Saturday, July 20, 2013

मेढकों के कमान्डर इन चीफ

प्रिय पाठकों,
देश में फिर चुनाओं की बरसात का मौसम आ गया है और साथ ही आ गया है मेढकों की बयान बाजी का।इन मेढकों को दिशा देने  और एक तराजू में रखने के लिए दोनों प्रमुख पार्टियो ने अपने अपने कमान्डर बना दिये है। आइये देखते है इन दोनों कमांडरो की क्या स्टाइल है और यह कैसे रखेंगे अपने-अपने मेढको को अपनी कमांड में।

भाजपा के नमो मन्त्र ने देश में जितनी उथल पुथल राजनीत में इस समय मचा रखी है, आजादी  के बाद इतनी हलचल  इसके पहले जिन लोगो ने मचाई है उनमे एक है जय प्रकाश नारायण  और दूसरे है विश्वनाथ प्रताप सिंह। एक ने देश में आपात काल में जनता का नेतृत्व किया और इन्द्रा गाँधी जैसी महिला को सत्ता से बेदखल करवा कर जनता पार्टी की सरकार बनवा दी और इस तरह कभी हार ना मानने वाली इन्द्रा को जेल तक जाना पड़ा। दूसरे ने राजीव गाँधी सरकार में बोफोर्स घूस कांड को लेकर पूरे देश में जागरूकता फैलाने का अभूत पूर्व काम किया था। और राजीव गाँधी को सत्ता से ऐसा बाहर किया की कांग्रेस को मज़बूरी में नरसिंघा राव को प्रधानमन्त्री बनाना पड़ा और देश का शाही गाँधी परिवार करीब तेरह साल शक्ति हीन होकर सत्ता से दूर रहा ।

लेकिन अब परस्थितिया फर्क है।यू पी ए के दस सालों  के कुशासन ने  भ्रष्टाचार ,महंगाई और अराजकता की वजह से ऐसा माहौल देश में बन गया है की नेताओ की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया है। बी जे पी के नेता भी इसका अपवाद नहीं है। ऐसे में जनता नरेंद्र मोदी को प्रधान मन्त्री पद का सबसे शशक्त उम्मीदवार मानने लगी है और भाजपा जो अब तक देश की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी होने के बावजूद डिफेन्सिव  खेल रही थी अब लीड रोल में आ गई है। विरोधी पार्टी होने के नाते तो यह रोल ठीक है लेकिन इसकी वजह से पार्टी के अन्दर कई महत्वाकान्छी नेताओ को यह स्थिति स्वीकारने में दिक्कत हो रही है। तीसरी बार गुजरात में जीतने  के बाद नरेन्द्र मोदी ने सिद्ध कर दिया की शेर को कोई राजा नहीं बनाता बल्कि उसकी दहाड़ सुन कर बाकी लोग उसे राजा मान लेते है।अतः मज़बूरी में भाजपा के बाकी नेताओ ने इसे भाग्य मान कर स्वीकार कर लिया है। अब इन सभी लोगों को  एक साथ रखना और अगले लोक सभा चुनाव तक जोड़े रखना ताकि  अंतिम लक्ष्य प्राप्त करने तक सिर्फ लक्ष्य पर निगाहें रहे  और कोई अपनी टर्र से नई बकवास कर नये विवादों को जन्म न दे इस पर काबू पाना  मेढको को एक तराजू में तोलने से कुछ कम नहीं है और मोदी को राजनीतिक विरोधियो के साथ इस चुनोती से भी निपटना है।

मगर ऐसा नहीं है की मेंढक केवल भाजपा में है। कांग्रेसी नेता भी कुछ कम नहीं है। दिग्गी राजा यानी दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी,अजय माकन , रेणुका चौधरी जैसों की लम्बी लाइन  है मगर एक फर्क है कांग्रेसी और भाजपाईयो  में। इनको एक तराजू में तोलना सम्भव है। एक हंटरवाली के काबू में सब है और फेविकोल से  जुड़े है।सुबह शाम जी मेम साहब  और युवराज की जय बोलने के बाद इन्हें दिन भर कुछ भी टर्र -टर्र करने की छूट है शाम को एक बार इनके विचारों कों वफ़ादारी की तराजू में तोला जाता है और इसके हिसाब से इनका इनाम तय किया जाता है।जिसकी टर्र ज्यादा  उसका इनाम भी जोरदार। मंत्री से लगा कर राज्यपाल तक का पद आपको सुलभ हो सकता है पुरस्कार मे।अतः लोग जल्दी से जल्दी अपनी पोजीशन ले लेना चाहते है फिर  इसके लिये चाहे  कितनी भी टर्र करनी  पड़े।

मोदी की हर अदा पर पक्ष और विपक्ष दोनों फ़िदा है चाहे उनकी बुर्के का डायेलाग हो या बिना बुर्के का।टिकट लगा कर भाषण करना हो या बिना टिकट का। टिकट के दाम को कोई  मोदी का रेट बता रहा है और कोई इस बात  को हैवी वैट नेता की पहचान बता रहा है। बाकी नेताओ को डर सता रहा है यह नया कम्पटीसन है,उनकी बात कोई मुफ्त में तो सुनता नहीं फिर पैसे दे कर क्यों सुनेगा।क्या मुंह दिखायेंगे  जनता को किसके बूते पहचाने जायेंगे  इसलिए पूरा जोर लगाकर ख़ारिज कर दिया। वैसे आइडिया बुरा नहीं है आखिर लोग सरकस भी तो पैसे देकर ही देखने जाते है और फिल्म, टेलीविजन में भी बकवास देखने और सुनने के पैसे देते है फिर नेताओ कि बाह सिकोड़ अदा और बकवास भी मुफ्त में क्यों?  तो साहब मौसम आ गया है राग भैरवी से राग मल्हार तक सुनने को मिलेगा और पैर पटक से धोबी पछाड़ तक  देखने को  मिलेगा इस चुनावी साल में।बस थोड़ा इन्तजार कीजये और देखते जाईये आगे आगे होता है क्या ।

और अन्त में
सिर्फ खन्जर  नहीं आंख में पानी  चाहिये 
ऐ खुदा मुझे दुश्मन खानदानी चाहिये।


Sunday, June 30, 2013

आधा सच आधा झूठ

प्रिय मित्रो,
बीड से भाजपा   के मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट और लोकसभा में उप नेता विपक्ष  गोपी नाथ मुंडे ने पिछले दिनों एक समारोह में रहस्योद्घाटन करते हुए बताया की उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में आठ करोड़ रूपये खर्च किये और साथ ही चालीस लाख खर्च करने की चुनाव योग द्वारा   तय की गयी सीमा को ख़ारिज कर दिया।  क्योंकि इस महंगाई के ज़माने में इतने पैसे में चुनाव जितना लगभग असम्भव है।समाचार पत्रों और दूरदर्शन पर इनदिनों बड़ी बहस इस बात पर हो रही है की क्या केवल गोपीनाथ मुंडे ने
खर्च सीमा का पालन न कर कानून तोड़ा है? या यह तो सभी कर रहे है बस स्वीकार गोपी ने किया है? तो गोपी नाथ को सच बोलने का इनाम दिया जाये और बाकी लोगो की जाँच की जाये की उन्होंने कितने पैसे खर्च कर चुनाव जीता है और इतने पैसे इनके पास कहाँ से आये यानि इस आय   का श्रोत क्या है?  या  सजा मुंडे को मिले क्योंकि इस देश में  झूंठ बोलना बड़ी सामान्य बात है और आमतोर पर सजा सच बोलने वाले को ही मिलती है ? चलिये देखते है सच बोलने की सजा मिलेगी या झूठ बोलने का इनाम।

