Friday, February 21, 2020

हम लाये है तूफान से किश्ती निकाल के


एक तरफ माननीय   श्याम गुप्त और दूसरी ओर श्रीमती नेहा मित्तल,  एकल कुम्भ के   तीसरे दिन का पहला सत्र, बड़ा भाव पूर्ण दृश्य था। विषय था एकल की भविष्य की योजनाओ पर चर्चा करने  और अगले दस वर्षो का मानचित्र सभी कार्य कर्ताओं के सामने रखने का।  युवा नेतृत्व  ने एक पीपीटी के माध्यम से अपनी योजनाओं  के बारे में बताया। इसमें शामिल था चार लाख स्कूलों के माध्यम से गावों में संपर्क करने ,सौ से अधिक एकल आन व्हील द्वारा कम्प्यूटर लिट्रेसी का प्रसार,एक हजार एकल चिकित्सालय इत्यादि जैसे लक्ष्य  की अगले दस वर्षो में प्राप्ति  का ।  जैसे ही एकल युवा विभाग  की नेहा ने कहा की मुझे जो जिम्मेदारी मिली है तो ऐसा लग रहा है की मैं अर्जुन हूँ और अब मैं लक्ष्य प्राप्ति तक रुक नहीं सकती हूँ  ,तभी दूसरी ओर से श्याम जी ने घोषणा कर दी की मैं तो कृष्ण बनने को तैयार हूँ लेकिन नेहा यदि तुम अर्जुन बनने को तैयार तो यह समझ लो की यह आसान नहीं है।  इसके लिए तुम्हे घर परिवार से मोह  छोड़ना पड़ेगा और बिना  लक्ष्य प्राप्ति तक  रुकने की आज्ञा नहीं है यदि स्वीकार हो तो हाँ करना। नेहा मित्तल भी कहाँ रुकने वाली थी उन्होंने तुरंत अपनी सहमति दे दी। इसके अगले चरण में शुरू हुआ पुरानी अनुभवी पीढ़ी से जिम्मेदारियों का नयी ऊर्जावान और ज्ञानवान पीढ़ी को हस्तान्तरण का उत्सव। 

इस तरह वहां बैठे हुए सैकड़ो लोग प्रत्यक्ष दर्शी बने  श्रीमद भगवत गीता उस सन्देश  के क्रियान्वन के  जिसमे   श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से  कहा  था 


इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्-गुह्यतरं मया ।
           विमृश्यैतदशेषेण  यथेच्छसि तथा कुरु ॥ १८.६३ ॥
(I have thus disclosed to you that knowledge which is the most confidential. Deliberate upon it and do as you wish.)
गीता का  वह  दृश्य तब  एकल कुम्भ में सजीव हो उठा   जब श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को कहा कि "अर्जुन गूढ़ से गूढ़ रहस्य का ज्ञान  मैंने  तुम्हे  दे दिया है अब तुम अपने विवेक का इस्तेमाल कर अपने का  कर्त्तव्य पालन करो " 

इस तरह  शुरू हुआ एकल अभियान का  एक नया अध्याय जब एकल के तीन पुरोधाओं में सबसे वरिष्ठ  एकल अभियान केंद्रीय कार्यकारणी के अध्यक्ष  श्री  बजरंग लाल बागड़ा जी ने अपनी जिम्मेदारी का ध्वज दिया श्री दुर्गेश मिश्रा जी को जिन्होंने दो वर्ष पूर्व ही सेवाब्रती बनने का निर्णय लिया।एक तरफ  विदेश जाने का आमंत्रण और दूसरी तरफ  एकल अभियान से जुड़ कर सेवाव्रती बनने का निश्चय।  दोस्त परिवार सब हतप्रभ और एक बार फिर इतिहास ने अपने को कुम्भ के  सैकड़ो प्रतिभागिओ के सामने  दोहरा दिया। ऐसा लगा मानो एक और अशोक सिंघल  जी सब प्रकार के भौतिक आकर्षण को छोड़ कर देश सेवा के लिए जीवन देने को तैयार है।   

दूसरा नंबर था एकल अभियान के राष्ट्रीय महा मंत्री श्री  माधवेन्द्र  सिंह  जी का, जिनकी  जिम्मेदारी  मिली श्रीमती सुमन दिगारी को। जिनका विवाह अभी पिछले महीने हुआ है। विवाह के कुल पंद्रह दिन बाद ससुराल से सीधे एकल कुम्भ में  आकर प्रतिभागी बनना और एक सप्ताह से भी अधिक समय लगा कर अपने दाईत्व का निर्वहन। धन्य है ऐसे सास और ससुर  तथा पति देव जिनको सौभाग्य से सुमन जैसी बहू और पत्नी मिली। जिसने अपने विवाह की मेहँदी लगे हाथो से एकल अभियान में प्रशिक्षण प्रमुख  जिम्मेदारी स्वीकार की। सुमन की माता और पिता श्री तो बहुत पहले से ही एकल अभियान के साथ जुड़े है। यह उनके पालन पोषण का ही शुभ परिणाम है की एकल अभियान के कार्यकर्ताओं के  प्रशिक्षण के लिये एक युवा नेतृत्व श्रीमती सुमन दिगारी के रूप में प्राप्त हो रहा है। 

अंत में श्री रमेश भाई सरावगी जिन्होंने अपनी युवा अवस्था यानि लगभग २५ वर्ष की आयु में ही जब एकल अभियान शुरू ही हो रहा था  कलकत्ता में माननीय श्याम गुप्त से  एक वचन लिया था की आप किसी नगर वासी से धन  नहीं  मांगेंगे अपितु आप समय मांगिये और धन आवश्यकता पूर्ति  की जिम्मेदारी मेरी है। काम कठिन था लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ की रमेश सरावगी अपने वादे में कमजोर पड़े हो। पिछले तीस वर्षो से लगातार देश भर के बड़े   उद्योगपतियो एवं  व्यापारिओं  को एकल के साथ जोड़ना  और उनकी प्रतिभा का अहर्निशं उपयोग एकल अभियान के लिए करना रमेश सरावगी के व्यक्तित्व की विशेषता रही है। रमेश सरावगी ने अपना  ध्वज यानि जिम्मेदारी दी संघ परिवार की एक युवा बेटी नेहा मित्तल को। नेहा के पिता स्व. रवी मानसिंगका  तीन दशकों पूर्व जब असम आंदोलन की आग में जल रहा था मुंबई आ कर बस गए थे। बड़ा व्यापार  समाज में प्रतिष्ठा और देश के लिए सबकुछ त्याग कर देने की तैयारी। नेहा ने अपनी पढाई अमेरिका से पूरी की और ब्याही गयी एक इंदौर के एक बड़े उद्योगपति परिवार में । लेकिन माता पिता की देश सेवा की  प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए अर्जुन बनने को तैयार और सहर्ष स्वीकार कर ली वह जिम्मेदारी जो बड़े बड़े लोग भी लेने को आसानी से तैयार नहीं होते। 

