Sunday, December 23, 2012

चित भी मेरी पट भी मेरी खड़ा तो मेरे ..............का

प्रिय दोस्तों,
कुछ इसी तर्ज पर भाई मुलायम सिंह और मायावती बहनजी संसद में बता रहे थे।तभी तो दोनों ही पार्टियो ने ऍफ़ डी आइ का विरोध भाषण   में तो किया लेकिन वोट डालने की जब  बारी आयी तो सदन से बाहर चली गयी। और इस तरह से बिना लाठी तोड़े साँप मार दिया।लेकिन जनता को इससे एक बात तो यह समझ में आ ही गयी की भाई यदि ऍफ़ डी आइ लागू होने के बाद जनता को फायदा मिला तो कहेंगे की इसीलिए प्रस्ताव को संसद में गिरने नहीं दिया और अगर नुकसान हुआ तो कहेंगे की इसलिए तो प्रस्ताव के पक्ष में मत नहींदिया।दूसरी बात यह समझ में आ गयी "इस देश की राजनीत में नीतियों पर फैसला सड़क या संसद में नहीं बंद कमरों की सौदेबाजी से होता है। यहाँ समर्थन भी बिकता है और विरोध भी। बस खरीदार चाहिए।"और ऐसा हर पाँच साल में होते रहना चाहिए ताकि पैसे बटते रहे और नेताओ की  अर्थव्यस्था  अगले चुनाव के लिए ठीक हो जाये।

देश की दो राजनेत्री प्रियंका और वृंदा करात ने अपने अंग दान करने की घोषणा कर दी है। समाचार ने बड़ा हर्षित किया। एक तो इसलिए दोनों सुंदर नेत्रियो ने कुछ दान करने की बात कही है मरने के बाद ही सही, दूसरे इसलिए की जिन्हें लेने की आदत हो वह कुछ देने की बात करे तो इसका असर दूना होता है। अब अन्दर की बात यह है की जीते जी कुछ नहीं देंगे मरने के बाद चाहे जो हो।

राष्ट्रीय शर्म के काम राजनीतिज्ञ अक्सर करते ही रहते है, यह बात दीगर है की शर्म आती नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति  ने भारतीय ओलम्पिक संघ पर प्रतिबंध लगाया है जिसका कारण यह है की हमारे यहाँ पदाधिकारियों के चुनाव में धांधागर्दी और भाई भतीजावाद इस कदर हावी है की  बेसिक दिशा निर्देशों का भी पालन नही हो पा  रहा है।  वास्तव में राजनीत का विस्तार इतना ज्यादा हो गया है की अब देश में  कुछ भी राजनीत से परे नहीं है। राजनीत में खेल और खेलो में राजनीत तो हिन्दुस्तानियो की  पुरानी  फितरत  है।

अजय सिंह "एकल "

Saturday, December 8, 2012

एफ डी आइ इन रिटेल


प्रिय मित्रो ,
कल राज्य सभा मे एफ डी आइ इन रिटेल का बिल पास हो जाने के बाद इसका देश में लागू  होना तय है।जिस तरह से लोक सभा में मुलायम सिंह और मायावती की पार्टी ने वोट  का बहिष्कार कर के  अप्रत्यक्ष रूप से बिल का समर्थन किया और सरकार को वोटिंग में जीता  दिया और फिर राज्य सभा में मायावती ने बी जे पी  पर आरोप  लगा कर अपनी पार्टी के द्वारा बिल के समर्थन को उचित सिद्ध किया और मुलायम सिंह की पार्टी  ने बहिष्कार करके अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन   दिया है इस से देश की जनता का अपमान भी हुआ है और इस राजनीत ने  लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी सवाल उठाये है। क्या वास्तव में इस बिल को जनतंत्र का समर्थन प्राप्त है अथवा यह जनतांत्रिक प्रक्रिया में छिद्र के कारण ऐसा हो सका है।

अत: इसको जाचने और निदान का इससे उचित  समय और क्या हो सकता है। आइये इस समस्या से निपटने पर विचार  करे।

1.एक बार चुनाव हो जाने के बाद किसी भी तरह के जनमत संग्रह की व्यस्था नहीं होने के कारण महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर आम जनता की राय जानने का कोई उपाए नहीं है। अत: ऐसे प्रस्तावों पर निर्णय करने को   राजनैतिक पार्टिया अपनी सुविधा  के अनुसार  स्वतन्त्र रहती है और अपने पक्ष में उसी तरह के तर्क देकर जन भावना को प्रभावित करने का प्रयत्न करती है।

2. अधिकांश घटनाओ में  किसी प्रकार  के लालच, वित्तीय अनियमित करण  अथवा भ्रस्टाचार  के कारण  ऐसा होना पाया जाता  है। । जैसा की पिछली बार परमाणु बिजली प्रस्ताव पर सामने आया था ,इस बार भी ऐसा होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

3 ख़राब .राजनैतिक चरित्र के कारण देश पर ऐसी योजनाए उन लोगो के द्वारा थोपी जाये जिनका व्यहार देश हित में सन्दिग्ध है कहाँ तक उचित है? क्योकिं जो जितना भ्रस्टाचारी है धन और बाहू बल के कारण उसके चुने सांसद अथवा दूसरे  संवैधानिक पद पर चुने  जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इन परिस्थितियो में  आम आदमी को केवल पाँच साल में एक बार वोट दे कर चुनने का अधिकार देंना  काफी नहीं है।

4.देश के 271  माननीय  संसद किसी भी बात पर सहमत हो जाये तो उसे देश में लागू  किया जा सकता है फिर चाहे यह प्रधान मंत्री चुनने की ही बात क्यों न हो यानि 271@20 करोड़  रुपए में देश में मनचाहा कानून बनवा सकते है।यह धनराशी करीब 1080 मिलियन  डालर  बैठती है ।  केवल एप्पल कंपनी का पिछले साल का मुनाफा इससे 4 गुना ज्यादा है। ऍफ़ डी आइ बिल के आने के कुछ माह  पहले ही ऐसी खबर आई  थी की वालमार्ट जो की रिटेल की दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है,ने भारत में अपनी कंपनी का व्यक्ति भारी  तन्खा पर नियुक्त किया हुआ है। जिसका काम देश के बड़े राजनेताओ और अधिकारियो के साथ कम्पनी हित के काम करवाना है।और इसके खिलाफ आर्थिक मामले में जाँच भी  चल रही है।