मगर  झूठ केवल  चुनाव खर्च बताने में नेता बोलते है ऐसा नहीं है। पिछले सप्ताह उत्तराखंड में आयी विपदा में किस नेता ने  कितना झूठ बोला इसका हिसाब तो कैग भी अपनी जाँच से नहीं पकड़ पायेगा। दरअसल बहुआयामी झूंठ बोलना  जितना आसान होता उसको पकड़ना उतना ही मुश्किल। दुर्घटना में कितने लोग मारे गये और कितने बचाये गये , सहायता पहुचाने में देर क्यों हुई और सहायता के लिए भेजे गए हजारो करोड़ रुपयों  में से कितने रूपये उन लोगो के पास पहुँच पाये जिनके लिए भेजे गए थे और कितने नेता और दलाल मिल कर खा गये,इन सब विषयों पर चर्चा चाहे जितनी हो हम सब को पता है की सच्चाई  का पता लगना असम्भव है और यह भी की किस नेता ने कितना सच और कितना झूठ बोल कर अपने लिए पैसे और सहानभूति बटोर कर अगले चुनाव में जीते जाने का प्रबंध कर लिया है। आम आदमी तो केवल इनकी आधी  सच और आधी  झूठ बातों को सुन कर केवल इतना ही कह सकता है की चलो आधा सच बोल कर भी इन्होने अहसान ही किया है वर्ना हम कोई इनके पूरे  झूठ पर भी इनका क्या कर लेते। .

हमारे जैसे करोड़ो आम आदमियो  की ताकत तो केवल यह विश्वास  ही है जो बताता है सत्य मेव जयते । बस इसी  विश्वास की वजह से ही  आम आदमी इतनी मुसीबत के बावजूद भी अगले चुनाव में वोट देने के लिए जिन्दा है। और जिन्दा है नेताओ का आधा झूठ और आधा सच सुनने के लिए।

अजय सिंह "एकल"

Saturday, June 1, 2013

गुबार देख रहें है हम, गुजरते कारवां का

मित्रो,
समय का चक्र अबाध गति से घूम रहा है और कारवाँ हमारे सामने से  हर छण गुजरता जा  रहा है।आप इसका हिस्सा जानबूझ कर बन जाये और होशोहवास में रह कर इसके गवाह बने तो अच्छा, नहीं तो यह सबकुछ तो होने वाला है ही बस आपको ही पता नहीं चलेगा की जीवन की कब शाम हो गयी और जब आप पीछे मुड़ कर अपने योगदान का मूल्यांकन करेंगे तो लगेगा की जो कुछ कर पाए वह काफी नहीं था और इससे बेहतर करने की सम्भावना थी लेकिन चूक  गये।

बस यही सोच कर शायद  अरुणा राय, सोनिया गाँधी का काफिला छोड़ दूसरे पाले  में आगयी है।कुछ लोगो का मानना है की उन्होंने सोनिया की डूबती नाव से किनारा वैसे ही किया है जैसे डूबते  जहाज में पानी भरने पर चूहे सबसे पहले बाहर निकल कर आते है। कुछ की राय यह भी हो सकती है की जब सोया हुआ जमीर जाग गया तब लिया है उन्होंने यह निर्णय।लेकिन कुछ की राय यह है कि लोग बहुत हिसाबी किताबी होते है और मौके की नजाकत के हिसाब से  पाला बदल लेते है और कभी पासा उल्टा पड़ जाय  तो बयान से ही किनारा कर लेंगे या फिर किसी और को बली  का बकरा बना देंगे। और जिस जहाज से भागे थे उसी पर फिर चढ़ जायेंगे।
कभी जेन्टिल मैनो  का खेल समझा जाने वाले  क्रिकेट   के खेल में कितना घाल मेल है इसका पता सभी को है। इसी लिए इसके मलाई दर पदों पर राजनेता काबिज है जिनका दूर- दूर तक क्रिकेट से कोई लेना देना नहीं है। राजीव शुक्ल से लगा कर लालू यादव तक इनके पदों पर मजे उड़ाते हुये बयान  देते है की खेलो में राजनीत नहीं
होनी चाहिये। और मजे की बात यह की यह भी राजनीत होती है। तीन  साल पहले ललित मोदी इसी खेल के कमिश्नर थे और जब उनकी तिकड़म पकड़ी गयी तो हिंदुस्तान छोड़ लन्दन में जा कर बस गये। फिर उनसे ज्यादा बड़े खिलाडियो मसलन राजीव शुक्ला और शरद पवार जैसे दिग्गजों ने कमान सम्भाली, मलाई खाई बदनामी की टोपी पहनाई और चलने की तैआरी कर ली।इस खेल से किसका भला हो रहा है यह  सभी को पता है फिर भी हमारी सहने की क्षमता देखिये की हम विरोध केवल उतना ही करते है की विरोध करते हुए दिखे, लोग हमको ईमानदार समझे और   खेल चलता रहे।

जिस मामले की वजह से से क्रिकेट अभी चर्चा में आया है वोह है सट्टे बाजी।अब कोई गरीब आदमी तो सट्टे  बाजी  करेगा नहीं, इसलिए बड़े लोगो के चमचो ने इसे लीगल ठहराने की मुहीम चला दी है। तर्क यह है की दुनिया के बहुत से देशो में यह लीगल है। लेकिन अगर इनसे कोई पूछे जिन देशो की बात यह लोग कर रहे है वहाँ कितने लोग ऐसे है जो भूख से मरते है या इतने गरीब है की दो जोड़ी कपडे भी नसीब नहीं है तो इसका जवाब शायद ही दे पायें। दर असल जब से सुधारो का दौर इस देश में शुरू हुआ है तब से यह एक आम बात हो गयी है की बात -बात में अमरीका और इंग्लैंड से  सुविधा की तुलना करना। लेकिन जब देश के लिए काम करने   या त्याग करने की बात हो  तो खाटी हिन्दुस्तानी बन जायंगे और दूसरे  को दोष दे कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेंगे ।असल में  यह क्लास  मलाई खाने का इतना आदी  हो गया है कि  अमरीका और यूरोप में रह कर जिन्दगी के मजे उठाता है जब मलाई खाने की बात हो तो हिंदुस्तान आ जाता है और जब देश के लिए  कुछ करने की बात हो तो अपनी मजबूरिया गिनवाता है।