 सभी लोग  भावुक  हो रहे थे,प्रसन्नता व्यक्त कर रहे थे और सोच रहे थे की  श्याम जी ने जिस तरह   नेतृत्व की बागडोर युवा पीढ़ी को सौप कर उस पर पर अपना  विश्वास व्यक्त किया है यह वास्तव में राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ के आदर्श  पूज्‍य श्री गुरूजी का राष्‍ट्र को समर्पित  मंत्र "राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम”  आज श्याम जी ने पुनः चरितार्थ  कर दिया  । ‘इदं न मम’ अर्थात यह मेरा नही है, कुछ भी मेरा नहीं है यही भारतीय दर्शन है। और  वही दर्शन शाश्वत होता है जो प्राकृतिक होता है और इदं न मम ही प्राकृतिक है। तब  अर्जुन  की  जिम्मेदारी लेनेवाली बहन नेहा ने भी मानों  कहा 
अर्जुन उवाच |
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव || १८. ७३ ||
(अर्जुन बोले- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।)

 मेरे मन में भी कौतुहल और आश्चर्य दोनों ही थे और मैं सोच रहा था की माननीय   श्याम  जी गुप्त  ने  भौतिक शास्त्र में  पोस्ट ग्रेजुएशन की  पढाई  विशेष योग्यता के साथ पूरी करने के बाद  युवा अवस्था में ही  अपना पूरा जीवन  देश सेवा के लिए लगाने का निर्णय लिया और राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ में प्रचारक निकल कर   विभिन्न जिम्मेदारियों  को  निभाते हुए एकल को पिछले ३० से भी अधिक वर्षो से अपना नेतृत्व देते हुए दुनिया का  सबसे बड़ा सेवा  संगठन  बना दिया है ।  जिनके सफल नेतृत्व के कारण केवल  देश में ही नहीं बल्कि दस से भी अधिक देशो में एकल अभियान की पहचान बनी है, आज बड़ी आसानी से एक बार फिर  आदर्शो की नयी उचाईयों को प्राप्त करने में सफल हुए  है। और युवा नेतृत्व को बागडोर दे कर उसका मार्गदर्शन करने का निर्णय ले कर  एक आदर्श परम्परा का निर्वाह किया है। इसके लिए  हम सब श्याम जी  के संपर्क में आकर देश की  सेवा के इस  प्रकल्प के साथ जुड़ कर गौरवान्वित अनुभव कर रहे है। प्रभू से प्रार्थना है की श्याम जी को शतायु करे और आने वाले समय में उनका मार्गदर्शन और आशीर्वाद एकल अभियान को लम्बे समय तक प्राप्त होता रहे।  और हम सब मिलकर डॉ  हेडगेवार के स्वप्न का परम वैभवशाली राष्ट्र निर्माण करने में अपना योगदान करते रहे।   

अजय सिंह "एकल "    






     

Tuesday, December 17, 2019

धर्म है समाज सेवा


भारत की  सनातन संस्कृति में  सम्प्रदाय, समुदाय की अवधारणा है जिसमे हर व्यक्ति का योगदान होता है। इसके निर्माण में हर किसी का सक्रिय सहयोग ही धर्म है।  भीष्म पितामह ने भी धर्मोपदेश में कहा है 

अजीजीविषवो विद्यम यशः कामो समन्ततः।

ते  सर्वे नर  पापिष्ठाह  धर्मस्य   परिपंथिन:।।


अर्थात जो व्यक्ति अपने ज्ञान व क्षमताओं का उपयोग केवल अर्थ और काम के लिए करते हैं वे सभी घोर पापी एवं धर्म द्रोही हैं।इससे बचने के लिए धर्म और मोक्ष में भी अपने ज्ञान व क्षमता का उपयोग करना होगा, इसी को समष्टि, समुदाय, सम्प्रदाय एवं वर्तमान में समाज की सेवा कहा जाता है।धर्म व मोक्ष के रूप में समष्टि अभ्युदय हर मनुष्य का नैसर्गिक/धार्मिक दायित्व है।


पश्चिमी देश के एक मनोविज्ञानी अब्राहम मैसलो ने मनुष्य व्यहार (Human behavior ) का  एक  सिद्धांत १९४३ में प्रतिपादित किया था।  मैनेजमेंट विषय में पढ़ाया जाने वाला यह एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो यह बताता है कि किसी भी आदमी  का  व्यहार उसकी अपनी निजी  आवश्यकताओं के अनुसार बदलता है। हालाँकि इसका एक सामान्य क्रम है। इस क्रम में सबसे पहली आवश्यकता है,अपनी   शारीरिक  आवश्यक्ताओं  की  पूर्ति। जिसमे रोटी, कपडा  मकान इत्यादि के अलावा जैसे सोना,यौन क्रिया इत्यादि शामिल है। फिर आता है जीवन में आने वाली तरह-तरह की परेशानियों से मुक्ति के लिए सुरक्षा इसमें शामिल है जीवन यापन के लिए पर्याप्त धन,अच्छा स्वास्थ ,परिवार इत्यादि की प्राप्ति । इन दो आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद नंबर आता है दोस्तों, परिवारजनों के बीच आदर जिससे उसमे सामाजिक प्राणी होने का भाव जाग्रत होता है। दुनिया में ८० प्रतिशत लोग इन तीन आवश्यकताओं की पूर्ति में  ही पूरा जीवन  बिताते है। इस क्रम में अगला  नंबर आता  है  समाज में पहचान बनाने का एवं  प्रसिद्धि पाने का । और अंत  में आदमी  सेल्फ रिअलाइजेशन यानि मैं कौन हूँ ?  मेरा जन्म क्यों हुआ है इत्यादि प्रश्नों  के उत्तर पाना चाहता है , ताकि इस जीवन मरण से सदैव के लिए मुक्ति मिले और  मोक्ष प्राप्ति की और अग्रसर हो  सके । 

लेकिन पश्चिमी देशो की सोच से  इतर सनातन धर्म में सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद  समाज सेवा के लिए  समय और धन  देने को ही धर्म बताया गया है। गुरु नानक देव जी ने  अपनी कमाई का दशांश समाज सेवा के लिए देने की प्रेरणा दी है।  इसी  विषय पर  संत कबीर दास ने एक दोहे में सीख दी और कहा है :

पानी बाढ़े नाव में, जेब में बाढ़े दाम 

दोऊ हाथ उलीचिए यह सज्जन को काम। 

 समाज की सेवा सबका काम है नाकि  कुछ विशेष लोगो का। मनुष्य जीवन एक अवसर है मनुष्यता की सेवा करने  का । दरअसल जब हम यह कहते है की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो उसके पीछे जो भाव है वह यह है की मनुष्य अकेला नहीं रह सकता। इसीलिए मनुष्य  समाज के  निर्माण में  अपना योगदान कर इसे  बनाता है और  फिर इसका उपभोग करता है। परन्तु समाज में देखने से पता चलता है की एक वर्ग अपना अधिकांश समय  अपने और परिवार के लिए धन उपार्जन में लगाता है  लेकिन जब संसाधनों के  उपभोग की बारी आती  है  तब सबसे ज्यादा उपभोग उन्ही के द्वारा होता है जिन्होंने इसके लिए सबसे कम योगदान किया है। चूँकि सामाजिक संरचना ऐसी है की संसाधनों के  उपभोग की सुविधा पैसे के बदले में आसानी से  उपलब्ध हो जाती अतः  यह  तरीका सरल है और कम समय में  उपभोग की सुविधा  प्राप्ति हो जाती है। इस व्यस्था  का ही  परिणाम है की समाज सेवा में लगे हुए लोग भौतिक सुख से तो वंचित रहते ही है साथ ही उनकी सेवा के परिणाम स्वरुप समाज में हुए सकारात्मक परिवर्तन के कारण  अपने योगदान के लिए जिस स्वाभाविक सम्मान के वे  अधिकारी  है वह भी मुश्किल से ही मिलता है। नतीजा, समाज सेवा को  जीविका  का विकल्प बनाये जाने के   लिए  प्रेरणा का अभाव रहता है। जिससे समाज में अनेक प्रकार की विकृतियाँ होती है और उसका खामियाजा किसी न किसी  रूप में समाज के सभी लोगो  को भुगतना पड़ता है। असल में समाज में सेवा करने वाले लोग दूध में चीनी की तरह है जिनका काम दिखता नहीं है किन्तु इसका अभाव जरूर महसूस होता है। 

