This blog is about the incidents and happenings in and around us which are affecting the country either way. I am raising these issues through this blog which are other wise left behind but need attention.
Sunday, April 2, 2017
जीवन की सीख
मौन प्रार्थना जल्दी पहुँचती हैं गुरु तक
क्यों की मुक्त होतीं हैं शब्दों के बोझ से।
सलाह गलत हो सकती है, साथ नहीं"
मेरे व्यक्तित्व और मेरे व्यवहार को
हर नजर में मुमकिन नहीं है, बेगुनाह रहना,
कभी मत मिलाईयेगा !!
क्योंकि मेरा व्यक्तिव मै हूँ और मेरा
व्यवहार आप पर निर्भर करता है.!
वादा ये करें की खुद,की नजर में बेदाग रहें।
यहाँ सब खामोश हैं, कोई आवाज़ नहीं करता,
बोल के सच, कोई किसी को नाराज़ नहीं करता..!!
जीवन का सच
न मैं गिरा,और न मेरी उम्मीदों के मीनार गिरे..!
पर.....
लोग मुझे गिराने मे कई बार गिरे...!!
सवाल जहर का नहीं था वो तो मैं पी गया,
तकलीफ लोगों को तब हुई, जब मैं जी गया।
कौन कहता हैं साहब,की नेचर और सिग्नेचर कभी बदलता नही।।_
साहब,, बस एक चोट की दरकार हैं।।_
अगर ऊँगली पे लगी,, तो सिग्नेचर बदल जाएगा।।
और दिल पे लगी,, तो नेचर बदल जाएगा।
जीवन की सीख
जो आनंद अपनी छोटी पहचान बनाने में है,
वो किसी बड़े की परछाई बनने में नहीं है.
बेहिसाब हसरतें भी पालिए,
मगर जो मिला है उसे पहले सम्भालिए.
बेवजह अच्छे बनो,
वजह से तो बहुत बनते हैं।
होने वाले ख़ुद ही अपने हो जाते हैं,
किसी को कहकर,अपना बनाया नहीं जाता.
टूटा हुआ फूल खुश्बू दे जाता है,
बिता हुआ पल यादें दे जाता है.
हर शख्स का अपना अंदाज़ होता है,
कोई ज़िंदगी मे प्यार,तो कोई प्यार मे ज़िंदगी दे जाता है.
एक जैसी ही होती हैं ये चिनगारियां,
कोई दीप जलाती हैं तो कोई आशियाँ.
मत पहनाओ इन्हें शर्तों का लिबास,
रिश्ते तो बिंदास ही अच्छे लगते हैं.
तालाब सदा कुँऐ से कइ गुना बड़ा होता है,
फिर भी लोग कुँऐ का पानी पीते थे,
क्योंकि कुँऐ में गहराई और शुद्धता होती है.
Friday, January 13, 2017
पाप का महत्त्व
स्वर्गीय भारत भूषण जी की लिखी पाप के महत्व को समझती हुई कविता
न जन्म लेता अगर
कहीं में ,धरा बनी ये मसान
होती,
न मंदिरों में मृदङ्ग बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.
न मंदिरों में मृदङ्ग बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.
मुझे सुलाते रहे
मसीहा ,मुझे मिटाने रसूल
आये,
कभी सुनी मोहनी मुरलिया,कभी अयोध्या बजे बधाये,
मुझे दुआ दो बुला रहा हूँ हज़ार गौतम,हज़ार गाँधी,
बना दिए देवता अनेकों ,मुझे मगर न तुम पूज पाए,
मुझे रुलाकर न स्रष्टि हंसती,न सुर ,तुलसी , कबीर आते,
न क्रास का ये निशाँ होता , न पाक-पावन कुरान होती,
कभी सुनी मोहनी मुरलिया,कभी अयोध्या बजे बधाये,
मुझे दुआ दो बुला रहा हूँ हज़ार गौतम,हज़ार गाँधी,
बना दिए देवता अनेकों ,मुझे मगर न तुम पूज पाए,
मुझे रुलाकर न स्रष्टि हंसती,न सुर ,तुलसी , कबीर आते,
न क्रास का ये निशाँ होता , न पाक-पावन कुरान होती,
न जन्म लेता अगर
कहीं में ,धरा बनी ये मसान
होती,
न मंदिरों में मृदङ्ग बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.