आज सुबह पार्क में घूमते हुए एक 12-13 साल के बच्चे से मुलाकात हुयी जो चंडीगढ़ में रहता है देश के एक अत्यंत नामी  गिरामी स्कूल में  कक्षा ९ का विद्यार्थी है। उससे थोडा परिचय किया तो एक आश्चर्य जनक बात यह पता चली की उसके स्कूल में कबड्डी का खेल कभी नहीं हुआ  और तो और कभी चर्चा भी नहीं हुई  इसलिए इसके बारे में उसे कुछ भी पता नहीं था। मुझे आश्चर्य इसलिए हुआ की इस खेल में भारत को अन्तर्रष्ट्रीय प्रतियोगताओ  में अनेक इनाम मिले है और एशियन  गेम्स की प्रतियोगिताओ में यह  खेल नियमित
 खेला  जाता है। क्या इस देश के खेल मंत्री कोई ऐसी नीति बना सकते है की अन्तरराष्ट्रीय खेलो में खेले जाने वाले सभी खेलों  के बारे में  न्यूनतम जान कारी सभी बच्चो को  स्कूलों में करवाई जाये और फिर जिसकी जिस खेल में रूचि हो उसमे वह जा सके। आखिर क्रिकेट ,फुटबाल और हाकी ही खेल नहीं है बाकी  खेलो में भी  तमाम अवसर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध है। इसलिए सभी खेलो के बारे स्कूल स्तर पर बच्चों को पता चले और खेलने का अवसर मिले ताकि खेल प्रतिभा  का विकास वही से शुरू हो और देश  के लिए अन्तराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी पैदा हो सके और भारतको सम्मानित स्थान खेलो में भी प्राप्त हो। आखिर सवासो  करोड़ के देश में हम सौ खिलाड़ी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के क्यों नहीं पैदा कर पा रहे है?देश के नीति नियन्ता इस प्रश्न पर विचार कर खेलो को प्रोत्साहन देने वाली नीतियाँ क्यों नहीं बनाते है।



और अंत में
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो  गोय 
सुन इठ्लाइए  लोग सब बाँट न लेहे  कोय .



अजय सिंह"एकल"

Friday, May 17, 2013

उम्र न पूछों नेता की

मित्रो,
यह तो आपने सुना ही होगा   कि औरतों  की उम्र और मर्द की कमाई नहीं पूछनी चाहिए। पर जनाब समय ऐसा बदल गया है कि  अब नेता और अफसरों चाहे वह मर्द हो या औरत की उम्र और कमाई आप कुछ भी  न पूंछे तो ही ठीक है।बात दरअसल यह है की पहले जब आप उम्र और कमाई पूछते थे तो वह व्यक्ति केवल उस समय का फैक्ट और फीगर बता देता था अर्थात  सूचना टू डाईमेंसनल हुआ करती थी। समय बदला लोग बदले और बदल गए सदाचार के नियम और फिर हम उन्नति भी तो कर गए है । इसलिये अब इसमें एक डाईमेंसन और जुड़ गई है अर्थात अब किसको बता रहे है उसके हिसाब से उम्र और आय बतानी पड़ती। जैसे मनमोहन सिंह ने पिछले चुनाव जो सन 2007 में हुए थे अपने को 74 का बताया था वही मनमोहन    सन 2013 में चुनाव आयोग के सामने हलफ नामा दे रहे  है की उनकी  उम्र 80 के बजाये 82 साल  हो गयी है। अर्थात उम्र अंकगणित के हिसाब से नहीं बढ़ी  बल्कि महंगाई की तरह बे काबू है, अब कर लो जो करना है। और नेता ही क्यों आर्मी के पूर्व प्रमुख जनरल वी के सिंह भी देश की 32 साल सेवा करने के बाद भी मन नहीं  भरा  एक  और साल देश सेवा करने का मन किया तो बस घटा दी उम्र एक साल।

कमाई तो आप नेता और अफसर की पूछने की गलती न ही करे तो ही ठीक है वर्ना पता चलेगा की जिन्दगी  भर में कुल तनखा मिली २ करोड़ और नौकरी से रिटयारमेंट के बाद सौ करोड़ के मालिक है। अभी दो साल पहले ही मध्य प्रदेश के एक आइ ए एस दम्पति के पास तीनसो करोड़ से भी ज्यादा की सम्पत्ति की मल्कियत का पता चला। और ये ही क्यों रोड ट्रांसपोर्ट और मैनुस्पल्टी के  बाबू से लगा कर इंजिनिअर तक सब करोड़पती  है इस देश में ।

 यदि आप नेताओ  की कमाई का हाल जानने की कोशिश करेंगे  तब  तो  फिर बस भगवान  ही मालिक।उत्तर प्रदेश में बहन जी के राज्य में बने एक पूर्व परिवहन  मन्त्री की हैसियत  पाँच साल में एक करोड़ से एक हजार  करोड़ हो गयी।लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई  बात नहीं है।  जब उनकी आका मायावती  पाँच साल में पाँच  हजार करोड़ से ज्यादा कमा सकती है तो उनके मातहत का इतना हक़ तो बनता ही  है। लेकिन यह  हाल तो  है छुट भईया नेताओ का। अब अगर नेता केंद्र में हो और जरा जमा हुआ भी हो फिर तो इतने पैसे तो एक साल में ही हो जाते है। देखिये न एक -एक ट्रान्सफर और  पोस्टिंग का खर्चा और लगाईये कमाई का हिसाब।अरे नेता तो छोड़िये साहब साले, भांजे और जीजा तक की कमाई हजारो करोड़ है। अब जनता भूखी मरे तो मरती रहे नेताओ ने क्या ठेका लिया है  जनता का ? पाँच साल में एक बार वोट ही तो दिया था।उसके बदले दे तो दिया मनरेगा की स्कीम और गैस की सब्सिडी।और उतार दिया जनता का एहसान।
 डेमोक्रटिक देश के ईमानदार प्रधान मंत्री  का हाल देखिये कहते है कि उनके  पास अपनी  पन्द्रह साल पुरानी मारुती कार है बस। बहुत खूब मनमोहन सिंह जी। आपके योजना आयोग के उपाध्यक्ष कहते है  29रुपये रोज से ज्यादा कमाने वाला गरीबी रेखा के ऊपर और आपके पास  पन्द्रह साल  पुरानी कार। कही इसी वजह से तो देश का प्रोडक्शन नहीं घट रहा और मंदी आ गयी  है। लेकिन  जनता को आपके पास बड़ी कार न होने का कारण समझ में आ गया है। आखिर जब  बड़ी-बड़ी कारे  सरकार के खर्चे पर ड्राईवर और ईंधन के साथ सब्जी लाने   से लेकर बच्चो को स्कूल पहुचाने के लिए उपलब्ध  है तो क्या जरुरत है अपने पैसे खर्च करने की। जब सब कुछ मुफ्त में  सरकारी खर्चे पर मिलता है तो फिर  क्यों पड़े झंझट में। अब आप  कोई आम आदमी तो है नहीं जो नोन तेल लकड़ी का हिसाब लगाते घूमे।




और अंत में  
सरकार हमारी अपनी है,  और ये बस तो सरकारी है 
हम क्यों टिकट ख़रीदे, अपनी तो  बस कंडक्टर से यारी है। 

अजय सिंह "एकल"

