल  भैया और भारत देश के वर्तमान खेवैया मोदी जी जरा समझने की कि "जो हुआ, वह अच्छा हुआ। जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा और क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो?
किससे व्यर्थ डरते हो?तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया।' तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? 
 तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, पर दिया।



लेकिन  हे श्री मान अरविन्द   केजरीवाल जी एक बात ध्यान से सुन लो "जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो। बस, यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण बन  सकती है इसलिए अपने किये हुए वायदों को जरा याद  रखना नही तो याद रखना जनता ने तुम्हे AK 49 अर्थात पहले ४९  दिनों का राजा बनाया था  अब  साल का का  भी पूरे 67 विधयाको  साथ इसे जाने  केवल 1825  ही शेष रह गए है। यानि जीवन मिलने के साथ ही मृत्यु की उलटी गिनती शुरू  हो जाती है।

और अंत में
जनता ने तुमको दिया जो भी मान सम्मान 
जग में कुछ  स्थाई नहीं इसका रखना ध्यान
अजय सिंह "एकल"




Saturday, August 16, 2014

हम होंगे कामयाब


 
दोस्तों,
स्वतन्त्रता दिवस पर लाल किले से अपने पहले भाषण में ही नरेंदर मोदी ने आशा के अनुरूप  अपने इरादे साफ़ कर दिए है.अब यह देश रुकने वाला नहीं है.और केवल आगे ही नहीं बढ़ेगा बल्कि स्वाभिमान के साथ महर्षि
अरविन्द का तथा स्वामी विवेकानन्द का देश को विश्व गुरु के पद पर पहुँचाने का सपना भी साकार करेगा। तभी तो मोदी जी ने अपने सम्बोधन में साफ़ साफ़ कहा की हमें शस्त्र के बजाय शास्त्र का रास्ता चुनना है युद्ध के बजाये बुद्ध  का रास्ता चुनना है और विश्व को दिशा देनी है. युद्ध हो जाये तो उसे जितने की तैयारी से ज्यादा आवश्यक है की ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो की युद्ध की नौबत है ना आये.
ऐसा होगा कैसे इसके लिए सरकार की चिंता बताते हुए मोदी ने कहा की सरकार में बैठे लोगो को मेरा क्या पूछने और अपना हित  लाभ न होने पर मुझे क्या सोचने के बजाय सेवा भाव से काम करना होगा और इतना ही नहीं अब सरकारी कर्मचारी समय पर दफ्तर पहुंचे और समय पर काम खतम करे यह समाचार नहीं बनेगा बल्कि आज कौन सा कर्मचारी समय पर नहीं पहुँचा यह खबर सबको होगी।
बड़ी -बड़ी घोषणाओं के मंच से उन छोटी छोटी बातो की और देश वशिओ का ध्यान आकर्षित करने में मोदी सफल भी रहे और जिन से देश को अक्सर अपमानित होने की नौबत आ जाती है चाहे बलात्कार की घटनाये हो या भ्रूण हत्या का मामला हो और उदाहरण देकर अभी समपन्न हुए कॉमन वेल्थ खेलो में ६४  में से २९
 मेडल स्त्री शक्ति को पर्याप्त हुए है बताना नहीं भूले और साथ ही स्कूल में शौचालय की वजह से स्कूल न जा पाने को लड़कियों को न पढ़ने का कारण मानते हुये अगले एक सालमे सारे स्कूलों में इसकी  व्यवस्था हो इसका समय बद्ध योजना सरकार के साथ व्यापार जगत के लोगो को भी दे दी.
गावँ इस देश का आर्थिक विकास की धुरी बने इसके लिए  पार्लियामेंट मेम्बरस को अपना पैसा इनके आधुनकी करण पर किया जाये इसका भी आह्वान लाल किले से कर के देश के आखरी व्यक्ति तक पहुँचने का मार्ग भी खोल दिया। कुल मिला कर "आगाज तो अच्छा है अंजाम भी अच्छा होगा" ऐसी आशा का सँचार मोदी ने लालकिले से कर के देश वासियों के जमीर को जगा दिया है. अच्छे दिन
आने के लिए राह बननी शुरू हो गयी है और अब इसके लिए केवल सरकार का मुह ताकते रहने की जरुरत नहीं बल्कि छोटे छोटे संकल्प जनता खुद करे और इसे पूरा करने के लिए जनता आगे बढे ऐसी अपनी इच्छा प्रगट की है फिर चाहे वोह अपनी गली मोहल्ले में सफाई का मामला हो या कोई और. मोदी ने बता दिया की ईश्वर उन्ही की सहायता करता है जो अपनी सहायता स्वयम करते है।