5.इन परिस्थितयों में आम आदमी एक बार वोट देकर माननीय सांसदों और पार्टियों के हाथ अपने को गिरवीं रखने को मजबूर है। क्योंकि बाद में केवल निर्णय करने की शक्ति केवल राजनेताओ और अधिकारिओ के पास होती है।और आम जनता का इससे  कोई लेना देना  या कंट्रोल नहीं है।

6.इस तरह की धटनाओ को भविष्य में रोकने के लिए आम जनता के द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग इंटरनेट द्वारा फेस बुक के मध्यम से अथवा अलग से इसी उद्देश्य के लिए बनाई गयी वेब साईट पर  करवाई जा सकती है। जैसे की अभी  भी तमाम तरह की प्रतियोगताओ में पुरूस्कार वितरण हेतु प्रत्याशी अथवा संगठन के  चुनाव हेतु किया जाता है।

7. साथ ही विकल्प के तौर पर  यदि  दो फ़ोन नम्बरों में से एक पर पक्ष में और दूसरे  पर विपक्ष में  मिस काल देने की  सुविधा प्रदान की जाये तो गाँव में रहने वाला व्यक्ति भी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर अपनी राय दे सकता है। इस तरह के प्रयोग मनोरंजन उद्योग में "कौन बनेगा करोडपती" अथवा "सा रे गा माँ" इत्यादि प्रोग्रामो में प्रत्याशियों की लोकप्रियता जानने के लिए सफलता पूर्वक किये जा रहे है।

8.इस तरह की वोटिंग की  देखरेख चुनाव आयोग  जैसे संवेधानिक संस्थानों द्वारा अथवा सीधे लोक सभा और राज्य सभा कार्यालय द्वारा हो जिससे पार्टी अथवा सत्ता के  दुरपयोग की सम्भावना को कम किया जा सके।

9. इस तरह पांच वर्षो के लिए एक बार सांसद चुनने के बावजूद देश के लिए महत्व पूर्ण विषयों पर आम जनता की राय जानना संभव हो सकेगा और देश को सत्ता अथवा विपक्ष की देश हित के बजाये अपने हित की राजनीत करने से रोकना सम्भव हो सकेगा।

10.इस प्रकार  सत्ता के विकेंद्री करण में मदद मिलेगी और सही मायने में जनता की ताकत जनता के हाथ में रहेगी।

11. इस प्रकार की प्रक्रिया अपनाने से राजनेतिक भ्रष्टाचार को रोकने में भी मदद मिलेगी।

अजय सिंह "एकल "

Thursday, November 15, 2012

फोर मोर इअर्स आफ अंकल सैम


                                                                          दोस्तों,
ओबामा  4 साल के लिए अमरीका के राष्ट्रपति और पूरी दुनिया के लिए चाचा चौधरी(Uncle Sam)फिर   बन  गये है ।फोर मोर इअर्स  के नारे ने  कमाल  का करिश्मा  कर दिया, प्रचार के दौरान एक बार तो लगा की शायद इसबार मिट रोमनी मिटा  देंगे डेमोक्रट ओबामा को ।वोटों कि गिनती होते समय कई राज्यों में उन्होंने ओबामा को हराया भी लेकिन अंत में ओबामा अपना परचम लहराने में सफल रहे।पूरी दुनिया में अधिकतर देशो ने बधाई भी दी , कुछ ने दिल से तो कुछ ने केवल  शिष्टाचार वस ।हिंदुस्तान के उद्योगपतियों तथा राजनेताओ ने भी बधाई दी, हालाकि बहुत से  लोगो के मन में आउट सोर्सिंग की स्थिति  तथा परमाणु विद्युत् के समझौतों को  लेकर मन में संदेह भी है। लेकिन अब कोई उपाय तो है नहीं इसलिए  चलो हम भी बधाई दे देते है आखिरहाथी के पावँ में ही सबका पावँ होता है।और इस धरती पर अमरीका से बड़ा हाथी कौन है?

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पर आरोप लगे तो कांग्रेस की बाछे खिल गई।उन्हें लगा की  देश को केवल वही बेमानी कर के नहीं लूट रहे है बल्कि विरोधी पार्टी जो चाल , चरित्र और चेहरा अलग बताती उसका चरित्र और चेहरा  कमोबेस उसके जैसे  ही है और इसलिए पहला मौका मिलते ही कांग्रेस के रण नीत कारो ने आरोपों की तोप का मुह वाड्रा और कोल घोटाले की बजाय गडकरी  की और घुमा दिया   और सरकार के मंत्रियो ने  भी स्वामिभक्ति का परिचय देते हुये    इन्कम टैक्स से ले कर मीडिया तक को सच्चाई पता लगाने में लगा  दिया और सबने मिल कर ऐसा माहोल बना दिया की बी जे पी से लेकर संघ तक में  गडकरी को बचाने और इस्तीफा  मागने वालो का अन्तर्द्वंद जनता के बीच  में आ गया और जो फजीहत  होनी शुरू हुयी वोह अब बिना इस्तीफे  के खत्म होगी ऐसा  लगता  नहीं है। पार्टी से ले कर गडकरी तक को भी यह लग रहा है कि जाना तो है ही लेकिन बे आबरू होकर न जाना पड़े तो अच्छा है।बस बी जे पी के रण नीत  कारो से यहीं समय की  चूक  हो गयी।आखिर गडकरी कोई हीरा तो है नहीं जो सदा के लिए होता है।अगर आरोप लगने के तुरन्त  बाद इस्तीफा दे  देते तो गडकरी की इज्जत बच जाती पार्टी की इमेज बनती सो अलग। और फिर कांग्रेस के ऊपर पूरी ताकत से आक्रमण करने का मौका बी जे पी को मिलता  इससे देश का भी और पार्टी का भी भला होता । खैर अब तो सिर्फ डैमेज कंट्रोल हो सकता है लेकिन  अभी भी डैमेज कंट्रोल उपायों के  बजाये कभी गुरुमूर्ति का और कभी कुछ  और तरह -तरह के ड्रामे हों रहे  हालाकि उपाय सिर्फ इस्तीफा ही  है,राजी खुशी  दे-दे तो ठीक नहीं तो बेआबरू होकर जायेंगे।
जिस तरह डेविड पेट्रास जो एफ बी आइ के डाइरेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत थे   एक महिला कर्मी  के साथ   सेक्स  रिश्तो का आरोप लगते ही इस्तीफा दे दिया है यह अपने आप में एक मिसाल है।लग भग ऐसे ही आरोप जब कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पर लगे थे तो वह तुरन्त 5-7 महीनो के लिए छिप गए और अब फिर जब यह भरोसा हो गया की जनता इतने दिनों में भूल  गई  होगी तो पार्टी को फिर सेवा देने और नए शिकार करने को हाजिर हो गए है। बस यही  फर्क है अमरीका और भारत में।