Sunday, May 5, 2013

घोर कलयुग आ गया है

 दोस्तों,
वैसे तो कलयुग आये कई सौ साल हो चुके है और इस समय के समर्थन में कई लोगो ने जैसी भविष्यवांणियाँ   की थी वह  सच भी हो रही है जैसे कहा गया कि  "हंस चुनेगा दाना कौवा मोती खायेगा" तो आप आजकल  देश में कौओ को मोती खाते आसानी से देख सकते है। पर पिछले दिनों तो बस कमाल ही हो गया,आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या हो गया की घोर कलयुग दिखने लगा है।तो आप को याद  दिला  दे की  द्वापर यानि कलयुग  से पहले वाले युग में आपने कंस मामा को अपने भांजे कृष्ण और शकुनी  मामा को भांजे दुर्योधन का  बेड़ा गर्क करते सुना होगा।अब  भांजे विजय सिंगला ने मामा और देश के रेल मंत्री पवन बंसल का बेड़ा गर्क किया है यानि अब मामा ने भांजे का नहीं बल्कि भांजे ने मामा को पलिता लगा कर  घोर कलयुग के आने  की घोषणा की  है ।

लेकिन इसी कलयुग में  सतयुग में हुई एक  घटना की पुनरावृत्ति भी हो रही है। यानी विभीषण ने एक बार फिर
रावण की लंका ढहाने का काम घर के भेदिया होने के कारण कर दिया है। आपने  ठीक समझा पिछले पाँच सालों में कर्नाटक की सत्ता पर काबिज भा .जा .पा .के पूर्व मुख्यमंत्रियो विशेष रूप से यद्दुराप्पा जी ने अपनी पार्टी बना कर कर्नाटक में कांग्रेस का रास्ता आसान  कर दिया है।और अपनी पूर्व पार्टी को धूल चटा कर "न खायंगे और न खाने देंगे" की कहावत को चरितार्थ किया है। वैसे यदुरप्पा और विभीषण में कई और समानताये भी है, मसलन दोनों ब्राह्मण है और दोनों दक्षिण भारत से आते है।

कांग्रेस ब्यूरो आफ इन्वेस्टीगेशन यानी सी. बी .आइ. के प्रमुख को बुला कर कोल घोटाले की रिपोर्ट को मन मुताबिक बदलवाने का महत्वपूर्ण काम करवा कर अश्वनी कुमार यानि देश के कानून मन्त्री ने कोल घोटाले में   फँसे अपने साथियो और पार्टी के प्रति वफ़ादारी का जो प्रदर्शन किया है उससे मोगेम्बो यानी  मनमोहन सिंह  और टीम तो जरुर खुश हुए है और इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पड़ी के बावजूद पूरी कांग्रेस पार्टी मजबूती से अश्वनी के पक्ष में खड़ी है और घोषणा कर दी है की जाँच पूरी होने तक इस्तीफे का  तो सवाल  ही नहीं और कांग्रेस के शासन में रहते जाँच पूरी हो जाये इसका भी कोई सवाल नहीं। यानी  यदि अगले चुनावो में यू . पी . ऐ . हार जाये तो ही इन घोटालो की जाँच हो सकती है नहीं  तो देश लुटेरों के हाथ लुटता ही रहेगा और फिर भगवान  ही मालिक है इस  देश का।

और अंत में  
आंधियों के बीच जो जलता हुआ मिल जायेगा 
उस दिए से पूछना मेरा पता मिल जायेगा।

अजय सिंह "एकल "


Sunday, April 7, 2013

जाकी रही भावना जैसी ........

दोस्तों,
यह कोई पहली बार नहीं है जब भारत  की उपमा किसी ने  माँ या मधुमक्खी से की  है। इससे पहले उस समय  देश की प्रधान मंत्री और राहुल की   दादी मां की  तुलना  इंदिरा इज इंडिया कह कर की थी।जमाना  आपात काल का था और   उनकी चौकड़ी के एक सदस्य ने  ऐसी तुलना करके पहली बार चमचा गिरी के नए कीर्तिमान स्थापित किये थे और उसकी जब किरकिरी  हुयी तो  कांग्रेस चौकड़ी  के लोगो ने बड़े -बड़े तर्क दे कर उसको तर्क सिद्ध करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी । उत्तर प्रदेश के एक पदासीन मंत्री आजम खान  भारत माँ की तुलना डाईन से भी  कर चुके है और शान से मंत्री बने हुये है। इतिहास ने एक बार  फिर अपने को दोहराया है।

अब राहुल ने भारत की तुलना मधुमक्खी के छत्ते से की है। ऐसा नहीं है की मधुमक्खी में कुछ गुण नहीं है।यहअत्यंत मेहनती होती है और शहद के लिए बड़ी दूर दूर तक जाती है और  खास बात यह की सारी मक्खियाँ रानी मक्खी के लिए काम करती है। अब राहुल ने जन्म से यही देखा है पहले दादी मां और अब उनकी माँ रानी  मक्खी  बनी बैठी है और ऐसा  लगता है कि  पूरा देश  उनके लिए  मधुमक्खियों की तरह ही मेहनत से काम कर रहा  है। और ख़ास बात यह कि   यदि कोई उस छत्ते को हाथ लगायेगा तो  सारे   कांग्रेसी नेता मधुमक्खियों  की तरह ही पीछे लग जायेंगे। क्योंकी  रानी मधुमक्खी के लिए काम करते हुये कुछ शहद तो इनके हाथ भी लग जाता है।बस यही फर्क है, इसीलिए देश    मधुमक्खी नहीं है क्योंकी वहाँ बाकी मक्खियाँ रानी मक्खी के लिये पूरी ईमानदारी से काम करती है और यहाँ रानी के लिए काम करते हुए कुछ  शहद काम करने वाले  अपने लिए निकाल लेते है  जैसे की टू जी और कोल गेट जैसे अनंत घोटालों में पिछले सालो इस देश में हुआ  है। इसी वजह से राहुल के बयान पर तरह तरह के तर्क उनके मंत्री दे कर  उसको तर्क सिद्ध करने की कोशिश कर रहे है।
राहुल ब्रिगेड के सबसे उर्जावान सूचना और प्रसारण मंत्री ने राज उजागर करते हुए बताया की भ्रामरी देवी का एक मंदिर उत्तरांचल  में है और मधु मक्खी से देश की तुलना का  बयान देते हुए राहुल के दिमाग में वह देवी थी  इसलिए उन्होंने  भारत देश की तुलना   मधुमक्खी से  की थी। दूसरे उर्जावान  मंत्री राजीव शुक्ला साहब बताते है  की भाजपा को मुहावरे नहीं समझ आते है। इसलिये वह राहुल के बयान को समझ नहीं पाए है और बात का बतंगड़ बना रहे है। और इस तरह से राहुल कवच बनने की कोशिश कर रहे है।ठीक ही  है आखिर आदमी अपने स्वार्थ के आगे न देखने की प्रैक्टिस करके ही  वहाँ  तक पहुँच सकता जहाँ तक आप लोग पहुंचे है वर्ना आपसे ज्यादा काबिल लोग तो सैकड़ो पड़े है आपकी पार्टी में और  देश में तो हजारों  धक्के खा रहे है।आखिर जब आपको आपकी चमचा गिरी  का इनाम मिल जाये तो भी आपको यह लगातार करते रहना पड़ता है लगातार शहद पाने के लिये।