न मंदिरों में मृदङ्ग बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.
बुरा बता लें मुझे
मोलवी,की दें पुरोहित
हज़ार गली,
सभी चित्र या शकल बना लें बहुत भयानक ,कुरूप , काली,
मगर ये ही जब मिलें अकेले सवाल पूछो यही कहेंगे,
की पाप ही ज़िन्दगी हमारी ,वही ईद है वही दीवाली,
न सीचता अगर में जड़ों को कभी जहां में पुण्य न फलता,
न रूप का यूँ बखान होता , न प्यास इतनी जवान होती.
सभी चित्र या शकल बना लें बहुत भयानक ,कुरूप , काली,
मगर ये ही जब मिलें अकेले सवाल पूछो यही कहेंगे,
की पाप ही ज़िन्दगी हमारी ,वही ईद है वही दीवाली,
न सीचता अगर में जड़ों को कभी जहां में पुण्य न फलता,
न रूप का यूँ बखान होता , न प्यास इतनी जवान होती.
न जन्म लेता अगर
कहीं में ,धरा बनी ये मसान
होती,
न मंदिरों में मृदङ्ग बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.
न मंदिरों में मृदङ्ग बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.
अजय सिंह
Saturday, December 31, 2016
महात्मा की सच्चाई
मैं अभी भी उस रेलगाड़ी को देख सकता हूं जिसमें गांधी सफर कर रहे थे। वे सदा तीसरे
दर्जे, थर्ड क्लास में सफर करते थे .
परंतु उनका यह थर्ड क्लास फ़र्स्ट क्लास,प्रथम श्रेणी से भी अधिक अच्छा था। साठ सीटों के डिब्बे में वे उनकी पत्नी और उनका सैक्रेटरी—केवल यह तीन लोग थे। सारा डिब्बा आरक्षित था।और वह कोई साधारण प्रथम श्रेणी का डिब्बा नहीं था क्योंकि ऐसा डिब्बा तो दुबारा मैंने कभी देखा ही नहीं। वह तो प्रथम श्रेणी का डिब्बा ही रहा होगा। और सिर्फ प्रथम श्रेणी का ही नहीं बल्कि विशेष प्रथम श्रेणी का, सिर्फ उस पर ‘’तृतीय श्रेणी’’ लिख दिया
गया था और तृतीय श्रेणी बन गया था। और इस प्रकार महात्मा गांधी के सिद्धांत और उनके दर्शन की रक्षा हो गई थी।
उस समय मैं केवल दस साल का था। मेरी मां यानी मेरी नानी ने मुझे तीन रूपये देते हुए कहा कि स्टेशन बहुत दूर है और तुम भोजन के समय तक शायद वापस घर न पहुच सको। और इन गाड़ियों का कोई भरोसा नहीं है। बारह-तेरह घंटे देर से आना तो इनके लिए आम बात है। इसलिए ये तीन रूपये अपने पास रख लो। भारत में उन दिनों तीन रुपयों को तो एक अच्छा खासा खजाना माना जाता था। तीन रुपयों में तो एक आदमी तीन महीने तक अच्छी तरह से रह सकता था।
नानी ने मेरे लिए एक बहुत सुंदर कुर्ता बनवाया था। उनको मालूम था कि मुझे लंबी पतलून अच्छी नहीं लगती । ज्यादा से ज्यादा मैं कुरता-पायजामा पहन लेता था। कुर्ता मुझे बहुत प्रिय था, और पायजामा तो धीरे-धीरे गायब हो गया केवल लंबा कुर्ता ही बचा।