ऐसा लगता है कांग्रेस के राजकुमार राहुल गाँधी अब देश के साथ कांग्रेस पार्टी के लिए भी असेट के बजाये लाएबिल्टी बनते जा रहे है।कांग्रेस के लोग  बहुत  दिनों से उन्हें बड़ी जिम्मेदारी  दे कर अपनी क़ाबलियत सिद्ध करने की मांग कर रहे है लेकिन एक के बाद एक असफलताओ के कारण ऐसा करने की उनकी हिम्मत  पड़ नहीं रही है और वह  बाकी लोगो की प्रगति में बाधा बन रहे है। लेकिन आज लोगो ने उन्हें चुनाव की समिति का प्रधान बना दिया है।पद सजावटी है  इसलिए क़ाबलियत की जरुरत नहीं है।इस तरह साँप बिना लाठी तोड़े ही  मर गया।वैसे भी कहते है की बेटर टू यूज दैन  रस्ट आउट अर्थात जंग लगा कर बेकार करने से अच्छा  है की इस्तेमाल  कर लो। चलो देखते है की बाहें समेटने के अलावा और क्या कुछ कर सकते कुंवर साहेब।

और अंत में 

मुल्क का कौम का इतना भी मियार (स्तर ) न गिरे 
कि सुर्खिया देखते ही हाथ से  अख़बार गिरे।

अजय सिंह "एकल "

Tuesday, October 23, 2012

हमाम में नंगे लोग

दोस्तों,
लोग पहले हमाम में नंगे होते थे अब पब्लिक में है, कुछ की खुल गई है कुछ की खुलने वाली है।किसी को 10 करोड़ का फ्लैट 80 लाख में मिलता है तो किसी की कार के ड्राईवर  कम्पनी  में डायरेक्टर है। एक को करोड़ो रुपये बिना ब्याज बिना सिकुरिटी के  एक नहीं कई सालो के लिए मिल जाते है तो एक के सेबों के बाग़  सात लाख सालना आमदनी के बजाये  एक साल में  पांच करोड़ की आमदनी करने लग  गए है।कौन किसकी कहे इसलिए सब एक दूसरे की तारीफ में लगे है। दुनिया के बड़े-बड़े मैनेजमेन्ट कालेजो के लिए यह अच्छी केस स्टडी हो सकती है।कंपनी मुनाफा कैसे कमाती है ,कुशल व्यापारी 50 लाख की पूंजी लगा कर चाँद सालो में 300 करोड़ के मालिक कैसे बनते है।मुंबई की चाल में करोड़ो का व्यापर करने वाली कंपनी कैसे अपना दफ्तर चलाती है। देश के प्रधान मंत्री को पता ही नहीं चला कब  उनकी नाक के नीचे ही  पैसे पेड पर उगने लगगये और उनका अर्थ शास्त्र कब और कैसे फेल हो गया।

चपन मैं पढाई गयी पंचतन्त्र की कहानिया केवल चरित्र निर्माण ही नहीं करती बल्कि आदमी की समझ भी बढाती है और जीवन जीने की कला सिखाती है।भारत के कानून मंत्री की पत्नी के द्वारा चलाये जाने वाले एनजीओ पर भ्रष्टाचार के खुलासे के बाद खुर्शिद साहेब को कुछ सूझ नहीं रहा है इसीलिए तो कभी हाई कमांड तो छोड़िये उनके के दामाद को क्लीन चिट भी दे रहे है और उनके लिए जान देने को भी  तैयार है और कभी अरविन्द केजरीवाल को  फरुखाबाद से सलामत वापस आने की चुनौती दे रहे है। आज तो उनके एक बयान ने सिद्ध कर  दिया  की उनका व्यहारिक ज्ञान बिलकुल जीरो है नहीं तो अरविन्द केजरीवाल को  चीटी  कह कर  वह  हाथी की तुलना अपने से नहीं करते।शायद उन्हें नहीं पता की चीटी अगर हाथी  की  सूँड में घुस जाये तो जान भी ले सकती है। दूसरी विशेषता यह  भी की हाथी की पीठ  पर चीटी नाच सकती है लेकिन हाथी ऐसा नहीं कर  सकता। इसलिए मंत्री जी सावधान चींटियो  ने झंडा उठा लिया है और आपका मंत्री पद खतरे मैं है।

भारत सरकार  के इस्पात मंत्री तो अजब -गजब है कहते है आखिर केंद्र के मंत्री की भी   कोई इज्जत है,हैसियत है।अब वोह घोटाला करे तो कम से कम 71 करोड़ का तो होना चाहिए क्या आपने 71 लाख का आरोप लगा दिया है। इतने रुपये का घोटाला तो हमारे यहाँ बाबू  लोग कर लेते है। यानि मंत्री जी एनजीओ की बेमानी की मुकालफत करने के बजाय अपनी बेमानी के स्टैण्डर्ड का बखान कर रहे है।और अपने दोस्त का  पूरी शिद्दत से साथ दे रहे है इसे कहते है मौसेरे भाई का रिश्ता।
मैंने तो बच्चो को कैरियर काउंसलिंग मे  इंजिनियर, डाक्टर वगैरा की पढाई  छोड़ कर किसी गडकरी जैसे के यहाँ ड्राईवर या बेनी बाबू जैसे लोगो के यहाँ बाबू  बनने की सलाह देना शुरू कर दिया है।और अगर ज्यादा  महत्वाकान्छी  हो और आवारा गर्दी के अलावा कुछ नहीं कर सकते तो वाड्रा की तरह किसी खानदानी लड़की से शादी करने की योजना बनाना अबकी की जिन्दगी आराम से काटने के लिए अच्छा पेशा हो सकता है। नहीं तो पढ़ लिख कर नवीन जिंदल  या मनोज जैसवाल जैसे किसी घोटाले बाज के यहाँ चंद रुपयों की नौकरी करते नजर आओगे। यदि घोटाले की जाँच हुई और जेल जाने को नौबत आयी तो गौतम दोषी या हरी नैअर की तरह तिहाड़ में भी जाना
 पड़ सकता है। वैसे रावन की सेना में भर्ती खुले तो उसमे भी जाने का विचार अच्छा है।अब राम तो सतयुग मैं आएंगे और तब तक तो रावन का ही राज् रहने वाला है। इसलिए सबसे अच्छा कैरिअर  और अकूत पैसे की वर्षा वही होगी।तो या तो उसे स्वीकार कर लो नहीं तो जिन्दगी भर पता ही नहीं चलेगा की आप  महान भारत में  रहते है या  बनाना रिपब्लिक में जहाँ वोट देकर और  अपने ऊपर टैक्स लगवा कर चोरो और लुटेरो की तिजोरी भरने की व्यवस्था करते है।