और अंत में

आजादी का जश्न था लाल किला प्राचीर
केसरिया पगड़ी धरे पी एम की तकरीर 
पी एम की तकरीर साफ़ देती संदेशा
सेवा समझ आप करो कोई भी पेशा 
यदि हो जिम्मेदार देश की आबादी 

तब होगी चरितार्थ बंधू सच्ची आजादी


Thursday, June 19, 2014

तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती हैं

दोस्तों,
१६वीं शताब्दी में  पैदा हुये महा कवि भूषण ने कभी अपनी कविता में समय का चक्र कैसे कैसे परिवर्तन लाता है क्या क्या दिन दिखाता है  का वर्णन करते हुए लिखा था "ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवाली ,ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैँ,तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती  हैं " . ४०० साल पहले कही  हुई बात आज भी बड़ी सटीक बैठी है. देखो न क्या दिन आये है पहले सत्ता मैं आने के लिए समझौते करते थे और अब विपक्ष बनाने के लिए समझौता करने की नौबत आ गयी है. देश में पिछले दस सालो से सत्ता का  केन्द्र बनी सोनिया गांधी नेता विपक्ष के पद के लिए बेबस खड़ी मोदी की ओर निहार रही है और उम्मीद कर रही हैं की उन्होंने सत्ता मैं रहते हुये चाहे जो बर्ताव विपक्ष के साथ किया हो पर एन डी ऐ सरकार के मुखिया नरेंदर मोदी तो सज्जन वयक्ति है और उनकी सज्जनता की वजह से देश के ही नहीं उनके भी दिन कुछ तो अच्छे हो ही जायेंगे। और फिर मोदी ने ही तो सबका साथ सबका विकास का मंत्र दिया था तो उसमे मेरा और बेटे राहुल का हिस्सा मांग लेने में हर्ज है क्या है.
टी वी की बहू स्मिृता  ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय क्या मिला मानो राजनीत मैं भूचाल आ गया
है।  सारे कांग्रेसी उनकी क्वालिफिकेशन पर सवाल उठा रहे  है. जब उमा भारत ने सोनिया गांधी की योग्यता का प्रश्न उठाया तो सारे बगलें जहकने लगे। सही कहा गया है शीशे के घरों मैं रहने वालों को दूसरो  पर पत्थर नहीं फेकने चाहिये। और फिर अभी अभी तो अमेठी में राहुल को नाको चने चबुआ कर लौटी है उसका कुछ तो पुरस्कार मिलना ही चाहिये। सो मोदी जी ने कर दी कृपा।


    
                                                      
                    और अंत में

मैंने पूछा साँप से दोस्त बनेंगे आप। नहीं महाशय ज़हर में आप हमारे बाप।।
 कुत्ता रोया फूटकर यह कैसा जंजाल। सेवा नमकहराम की करता नमकहलाल।
बीज बनाये पेड़ को, पेड़ बनाये बीज। परिवर्तन होता सतत, बदलेगी हर चीज।।
 बारिश चाहे लाख हों, याद नहीं धुल पाय। याद करें जब याद को, दर्द बढ़ाती जाय।।  

अजय सिंह "एकल "



Friday, January 10, 2014

अब भविष्य़ उज्जवल है


 प्रिय मित्रों ,
घपले, घोटाले और तमाम अनिश्चिंताओं  के साल २०१३ के बीतने के साथ ही देश और देशवासिओ के लिए एक अच्छा समय आने के असार बनने लगे है . हाँलाकि चुनाव तो पाँच राज्यो में हुये है लेकिन चर्चा चार की  है क्योंकी मिजोरम के चुनाव में विपक्षी दलो ने कांग्रेस को वहाँ वॉक ओवर  दे दिया था इसलिये मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,छत्तीसगढ़ और दिल्ली के चुनावोँ पर पूरे  देश कि निगाह रही।  और निगाह रही भाजपा के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ,प्रधान मंत्री पद के खानदानी उम्मीदवार राहुल गाँधी और अन्ना कि आंधी से निकले हुये अरविन्द केजरीवाल पर ।

साल के अंतिम सप्ताह में अरविन्द केजरीवाल कि आम आदमी पार्टी के सत्ता नसीन हो जाने से कम से कम दिल्ली में तुरन्त चुनाव कि सम्भावना कम हो गई और जनता को  कुछ राहत मिली  और साथ ही "आप " पार्टी का भी  इम्तिहान शुरू हो गया इससे अब लोकसभा चुनाव में अरविन्द यह नहीं कह सकेंगे कि हमको प्रूव करने का मौका नहीं मिला। अरविन्द कि पार्टी ने जिस तरह की  तमाम दुविधाओं और परिस्थितयों  में दिल्ली के मुख्यमन्त्री का पद स्वीकार कर किया है उसके लिये मैं तो यही कह सकता हूँ "इतने रंग तो  न बदले होंगे गिरगिट के भी बाप ने, हद करदी "आप" ने" .