एक आदमी जिसने पूरा जीवन देश सेवा में  लगाया हो और सोते जागते केवल देश की भलाई का सपना  देखता हो सुबह शाम भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में विश्व गुरु बनाने की कल्पना और प्रार्थना करता हो तो निश्चित रूप से उसके लिए भारत माता ही हो सकती है। क्योकि कोई भी तर्क संगत बात करने वाला  बुद्धिमान  व्यक्ति शहद के लिए यह सब नहीं करेगा।और उसके लिए ही क्यों आखिर भगत सिंह   और उनके जैसे
अनगिनत क्रन्तिकारी साथियों ने हँसते हँसते फांसी का फंदा मधुमक्खी के लिए नहीं भारत को माँ समझ इसको  स्वाधीन कराने को चूमा था।गुरू गोविन्द सिंह सरीखे लोगो ने अपने बच्चो को जिन्दा दीवार में मधुमक्खी के छत्ते के लिए नहीं भारत माता की आन बान  और शान बचाने के लिए किया था। और महाराणा प्रताप ने भी घास की रोटी  मधुमक्खी के छत्ते को बचाने के लिये नहीं बल्कि भारत को अपना जन्म देने वाली माता से भी ज्यादा प्यार और सम्मान देने के लिए
खाई थी। लेकिन विदेशी माता और भारतीय पिता की सन्तान राहुल को तो देश भारत माता के बजाये रानी माँ के लिये शहद इकट्ठा करने का टूल ही दिखाई देगा।और आश्चर्य नहीं की अन्दर खाने मन में यह बात भी हो की शहद इकट्ठा होने के बाद इसको बर्तन  में   भरकर कहीं  ले भी  जाया  जा सकता है।

ठीक ही है पत्थर में भगवान देखने वाले को पत्थर के बने खम्बे से भी भगवान निकलते नजर आते है वर्ना भगवान के अस्तित्व को भी हलफ़नामा देकर नकारा  जा सकता है।ऐसे ही लोगो के लिए तुलसी दास ने चार सौ साल पहले कहा था
 
जाकी रही भावना जैसी प्रभु  मूरत देखी तिन तैसी
अब हमारे जैसे  मधुमक्खी की तरह  मेहनत  करने वाले  लोग तो केवल ईश्वर से इन लोगो को सद्बुद्धि  देने की प्रार्थना ही कर सकते है।और यह कामना भी कि  हमारा लाया और कमाया हुआ शहद खाये कोई भी लेकिन कम से कम देश में ही रहे और देश के काम आये।


और अंत मे  

वो जिसके हाथ मैं छाले हैं ,पैरों मैं बिंवाई है 
उसी के दम से रौनक आपके बंगले मैं आयी है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखो में गाँधी जी के चेलो की कमाई है।

अजय सिंह "एकल "

Monday, February 11, 2013

स्वराज मिला है सुराज नहीं

दोस्तों,
गुजरात के चौथी  बार मुख्यमंत्री बने नरेन्द्र मोदी जी ने छै करोड़ गुजरातियो का दिल गुड गवर्नेंस के द्वारा  जीत कर अब दिल्ली पर दावा ठोक दिया है। मोदी ने जिस तरह से श्री राम कालेज आफ कामर्स,नई दिल्ली  में नौजवानों को सम्बोधित किया और उसमे जो भी विषय बिंदु उठाये गए औरउनके लिए  जो तर्क और  समाधान दिए गए उससे केवल नौजवानों को ही नहीं बल्कि देश के बुद्धि जीवियो के बीच में सार्थक और आशावादी माहौल बना है।और इसने भाजपा के लिए भी उचित वातावरण तैयार किया है। लेकिन भाजपा पिछले कई वर्षो से अनेक मुद्दों का राजनीतक लाभ उठाने से चूक  गयी है उससे सीख  लेते हुए अब यदि रणनीत बनाये तो बहुत सम्भावना है की मिशन 2014 में एनडीए को सफलता मिल जाये। मोदी के मिशन दिल्ली का आगाज हो चुका  है अब अन्जाम तक ठीक से पहुँच जाये इसकी जिम्मेदारी टीम भाजपा की है। एक बात जो बिलकुल तय है की अब प्रधान मंत्री पद की दौड़  जो राहुल और मोदी के बीच में मानी  जा रही थी उसमे मोदी ने बढत तो निश्चित ही हासिल कर ली है।

जनता दल (यू ) के नेता और बिहार के मुख्यमन्त्री  नितीश कुमार जिन्होंने प्रदेश  में सुशासन की एक मिसाल बनाई है और एन डी ए के जन्म से ही इसके एक प्रमुख घटक बने हुये है, ने  बार -बार मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर जो आपत्ति जतायी है वह तर्क संगत नहीं है।और नितीश यह निश्चित ही नहीं चाहेगे की भाजपा के नेतृत्व में एन डी ए की सरकार केवल उनके विरोध के कारण मुश्किल में पड़े और न ही वह उस कांग्रेस पार्टी के साथ सहयोग करना चाहेंगे जिसके विरोध पर उनकी राजनीत टिकी हुयी है और उनके धुर विरोधी लालू यादव की पार्टी सहयोग कर रही है। अतः  समय आने पर राजनीत के एक  परिपक्व खिलाड़ी के नाते नितीश की पार्टी  एन डी ए का समर्थन करेगी यही जे डी  यू  के हित में भी  है और देश के हित में भी।

कांग्रेस पार्टी ने  राहुल की ताज पोसी जल्द बाजी  में की है  और चुनावी साल में एन केन प्रकारेन पुन: सत्ता पर स्थापित होने के लिए हथकंडे अपनाने  में लगी है।अब  इसके लिए  अप्रत्याशित निर्णय ले कर अपने वोट बैंक को मजबूत कर लेना चाहती है। इसी कड़ी में पहले कसाब को और फिर अफजल गुरु को फाँसी देकर जनता में एक निष्क्रिय सरकार की छवि को खतम करने का प्रयास कर रही है तो भी आतंकियों को उनके अंजाम तक पंहुचा कर एक ठीक काम किया है मज़बूरी में ही सही एक सामयिक  निर्णय का समर्थन देश वासिओ द्वारा किया जा रहा है।

अजय सिंह "एकल"



Friday, January 25, 2013

मैं भी मर्द हूँ

दोस्तों,
विवादस्पद बयान और बडबोला पन नेता के बड़े होने की निशानी है।अखबार और अन्य माध्यमो से समाचार में बने रहने का तरीका भी। तभी तो नितिन गडकरी जो अभी -अभी खुद  बेआबरू होकर और अपने चाहने वाले  बहुतो को बेआबरू होते देख कर अध्यक्ष पद से रुखसत हुएँ हैं और भाजपा को और ज्यादा शर्मिंदगी से बचाने के लिए धन्यवाद के पात्र है, ने 24 घन्टे से भी कम समय में यह बता दिया की वह भी मर्द है इसलिए जब एन डी ऐ की सरकार आयेगी तो उन इन्कम टैक्स अफसरों को कोई बचा नहीं पायेगा जो उन्हें तंग कर रहे है। अब गडकरी कोई मामूली आदमी तो है नहीं आखिर एक राष्ट्रीय पार्टी के पूर्व  अध्यक्ष  है इसलिए उन्हें ऐसे बयान देने से कोई रोक नहीं सकता और अब तो वह उन मर्यादाओं  को भी लाँघ सकते है जो पद पर रहते संभव न थी।लेकिन अपनी मर्दानगी का बखान करने में उन्होंने  तीन महीने यानी  अक्टूबर के महीने से अबतक का समय ख़राब क्यों किया यह आम आदमी और पार्टी कार्यकार्ताओ की समझ के बाहर है।  अगर उसी समय पद से इस्तीफा   देकर ताल ठोकते तो लोग वाकई मर्द समझते और फिर उन्हें इसकी घोषणा नहीं करनी पड़ती। उनकी और पार्टी की इज्जत बढती सो अलग।