नव रात्रि एवं विजय दशमी की शुभ कामनाओ के साथ 

अजय सिंह "एकल"

Sunday, October 14, 2012

बनाना रिपब्लिक का आम आदमी

 दोस्तों,
पिछले सप्ताह देश में एक ऐसी घटना घट गई जिसने मेरी नींद उड़ा दी है और बेचैन  कर दिया हालाकिं इस समाचार पर  समाचार पत्रों और दूरदर्शन पर बहस बहुत हुयी है लेकिन मेरी चिंता कुछ फर्क है और लोगो की चिंता से।

हुआ ये की अरविन्द केजरीवाल के डी .एल .एफ . और  वाड्रा सम्बन्धो के खुलासे पर वाड्रा साहेब खुन्दक खा गये और भारत देश और जनता की तुलना "मैंगो मैन आफ बनाना रिपब्लिक " कहकर कर दी .यहाँ तक तो ठीक था भारत के आम को कोई कुछ भी कहे इस से कहने वाले को भले आत्म संतुष्टि मिलती हो, आम आदमी कोई फर्क नहीं पड़ता इसलिए नहीं की वह कुछ  जानती समझती नहीं  बल्कि इस लिए कि उसकी अपनी मजबूरिया उसे और कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं देती। खैर देश के पहले परिवार के दामाद का यह सोचना मुझे कुछ ज्यादा  ठीक नहीं लगा फिरभी मैंने सोचा की चलो कोई बात नहीं, आम तो होता इसीलिए है जो चाहे निचोड़े चूसे और फेंक दे. आम को क्या फर्क पड़ता है। लेकिन अब समस्या ज्यादा विकट  है।
आम जनता का ख़िताब पाए हर आदमी की आखरी तम्मना होती है खास बनना।और वो सारी  जिन्दगी इसी कोशिश में लगा रहता है।इसके लिए चोरी करना, राजनीत करना और भी बहुत कुछ करना पड़ता है लेकिन अब तो हद हो गयी है । गाँधी परिवार के  दामाद राबर्ट बडेरा जो दामाद बनने के पहले आम (दसहरी ) थे   और गाँधी परिवार में शादी करके खास बन गये  है वो फिर  से आम (अलफांसो )बनना चाहते  है।एक ऐसा आम आदमी जिसके पास रु 300 करोड़ का बैंक बैलेंस है जिसको बचाने  के लिए देश का कानून मंत्री जान देने को तैयार है, वित्त मंत्री कानून बदलने को तत्पर है।

कहाँ   चोराहे की लाल बत्ती पर पुलिस द्वारा  रोके जाने  पर गिडगिडाने वाला बेचारा आम आदमी राशन की दुकानों का चक्कर लगने वाला आदमी ,कहाँ एक अदद राशन कार्ड के लिए धक्के खाने वाला आदमी ,कहा सरकारी बस में पसीना बहाने  वाला जिसको मैं अबतक देश का आम आदमी समझता  था, मुझे अचानक लगा की मैं स्वप्न लोक मैं विचरण कर रहा हूँ जहाँ आम आदमी का बैंक बैलेंस इतना है की आधा शहर  खरीद ले,चमचमाती बड़ी कार मे  घूम रहा है, पुलिस वाला सलाम कर रहा है और साल मैं 6-7 नहीं सब्सिडी वाले  60-70 गैस सिलेण्डर मिलते है और कोई मंत्री इस सब्सिडी का भार सहने के लिए मना नहीं करता बल्कि और भी भार  सहने को ख़ुशी-ख़ुशी तैआर है।फर्जी बैलेंस शीट में जारी आकड़ो को खुद कार्पोरेट अफेअर मंत्री सही होने का प्रमाण दे रहे है। बड़ी मुश्किल से वफादारी का प्रमाण देने का समय मिला है अतः हरकोई एक दूसरे से आगे निकलना चाहता है।पता नहीं फिर  मौका कब मिलेगा अरविन्द केजरीवाल भी मानते है की इस मौके पर चूके तो अगला मौका चालीस साल बाद आयेगा।

जब से अरविन्द  और वाड्रा  साहेब में आम आदमी बनने को होड़ लगी है लोग खास की बजाय आम बनना चाहते है।    मैनेजमेन्ट  की भाषा मैं इसे कहते है प्रतिमान बदलना अर्थात पैराडाइम   शिफ्ट।अब इस देश का आम आदमी खास बनने की कोशिश नहीं करेगा बल्कि खास लोग आम बनने की कोशिश  करेंगे।चाहे वो देश के प्रथम राजनैतिक परिवार के दामाद राबर्ट वाड्रा हो या भारतीय रेवेन्यू सेवा के पूर्व अधिकारी अरविन्द केजरीवाल।चलो इस बहाने कम से कम देश के 70 करोड़ लोगो को खाना मिलने लगेगा और लंगोटी भी।

और अंत में  


हम जानते है जन्नत की हकीकत को    
दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है।
                                                        मिर्जा ग़ालिब 

अजय सिंह "एकल"

Tuesday, October 2, 2012

असली गाँधी नकली गाँधी

दोस्तों ,
दुनिया के लिए दुनिया में एक ही गाँधी होंगे,जिनको लोग प्यार और सम्मान से महात्मा गाँधी पुकारते थे।लेकिन गाँधी के देश में इतने गाँधी हैं की पहचानना मुश्किल है की कौन असली है और कौन नकली।दर असल नकली गाँधी की पैकिंग  इतनी अच्छी और आकर्षक है की लगता है असली को छोड़ नकली से ही काम चला ले। अब आप सोच रहे होंगे की गाँधी के जन्म दिन पर यह क्या राग अलापने लग गए ,पर घबराइए नहीं हम आपको कुछ मजेदार बाते बताने जा रहे है जो आपको आनंदित भी करेंगी और मनोरंजन भी।