 
 दूसरे साल के शुरू होते ही  देश के प्रधान मंत्री जी ने अपना मौन व्रत तोड़ कर एक फड़कती हुई प्रेस कान्फरेंस अति उत्साही नेता मनीष तिवारी के साथ सम्पन्न कर दी और एक नया रिकॉर्ड बनाया १० साल में तीन बार प्रेस से मुखातिब होने का आम जनता और प्रेस दोनों ने मौन मोहन सिंह जी को मुँह खोलने के लिए धन्यवाद  दिया मगर बात यही तक होती तो ठीक था लेकिन कान्फरेंस में  किंग बने सिंह साहब अपने प्रधान मंत्री के
रोल से ऊबे हुए और सोने के पिंजरे से चार महीने बाद वापस आने को बेताब  दिखे और जनता को आश्वाशन दिया कि दस साल के कुशासन से बाहर आने का वक्त अब दूर नहीं और अगले चार-पाँच महीनो में आयेगा पता नहीं उनका इशारा क्या था पर जनता को लगा कि यह भी वही कह रहे जो देश कि जनता कह रही है कि अब  सुख चैन मोदी के प्रधान मंत्री बनाने के बाद ही मिलेगा और ऐसा होगा पाँच महीने बाद.और मजे कि बात यह है की प्रधान मंत्री के आर्थिक  सलाहकार कौशिक बासु ने २०१२ में भी यही कहा था बस इसको स्वीकार करने में २ साल लग गए चलो "देर आएद दुरुस्त आएद".

 देश कि राजनीत में महात्मा गांधी से ज्यादा बिकाऊ नाम और कोई नहीं है इसलिए समय समय पर इसका उपयोग होता रहता है, कभी भ्रष्टाचार मिटाने कि कसम खाने में और कभी सत्ता में बैठे लोगो को हटाने में. सो

 आज भाजपाइयों ने भी "आम आदमी" की सफ़ेद टोपी का जवाब  भाजपाई "केसरिया टोपी" लगा कर राज घाट में धरना देकर दिया. कुछ आरोप प्रत्यारोप हुये फ़ोटो खींची नाश्ता हुआ और बात ख़तम. दिल्ली कि हांड कपाऊ सर्दी में धूप खाने कि इससे बेहतर जगह हो ही नहीं सकती जहाँ हरियाली में बैठे चाय पीते हुये फोटो शेशन करवाये टीवी में भी आये और अगले दिन अख़बार में भी छप जाये. इसे कहते है आम के आम और गुठलियों के भी दाम और भाजपाइयों से ज्यादा इसे कौन समझता है.

और अंत में 
डाला तो मत आप को ,किन्तु न आया काम
उलटे दिल्ली में बढे अब झाडू  के दाम
अब झाड़ू के दाम बढ़ा कर बेचे बनिए
 होकर मालामाल कहे झाड़ू को चुनिए
कहे केजरीवाल जपो झाड़ू की  माला
होगा देश त्रिशुंक वोट जो हम  को डाला
अजय सिंह "एकल"

 

Tuesday, September 17, 2013

तो मैं क्या करूँ ?