समाज में गुणात्मक परिवर्तन के लिए इस व्यस्था में  परिवर्तन की  आवश्यकता है। नयी व्यस्था में जिसका जितना योगदान उतना उसका प्रतिफल के सिद्धांत को अमल में लाना चाहिए।  समाज  सेवा के लिए संकल्पित लोगो को साधारणतया  जीवन व्यापन के लिए मानधन  ऐसे  व्यापारिक प्रतिष्ठानों से प्राप्त होता है जिनकी सामाजिक कार्यो में रुचि हो अथवा  सामाजिक दाईत्व कानून का निर्वाह करने हेतु बड़े व्यापारिक  प्रतिष्ठान इस कार्य के लिए अपना योगदान करते है। सरकार के द्वारा इस  योगदान को कर में छूट देकर   सम्मानित किया जाता है।  इस तरह सामाजिक दाइत्वों का निर्वाह समाज की अलग अलग इकाईओं द्वारा होता है। 

समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यह व्यस्था ठीक है परन्तु  पर्याप्त नहीं है। दरअसल इस व्यस्था की एक बड़ी  खामी है की यह समाज के सभी लोगो को योगदान करने के लिए न प्रेरित करती है न मजबूर करती है। वैकल्पिक व्यस्था के रुप में जैसे वित्तीय विश्वसनीयता के प्रमाणी करण का क़ानूनी  प्रावधान है, उसी प्रकार  का प्रावधान सामाजिक प्रमाणी करण के लिए भी बनाये जाने की आवश्यकता है। जैसे एक बार वित्तीय सुविधाओं का दुरपयोग  करने पर दोबारा यह सुविधा उपलब्ध नहीं  होती है  उसी तरह समाज के संसाधनों का एक बार दुरुपयोग  किये  जाने के बाद उसी व्यक्ति द्वारा दोबारा दुरपयोग किये जाने की सम्भावना ख़तम हो जानी चाहिये। यह नियम समाज के लोगो को समाजोपयोगी  कार्यो को करने  के लिए प्रोत्साहित करेगा। यदि इसका प्रमाणी करण भी  हो  सके तो इसमें अपना योगदान करने के लिए हर व्यक्ति प्रेरित हो सकेगा। और संसाधनों के उपभोग के साथ ही निर्माण में भी  योगदान अपनी दिनचर्या में कुछ समय समाज के लिए देना है इसका निर्धारण करेगा।  साथ ही जैसे  अन्य दैनिक कार्य नियमित करने का नियम दिनचर्या में होता  है उसी तरह समाज निर्माण में  भी उसका योगदान सुनिश्चित  हो जायेगा। यह पहल  समाज निर्माण में  एक नई शुरुवात होगी।  

विद्यार्थी जीवन में एन सी सी और एन  एस एस  जैसे अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में साधारणतया काफी विद्यार्थियों की  भागीदारी रहती है। इसका मुख्य कारण है की इस तरह की भागीदारी नौकरी प्राप्ति में सहायक होती  है। इसलिए इसमें विद्यार्थियों की  उत्साह पूर्वक भागीदारी होती है।  पश्चिमी देशों में तो उच्च शिक्षा में  प्रवेश  के लिए  यह एक  आवश्यक शर्त है। आज आवश्यकता इस बात की है कि  यह प्रेरणा विद्यार्थी जीवन के बाद भी बनी  रहे।  

अतः यह आवश्यक है की ऐसा तन्त्र विकसित किया जाये जो सेवा के कर्तव्य पालन के लिए सभी लोगो को प्रेरित और प्रोत्साहित करे ताकि सबका समावेशी विकास सुनश्चित किया जा सकेगा। तभी हम आदर्श समाज की स्थापना का लक्ष्य प्राप्त करने की और अग्रसर हो सकेंगे।  

अजय सिंह "एकल"



 और अन्त मे  

मुझे डर नहीं दुर्जनो की सक्रियता का 
में डरता हूँ सज्जनो की निष्क्रियता से 

                                                   

Wednesday, December 4, 2019

क्यों आवश्यक है व्यक्ति का सामाजिक प्रमाणीकरण ?

समाज की सेवा करना क्या कुछ लोगो का काम है ? क्या समाज की सेवा करने वाले लोग वह  है जिन्हे इसके अलावा कोई और काम नहीं ? क्या सेवा  कुछ सिरफिरे जुनूनी लोगो का काम है जो समाज में परिवर्तन लाने की चाह रखते है और उसमे अपना सहयोग करना चाहते है चाहे इसकी कीमत कुछ भी देनी पड़े। कुछ भी यानि कैरियर दांव पर, परिवार , व्यक्तिगत रिश्ते दांव पर परिणाम स्वरूप  जीवन भर का भटकाव। नहीं, समाज सेवा  कुछ लोगो की जिम्मेदारी  नहीं हो सकती है, क्यों  आइए इसे जरा विस्तार से समझते है।


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसकी आवश्यकताएं केवल भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित नहीं है। इस विषय पर अब्राहम मैस्लो नाम के एक सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी ने मनुष्य व्यहार (Human behavior ) का  एक बड़ा  उपयोगी सिद्धांत १९४३ में प्रतिपादित किया था।  मैनेजमेंट विषय में पढ़ाया जाने वाला यह एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो यह बताता है कि किसी भी आदमी  का  व्यहार उसकी अपनी निजी  आवश्यकताओं के अनुसार बदलता है। हालाँकि इसका एक सामान्य क्रम है। इस क्रम में सबसे पहली आवश्यकता है,अपनी   शारीरिक  आवश्यक्ताओं  की  पूर्ति। जिसमे रोटी, कपडा  मकान इत्यादि के अलावा जैसे सोना ,यौन क्रिया इत्यादि शामिल है । फिर आता है जीवन में आने वाली तरह-तरह की परेशानियों से मुक्ति के लिए सुरक्षा इसमें शामिल है जीवन यापन के लिए पर्याप्त धन,अच्छा स्वास्थ ,परिवार इत्यादि की प्राप्ति । इन दो आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद नंबर आता है दोस्तों, परिवारजनों के बीच आदर जिससे उसमे सामाजिक प्राणी होने का भाव जाग्रत होता है। दुनिया में ८० प्रतिशत लोग इन तीन आवश्यकताओं की पूर्ति में  ही पूरा जीवन  बिताते है। इस क्रम में अगला  नंबर आता  है  समाज में पहचान बनाने का एवं  प्रसिद्धि पाने का । और अंत  में आदमी  सेल्फ रिअलाइजेशन यानि मैं कौन हूँ ? मेरा जन्म क्यों हुआ है इत्यादि प्रश्नों  के उत्तर पाना चाहता है , ताकि इस जीवन मरण से सदैव के लिए मुक्ति मिले और  मोक्ष प्राप्ति की और अग्रसर हो  सके । 