आज सुबह मैंने एक मित्र को फोन कर गाँधी जयंती की जब बधाई दी तो उन्होंने रिटर्न गिफ्ट की तरह मुझे भी बधाई दे दी और कहा की मैं चाहता हूँ की गाँधी जी हमेशा आप की जेब मैं रहे ( I wish Gandhi should always remain in your pocket)  । यह सुन कर मैं आश्चर्य में  पड़ गया क्योकि अब तक मैं गाँधी को दिल मैं रखकर उनके आचरण का पालन करने की ही कामना करता था तो मैंने उनसे पूछ लिया की येसा क्यों कह रहे है   तो वह  बोले  कि भईया गाँधी दिल -विल मैं तो बहुत रह लिए अब तो दुनिया उसी की सुनती है, उसी को पूजती  है जिसकी जेब मैं गाँधी यानि वोह करेन्सी नोट है जिस पर देश के  राष्ट्र पिता की फोटो छपी है।

भौतिक शास्त्र (Physics) का  एक  सिद्धान्त है की समान चीजे  एक दूसरे  को आकर्षित करती है इस नियम के हिसाब से गाँधी (करेंसी ) गाँधी नाम वालो के पास ही  जा रही है। कल गुजरात के मुख्यमंत्री जी ने बताया की श्रीमती सोनिया गाँधी ने यू पी ये (दो ) के कार्य काल में अपनी विदेश यात्रा में 1800 करोड़ गांधियो को खर्च किया है।अब इनकी कोई फैक्टरियां तो चलती नहीं है और न पिता जी इटली के राजा थे तो इतने गाँधी तो नाम से ही आकर्षित हुए होंगे न। और आपको पता है की दूध देने  (कमाई करने )वाली काली मोटी भैंस जब अपनी  नांद मैं   खाना खाती है तो चारो ओर इतना गिर जाता है  की अगल बगल वालो यानि दिग्विजय और सिब्बल जैसे लोग उसी से काम चला लेते है।

देश के वर्तमान प्रधान मंत्री गाँधी जी के आदर्शो पर चलने के कारण ही कुर्ता - पैजामा  पहनते है और न बोलते है न सुनते है और न देखते है। कहते है कि  एक ख़ामोशी हजारो बातो से बेहतर है ,लोग चाहे मोटा माल कमाए या पतला, चाहे कैग कुछ कहे या सुप्रीम कोर्ट मैं तो गाँधी वादी हूँ मैं न देखता हूँ न सुनता हूँ न बोलता हूँ।और करेंसी नोटों छपे गाँधी को अगर इस देश ने पिता माना है तो उसपर हस्ताक्षर तो मेरे ही है इसलिए देख लेना एक दिन लोग मुझे भी पापा (सरदारों को लोग वैसे भी पापा कहते है ) मानेंगे।इस देश  की जनता ऐसी है कि मौका पड़ने पर तो गधे को भी बाप बना लेती है तो फिर मैंने तो रुपये देने का वचन देकर हस्ताक्षर भी  किया है।
पता नहीं महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने कब और क्यों कहा था की सौं साल बाद यह कल्पना भी मुश्किल होगी की दुनिया मैं महात्मा गाँधी जैसा कोई व्यक्ति पैदा हुआ था। लेकिन  मुझे तो लगता है की अब से पचास साल बाद ही यह बात कल्पना के बाहर होगी की गाँधी के देश मैं पैदा हुए गांधियों ने देश का बेड़ा कैसे गर्क किया है। महात्मा गाँधी जहाँ अपनी सारी परिभाषा देश के अन्तिम आदमी को ध्यान में रखकर गढ़ते थे, उसी देश के सत्ता मैं बैठे महान नेताओं की कोशिश है की कोई भी लाभ उसको न पहुचे जिसके वोट ले कर यह यहाँ तक  पहुचे हैं।अगर ऐसा न होता तो नवीन जिंदल और मनोज जयसवाल जैसे लोगो को झूठे कागजो पर कोयले की खाने न बटती। रिलाएंस और भारती मित्तल के घरानों को सस्ते स्पेक्ट्रम न बटते।वालमार्ट जैसे उद्योगों को जिन्हें अमरीका की जनता और सरकार ने अस्वीकार कर दिया, को भारत मैं लाने  की वकालत गाँधी वादी काँग्रेसी नेता और सरकार न करती।  और देश की गरीब जनता का निवाला देश के अरबपतियो को मुहायिया न कराती। इस देश की अर्थव्यस्था गैस सिलिंडर की सब्सडी का बोझ इस लिए नहीं उठा सकती की  नकली गांधियो का बोझ इतना ज्यादा है कि उसी को उठाने मैं वह ख़राब हुई जा रही है।

मुझे देश के प्राचीन  शहर बनारस के बारे मैं कही गयी बात "रांड ,सांड सीढ़ी सन्यासी ,इनसे बचे तो सेवे काशी " याद आ रही हैजिसका सीधा अर्थ यह है की भ्रष्टाचार और देश को बेचने की तरकीबे ढूढने से फुर्सत मिले तो देश हित की बात सोंचे। नेता लोग भजन गा रहे है "मेरे तो गाँधी ही गाँधी ,केवल गाँधी ,बूढ़े गाँधी ,जवान गाँधी, जिन्दा गाँधी ,मुर्दा गाँधी दूसरो न कोई, जो नोट पर छपा हुआ वही मेरो सब कोई  "
गाँधी का  जन्म दिन मुबारक,और शास्त्री जी का भी  .

हर  भारतीय की  अंतिम इच्छा 
जिसदिन T20 का फाइनल मैच हो उसदिन किसी की मौत न हो ,क्योंकी भारत  में उस दिन कन्धा देने वाले नहीं  मिलेंगे।
 और 
 2अक्टूबर को घर में कोई पैदा न हो, नहीं  तो फिर चाहे वह लाल बहादुर शास्त्री की तरह का महान व्यक्ति  ही क्यों न हो जाये न जनता याद करेगी और न मीडिया।

अजय सिंह "एकल"

Sunday, August 5, 2012

वी दा पीपुल ऑफ़ इंडिया

प्रिय मित्रो ,
पिछले लगभग एक वर्ष से चलाये जा रहे अन्ना आन्दोलन का पटाक्षेप इस तरह से होगा ऐसा किसी ने सोचा  भी ना था. अन्ना आन्दोलन जो एक पवित्र जन आदोलन के रूप में जन मानस को उद्वेलीत करने में सफल रहा था,अब अपनी धार खो कर टीम अन्ना के लोगो की अति महत्वाकांछा का शिकार हो गया है.एक आन्दोलन जिसने पिछले साल सरकार को धर्म संकट में डाला, और एक बार तो ऐसा लगा की सरकार के ऊपर जनमानस का दबाव बन ने लगा है ,धीरे -धीरे आन्दोलन सरकार की राजनीत में उलझ गया और वही नेता लोग जो अभी तक यह कह कर आन्दोलनकारियों को उकसा रहे थे की पहले चुनाव लड़ो और फिर बात करो अन्ना के पार्टी बनाने की घोषणा से बहुत खुश हो गए क्यों की उनके उकसाने से अन्ना के आन्दोलनकारी खेल का मैदान बदलने को तैयार  हो गए. इन नेताओ  को पता है की जन आन्दोलन से वह  जीत नहीं सकते और चुनावी राजनीत में इनसे कौन जीतेगा.