दोस्तों,
इस देश में एक प्रधान मंत्री है यह बात मैं पूरे  होशो हवास में भगवान को हाजिर और नाजिर मान कर कह रहा हूँ। आप यह सोच सकते है की यह बात तो देश के हर बच्चे तक को पता है फिर इसमें ऐसा क्या है जो आप बेफजूल  बात का बतंगड़ बना रहे है तो मैं आपको बतादूँ की बात खास है इसीलिए मैं सौगंध खा रहा हूँ प्रधान मंत्री का वजूद सिद्ध करने के लिये।
कल चंडीगढ़ के एक कार्यक्रम में मनमोहन सिंह ने गरीबो के लिए एक आवासीय योजना का उद्घाटन करते हुए कहा की देश को अब झुग्गी झोपड़ी मुक्त बनाया जायेगा लेकिन एक पत्रकार ने जब यह पूंछा की दिल्ली को यह वादा तो पाँच साल पहले किया था और वहाँ तो चार लाख से ज्यादा  झुग्गी झोपड़ी अभी भी है तो जवाब सीधा था तो मैं क्या करूँ?
आज कल देश में जैसा राजनैतिक माहौल चल रहा इसमें केवल ४ करेक्टर  फ्रंट मैं है बाकी सब साइड रोल में।इसमें सबसे पहले नम्बर पर है नरेन्द्र मोदी। संघ का एक प्रचारक जिसने देश के लिए घर छोड़ दिया हो वह सबसे महत्वपूर्ण कुर्सी का प्रत्याशी बन जाये तो चर्चा का विषय तो बनेगा ही। लेकिन उससे बड़ी बात यह है की जिस आदमी ने सारा जीवन इस कुर्सी तक पहुँचने की योजना बनाकर उन सिद्धान्तों  से भी समझोता करलिया हो जिनका उसने हमेशा विरोध किया (आप ठीक समझे मैं जिन्ना की ही बात
 कर रहा हूँ) अब उसके सामने से कुर्सी निकलती नजर आये तो वह जो कुछ भी करेगा उस पर चर्चा तो होगी ही।  लेकिन तीसरा चेहरा राहुल गाँधी जिनको पूरी कांग्रेस पार्टी प्रधान मंत्री बनाने में लगी  है और खुद राहुल न तो इसकेलिए उत्साहित दिखते है और न ही अपनी कोई योग्यता सिद्ध कर पाए है को रेस में बनाये रख कर भाजपा को वाक ओवर नहीं देना चाहती। चौथे फ्रंट खिलाड़ी खुद मनमोहन सिंह है जिन्होंने साफ़ कर दिया है की उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की परम्परा को अभी तक जिन्दा रखा है जिन्होंने एक बार कहा था की यदि इन्द्रा जी कहे तो झाड़ू भी लगा सकता हूँ उसी तर्ज पर मनमोहन सिंह ने भी गाँधी परिवार का एहसान यह कह कर उतार दिया है की मैं  राहुल के नेतृत्व में सहर्ष काम करूँगा उन्हें  देश का अगला प्रधानमन्त्री बनना चाहिये। दोनों सरदारों ने इस देश के सबसे ऊँचे पदों को  शुषोभित किया है और दोनों कांग्रेस पार्टी  की दो सबसे शक्तिशाली महिलाओं  की कृपा से यह पद प्राप्त कर पाये और दोनों ने उनका ऐहसान उतारने मैं कोई कसर नहीं छोड़ी।
कोयला मन्त्रालय में घोटाले से सम्बंधित  फाइले गायब होने की खबर पर संसद में जबरदस्त हंगामा हुआ। कोयेला मंत्री श्री प्रकाश जैसवाल जी ने अपने स्वभाव के अनुसार समस्या का निदान सुझाया और संसद को आश्वासन दिया की फाईलें ढूढी जा रही है जैसे ही मिलेगी संसद को बता दिया जायेगा,मानों फाईलें न हुई प्याज हो गया पैदावार तो खूब हुई पर बाजार में ढूढे नहीं मिल रहा।  और जब सवाल यह उठा की उस समय क्योकीं प्रधान मंत्री जी के पास ही यह मंत्रालय भी था इसलिये उनको भी जिम्मेदार माना जाये तो मनमोहन जी ने बिना देर लगाये जवाब दिया की फाईलें खो गई तो में क्या करूँ। मैं कोई चौकीदार हूँ जो रखवाली करूँ।और यह तो तब करूँ जब मुझे आलाकमान का एहसान उतारने से फुर्सत मिले।

जब मनमोहन सिंह को खबर मिली की मोदी को भाजपा ने अपना प्रधान मंत्री का उम्मीदवार बनाया है और उनको जैसा जन समर्थन मिल रहा है तो बोले की मैं क्या करूँ और जब उनकी यह कहा गया की इससे कांग्रेस और खास कर युवराज  के लिए मुश्किल खड़ी होने की सम्भावना है तो बोले की मैंने तो पहले ही यह घोषणा कर दी की मैं राहुल के अन्डर काम करके भी खुश रहूँगा फिर धीरे से बोले की इसकी नौबत ही नहीं आयेंगी मैं इस पद पर रहते हुये ऐसा कर दूँगा सरदार का असर सरदार के जाने के बाद पता चलेगा।




और अंत में

 इस नए दौर की   किताबो में , क्या  खाक तुलसी   कबीर ढूंढेंगे 
बिक गया जो चन्द  सिक्को में, उसमे हम क्या जमीर ढूंढेंगे। 
ये  तो  शतरंज   है सियासत  की , गोंटिया खुद वजीर ढूंढेंगे 
पीर अपनी हम भुला कर "शेरी", दिन दुखियों की पीर ढूंढेंगे  ।
                                                                - चाँद शेरी


Thursday, August 15, 2013

कैन वी? विल वी?