मैसलो नियम के अनुसार साधारणतया मनुष्य  पहली और दूसरी आवश्यकता पूर्ति के बाद ही  तीसरी आवश्यकता पूर्ति के लिए काम शुरू करता है। लेकिन  बहुत से लोग जिन्होंने  जीवन में समाज सेवा का   मन बना लिया  है तो  वह पहली दूसरी तो क्या तीसरी की भी न परवाह करते है न चाह।  देश में दर्जनों ऐसे उदाहरण मौजूद है जिन्होने इस नियम के अपवाद के उदहारण समाज के सामने रखे है। इनमे से कुछ की सामाजिक  उपलब्धियाँ इतनी बड़ी थी की  चौथे और पाँचवे नंबर की आवश्यकताओं की पूर्ति होती लगती है  लेकिन  यह उनका जीवन  उद्देश्य न होकर  लक्ष्य था समाज  सेवा । अतः अनजाने में ही  उनकी चौथी और पांचवीं आवश्यकता की पूर्ति होती मालूम पड़ती है। यह उन लोगो के लिए तो ठीक  कहा जा सकता है जिनकी उपलब्धिया इतनी बड़ी थी की समाज में उन्हें उच्च सम्मान अपने कार्यो के परिणाम स्वरुप प्राप्त हुआ। लेकिन समाज में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसकी उपलब्धियाँ इतनी बड़ी नहीं है जिससे ऐसा लगे की यह लोग उच्च आवश्यक्ताओं के लिए काम कर रहे है  किन्तु इनकी अनुपस्थित आसानी से महसूस की जाती है। यही नहीं  बहुत से  लोग जिनको बड़ी  उपलब्धियां प्राप्त  हुई है उनको  भी बड़ी उपलब्धियाँ ऐसे लोगो के योगदान के बिना संभव   नहीं हो सकती थी । समाज में अनेक ऐसे समाज सेवी संगठन है जिसके साथ काम करने वाले हजारों लोग अपने जीवन की आहुति समाज सेवा के लिए बिना किसी अपेक्षा के केवल अपनी जुनूनी प्रवृति के कारण अथवा किसी महान व्यक्ति को आदर्श मैंने के कारण समाज  सेवा की राह  पर चल पड़ते है।  राष्ट्रीय स्वयँ सेवक संघ के प्रचारक इस तरह के समाज सेविओं का एक बड़ा उदाहरण  है। जिनके योगदान से ही समाज का संगठन,और चरित्र निर्माण इत्यादि होता है। 

अब आते है मूल सवाल पर की समाज की सेवा सबका काम है या कुछ विशेष लोगो का। जो मनुष्य जीवन को एक अवसर  मानते है मनुष्यता की सेवा करने  का । जब हम यह कहते है की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो उसके पीछे जो भाव है वह यह है की मनुष्य अकेला नहीं रह सकता। इसीलिए मनुष्य  समाज के  निर्माण में  अपना योगदान कर इसे  बनाता है और  फिर इसका उपभोग करता है। परन्तु समाज में देखने से पता चलता है की एक वर्ग अपना अधिकांश समय  पहली ,दूसरी  और तीसरी आवश्यकता की पूर्ति   में लगाता है लेकिन जब संसाधनों के  उपभोग की बारी आती  है  तब सबसे ज्यादा उपभोग उन्ही के द्वारा होता है जिन्होंने इसके लिए सबसे कम योगदान किया है। चूँकि सामाजिक संरचना ऐसी है की संसाधनों के  उपभोग की सुविधा पैसे के बदले में आसानी से  उपलब्ध हो जाती अतः  यह  तरीका सरल है और कम समय में  उपभोग की सुविधा  प्राप्ति हो जाती है। इस व्यस्था  का ही  परिणाम है की समाज सेवा में लगे हुए लोग भौतिक सुख से तो वंचित रहते ही है साथ ही उनकी सेवा के परिणाम स्वरुप समाज में हुए सकारात्मक परिवर्तन के कारण  अपने योगदान के लिए जिस स्वाभाविक सम्मान के वे  अधिकारी  है वह भी मुश्किल से ही मिलता है। नतीजा, समाज सेवा को  जीविका  का विकल्प बनाये जाने के   लिए  प्रेरणा का अभाव रहता है। जिससे समाज में अनेक प्रकार की विकृतियाँ होती है और उसका खामियाजा किसी न किसी  रूप में समाज के सभी लोगो  को भुगतना पड़ता है। असल में समाज में सेवा करने वाले लोग दूध में चीनी की तरह है जिनका काम दिखता नहीं है किन्तु इसका अभाव जरूर महसूस होता है। 

समाज में गुणात्मक परिवर्तन के लिए इस व्यस्था में  परिवर्तन की  आवश्यकता है। नयी व्यस्था में जिसका जितना योगदान उतना उसका प्रतिफल के सिद्धांत को अमल में लाना चाहिए।  समाज  सेवा के लिए संकल्पित लोगो को साधारणतया  जीवन व्यापन के लिए मानधन  ऐसे  व्यापारिक प्रतिष्ठानों से प्राप्त होता है जिनकी सामाजिक कार्यो में रुचि हो अथवा  सामाजिक दाईत्व कानून का निर्वाह करने हेतु बड़े व्यापारिक  प्रतिष्ठान इस कार्य के लिए अपना योगदान करते है। सरकार के द्वारा इस  योगदान को कर में छूट देकर   सम्मानित किया जाता है।  इस तरह सामाजिक दाइत्वों का निर्वाह समाज की अलग अलग इकाईओं द्वारा होता है। 

समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यह व्यस्था ठीक है परन्तु  पर्याप्त नहीं है। दरअसल इस व्यस्था की एक बड़ी  खामी है की यह समाज के सभी लोगो को योगदान करने के लिए न प्रेरित करती है न मजबूर करती है। वैकल्पिक व्यस्था के रुप में जैसे वित्तीय विश्वसनीयता के प्रमाणी करण का क़ानूनी  प्रावधान है, उसी प्रकार  का प्रावधान सामाजिक प्रमाणी करण के लिए भी बनाये जाने की आवश्यकता है। जैसे एक बार वित्तीय सुविधाओं का दुरपयोग  करने पर दोबारा यह सुविधा उपलब्ध नहीं  होती है  उसी तरह समाज के संसाधनों का एक बार दुरुपयोग  किये  जाने के बाद उसी व्यक्ति द्वारा दोबारा दुरपयोग किये जाने की सम्भावना ख़तम हो जानी चाहिये। यह नियम समाज के लोगो को समाजोपयोगी  कार्यो को करने  के लिए प्रोत्साहित करेगा। यदि इसका प्रमाणी करण भी  हो  सके तो इसमें अपना योगदान करने के लिए हर व्यक्ति प्रेरित हो सकेगा। और संसाधनों के उपभोग के साथ ही निर्माण में भी  योगदान अपनी दिनचर्या में कुछ समय समाज के लिए देना है इसका निर्धारण करेगा।  साथ ही जैसे  अन्य दैनिक कार्य नियमित करने का नियम दिनचर्या में होता  है उसी तरह समाज निर्माण में  भी उसका योगदान सुनिश्चित  हो जायेगा। यह पहल  समाज निर्माण में  एक नई शुरुवात होगी।  