लोगों ने शरीर को दो हिस्सों में बाट रखा है। एक ऊपर का हिस्सा और दूसरा नीचे का हिस्सा। और इन दोनों के लिए कपड़े भी अलग- अलग तरह के बनाए है। शरीर के ऊपरी हिस्से के लिए तो सुंदर-सुंदर कपडे बनाए है और निचले शरीर को तो ढाँक लेने का प्रयास किया गया है बस।
नानी ने मेरे लिए बहुत सुंदर कुर्ता बनवाया था। उन दिनों बहुत गर्मी थी। मध्य-भारत के उस अंचल में बहुत अधिक गर्मी पड़ती है। दिन-रात लू चलती रहती है, उस के थपेड़ों से मुंह और नाक को बहुत परेशानी होती। बस केवल आधी रात को लोगों के कुछ राहत मिलती।
उस समय सोने की मोहरें गायब हो गई थीं और चाँदी के रुपयों का प्रचलन था। अब उस मलमल के कुरते की जेब के लिए चाँदी के तीन रूपये बहुत भारी थे—जेब लटक रही थी। ऐसा मैं क्यों कह रहा हूं, क्योंकि इसको जाने बिना आप लोग उस बात को समझ नहीं सकोगे जो मैं कहने जा रहा हूं।
गाड़ी हमेशा की तरह तेरह घंटे लेट आई। बाकीसभी लोग चले गए थे। सिवाय मेरे। तूम तो जानते है कि मैं कितना जिद्दी हूं। स्टेशन मास्टर ने भी मुझसे कहा: बेटा तुम्हारा तो कोई जवाब नहीं है। सब लोग चले गए हैं किंतु
तुम तो शायद रात को भी यहीं पर ठहरने के लिए तैयार हो। और अभी भी गाड़ी के आने को कुछ पता नहीं है। और तुम सुबह चार बजे से उसका इंतजार कर रहे हो।
स्टेशन पर चार बजे पहुंचने के लिए मुझे अपने घर से आधीरात को ही चलना पडा था। फिर भी मुझे अपने उन तीन रुपयों को खर्च ने की जरूरत नहीं पड़ी थी क्योंकि स्टेशन पर जितने लोग थेसब कुछ न कुछ लाए थे और वे सब इस छोटे लड़के की देखभाल कर रहे थे। वे मुझे फल, मिठाइयोंऔर मेवा खिला रहे थे। सो मुझे भूख लगने का कोई सवाल ही नहीं था। आखिर जब गाड़ी आई तो बस एक दस बरस का लड़का स्टेशन मास्टर के साथ वहां खड़ा था।
स्टेशन मास्टर ने महात्मा गांधी से मुझे मिलवाते हुए कहा: इसे केवल छोटा सा लड़का ही मत समझिए। दिन भर मैंने इसे देखा है और क विषयों पर इससे चर्चा की है, क्योंकि और कोई काम तो था नहीं। बहुत लोग आए थे और
बहुत पहले चले गए, किंतु यह लड़का कहीं गया नहीं। सुबह से आपकी गाड़ी का इंतजार कररहा है। मैं इसका आदर करता हूं, क्योंकि मुझे पता है कि अगर गाड़ी न आती तो यह यहां से जानेवाला नहीं था। यह यहीं पर रहता। आस्तित्व के अंत तक यह यहीं रहता। अगर ट्रेन न आती तो यह कभी नहीं जाता।
महात्मा गांधी बूढे आदमी थे। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मुझे देखा। परंतु वे मेरी और देखने के बजाए मेरी जेब की और देख रहे थे।बस उनकी इसी बात ने मुझे उनसे हमेशा के लिए विरक्त कर दिया। उन्होंने कहा: यह क्या है?