ऐसा नहीं है की यह पहली बार हुआ है ,संघ के संस्थापक डा.हेडगेवार और सर संघ चालक प.पु.गुरु जी को भी संघ के संगठन की ताकत को देखते हुए इस जाल में फसाने की अनेक कोशिशे तत्कालीन कांग्रेस जनों ने की.लेकिन डा.हेडगेवार और गुरु जी की इस विषय पर   स्पष्ट दृष्टि और सोंच ने इसको राजनीत से दूर रख  संघ केवल समाज निर्माण का कार्य  करेगा ऐसा दिशा निर्देश दिया और ना तो खुद और ना ही  अपनी टीम के लोगो को राजनैतिक महत्वाकांछा का शिकार होने दिया. बाद में राजनीत में नैतिकता के नए-नए आयाम रचने हेतु अपने जीवन समर्पित कार्य कर्ता प.दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख जैसे लोगो को राजनीत में जाने का निर्देश दिया और अपने लिए चुनी हुई  राष्ट्र निर्माण की भूमिका को महत्वपूर्ण लक्ष्य मान पिछले  ८५ से अधिक वर्षो से इस दिशा में कार्य शील है. आश्चर्य, की टीम अन्ना ने इतिहास से कोई सीख नहीं ली इसलिए  शायद ही इन्हें कोई सम्मान जनक स्थान इतिहास में मिलेगा.और इस गलती के लिए वी दा पीपुल  ऑफ़ इंडिया शायद ही इन्हें  माफ़ करे .जिन्होंने जाने-अनजाने आम आदमी को आशा तो दिलाई लेकिन उसपर खरे नहीं उतर सके.       

१५ अगस्त १९३६ को छठे ओलम्पिक का  स्वर्ण मेडल जीत कर  भारतीय हाकी टीम ने बर्लिन में इतिहास रचा था. वहीँ  उसी दिन एक और इतिहास रचा टीम के  कैप्टन ध्यान चन्द ने.जिन्होंने जर्मनी के चांसलर हिटलर जो हाकी  का  मैच देखने आये थे और  जर्मन टीम पर  भारतीय द्वारा किये   गए  ८ गोलों में से ६ गोल  को दागने वाले कप्तान  ध्यान चन्द से प्रभावित हो कर उन्हें जर्मनी में रहने का निमंत्रण दिया.लेकिन  ध्यान चंद  ने बिना किसी द्विधा में पड़े   बड़ी विनम्रता के साथ हिटलर के निमंत्रण को  अश्वीकार कर इतिहास बना दिया. भारतीय हाकी तब से इतिहास ही   बना रही है  ओलम्पिक में मेडल न जीत कर. मगर  भारत सरकार ने भारतीय हाकी का सबसे   सुनहरा इतिहास लिख दिया है आप यदि आश्चर्य में पड़ गए हो तो आप को बता दे की अभी तक भारत का राष्ट्रीय खेल दर्जा प्राप्त हाकी  को भारत सरकार ने ऐसे किसी दर्जे से साफ़ मना कर दिया है.और यह  पता चला   आर.टी.आइ . के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में. पूरा समाचार पढने के लए यहाँ क्लिक करे .  

मैं तो कहता हूँ की सरकार की इस काम के लिए जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है. आखिर जब हम पदक जीत नहीं सकते तो खेल में मिल रही  राष्ट्रीय शर्म को तो ख़त्म कर ही सकते है हाकी को राष्ट्रीय खेल श्रेणी से हटाकर  .ऐसा इतिहास पहली बार नहीं लिखा गया है. करीब दो वर्ष पहले दायर   एक जन  हित याचिका के जवाब में सरकार ने बताया था की हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा नही है. पूरा समाचार पढने के लिए यहाँ क्लिक,करे.ये तो भला हो सूचना के अधिकार कानून और जन हित याचिका का जिसने हिंदुस्तान की जनता की आखें खोल दी नहीं तो हम इस ज्ञान के भरोसे ही अपने को ज्ञानी समझते रहते.साथ  ही सरकार को   एक सुझाव  भी है की भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय खेल और गाली -गलोज को राष्ट्रीय भाषा बनाये जाने पर विचार कर जल्द से जल्द घोषित  किया जाना चाहिए. केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश जब  पर्यावरण मंत्रालय में थे तो उन्होंने आशा व्यक्त की थी भारत भ्रष्टाचार के खेल में गोल्ड का प्रबल दावेदार होगा ,पता नहीं की   सरकार अपने मंत्रियो की क्यों नहीं सुनती.

भारत सरकार ने एक और इतिहास लिखा  एक नाकामयाब  वित्त मंत्री लेकिन कांग्रेस पार्टी के परम  वफादार  प्रणव दादा को भारत का  महामहिम यानि राष्ट्रपति बना कर. लेकिन इतना काफी नहीं था तो नाकामयाब बिजली मंत्री को गृह मंत्रालय देकर एक और इतिहास लिख दिया.राजनीत में अब आगे बढ़ने के लिए अपने काम में कुशल होने से ज्यादा वफादार होना आवश्यक हो गया है.और यदि आप कांग्रेस की राजनीत  में है तो केवल गाँधी परिवार का वफादार होने का पुरष्कार  क्या होगा  यह आपकी वफ़ादारी के वर्षो से तय होगा ना की क़ाबलियत से.प्रणव दा के राष्ट्रपति बनने पर २१ तोप की सलामी और.गृह मंत्री शिंदे का ४ बम धमाको द्वरा पुणे में आतंक वादियो द्वारा स्वागत भी तो इतिहास ही है.