विद्यार्थी जीवन में एन सी सी और एन  एस एस  जैसे अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में साधारणतया काफी विद्यार्थियों की  भागीदारी रहती है। इसका मुख्य कारण है की इस तरह की भागीदारी नौकरी प्राप्ति में सहायक होती  है। इसलिए इसमें विद्यार्थियों की  उत्साह पूर्वक भागीदारी होती है।  पश्चिमी देशों में तो उच्च शिक्षा में  प्रवेश  के लिए  यह एक  आवश्यक शर्त है। आज आवश्यकता इस बात की है कि  यह प्रेरणा विद्यार्थी जीवन के बाद भी बनी  रहे।  

यहाँ एक बात को समझना बड़ा महत्वपूर्ण है कि सनातन संस्कृति में  सम्प्रदाय, समुदाय की अवधारणा है जिसमे हर व्यक्ति का योगदान होता है। इसके निर्माण में हर किसी का सक्रिय सहयोग ही धर्म है।  भीष्म पितामह ने भी कहा है 
अजीजीविषवो विद्यम यशः कामो समन्ततः।
ते  सर्वे नर  पापिष्ठाह  धर्मस्य   परिपंथिन:।।

अर्थात जो व्यक्ति अपने ज्ञान व क्षमताओं का उपयोग केवल अर्थ और काम के लिए करते हैं वे सभी घोर पापी एवं धर्म द्रोही हैं।इससे बचने के लिए धर्म और मोक्ष में भी अपने ज्ञान व क्षमता का उपयोग करना होगा, इसी को समष्टि, समुदाय, सम्प्रदाय एवं वर्तमान में समाज की सेवा कहा जाता है।धर्म व मोक्ष के रूप में समष्टि अभ्युदय हर मनुष्य का नैसर्गिक/धार्मिक दायित्व है।

अतः यह आवश्यक है की ऐसा तन्त्र विकसित किया जाये जो सेवा के कर्तव्य पालन के लिए सभी लोगो को प्रेरित और प्रोत्साहित करे ताकि सबका समावेशी विकास सुनश्चित किया जा सकेगा। तभी हम आदर्श समाज की स्थापना का लक्ष्य प्राप्त करने की और अग्रसर हो सकेंगे।  

अजय सिंह "एकल"




 और अन्त मे  

                                                    चिंता तो मुझे भी थी बहुत देश के लिए 
मगर जब पेट भर गया तो नींद आ गयी 

Friday, November 22, 2019

असीम रोजगार की संभावनाएं है पानी में


दोस्तों ,

पानी  और हवा ईश्वर की  ऐसी देन है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं  की जा सकती है। लेकिन आज के युग में शुद्ध हवा और शुद्ध पानी दोनों  ही मिलना  मुश्किल हो गया है। आज से बीस -पच्चीस  साल पहले तक जब बोतल वाला पानी और आरओ वगैहरा की   उपलब्ध  नहीं था  तो नलों  में सप्लाई  होने वाला  पानी सभी लोग निश्चिंत  हो कर पी  लेते थे। परन्तु अब जो लोग  आर्थिक रूप से संपन्न  है उन की कोशिश है की बोतल का पानी ही पिया जाये। ताकि अशुद्ध पानी पीने  के खतरे से बचा जा सके।  

पिछले बीस -तीस   वर्षो  में देश ने तकनीकी क्षेत्र में बहुत उन्नति की है। खास तौर पर सॉफ्टवेयर ,अन्तरिक्ष , ऑटोमोबिल इत्यादि में भारत ने विश्व में अपना स्थान बनाया है। किन्तु कुछ सेक्टर जैसे कृषि , ऊर्जा इत्यादि में हम उस मुकाबले में  उन्नति नहीं  कर पाए है।  हवा ,पानी जैसे कई अन्य   महत्वपूर्ण  क्षेत्र  तो  बिलकुल ही  पिछड़  गए है। नतीजा पर्यावरण और शुद्व पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। भारत सरकार ने अब इसके लिए नए सिरे से युद्धस्तर पर प्रयास शुरू कर दिया है। उम्मीद की जानी  चाहिए की  स्थितियों में शीघ्र ही परिवर्तन देखने को मिलेगा।

पानी स्वास्थ्य के लिए तो महत्वपूर्ण है ही ,इस  क्षेत्र में रोजगार की भी  असीम सम्भावनाये है। उपयुक्त रणनीतिक योजना बना कर काम करने से अगले पांच वर्षो में दस लाख से ज्यादा रोजगार एवं  दस हजार से ज्यादा उद्दयम इस क्षेत्र में स्थापित हो  सकते है। यह प्रयास अर्थव्यस्था के फाइव ट्रिलियन के लक्ष्य के साथ ही यूनाइटेड नेशन्स के सेल्फ डेवलपमेंट गोल २०३०  को भी प्राप्त करने में सहायक होगा। प्रधान मंत्री मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के लाल किले के प्राचीर से हुए स्वतंत्रता दिवस के भाषण में  जल मंत्रालय के द्वारा किये जाने वाली  एक अति महत्वाकांक्षी योजना "वर्ष २०२४ तक हर घर में नल" पहुंचाने की घोषणा की है और इसके लिए तीन लाख पचास हजार करोड़ का बजट भी दे दिया है। इन लक्ष्यों की तय समय में प्राप्ति हो इसके लिए योजनाबद्ध तरीके  सभी आवश्यक पहलूओं पर काम करना होगा।  यह जरुरी है की जब हर   घर  मे नल पहुंचे तो उसमे निकलने वाला पानी पीने लायक हो। यह बहुत बड़ा काम है जिसको अंजाम देने के लिए  कुशल एवं प्रशिक्षित लोगो की बड़ी टीम की जरुरत पुरे देश में  होगी।   अभी देश में पानी के क्षेत्र  में कौशल विकास प्रशिक्षण का बहुत अभाव है। पीने के पानी के शुद्धिकरण और इसके वितरण प्रबंधन के लिए जिस  तरह का कौशल चाहिए उसके  लिए  केवल काम चलाऊ अनौपचारिक प्रशिक्षण  की व्यस्था  है।  नतीजतन  हम आज भी वर्षो पुरानी तकनीक का प्रयोग पानी के शुद्धि करण और वितरण के लिए कर रहे है।

वर्ष  २०१४ में मोदी सरकार के आने के बाद से ही इस दिशा काम करना शुरू हो गया था।  माननीय प्रधान मन्त्री  ने एक बड़े व्यापारिक प्रतिनिधि मंडल जिसमे नेशनल स्किल डेवलपमेंट कार्पोरेशन के प्रतिनिधी  भी शामिल थे के साथ  2015  में फ्रांस, जर्मनी कनाडा और अमेरिका चार देशो की यात्रा की थी। इस यात्रा में  कनाडा  के प्रसिद्ध  फ्लेमिंग कॉलेज जो पानी से सम्बन्धित प्रशिक्षण का प्रतिष्ठित केंद्र है,  के साथ एक ऍम ओ यू  साइन हुआ था।   पानी से सम्बंधित तकनीकी  के लिए कनाडा दुनिया का एक  अग्रणी देश है इस नाते से    भारत सरकार  की यह एक सराहनीय कोशिश  थी। लेकिन दुर्भाग्य से पांच साल बीत जाने के बाद भी  इसमें कोई प्रगति नहीं हो पायी है।