लेकिन देश में गडकरी अकेले मर्द नहीं है। इस देश का गृह मंत्री भी मर्द है। तभी तो पाकिस्तानियो द्वारा भारतीय सैनिको के सर काटने पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता। हाफिज सईद को सईद जी कह कर संसद में बयान देता  है।दिल्ली रेप कांड जिससे पूरा देश आंदोलित हो गया उस पर सात दिनों तक चुप्पी साधे रहता है।लेकिन  मर्दानगी का  सबूत देने और  अपनी मालकिन को खुश रखने के लिए देश भक्तो के संगठन आर एस एस को देश द्रोही संगठन करार देता  है।उसी क्रम में देश का गृह सचिव अपने मालिक यानी मंत्री जी को खुश करने के लिए कहते है की उनके पास सबुत भी है लेकिन कोई कार्यवाही  क्यों नहीं कर रहे है यह बताने की हिम्मत इन मर्दों में नहीं है।  भगवा जिसने  देश में शिवाजी महराज जैसे  कितने ही देश भक्तो को बलिदान होने के लिए प्रेरित किया है, को आतंकवाद का प्रतीक बताने में मर्दानगी महसूस कर रहे है। अब इनसे कोई यह पूछे की राहुल के पर नाना (राजीव के नाना) जवाहर लाल जी ने  इसी  संगठन को क्यों  देशभक्त संगठन ही करार नहीं दिया बल्कि 1963 की गणतन्त्र  दिवस परेड में भागीदारी के लिए बुलाकर सम्मान भी किया था।लेकिन इन मर्दों का पढने लिखने से तो कोई सम्बन्ध है नहीं बस तलवे चाटने की आदत ने पद और प्रतिष्ठा दिल दी है तो उसीको बाकी जिन्दगी  में हथियार बनाये रखने की कोशिश जारी है। फिर देश का नफा हो या नुकसान हमें तो बस अपने वोटो से है काम।

राहुल की दादी श्रीमती गाँधी ने भी  1971 पाकिस्तान युद्ध में  संघ को उस  के द्वारा युद्ध के समय देश सेवा के  किये हुए कार्यो के लिए बधाई दी थी . उनका भाषण संसद के दस्तावेजो में दर्ज है और साथ ही अटल जी का वह बयान  भी जिसमे उन्होंने इंद्रा गाँधी की तुलना माँ दुर्गा से की थी। इस लिहाज से तो नेहरु और इंद्रा संघ के आतंक वाद का समर्थन करते हुए माने जाने चाहिए और इस  से जो नतीजा निकलेगा वह यह है की कांग्रेसी कई पीढियो से  आतंकवादी संगठन अर्थात संघ का समर्थन समय समय पर करते रहे है  और राहुल उसी खानदान के कुलदीपक है   तो क्या वह आतंकी समर्थक है , इस सवाल का जवाब यदि आपके (शिंदे के) पास न हो तो कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े मर्द दिग्विजय सिंह  से पूछ लीजिये जिनकी घिघ्घी ओसामा के मर जाने और दफ़न होने की खबर आने  के बाद भी बहुत दिनों तक बंधी रही और उसको ओसामा जी कह कर बुलाते रहे। लेकिन देश भक्तो पर किसी भी तरह का आरोप लगा कर मर्दानगी दिखाने में नहीं चूकते ।

अजय सिंह "एकल"