, मैंने कहा: तीन रूपये।
इस पर तुरंत उन्होंने मुझसे कहा, इनको दान कर दो। उनके पास एक दान पेटी होती थी,जिसमें सूराख बना हुआ था। दान में दिए जाने वाले पैसों को उस सूराख से पेटी के भीतर डालदिया जाता था। चाबी तो उनके पास रहती थी। बाद में वे उसे खोल कर उसमें से पैसे निकाल लेते थे।मैंने कहा: अगर आप में हिम्मत है तो आप इन्हें ले ले।
लीजिए,जेब भी यहां है रूपये भी यहां है, लेकिन क्या मैं आप से पूछ सकता हूं कि ये रूपये आप किस लिए इक्कठा कर रहे है। उन्होंने कहा: गरीबों के लिए। मैंने कहा: तब यह बिलकुल ठीक है। तब मैंने स्वयं उन तीन रुपयों को उस पेटी में डाल दिया, लेकिन आश्चर्य तो उन्हें होना था क्योंकि जब मै वहां से चला तो उस पेटी को उठा कर चल पडा।
उन्होंने कहा: अरे, यह तुम क्या कर रहे हो। यह तो गरीबों के लिए हे। मैंने उत्तर दिया: हां, मैंने सुन लिया है, आपको फिर से कहने की जरूरत नहीं है। मैं भी तो गरीबों के लिए ही ले जा रहा हूं। मेरे गांव मेंबहुत से गरीब है। अब मेहरबानी करके मुझे इसकी चाबी दे दीजिए, नहीं तो इसको खोलने के लिए मुझे किसी चोर को बुलाना पड़ेगा। क्योंकि चोर ही बंद ताले को खोलने की कला जानते है।
उन्होंने कहा: यह अजीब बात है….उन्होंने अपने सैक्रेटरी की और देखा। वह गूंगा बना था जैसे की सैक्रेटरी होते है। अन्यथा वे सैक्रेटरी ही क्यों बने? उन्होंने कस्तूरबा, अपनी पत्नी की और देखा। कस्तूरबा ने उनसे कहा: अच्छा हुआ, अब आपको अपने बराबरी का व्यक्ति मिला। आप सबको बेवकूफ बनाते हो, अब यह लड़काआपका बक्सा ही उठा कर ले जा रहा है। अच्छा हुआ। बहुत अच्छा हुआ,मैं इस बक्से कोदेख-देख कर तंग आ गई हूं।
परंतु मुझे उन पर दया आ गई और मैंने उस पेटी को वहीं पर छोड़ते हुए कहा: आप सबसे गरीब मालूम
होते है। आपके सैक्रेटरी को तो कोई अक्ल नहीं है। न आपकी पत्नी का आपसे कोई प्रेम दिखाई देता है। मैं यह बक्सा नहीं ले जा सकता,इसे आप अपने पास ही रखिए। परंतु इतना याद रखिए कि मैं तो आया था एक महात्मा से मिलने परंतु उस छोटी सी उम्र में भी महात्मा गांधी मुझे व्यवसायी ही लगे।
व्हाटस अप पर प्राप्त
अजय सिंह "जे एस के "
मैखाने मे आऊंगा मगर
मैखाने मे आऊंगा मगर...
पिऊंगा नही साकी...
ये शराब मेरा गम मिटाने की औकात नही रखती......
"खामोश बैठें तो लोग कहते हैं उदासी अच्छी नहीं,
ज़रा सा हँस लें तो मुस्कुराने की वजह पूछ लेते हैं" !
हद-ए-शहर से निकली तो गाँव गाँव चली।
कुछ यादें मेरे संग पांव पांव चली।
सफ़र जो धूप का किया तो तजुर्बा हुआ।
वो जिंदगी ही क्या जो छाँव छाँव चली।।....
तू होश में थी फिर भी हमें पहचान न पायी;
एक हम है कि पी कर भी तेरा नाम लेते रहे!
हजार जवाबों से अच्छी है खामोशी,
ना जाने कितने सवालों की आबरू रखती है !
"सूरज ढला तो कद से ऊँचे हो गए साये,
कभी पैरों से रौंदी थी, यहीं परछाइयां हमने..