अब समय आ गया है की इस दिशा में योजना बद्ध तरीके से कार्य किया जाये। इसके लिए एक कार्य दल (टास्क फ़ोर्स) बना कर पानी के क्षेत्र में  किये जाने वाले सभी कामों की सूची बनाना ,उन कामो को करने के लिए जिस तरह के कौशल विकास की आवश्यकता है उसका निर्धारण करना।  काम को ठीक ढंग से अंजाम देने के लिए पूर्व योग्यता का निर्धारण और  इंडस्ट्री के साथ मिलकर पाठ्यक्रम बनाना कार्यदल का प्रथम कार्य होगा। इसके बाद कौशल प्रशिक्षण के लिए विशेषज्ञ शिक्षक (मास्टर ट्रेनर्स) तैयार करना  और हर प्रदेश में आवश्यक प्रयोगशालाओं  का निर्माण एवं प्रबन्धन करना। तत्पश्चात मास्टर ट्रेनर्स  की सहायता से पूरे  देश की  नगर पालिकाओं और जल विभाग के अधिकारिओं का प्रशिक्षण करके  नियमित रूप से इनका समय समय पर परिक्षण (ऑडिट) करके पूरी पारदर्शिता के साथ इस सूचना का वेब साइट पर प्रसारण होने की जिम्मेदारी भी  कार्यदल की होनी चाहिए। जिन कामों को किया जा रहा है उसकी गुणवत्ता  बनाये रखने की जिम्मेदारी जिन  लोगो की है  उन अधिकारिओं की जवाब देही तय करना और   उसमे  कमी होने पर  उनसे जवाब मांगे जाने की  व्यस्था हो जाने पर आम आदमी का  व्यस्था में  विश्वास पुनर्स्थापित होगा। और देश के लोगों का नगर पालिकाओं द्वारा वितरित  पानी  पीकर भी  स्वास्थ ठीक रहेगा इसे सुनिश्चित कर सकेंगे।  

अजय सिंह "एकल"   



   

Monday, November 11, 2019

भारत की नई शिक्षा निति :सब अच्छा नहीं


दोस्तों,
मोदी सरकार के पहले सत्र में जिस नई शिक्षा निति का आगाज किया गया था आखिरकार उस निति की घोषणा मोदी सरकार  के द्वितीय  सत्र में सत्ता सँभालते ही हो गयी है।  इस नीति को बनाने और घोषणा करने में चार वर्षो से ज्यादा का समय लगा। इस वर्ष जून- जुलाई में   घोषणा होने के बाद १०० से ज्यादा गोष्ठियां देश बाहर में आयोजित की जा चुकी है और दो लाख लोगो से ज्यादा लोगो ने इस पर अपने सुझाव दिए गए है। अब इन सुझावों को मसौदे में शामिल कर मंत्री परिषद् के सामने पेश किया जायेगा। इसके बाद नई शिक्षा नीति को लागु करने का रास्ता प्रशस्त हो जायेगा।

वास्तव में किसी भी देश की शिक्षा नीति से ही यह तय होता है की हम भविष्य में कैसे नागरिक चाहते है। इस शिक्षा नीति में पिछली नीतियों से सबक लेते  हुए उनको बहुत हद तक दूर करने की ईमानदार  कोशिश भी की गयी है।  लेकिन कुछ ऐसी कमियाँ जिनका जिक्र अभी तक ठीक से नहीं हो पाया है उनको इंगित करने और उन्हें ठीक करने की भी कोशिश की जानी चाहिए ताकि इसे और बेहतर बनाया जा सके। प्रस्तावित  शिक्षा नीति की कमियों को दूर कर के ही नए भारत के निर्माण का रास्ता सुनिश्चित किया जा सकेगा।

दुनिया में जिस तरह से मशीनी करण और स्वचालित यंत्रो का उपयोग बढ़ रहा है ऐसा लगता है बहुत से रोजगारो को करने लिए आवश्यक कुशलता में तेजी से परिवर्तन आएगा। इसलिए आवश्यक है की इसको ध्यान में रख कर रोजगार पूरक पाठ्यक्रम बनाया जाये। रचनात्मक कुशलता एवं एवं व्यहारिक कौशल के गुण केवल मनुष्यो में हो सकते है। यन्त्र तो केवल जिस काम के लिए  बने है उसी को सकते है।  इसलिए इन गुणों को विकसित करने की युति शुरू से इस तरह से की जानी चाहिए ताकि यह वयक्ति की प्रकृति बन  जाये चेतना बन जाये।  इन गुणों को प्रयोग में लाने या  ना  लाने का विकल्प ही उपलब्ध न रहे।

दूसरी महत्व पूर्ण बात है की नव युवको  के सामने जब जीवन   वृत्ति के लिए  चुनाव करने का प्रश्न आता है तो केवल उन्ही पेशों के बीच चुनाव करने की सलाह दोस्त और परिवार जनो से मिलती है जिसमे धन कमाने की पर्याप्त सम्भावनाएं हों जैसे डॉक्टर,इंजीनियर या इसी तरह के कुछ और जो अच्छी तरह से जांचे परखे हुए काम है जिससे समाज में सम्मान और पर्याप्त धन मिल सके। जबकि कोई भी व्यक्ति केवल उसी काम को शानदार और सर्वश्रेष्ठ  तरीके से कर सकेगा जिसमे उसकी रूचि हो। अब नवयुवकों के पास  ज्ञान और अनुभव की कमी  होने के कारण अधिकांश मामलों में उन्हें मार्गदर्शन परिवार के बड़े बूढ़ो और मित्रो से मिलता है जो बिना उसकी रूचि जाने हुए अपने अनुभवों के आधार पर सुझाव देते है। पर्याप्त जानकारी के आभाव में उपलब्ध विकल्पों में से चुनाव करने की मज़बूरी होती है। परिवार की आर्थिक स्थिति का भी इसमें गंभीर योगदान होता है।

उदाहरण के लिए यदि कोई युवक जिसे प्रकृति  और  पोधो के साथ काम करना अच्छा लगता है और इसे वह जीवन यापन के लिए चुनना चाहे तो इस बात की सम्भवाना अधिक है की उसे इस विकल्प को चुनने की स्वतंत्रता ही न मिले और मज़बूरी में उसे वह विकल्प स्वीकार करना पड़े जिसमे अधिक धन और सम्मान की सम्भावना हो। इस कठिनाई को दूर करने का केवल एक ही तरीका है हमें ऐसा  पारिस्थितिकी तंत्र   विकसित करना पड़ेगा जिसमे वैकल्पिक व्यवसाओं के बारे में विस्तृत जानकारी आसानी से उपलब्ध हो। और इस ज्ञान को  युवक के पास जब वह छोटी कक्षा का छात्र हो पहुंचाने की व्यस्था करनी चाहिए।  साथ ही युवको की रूचि जानने के लिए मुफ्त परिक्षण की व्यस्था भी स्कूल के स्तर पर होनी चाहिए ताकि समय समय पर इसकी जाँच करना संभव हो सके। और नवयुवक पहले तो अपनी रूचि के बारे में जान सके और फिर सम्बद्ध  व्यसायों के बारे में जान कर कैसे अपनी सारी संभावनाओं का पूरा उपयोग कर सके इसकी योजना भी बना सके।  इस चुनाव को पूरा करने में आर्थिक परिस्थितयो से कैसे निपटा जाना है इसकी योजना भी शिक्षा नीति का ही हिस्सा होना चाहिए।