और  अंत में 


 सोंच को बदलो, सितारे बदल जायेंगे 
नजर को बदलो  तो, नज़ारे  बदल जायेंगे 
मंजिले पाना हो तो ,किशतिया मत बदलना
दिशा को बदलो किनारे बदल जायेंगें 

अजय सिंह"एकल" 
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Thursday, July 26, 2012

वीर भूमि का वीर पुत्र, प्यादा से बादशाहत तक

दोस्तों , 

यह कहानी नहीं सच्ची बात है पोलतू जब पैदा हुआ तो करोड़ो में एक था,फिर  करीब पैतीस साल बाद जब राज्य सभा का मेम्बर बना तो  वह  हजारो में एक था,उसके बाद जब मन्त्री  बना तो सैकड़ो में एक था लेकिन वही  पोलतू यानि प्रणव मुखर्जी आज जब देश के तेरहवे राष्ट्रपति बने तो तेरह में एक है . अब यदि शपथ ग्रहण समारोह में दादा ने अपने भाषण जो बाते कही तो वह यदि काम कर दे तो निश्चित एक में एक हो जायेंगे। भूतो न भविष्यती ! (पूरा भाषण पढने के लिए क्लिक करे )मसलन दादा ने कहा की भूख मानवता के लिये  सबसे बड़ा अपमान है यानि देश में किसी को भूखा नही रहना चाहिए. विचार अच्छा है लेकिन दादा अपने  ने वित्त मंत्री काल  के  आठ सालो में जो कुछ किया उससे तो जिनको दो समय खाना मिल जाता था उनको भी मिलना बंद होने की स्थिती है।हालाकि वोह इसके लिए कभी गठबंधन को और कभी अन्तराष्ट्रीय स्थितियो को दोषी ठहराते रहे है।लेकिन सच्चाई यही है की गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है और आम आदमी त्राहि-त्राहि कर रहा है।रही आतंकवाद से लड़ने की बात तो उससे कांग्रेस की सरकारपिछले 65 सालो से  केवल फायदा उठाने की नीतियो का पालन कर रही है.अब दादा के पास आतंकियों को सजा देने का अधिकार प्राप्त है, अतः इसको कितने प्रभावी ढंग से लागू करवा पाएंगे यह तो समय ही बताएगा।तीसरी महत्वपूर्ण बात दादा ने की  भ्रष्टाचार मिटाने  की  है , तो अभी तक दादा जिस सरकार में नंबर दो पर थे,  उस में कम से कम 15 मंत्री ऐसे है जिन पर सिरिअस भ्रष्टचार के आरोप है और सरकार उनकी जाच तक करवाने को तैआर नहीं है।मिटाना  तो बहुत दूर की बात है . यह देखना दिलचस्प होगा की राष्ट्रपति रहते हुए भ्रस्टाचार के विरुद्ध किस तरह और कितने प्रभावी ढंग से इसको ख़त्म करने में सफल होते है।


आज ही यहीं नई दिल्ली में संसद भवन से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर  भ्रष्टाचार का विरोध करने के  लिए   टीम अन्ना भी अनशन पर बैठ गयी  है लेकिन बा मुश्किल दिन भर में कोई समाचार इस बारे में आया . शाम होते-होते केवल इतनी खबर बताई गयी की पिछली बार से कम लोग आये थे।दूसरी महत्व पूर्ण बात नारायण सामी ने यह कही की अब सरकार  इनसे कोई बात नहीं करेगी , लेकिन सबसे ज्यादा मजेदार वक्तव्य दिया सलमान खुर्शीद साहेब ने.उन्होंने कहा की यदि ज्यादा परेशानी हो अन्ना को तो वह  यूनाइटेड नेशन क्यों नहीं जाते .शायद उत्साह में जनाब यह भूल गए की  कश्मीर मसले पर नेहरु  एक बार यू एन जा चुके है.और नतीजा सामने है पिछले 60 बर्षो से देश उसकी कीमत चूका रहा है  .लेकिन इन मदहोस मंत्रियो को तो कोई बात समझ में मुश्किल से ही आती है.आखिर देश और उसकी जनता चुनाव के बाद इनकी आखरी वरीयता क्यों हो जाती है.
 प्रणव दा यानि भारत के राष्ट्रपति और अन्ना दोनों भ्रष्टाचार मिटने की बात कर रहे है एक भूखे पेट टेंट के नीचे और दूसरे शान दार लिमोजीन की सवारी करते हुए. आश्चर्य  की बात है दोनों का उद्देश्य एक है. देश से भ्रष्टाचार को मिटाना।

शान्ति सुंदर राजन और पिंकी प्रमाणिक जैसे एथलीटो के विवाद पर यह लोग भारत में जैसे मजबूर कर दिए गये उन्ही हालात  में दक्षिण अफ्रीका की एथलीट  सैमेन्या के लिए उसने तीसरे विश्व युद्ध  की धमकी तक  दे डाली और अंतताः सेमेन्या को वोह अधिकार मिल गया जिसकी वोह हक़ दार थी. लेकिन भारत ऐसा करने और कहने का साहस नहीं दिखा सका और इसके पदक विजेता एथलीट ईंट भट्टे पर काम करने  को मजबूर है .(पूरा समाचार पढने को यहाँ क्लिक  करे). ऐसा देश है मेरा .


अजयसिंह "एकल"

Saturday, July 21, 2012

ये क्या हुआ ?

प्रिय दोस्तों,
पिछले दिनों  फिल्मी दुनिया के  दो महान कलाकार रुस्तमे हिंद दारा सिंह  और राजेश खन्ना नहीं रहे .दारा सिंह  केवल फिल्मी कलाकार ही नहीं फ्री स्टाइल कुश्ती में  दुनिया में हिन्दुस्तान का नाम रोशन करने वाले प्रथम व्यक्ति थे।हिन्दुस्तान के सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय टी वी धारावाहिक में  वीर हनुमान का चरित्र निभा कर दारा सिंह जनता में अत्यंत प्रिय कलाकार भी हो गए और श्रद्धा के पात्र भी।