काग़ज़ की कश्ती थी पानी का किनारा था।
खेलने की मस्ती थी ये दिल अवारा था।
कहाँ आ गए इस समझदारी के दलदल में।
वो नादान बचपन भी कितना प्यारा था ...!
जमीन छुपाने के लिए गगन होता है..
दिल छुपाने के लिए बदन होता है....
शायद मरने के बाद भी छुपाये जाते है ग़म....
इस लिए हर लाश पे कफ़न होता है
मेरे लफ़्ज़ों से न कर मेरे क़िरदार का फ़ैसला ll
तेरा वज़ूद मिट जायेगा मेरी हकीक़त ढूंढ़ते ढूंढ़ते l
कब्र की मिट्टी हाथ में लिए सोच रहा हूं,
लोग मरते हैं तो गु़रूर कहाँ जाता है.
किनारे पर तैरने वाली लाश को देखकर ये समझ आया…
बोझ शरीर का नही साँसों का था..!!
यह जो मेरी क़ब्र पर रोते हैं,
अभी ऊठ जाऊँ, तो ये जीने न दे..!!
मेरे पीठ पर जो जख्म़ है, वो अपनों की निशानी हैं,
वरना सीना तो आज भी दुश्मनो के इंतजार मे बैठा है..
जरुरत तोड देती है इन्सान के घमंड को..
न होती मजबूरी तो हर बंदा खुदा होता.!!!
जिसको गलत तस्वीर दिखाई,
उसको ही बस खुश रख पाया.
जिसके सामने आईना रक्खा,
हर शख्स वो मुझसे रूठ गया..!!
इस जमाने मे वफा की तलाश ना कर
गाफि़ल वो वक्त और था..
जब मकान कच्चे और लोग सच्चे होते थे..!!!
व्हाटअप से प्राप्त
अजय सिंह "जे एस के "
बैसवारा के श्री राव रामबख्श सिंह का बलिदान
मित्रों,
श्रीराम
की जन्मभूमि अयोध्या और लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) का निकटवर्ती क्षेत्र सदा से
अवध कहलाता है। इसी अवध में उन्नाव जनपद का कुछ क्षेत्र बैसवारा कहा जाता
है। इसी बैसवारा की वीरभूमि में राव रामबख्श सिंह का जन्म हुआ, जिन्होंने
मातृभूमि को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अन्तिम दम तक संघर्ष
किया और फिर हँसते हुए फाँसी का फन्दा चूम लिया।
राव
रामबख्श सिंह बैसवारा के संस्थापक राजा त्रिलोक चन्द्र की 16वीं पीढ़ी में
जन्मे थे। रामबख्श सिंह ने 1840 में बैसवारा क्षेत्र की ही एक रियासत
डौडियाखेड़ा का राज्य सँभाला। यह वह समय था, जब अंग्रेज छल-बल से अपने
साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। इसी के साथ स्वाधीनता संग्राम के लिए रानी
लक्ष्मीबाई, बहादुरशाह जफर, नाना साहब, तात्या टोपे आदि के नेतृत्व में
लोग संगठित भी हो रहे थे। राव साहब भी इस अभियान में जुड़ गये।
31
मई, 1857 को एक साथ अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक छावनियों में हल्ला बोलना
था; पर दुर्भाग्यवश समय से पहले ही विस्फोट हो गया, जिससे अंग्रेज सतर्क हो
गये। कानपुर पर नानासाहब के अधिकार के बाद वहाँ से भागे 13 अंग्रेज बक्सर
में गंगा के किनारे स्थित एक शिव मन्दिर में छिप गये।
वहाँ
के ठाकुर यदुनाथ सिंह ने अंग्रेजों से कहा कि वे बाहर आ जायें, तो उन्हें
सुरक्षा दी जाएगी; पर अंग्रेज छल से बाज नहीं आये। उन्होंने गोली चला दी,
जिससे यदुनाथ सिंह वहीं मारे गये। क्रोधित होकर लोगों ने मन्दिर को सूखी