अजय सिंह "एकल"  




Saturday, November 9, 2019

और देश जीत गया

 दोस्तों ,
आज का दिन ऐतिहासिक है। नौ नवम्बर का दिन भारत ही नहीं दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। नौ नवम्बर १९८९  आज ही के दिन बर्लिन की दीवार  टूटी   थी और ४५ साल बाद दो दिल मिल गये।  भारत पाक बॅटवारे के बाद गुरु नानक देव जी  का बोधि स्थल जो सिख समाज के लिए तीर्थ है पाकिस्तान में होने के कारण अपने गुरु स्थान पर जाने से वंचित था।  आज करतारपुर कॉरिडोर खुलने से दर्शन के लिए तीर्थ स्थल जाने का मार्ग भी खुल गया है। गुरु नानक देव जी के ५५० वर्ष पूरे होने पर आज ही के दिन पूरी दुनिया के सिख समाज और हिन्दू समाज को आज ही के दिन यह अनमोल तोहफा मिला है। 

आज का दिन भारत के इतिहास का सबसे सुखद दिन  है जब ५०० वर्षो से हिन्दू समाज के लिए कलंक की तरह बाबरी मस्जिद विवाद का सुप्रीम कोर्ट के पांच माननीय जजों की संवैधानिक पीठ ने तमाम तरह के शक सुबहे और आशंकाओं को ख़तम करते हुए ऐसा न्याय किया जो समाज के सभी वर्गों के  लिए  प्रसन्नत्ता  और संतोष लेकर आया है। इतने गंभीर   विवादित मुद्दे पर इतने कम समय (४० दिन) में  सटीक निर्णय करना वास्तव में न्यायालय के लिए कठिन काम था लेकिन इसके लिए जिस दृढ़ता और आत्मशक्ति का परिचय मुख्य  न्यायाधीश और उनकी टीम ने दिया है उसकी जितनी सराहना  की जाये कम है। सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशो का  एक मत हो कर निर्णय करना अपने आप में एक बड़ी बात है।  इसके लिए कानून का विशेषज्ञ होने के साथ देश हित समाज हित के साथ देश के साथ भावनात्मक जुड़ाव जरुरी है।  और हाँ कहा जाता है  की कानून अँधा होता है लेकिन आज के सर्वसम्मति से हुए निर्णय को सुन कर यह विश्वास हो गया की कानून अँधा नहीं है। अदालत में हुए निर्णय को अपने स्वार्थो के चश्मे से देखने वाले लोग अंधे होते  है।  वास्तव में न्याय वही है जो सब के लिए प्रसन्नता का कारण  बने  समाज में सद्भाव बना कर रखे और देश की उन्नति की सीढ़ी बढे, आगे बढ़ने की राह प्रशस्त करे और आने वाली पीढ़ी को  देश हित का  सन्देश दे  हो। आखिर कानून मनुष्यों के लिए है और ऐसा कानून जो समाज के लिए देश के लिए ठीक नहीं उसका पालन न करना ही ठीक है।  आखिर राष्ट्र पिता  गाँधी ने भी तो इसी कसौटी पर कानून को जाँच कर नमक  कानून की अवज्ञा की थी। 

राम मंदिर बनाने के लिए देश के कितने ही समाज सेविओ ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अपने जीवन को आहूत कर दिया।  विश्व हिन्दू परिषद् के माननीय अशोक सिंघल जी को इस अवसर पर याद करना आवश्यक है जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस सुन्दर कल्पना को साकार करने के लिए अर्पित किया। कोठारी बंधू और उनके जैसे अनगिनत लोगो ने जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान कर दिया ऐसे सभी लोगो के लिए  आज का दिन वास्तव में केवल यादगार दिन नहीं बल्कि  जीवन का  सबसे  सुन्दर दिन है और यह लोग जहा कही भी हो अति प्रसन्न होंगे।  हम हिन्दू समाज के  सभी लोग ऐसे सभी लोगो को याद करके अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते है जिनकी वजह से हिंदू समाज के भाग्यशाली लोगो के जीवन में  यह पुनीत अवसर आया है। 

देश में सुन्दर भव्य राम मंदिर बनाने का  रास्ता देश की सर्वोच्च अदालत ने आज  साफ़ कर दिया है।  इसके लिए कुछ दिशा निर्देश सरकार को दिये गए है। आशा  की जानी चाहिए भारत की सरकार और समाज के सभी वर्ग इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग कर देश की प्रतिष्ठा पुनर्रस्थपित करने में अपना सक्रिय सहयोग कर जल्दी से जल्दी मंदिर निर्माण कर अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को पुनः मंदिर में प्रतिष्ठित कर सकेंगे। क्योकि जिस समाज के आराध्य को सम्मान नहीं मिलता उस समाज को भी कभी सम्मान नहीं मिल सकता है। यही से देश के विश्व गुरु बनने के मार्ग प्रशस्त होगा और देश नए भारत के निर्माण की ओर अग्रसर हो कर दुनिया का नेतृत्व करेगा। समस्त मानवता का जीवन सुखी और समृद्ध बनाने का यही एक मात्र रास्ता है। 

जय  श्री राम 

अजय सिंह "एकल " 



   

  

Saturday, July 27, 2019

हाय मैं क्या करू राम

दोस्तों ,

अभी दो  महीना भी नहीं हुआ मोदी सरकार पार्ट २ का, अभी अभी तो अमित शाह गृह मन्त्री बने है, लोक सभा का भी पहला सेशन चल ही रहा है लेकिन  देश के कथित बुद्ध जीविओं का विधवा विलाप शुरू हो गया। मोदी पार्ट १ में भी ऐसा ही नाटक कथित बुद्ध जीविओं ने अपने पुरुस्कार वापस करके शुरुवात की थी।  थोड़े दिनों में शांत होना पड़ा क्योंकि जनता ने कोई खास तब्बजो नहीं दी।  फिर जैसे तैसे करके संतोष कर लिया चलो किसी तरह रह लेंगे इस देश में हालाकिं दर तो बहुत लगा नसरुद्दीन शाह जैसे लोगो को । लेकिन मोदी कौन सा दुबारा आने वाले है यह सोच कर संतोष कर लिया ।  फिर भी कोई चूक न हो जाये इसलिए सब मिल गए चुनाव लड़ने के लिए। लेकिन अफ़सोस जनता ने  इन लोगो को अंगूठा दिखा दिया। और मोदी सरकार को प्रचंड बहुमत मिल गया।  सारे अरमान धराशाइ हो गए।  

अब जब सारी उम्मीद टूट गयी तो फिर  दुबारा नाटक शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं सूझ रहा है । डर
लग रहा है की अगले पांच सालो में अस्तित्व ख़तम न हो जाये। इस लिए इसी को विकल्प मान कर कार्यवाही शुरू कर दी है शायद लोग बिचारा समझ कर ही कुछ दया दिखाए और सहानभूति से कोई चुनाव जितने का जुगाड़ लग जाये।  दिल्ली के चुनाव पास है और केजरीवाल सरकार आखरी सांसे गिन  रही है तो यह आखरी दांव चलने में भी क्या बुराई है।