Saturday, January 19, 2013

लोक तंत्र को दे आधार करे चुनाव सुधार

दोस्तों,
आदमी की जिन्दगी में पाँच  साल का जो महत्व है वही महत्व देश की जिन्दगी में सौ साल का होता है।हमारे देश में पंच वर्षीय योजना की शुरुवात लोक सभा एवं विधान सभाओ की पांच साल से सह सम्बद्ध है।अर्थात पांच वर्ष की योजना केंद्र सरकार द्वारा पांच साल की लोकसभा के  माध्यम से कार्यान्वन  किये जाने की संकल्पना है। बस यहीं चूक हो गयी। एक सरकार ने अपनी सुविधा के हिसाब से पांच हिसाब की योजना बनाई और उसको लागू  करवा दिया।और उसके बाद आने वाली सरकार ने अपने नेता और पार्टी की इच्छा अनुसार कुछ पुरानी नीतियो को लागू रखा और जो सुविधा जनक नहीं लगी उन्हें बदल दिया।ऐसा करने पर देश की दिशा में क्या परिवर्तन होगा,लगे हुए कितने पैसे ख़राब हो जायंगे,जनता के ऊपर इसका परिणाम क्या होगा इसकी चिंता करने का समय और इच्छा दोनों  शक्ति की कमी हमारे नेताओ में रही है। जिसका नतीजा देश दिशा हीन होकर कहाँ जा रहा है इसकी जवाब देही भी शायद ही किसी की है। ऐसा कब तक ऐसे  ही चलने दिया जाये ?क्या कुछ किया जा सकता है।आइए इस पर विचार करे।देश गणतंत्र की 63वी जयन्ती  मनाने  को तैआर है,अत:इस पर विचार करना आवशयक है ताकि हम आने वाली पीढ़ी के लिये जो भारत बनाए उस पर उसे गर्व हो, ताकि  वह पढ़ लिख कर किसी तरह अच्छी नौकरी पाकर या विदेश में जा कर बसने का लक्ष्य न बनाने के बजाए देश में रहने और इसकी सेवा करने में गर्व महसूस करे। हमारे इस विषय में सुझाव है :
  1. देश की अगले सौ सालो की जरूरतों का आंकलन किया जाये और उसको 50,25 और 5 वर्षो में प्राप्त किये जाने योग्य भागो में बाँट कर लागू करने की योजना बनायीं जाये।
  2. देश की योजनाओ को दो हिस्सों में बाटा  जाये ,एक वह जो नेताओ और  पार्टी हितो के ऊपर देश हित में हो और नेताओ अथवा पार्टी के आने -जाने से उन नीतिओ के प्रभावी कार्यान्वन प्रभावित न हो। जैसे देश की शिक्षा नीत क्या होगी, विदेश नीत अथवा रक्षा नीति क्या होगी अथवा बुनियादी ढांचे को बनाने की नीति क्या हो  यह  पार्टी अथवा नेताओ से प्रभावित न हो और यह अपने दीर्घ कालीन आवश्यकताओ के अनुसार  चले ताकि एक निश्चित समय में हमारे देश की दीर्घ कालीन अवश्यक्ताये पूर्ण होना निश्चित हो जाये।
  3. बची हुए क्षेत्रो की  नीतिया पांच  वर्ष की आवश्यकताओ के हिसाब से बनाई जाये जिसको चुनी हुई सरकार अपनी नीतिओ के हिसाब से बना  कर लागू कर सके।
  4. सरकार के द्वारा वस्तुओं  के दाम बढ़ाये जाने  अथवा अन्य किसी प्रकार भी परवर्तित किये जाने की मियाद एक साल में एक बार ही हो। ताकि एक बार नीति निर्धारण हो जाने के बाद आम आदमी और देश का व्यापारी उन नियमो  के हिसाब से अपनी योजना बना सके और जीवन यापन की व्यवस्था कर सके। साल में कई बार  बीच -बीच में महंगाई बढ़ जाने से आम आदमी की कमाई अथवा वेतन  वृद्धी  नहीं होती अत: उसके लिए जीवन दुश्वार हो जाता है। इसलिए बार-बार वृद्धि से बचा जाना चाहिए।किसी आपात जनक स्थिति में संसद में तीन  चौथाई बहुमत से उसका निर्णय किया जाये। 
  5.  किसान से ख़रीदे जाने का दाम साल में एक बार तय होता है तो फिर उसके खेत में लगने वाले सामानों जैसे खाद,डीजल इत्यादि के दामो में साल में कई बार वृद्धि करने से उसे निरंतर नुक्सान होगा और वह अपने काम को छोड़ने में ज्यादा रूचि रहेगी बजाय काम करने में।यह अच्छा चिन्ह नहीं है। भारत देश जिसकी अर्थव्यस्था कृषि आधारित है किसानो को लगातार अनादर देश की ऐसी क्षति करेगा की उसकी पूर्ति मुश्किल है।
  6. राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों में निर्णय लेने में आम जनता की राय  इलेक्ट्रोनिक सुविधाओं  का इस्तेमाल कर संसदीय क्षेत्रानुसार करवा कर सांसदों का अपने क्षेत्र की राय के हिसाब से ही समर्थन देना अनिवार्य हो। उदहारण  के लिए ऍफ़ डी आइ के मामले में क्षेत्रियो पार्टियो ने जिस तरह का व्यहार किया वह वास्तव में जनतंत्र का अपमान है।ऐसे मुद्दों पर जनता की राय जानना आवाश्यक हो।और इसकी मोनीटरिंग चुनाव आयोग  स्वयं करे।और सांसदों के लिए उनके क्षेत्र की जनता का निर्णय मानने की बाध्यता होनी चाहिए।
  7.  सरकार जब भी किसी चीज पर दाम बढाती  है तो साथ ही बताना चाहिए की उसका बढ़ा हुआ पैसा कहा खर्च करंगे। और बढ़ी कमाई तथा खर्च दोनों में आपस में सम्बन्ध होना चाहिए।उदाहरण  के लिए यदि सड़क पर नियम तोड़ने के लिए जुर्माना बढ़ाते है तो उसका निवेश सड़क के गढ़ों को पाटने में ,सड़क बत्तियो को ठीक करने  में लगाया जाये।
  8.  जब भी सब्सिडी देने की घोषणा सरकार करती है तो उसे यह बताना चाहिए की इसकी भरपाई कहाँ से करने वाली है।किस तरह के अतरिक्त टैक्स इत्यादि लगाये जाने प्रस्तावित है।ताकि आम जनता को पता चले की किस कीमत पर किसको लाभ पहुँचाई जा रही है। यह उचित नहीं की एक बार सब्सिडी दी जाये और फिर थोड़े दिन बाद घाटे के नाम पर दाम बढ़ाये जाये ये टैक्स लगाये जाये।
  9.  जब कोई पार्टी अपने चुनाव घोषणा पत्र में  अर्थ सम्बन्धी घोषणाऐ करती है तो उसे भी यह बताना आवश्यक हो की खर्च का उपयोग कैसे होगा और धन कैसे आयेगा।जैसे किसान का कर्ज माफ़ किया जायेगा तो इस पैसे की व्यवस्था कैसे होगी।हम बैंक में घाटा करके इसी नीत कैसे बना सकते है। और फिर उसको पूरा करने लिए नए टैक्स लगाये ये दाम बढ़ाये यह उचित नहीं।
  10.  सभी उम्मीदवारों के लिए यह आवश्यक हो की वह जन प्रतिनधि  बने रहने के दौरान अपनी माली हैसियत के बारे में स्पष्ट घोषणा करे और बताये की उनकी कमाई में वृद्धि किस तरह अर्थात कितनी वृद्धि सम्पत्ति पुनर्मूल्यांकन  के कारण हुयी है और कितनी कमाई के कारण। 
  11.  यदि कोई उम्मीदवार अपनी सुरक्षा कारणों से एक से ज्यादा जगह से चुनाव लड़ता है तो उसे अतरिक्त
     सीटो पर उपचुनाव करवाने का खर्च चुनाव आयोग  के पास जमा करवाना चाहिए। यदि उम्मीदवार एक से अधिक स्थान से जीत  जाता है तो छोड़े जाने वाली सीट  पर उपचुनाव का खर्चा उस उम्मीदवार से लिया जाये न की सरकारी खजाने से। पिछले लोकसभा चुनाव में करीब 10000 करोड़ रुपये लोकसभा की 540-542 सीटो  पर खर्च हुए थे। जिसके अनुसार करीब 20 करोड़ रुपये  एक  सीट का खर्च होता है .यदि  यही चुनाव  एक साथ न होकर अलग अलग होता है तो खर्च लगभग दूना अर्थात उपचुनाव में 40-50 करोड़ होता है। इतना पैसा बैंक में जमा करवा कर ही एक से ज्यादा सीट   पर चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाये। किसी उम्मीदवार को चुनाव में विजयी होने की सुरक्षा जनता के पैसे से नहीं दी जा सकती 
     
  12. चुनाव में आचार संघिता का तोडा जाना एक आम बात है।ज्यादातर मामलों में चुनाव आयोग चेतावनी दे कर उम्मीदवार को छोड़ देता है।इस सम्बन्ध में नियम स्पष्ट होना चाहिए।एक बार चेतावनी  देने के बाद दुबारा गलती होने पर उम्मीदवारी रद्द करने का अधिकार चुनाव आयोग  के पास होना चाहिए।और चुनाव आयोग  इस पर सख्ती से अमल करे इसके लिए सभी पार्टियों के एक-एक प्रतिनिधियों का अधिकरण बने जो इस विषय पर बहुमत से अपनी राय निर्धारित दो-तीन दिन में  दे और चुनावआयोग उसे सख्ती से लागू  करे।
  13. यदि कोई नेता किसी दूसरी पार्टी के बारे में आपत्तिजनक अथवा भद्दा टीका -टिप्पणी करता है तो उसे इस के लिए पर्याप्त सबूत  देने चाहिये।इसके बिना यह कहना की मैंने तो आरोप  लगा दिया है अब आरोपी इस को गलत सिद्ध करे अथवा अदालत में जाये उचित नहीं है। क्योंकि ज्यादातर मामलो में यह केवल बदनाम करने की साजिश  होती है जो आम आदमी को गुमराह करने के लिए की जाती है।
  14. सभी राजनैतिक पार्टियों द्वारा लिए जाने वाला पैसा व खर्च का ब्यौरा  इनकी बैलेंस शीट में हो और वह  वेब साईट पर आम आदमी के लिए उपलब्ध हो ताकि।पच्चीस हजार से ज्यादा दान देने वाले का नाम और पता उसी तरह जांचा जा सके जैसे समाज सेवी संस्थाओ को दिया जाने वाला धन जांचा जाता है। दिए जाने वाले धन पर 20-25% टैक्स वसूलना भी ठीक रहेगा।ताकि काले धन को  चुनाव के माध्यम से सफ़ेद करने के काम पर रोक लग सके।
  15. जो  पब्लिक लिमिटेड कंपनिया दान देती है यह केवल उन्ही को इजाजत होनी चाहिए जिन्होंने अपनी सालाना बैठक में ऐसा  प्रस्ताव पास किया हो।यह केवल 2%शेयर रखने वाले और मालिको की तरह कम्पनी चलाने की मन मर्जी से नहीं होना चाहिए।
  16. जिन कंपनियो पर सरकारी देनदारी बाकी है उन्हें दान देने की इजाजत तब तक न दी जाये जब तक वह देनदारी  दे न दे अथवा उतना पैसा सरकारी खजाने में जमा न कर दे।ताकि सरकारी पैसा देने के बजाय दान देकर जीतने वाली पार्टी की सरकार बनने के बाद दान की दुहाई दे कर सरकारी खजाने को चूना   न लगा  सके।
 अजय सिंह "एकल"