प्रिय मित्रो,
हैदराबाद  में नरेन्द्र मोदी ने वी कैन और वी विल का नारा लगा कर जनता
को झकझोर दिया तो विरोधिओं ने भी  बिना देर करे आरोप लगा दिया की मोदी अमरीका के ओबामा नहीं है वह तो मात्र उनकी नक़ल कर रहे है।  शक तो हमें भी है लेकिन वी कैन पर नहीं बल्कि इस बात पर की विल वी। रास्ता साफ़ है सीधा है  यू.पी. ए. के 9 सालके कुशासन से  नतीजे  में जनता के लिए में महगाई , भ्रष्टाचार और अथाह समस्याये ही आयी है। और इन परिस्थितिओं में नरेन्द्र मोदी का लाल किले पर पहुचना बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन रास्ता इतना आसान नहीं है  कांग्रेसियो की वजह से ही नहीं भाजपाईयों की वजह से भी।

आजादी की ६७वीं वर्षगाँठ देश के लिए जितनी महत्व पूर्ण है  मनमोहन सरकार के लिए और खास तौर  पर मनमोहन सिंह के लिए उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। मनमोहन सरकार के लिये इसलिए  कि इसकी कृपा
 से बहुत से लोग अकूत सम्पत्ति के मालिक पिछले दस सालों में  बन गये, नकारा मंत्रियों की टीम ने देश की अर्थव्यस्था को चौपट कर दिया और महंगाई की वजह से आम आदमी का जीना  मुहाल हो गया है। इस  सबसे बड़ी उपलब्धि यह की पोलियो जनता के बजाय मनमोहन सरकार को हो गया है। व्यक्तिगत रूप से मनमोहन १० बार लाल किले से झन्डा फहराने वाले देश के तीसरे प्रधान मंत्री हो गए है और वह भी अपने करिश्मे  से नहीं सोनिया की कृपा से। दूसरे की कृपा से प्रधानमंत्री बनने वाले  मनमोहन सिंह पहले और शायद आखरी प्रधान मन्त्री भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में होंगे।  

आजादी की पूर्व सन्ध्या पर मुम्बई में आइ एन एस सिन्धुरक्षक (भारतीय नौ सेना की शक्तिशाली अणु पनडुब्बी )  में रहस्यमय विस्फोट से देश और सेना विस्मय में है।  कई तरह के अनुमान लगाये जा रहे है।  एक अनुमान यह भी है की यह आतंकवादी घटना हो सकती है। पिछले कई महीनों और खास तौर पर पाकिस्तान के प्रधान मन्त्री नवाज शरीफ के आने के बाद से पाकिस्तान भारत को हर तरह से नुकसान पहुचाने  पर लगा है कभी एल ओ सी पर गोलीबारी और कभी पी ओ के में और कश्मीर में दंगे और फिर खबर आयी की स्वतन्त्रता दिवस पर पाकिस्तानी आतंकवादी  दिल्ली और मुम्बई में घुस आये  है और विस्फोट की फ़िराक में है इसलिये आश्चर्य  नहीं की यह विस्फोट भी उसी योजना का अंग हो। 

पाकिस्तान  के मुकाबले में भारत देश बहुत बड़ा है  हमारी सेना भी  बहुत  शक्तिशाली है और हम चाहे तो
पाकिस्तान का आस्तित्व  खत्म हो सकता।  पर सवाल है की विल वी ? देश की जनता यू.पी.ए.सरकार की नाकामी से दुखी है। हर ओर त्राहि -त्राहि मची है।  महंगाई, अराजकता ,भ्रष्टाचार ने आम आदमी को जीना तो  छोड़ मरना भी मुश्किल कर रखा है। कांग्रेस सरकार को बाहर का रास्ता दिखाने का मौका भी बस चन्द महीनों में ही आने  वाला है। डेमोक्रेसी में यह ताकत जनता के  हाथ में होती ही  है  इसलिये सर्टेनली वी कैन पर सवाल फिर वही है विल वी ?

और अंत मे
हम  उनसे  क्रोध   जता पूंछ  रहे है,अब तक हुई  है किस से खता पूंछ रहे है,
न जाने कौन से महल में कैद पड़ी जो,हम उस स्वतंत्रता का पता पूंछ रहे है। 


स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ 

 

अजय सिंह "एकल "