पूरे  देश में ४९ लोगो को माब लिंचिंग को लेकर  एक विशेष समुदाय के लोगो की चिंता हो रही है।  अब क्या करे तो कही ममता की जय न बोलने पर पिटाई कर रहे है और कही कही तो खून खराबा करने में भी कोई परहेज नहीं।   इन लोगो को भी पता है आगे क्या होने वाला है। जिस तरह का कड़ा रुख मोदी सरकार ने आतंकवादिओं  और उनकी मदद करने वालो पर अपनाया है तो अब वह दिन भी दूर नहीं की देश में प्रपंच करने वालो और किसी भी तरह से माहौल गन्दा करने वालो की खैर नहीं रहने वाली है। 

इसलिए अच्छा है संभल जाये आदते सुधार ले या फिर देश के बाहर का रुख करले नहीं तो इसके अगले सीन में "हाय राम मैं क्या करू"  के अलावा और कुछ नहीं हो सकेगा। समय रहते चेतना जरुरी है। और सोच में  परिवर्तन भी। 

 अजय सिंह "एकल"




Tuesday, November 6, 2018

हर कोई माँगे आजादी

दोस्तों ,



देश में जब से मोदी राज आया है तब से हर कोई आजादी माँग  रहा है। कभी कभी तो ऐसा लगता  है की मानों देश में किसी विदेशी का शासन गया है।  अख़बार, टीवी  और पत्रिकाओं को पढ़ने से तो ऐसा ही लगता है। मई २०१४ में मोदी जी के प्रधान मंत्री बनने के तुरंत बाद ही बहुत से लोगो को घुटन महसूस होनी शुरू हो गयी थी। इसके खिलाफ अपनी भावनाओं  को व्यक्त करने सबसे पहला बड़ा हमला बोला देश के उन लेखक और बुध्जीविओ ने जिनकी रोजी रोटी और दुकानदारी   सरकार के पैसो पर चल रही थी जब इन लोगो पर अंकुश लगा तो इन का दम  घुटने लगा और करीब ३२-३३ लोगों ने अपने पुरुष्कार वापसी का अभियान चला कर आजादी मांगने का स्वांग रचा।

- महीने में जैसे ही इन महान लेखकों को लगा की इनका  अभियान बिहार चुनाव में  अपेक्षित परिणामों को  लाने में सफल  हो गया तो इस अभियान का पार्ट दो शुरू हुआ देश के उत्तर में देश- विदेश में विख्यात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में।  जहाँ कन्हैया कुमार जिनका पढ़ने लिखने से कोई वास्ता होकर   केवल नेतागिरी  करने के लिए पढाई कर रहे थे कुछ कश्मीरी छात्रों के साथ आजादी माँगने का आन्दोलन चलाया और इसे राहुल गाँधी के नेतृत्व में खूब हवा मिली। और साथ ही दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश में कमान संभाली  रोहित वेमुला ने जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी की खिलाफत का आंदोलन शुरू कर दिया। और गुण्डा गर्दी में सफल हो पाने के कारण आंदोलन चलाने वालों ने रोहित की बली चढ़ा कर मामले को गरमाना शुरू किया। मुश्किल से -  महीने ही निकले थे की   जे एन यू में ही पढ़ने वाले एक और छात्र  नजीब अहमद गायब हो गए   जिनके  तार कश्मीर से जुड़े थे और आजादी की बेसब्री से माँग कर रहे थे। 


देश में यह सबकुछ चल ही रहा था मोदी जी  ने  छोटे -छोटे दर्दो के इलाज में देश में नोट बंदी लागू  कर दी यह एक ऐसी चाल  थी जिसका  पूर्वानुमान ही नहीं था। नतीजतन लोग आजादी मांगने के बजाय अपनी सम्पत्ति बचाने में लग गए और मोदी जी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में अप्रत्याशित विजय हासिल करके यह दिखा दिया की भले ही उन्हें राष्ट्रीय राजनीत का अनुभव दूसरे बड़े नेताओं खास कर के कांग्रेसी और समाजवादी नेताओं से कम  हो    लेकिन उन्हें रावण की नाभि के अमृत का पता है और उन्होंने एक वार  से सारा मामला ठंडे बस्ते में डालने में सफलता प्राप्त कर ली । 
देश में एक बार फिर चुनाव का माहौल बना है पहले पांच राज्यों के चुनाव फिर केंद्र के शासन के लिए चुनाव। एक बार फिर माहौल गर्माने की पुरजोर कोशिश शुरू हो गई है। सीबीआई हो या रिज़र्व बैंक  यहाँ तक की फिल्म और टेलेविज़न इंस्टिट्यूट के निदेशक अनुपम खेर समेत देश के अनेक संस्थानों में लोगो ने अपने अपने स्थान पर शोर मचाना शुरू कर दिया है। राफेल की खरीद में कल्पित घोटाले का शोर बिना किसी सबूत  के कांग्रेस अध्यक्ष  राहुल ने उठा रखा है। और यह सबकुछ चुनाव तक तो चलने वाला है ही। क्योकि इस बार के चुनाव कांग्रेस के लिए अस्तित्व का प्रश्न है तो भाजपा के लिये  प्रतिष्ठा का। 

मोदी अमित शाह की जोड़ी ने जिस तरह से पिछले साढ़े चार साल  शासन देश में किया है उससे पुराने भाजपाई भी नाराज है। यशवंत सिन्हा,शत्रुघन सिन्हा अरुण शौरी तो खुलेआम अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे है। गुपचुप नाराजगी वालो की लिस्ट तो और भी लम्बी है। इसका एक बड़ा कारण बना है देश के अंदर का माहौल।कुछ लोगो ने कुछ इस तरह का माहौल बना दिया है की यदि आप मोदी भक्त नहीं है तो फिर आप देश द्रोही की श्रेणी में आते है।  देश भक्त होना और मोदी भक्त होना पर्यायवाची हो गए है। ये स्थिति ठीक नहीं है। अतिउत्साह में यही काम डी के बरुआ इन्द्रा गाँधी के लिए भी करचुके है। असल में इस तरह का वातावरण बना कर कुछ लोग अपनी स्वार्थसिद्धि तो कर सकते है पर ये न तो देश का भला करता है न उस व्यक्ति का जिस के लिए यह सबकुछ किया जा रहा है। बल्कि यह वस्तुस्थित से दूर कर देता है जो चुनाव में परिणामो की पूर्व कल्पना भी करने के लिए केवल जीत का विकल्प  ही दिखाता है नतीजा परिणाम उलटे आते है। इसलिए जो कोई भी मोदी नीतियों से असहमत है उसके लिए घुटन का माहौल बन गया है। हालांकि मोदी नीतियों से असहमत व्यक्ति भी देश के बारे में ठीक सोच रखने वाला हो सकता है इस बात को अगर ध्यान नहीं रखा गया तो भविष्य में कुछ और लोग भी आजादी की मांग उठाते हुए दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं। 
अजय सिंह "एकल"

और अन्त  में 


प्रश्नपत्र है जिंदगी

जस की तस स्वीकार्य

कुछ भी वैकल्पिक नहीं,

सभी प्रश्न अनिवार्य....