घास से ढककर आग लगा दी। इसमें दस अंग्रेज जल मरे; पर तीन गंगा में कूद गये
और किसी तरह गहरौली, मौरावाँ होते हुए लखनऊ आ गये।*
लखनऊ
में अंग्रेज अधिकारियों को जब यह वृत्तान्त पता लगा, तो उन्होंने मई 1858
में सर होप ग्राण्ट के नेतृत्व में एक बड़ी फौज बैसवारा के दमन के लिए भेज
दी। इस फौज ने पुरवा, पश्चिम गाँव, निहस्था, बिहार और सेमरी को रौंदते हुए
दिसम्बर 1858 में राव रामबख्श सिंह के डौडियाखेड़ा दुर्ग को घेर लिया। राव
साहब ने सम्पूर्ण क्षमता के साथ युद्ध किया; पर अंग्रेजों की सामरिक शक्ति
अधिक होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा।
इसके
बाद भी राव साहब गुरिल्ला पद्धति से अंग्रेजों को छकाते रहे; पर उनके कुछ
परिचितों ने अंग्रेजों द्वारा दिये गये चाँदी के टुकड़ों के बदले अपनी
देशनिष्ठा गिरवी रख दी। इनमें एक था उनका नौकर चन्दी केवट। उसकी सूचना पर
अंग्रेजों ने राव साहब को काशी में गिरफ्तार कर लिया।*
रायबरेली
के तत्कालीन जज डब्ल्यू. ग्लाइन के सामने न्याय का नाटक खेला गया। मौरावाँ
के देशद्रोही चन्दनलाल खत्री व दिग्विजय सिंह की गवाही पर राव साहब को
मृत्युदंड दिया गया। अंग्रेज अधिकारी बैसवारा तथा सम्पूर्ण अवध में अपना
आतंक फैलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बक्सर के उसी मन्दिर में स्थित
वटवृक्ष पर 28 दिसम्बर, 1861 को राव रामबख्श सिंह को फाँसी दी, जहाँ दस
अंग्रेजों को जलाया गया था। राव साहब डौडियाखेड़ा के कामेश्वर महादेव तथा
बक्सर की माँ चन्द्रिका देवी के उपासक थे। इन दोनों का ही प्रताप था कि
फाँसी की रस्सी दो बार टूट गयी।
राव
रामबख्श सिंह भले ही चले गये; पर डौडियाखेड़ा दुर्ग एक तीर्थ बन गया, जहाँ
भरने वाले मेले में अवध के लोकगायक आज भी गाते हैं* -
अवध मा राव भये मरदाना।
अजय सिंह "जे एस के "
Saturday, November 12, 2016
काले धन पर प्रहार
रेड मार दी, रेढ़ मार वाह वाह जी, मोदी जी
काले धन की भेंड़ मार दी वाह वाह जी मोदी जी
काले धन की भेंड़ मार दी वाह वाह जी मोदी जी
एक मिनट में ब्लैक मनी का इंतकाल कर डाला जी
वाह वाह मोदी तुमने फिर से कमाल कर डाला जी
वाह वाह मोदी तुमने फिर से कमाल कर डाला जी
बोरे भरे पड़े थे घर में सब कूड़ा कर डाला जी
धन कुबेर के बेटों को पल में बूढ़ा कर डाला जी
धन कुबेर के बेटों को पल में बूढ़ा कर डाला जी
नकली नोट खतम पैसों से बिकने वाले वोट खतम
अर्थव्यवस्था पर आतंकी मुद्राओं की चोट खतम
अर्थव्यवस्था पर आतंकी मुद्राओं की चोट खतम
कैसा जादूगर है भैया रोज कमाल दिखाता है
राजनीति वाली बिसात पर धांसू चाल दिखाता है
राजनीति वाली बिसात पर धांसू चाल दिखाता है
धुर विरोधियों को भी इसका तोड़ नहीं दिखता है जी
कैसे करें खिलाफत इसका मोड़ नहीं दिखता है जी
कैसे करें खिलाफत इसका मोड़ नहीं दिखता है जी
भारत माँ से तेरा हमको सच्चा रिश्ता लगता है
आसमान से उतरा कोई नेक फरिस्ता लगता है
आसमान से उतरा कोई नेक फरिस्ता लगता है