Wednesday, January 16, 2013

करे कोई भरे कोई

 दोस्तों ,
क्या अपने कभी ऐसा  देखा है की किसी के द्वारा की गयी गलतियों का खामियाजा कोई दूसरा आदमी या व्यवस्था भरे। शायद नहीं। आपने तो शायद यह भी नहीं देखा होगा की यदि आप किसी योजना के बनाने और उसे लागू  करने के लिए जिम्मेदार हो तो उस योजना के बुरी तरह फेल  हो जाने पर आपको किसी  भी प्रकार न तो दण्डित किया जा सकता है  न ही  और किसी प्रकार की जवाबदेही आपकी बनती है। और आप मजे से अपनी सेवा पूरी करते हुए यानि सेवा में तरक्की का लाभ उठाते हुए सभी प्रकार के सेवा लाभ लेते हुए शान से सेवानिवृत्ति के लाभ उठा सकते है।

लेकिन  ऐसा हो रहा है और आप की नाक के नीचे हो रहा है और आप खूटें में बंधी बकरी की तरह कसाई को देख कर में-में तो कर रहे है लेकिन इससे ज्यादा कुछ नही कर सकते। हालाकिं इसमें दोष उन लोगो का नहीं है जो ऐसा कर रहे है ।बल्कि दोष उन लोगो का है जो ऐसा होते हुए देख रहे है, और कभी -कभी चर्चा भी करते है लेकिन उससे बाहर आने के लिए कोई प्रयत्न इसलिए नहीं करते की उन्होंने मान लिया  है की यही भाग्य है , यही विधि का विधान है अत: प्रयास करने से भी कुछ सार्थक होने वाला नहीं है।

आईये,हम अब आते है असली मुद्दे पर। हमारी संसदीय व्यव्य्स्थाओ के अनुसार साल में एक बार संसद में बजट पेश करने का प्रावधान है। यह बजट सरकार में तरह तरह के विशेषज्ञ और अनुभवी लोगो की मदद से बनाया जाता है और जनता के करोडो रुपये बजट बनाने में सरकार  खर्च करती है। यह बजट साल भर में तमाम मदों पर खर्च का आय और व्यय का अनुमान होता है। इसी अनुमान के हिसाब से  माननीय वित् मंत्री जी जनता पर टैक्स लगाते है अपने  राजनीतक हितो को ध्यान रखते हुए अनुदान और अन्य रियायतों की घोषणा करते है। इस बजट के बनने और फिर संसद में रखे जाने के बाद बजट सत्र में माननीय सांसदों द्वारा इस पर बहस कर इसे पारित किया जाता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार लगभग सौं करोड़ रुपये तो केवल बजट सत्र में संसद पर भत्ते तथा अन्य व्यय  किये जाते है। एक बार संसद से पास हो जाने के बाद इसे जनता पर लाद दिया जाता है। जिसे जनता ढोने के अलावा कुछ नहीं कर सकती।

बजट पास होने के बाद अभी आप नए टैक्स इत्यादी के हिसाब से अपने अपने परिवार के बजट को नए खर्चो के हिसाब से  समायोजित ही कर पाए थे की तीसरे महीने ही नए अनुमान मंत्री जी और उनकी मंडली ने लगा दिए और  जीवन उपयोगी तमाम चीजो के दाम बढ़ा दिये, अब  आप एक बार फिर से उन अनुमानों के हिसाब से अपनी जिन्दगी को व्यवस्थित करने लग जाते है और यह कभी न रुकने वाला क्रम जैसे इस देश की जनता की नियति बन गया  है। और आम आदमी जिसकी कमाई (तन्खा )साल में एक बार बढती है साल में कई बार छोटे -बड़े झटके खाते हुए फिर अगले बजट में लगने वाले नए करो के बारे में अनुमान लगाता रहता है। और इस बीच सरकार और उनके लिए काम करने वाली फ़ौज के लिए तरह -तरह से दिए जाने वाले भत्ते और सुविधाए बढती जाती है। तभी तो प्लानिंग कमीसन के उपप्रधान दिल्ली में 30 रूपये रोज में जीवन यापन करने की वकालत करते है और अपने बाथरूम में 35 लाख लगाकर नवीकरण करते है।

पिछले एक साल में अनेक बार पेट्रोल डीजल और एल पी   जी इत्यादी के रेट बढ़ाये गए। मंत्री जी ने घोषणा कर दी की अब सिलंडर पर अनुदान नहीं मिलेगा और साल में छे आपको सस्ते दाम पर पर और उसके बाद लगभग दूने  दाम पर मिलेंगे।  पेट्रोल के दाम बजट के बाद बढ़ाये गये क्योकि कहते है की अब हमें डालर मूल्य बढ़ने के कारण कंपनी को घाटा हो रहा है। लेकिन जिन कम्पनियो के घाटे की बात मंत्री जी कर रहे है वह कम्पनिया सरकार को डिविडेंड यानि मुनाफे का हिस्सा दे रही है।और कंपनियो के शेयर मूल्य भी बढ़ रहे है।
उदाहरन के लिए इंडियन आयल कारपोरेशन का पिछले 10 सालो का नियमित डिविडेंड देने का रिकार्ड है। कम से कम 4 बार इस कम्पनी ने बोनस शेयर भी एलाट किये है।

जिन कंपनियो की स्तिथी सुधरने के लिए मूल्य बढ़ा कर ज्यादा दाम देंने को जनता मजबूर है उन कंपनियो को अपने खर्चो पर कटोती करने के कोई संकेत नहीं और न ही उन्नत तकनीक से प्रक्रमण करने के कोई उपाए अपनाये जा रहे है। यानि जब भी आपकी योजना फेल  हो दाम बढ़ा दो। क्या सरकार बता सकती है अन्य व्यापारी जो आयातित मॉल से बना उत्पाद बनाते है उनके दाम ऐसे क्यों नहीं बढ़ते।

इस तरह देश की जनता सरकार के रहमो करम पर निर्भर हो गयी है।और सारे निर्णय राजनैतिक नफा नुकसान देख कर किये जा रहे है। क्या यही सोच कर हमारे संविधान निर्माताओ ने इसके नियम बनाये थे।क्या ऐसे ही देश की कल्पना की गयी थी। यह एक बड़ा प्रश्न है और गणतंत्र की 63वी जयंती मनाते समय इस स्थिति पर विचार करना उपयुक्त रहेगा।

अजय सिंह "एकल"