पप्पू, कजरी और दिग्विजय आज बिलो में दुबक गए
काले धन के बादशाह चुपचाप किलों में दुबक गए
काले धन के बादशाह चुपचाप किलों में दुबक गए
पूरा देश तुम्हारे संग है जंग रहे जारी भैया
देशद्रोहियों के मुंह पर है चोट पड़ी भारी भैया
देशद्रोहियों के मुंह पर है चोट पड़ी भारी भैया
चार दिनों तक दिक्कत होगी ये हमको मालूम है जी
सब चीजों की किल्लत होगी ये हमको मालूम है जी
सब चीजों की किल्लत होगी ये हमको मालूम है जी
लेकिन हम भारतवासी हैं सब संकट सह लेंगे जी
अगर बहुत दिक्कत होगी तो हम भूखे रह लेंगे जी
अगर बहुत दिक्कत होगी तो हम भूखे रह लेंगे जी
यही वक्त है हमको सच्ची देशभक्ति दिखलानी है
अल्पकाल की दिक्कत है हमको हंस कर सह जानी है
अल्पकाल की दिक्कत है हमको हंस कर सह जानी है
ये तो सोचो नेताओं के बढ़े पेट घट जायेंगे
ये तो सोचो टेररिस्ट के बड़े हाथ कट जायेंगे
ये तो सोचो टेररिस्ट के बड़े हाथ कट जायेंगे
ये सोचो अब वोट बैंक की कभी खरीद नहीं होगी
लोकतंत्र की सच्ची सूरत कभी शहीद नही होगी
लोकतंत्र की सच्ची सूरत कभी शहीद नही होगी
अपना क्या है बस थोड़े से नोट पड़े है बक्से में
उनकी सोचो जो भर भर कर कल लाये थे रिक्शे में
उनकी सोचो जो भर भर कर कल लाये थे रिक्शे में
जिनके कोठे भरे पड़ें है कालेधन के नोटों से
इस निर्णय ने हंसी छीन ली है उन सबके होंठो से
इस निर्णय ने हंसी छीन ली है उन सबके होंठो से
देशवासियो थोड़े दिन तक रखना धैर्य जरूरी है
सर्जीकल स्ट्राइक ये वाली भी अब मजबूरी है
सर्जीकल स्ट्राइक ये वाली भी अब मजबूरी है
पचपन लाख करोड़ रूपैया लोग दबाये बैठे है
आम आदमी की खुशियों पर लॉक लगाये बैठे हैं
आम आदमी की खुशियों पर लॉक लगाये बैठे हैं
ऐसा झटका मारा है कि सब बाहर आ जायेगा
लोभी लोमड़ चुप रहना वरना नाहर आ जायेगा
लोभी लोमड़ चुप रहना वरना नाहर आ जायेगा
पतझड़ में आभास हुआ है बाग बहार महीने का
इसको ही कहते हैं जलवा छप्पन इंची सीने का
इसको ही कहते हैं जलवा छप्पन इंची सीने का
व्हाट्स अप से प्राप्त कविता
Sunday, October 9, 2016
सर्जीकल स्ट्राइक

जो नाम तुम्हारा देखा तो अरविंद कमल के मानी है,
पर कीचड भरा नजरिया है,फितरत बिल्कुल शैतानी है,
है बहुत तरस आता मुझको,दिल्ली वालों के जनमत पर,
ये कैसा मुखिया सौंप दिया,जो थूंक रहा है भारत पर,
ये कैसा मुखिया सौंप दिया,जो थूंक रहा है भारत पर,
जब से दिल्ली पर बैठा है,केवल बवाल का पोषक है,
हमले के मांग सबूत रहा,पाकिस्तानी उद्धघोषक है,
हमले के मांग सबूत रहा,पाकिस्तानी उद्धघोषक है,
सेना पर करते हो सवाल,सम्बल को देते झटके हो,
हाफ़िज़ सईद के पैजामे का नाड़ा बनके लटके हो,
हाफ़िज़ सईद के पैजामे का नाड़ा बनके लटके हो,
सेना का अफसर बोल चुका,सरकार घोषणा कर बैठी,
पर बुद्धि तुम्हारी क्यों ऐसे मौके पर आखिर मर बैठी,
पर बुद्धि तुम्हारी क्यों ऐसे मौके पर आखिर मर बैठी,
माना मोदी से नफरत है,पर सेना से क्या बैर तुम्हे?
आतंकी सगे नज़र आते,फौजी लगते क्यों गैर तुम्हे?
आतंकी सगे नज़र आते,फौजी लगते क्यों गैर तुम्हे?
तुम नेता हो या भोंदू हो,ये प्रश्न बहुत उलझाते हैं,
दिल्ली वालों ने चुना तुम्हे,हम शर्म किये मर जाते हैं,
दिल्ली वालों ने चुना तुम्हे,हम शर्म किये मर जाते हैं,
खुद अब तक बता नही पाये,कैसे राशन के पत्र बने,
कैसे सीडी के दृश्य रचे,कैसे मंत्री छल छत्र बने,
कैसे सीडी के दृश्य रचे,कैसे मंत्री छल छत्र बने,
किसने तुमको अधिकार दिया,तुम सेनाओं से प्रश्न करो,
सेना सरहद पर मिट जाए,तुम विज्ञापन का जश्न करो,
सेना सरहद पर मिट जाए,तुम विज्ञापन का जश्न करो,
तुम वोट ढूँढ़ते हो अपना,अब आतंकी आघातों में,
अरविन्द!हमें अब आती है दुर्गन्ध तुम्हारी बातों में,
तुम चाह रहे,सेनाओं का हर प्लान उजागर हो जाए,
जो जो प्रयोग में लाया था,सामान उजागर हो जाए,
जो जो प्रयोग में लाया था,सामान उजागर हो जाए,
तुम चाह रहे,जो गुप्त रहा,अभियान उजागर हो जाए,
हम कैसे बदला लेते हैं,अरमान उजागर हो जाए,
हम कैसे बदला लेते हैं,अरमान उजागर हो जाए,
तुम वही सबूत मांगते हो,जो पाकिस्तानी मांग रहे,
वो भी सीमाएँ लाँघ रहा,तुम भी सीमायें लांघ रहे,
वो भी सीमाएँ लाँघ रहा,तुम भी सीमायें लांघ रहे,
आये हैं जबसे "पाक" वचन,अरविन्द तुम्हारे होंठो पर,
कजरी ने मानो नाच दिया हो,पेशावर के कोठों पर,
कजरी ने मानो नाच दिया हो,पेशावर के कोठों पर,
लो मान लिया अरविन्द,तुम्हे हम सब सबूत दिखलाएंगे,
गर हुआ पुनः स्ट्राइक तो तुमको लड़ने भिजवाएंगे,
गर हुआ पुनः स्ट्राइक तो तुमको लड़ने भिजवाएंगे,
ये कवि गौरव चौहान कहे,सारे सबूत मिल जाएंगे,
दो चार धमाके सुनकर ही दोनों गुर्दे छिल जाएंगे
दो चार धमाके सुनकर ही दोनों गुर्दे छिल जाएंगे
गोली निकलेगी कानो से,तब अम्मा याद करोगे तुम,
रख लो सबूत,घर जाने दो,रोकर फरियाद करोगे तुम,
रख लो सबूत,घर जाने दो,रोकर फरियाद करोगे तुम,
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