काका यानी  राजेश खन्ना जो हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार बने , लम्बी बीमारी के  बाद पार्थिव शरीर को छोड़ कर अपने पीछे  अच्छी और ख़राब लगने वाली तमाम  कहानिया छोड़ गए.अनेक अमर फिल्मो में अभिनय का लोहा मनवाने वाले राजेश ने जिन्दगी जितने उतार चढ़ाव देखे उतने उतार चढ़ाव बहुत कम लोगो की जिन्दगी में होते है .वोह राजेश जिनके सड़क पर निकलने पर जाम लगा करते थे आखरी दिनों में उसी राजेश से मिलने के लिए महीनो में कोई आता था  सिवाए डाक्टर  या सेवक के। एक सुपर स्टार से गुमनामी की जिन्दगी तक राजेश खन्ना का सफ़र अब सिर्फ यादो में सिमट जायेगा. एक ही जिदगी में उन्होंने बहुत कष्ट झेले. उन्होंने शोहरत की ऊंचाईयां भी छुई और उपेक्षा की सुनसान गलियो से भी गुजरे,लेकिन उन्होंने सबकुछ अपने सीने में छुपाये रखा. मगर एक अवार्ड फंक्सन में वोह बोल ही पड़े -इज्जते,शोहरते,चाहते,उल्फ़ते कोई भी चीज दुनिया में रहती नहीं.आज में जहाँ हूँ वहां कल कोई और था,ये भी एक दौर है वो भी एक दौर था।


सुना है एक बार फिर कांग्रेसियो ने फिर  राहुल को सरकार में आने के लिए उकसाया है,मैं  उकसाया इसलिए कह रहां हूँ क्योंकि समझाने  से  तो उन्होंने सरकार में कोई रोल किया नहीं .और संगठन के लिए के अबतक कुछ कर नहीं पाए. अब एक बार कांग्रेसी फिर राहुल के लिए बड़ा रोल माँग रहे है . अभी तक कांग्रेसियो को यह समझ नहीं आया जो आदमी आज तक अपनी शादी नहीं कर पाया, अपनी गर्ल फ्रेंड को हिंदुस्तान नहीं ला पाया उससे क्या रोल की उम्मीद की कांग्रेसियो ने लगा रखी है भगवान  जाने .लेकिन फिर भी राहुल के लिए बड़ा रोल चाहिए. राहुल ने भी कह दिया है अब कांग्रेस की अध्यक्षा यानी मम्मी जी रोल तय करेंगी की अमूल बेबी क्या रोल करेंगे और कितना बड़ा रोल करंगे।लेकिन  भारत की जनता को मालूम है  की राख  के ढेर मैं शोला है न चिंगारी हैं .

देश में एक नया बाबरी कांड होने  की भूमिका यही दिल्ली में निष्क्रिय केंद्र सरकार और शीला की राज्य सरकार  की नाक के नीचे सुभाष पार्क में बन गयी है , कोर्ट के आदेश के बावजूद नमाज पढने का सिलसिला जारी है . जमीन का मालिकाना हक़ और भारतीय पुरातत्व विभाग  की रिपोर्ट  अभी कोर्ट में आयी नहीं है किन्तु जबरदस्ती स्थान को 17वी  शताब्दी की अकबराबादी मस्जिद घोषित कर नमाज  पढवा कर देश मे एक नया विवाद देश के सेकुलरिस्टो ने खड़ा करवा कर अगले चुनाव की व्यूह रचना  शुरू करदी है. बहुसंख्य हिन्दू समाज को अपमानित करने  का कुचक्र कांग्रेस सरकार ने फिर शुरू कर दिया है .अब बात निकली है तो दूर तलक जायेगी . पूरा समाचार पढने के लिए यहाँ क्लिक   करे .


 और अंत में 

कान पर जूं रेंगने से, अब भला क्या फाएदा 
हर तरफ दाउद का घर ,हर तरफ अलकायदा ll 
अजय सिंह "एकल "

Saturday, June 23, 2012

गेट वेल सून

प्रिय मित्रो ,
कभी स्वास्थ्य लाभ की  शुभ कामना देने के लिए प्रयोग किया जाने वाले  शब्द अब यदि कोई किसी को कहता है तो स्वीकार करने वाले को यह सोचना पड़ जाता और जवाब में वोह पूछता है   "व्हाट   डू यू  मीन ". मुन्ना भाई  फिल्म मे इसका प्रयोग गाँधी गिरी के लिए किया गया था. यह स्थिति तब से और बिकट हो गयी  है जब से मोदी के लिए इस तरह के पोस्टर लगाये गएँ है . मुझे नहीं पता की मोदी के लिए ये पोस्टर क्यों और किसने लगाये है लेकिन जो समाचार आ रहे है उससे ऐसा लगता है की यह मोदी के द्वारा की जाने वाली कथित ज्यादितियो  के खिलाफ विरोधियो द्वारा उठाया गया एक  कदम है .

लेकिन यह सबकुछ  समझने के बाद अब मैं भी थोड़ा उलझन मैं हूँ किस किस को गेट वेल सून  कहूँ।सत्ता मैं बैठे हुए सारे  लोग ही बीमार नजर आ रहें हैं। और आम जनता इनकी हरकतों से बीमार होने के कगार पर है लेकिन सत्ताधीशो के कान पर जूँ ने भी रेंगने से मना कर दिया है .

सरकार ने एक आदेश निकाल कर फजूल खर्ची पर रोक लगाने का प्रस्ताव किया, जिसमे मंत्री और अधिकारिओ द्वारा की जाने वाली विदेश यात्राएँ  भी शामिल  थी साथ ही  जरुरी यात्राओ  के लिए 46 करोड़ का इंतजाम भी बजट  में किया गया था .एक  आर  टी  आइ  प्रार्थना पत्र के जवाब मैं सरकार ने बताया की अब तक दस गुना ज्यादा यानि लगभग  500 करोड़ इस मद में खर्च हुए है . इसमें करीब 2.43 करोड़ केवल  जनाब मोंटेक  सिंह अहलुवालिया ने खर्च किये है .यह भारत  सरकार  के वही साहेब  हैं जिनका कहना है यदि  कोई 29 रूपये रोज  कमाता है तो वह  गरीबी रेखा के ऊपर है और सरकार ऐसे लोगो को दी जाने वाली  सब्सिडी का खर्च नहीं उठा सकती है .इसलिए  पेट्रोल  के ,खाद  के गैस  के यानि गरीबो द्वारा इस्तेमाल  की  सारी  चीजो से  सब्सिडी हटा  दी जाये ,यदि महंगाई बढती है तो बढ़ जाये सरकार गरीबो का बोझ नहीं उठा सकती है . ठीक ही है  सरकार केमंत्री और  अधिकारिओ की विदेश यात्राओं  में  ही इतना ज्यादा खर्च हो जाता है तो फिर दोहरा खर्च सरकार थोड़ी उठाएगी । अब आम आदमी क्या करे वोह तो मोंटेक सिंह और उनका भार उठानेवाली सरकार  को  गेट वेल  सून की दुआ ही कर सकता है ताकी गूंगी बहरी सरकार  को आम आदमी की आवाज सुनाई  पड़ने लगे।

यूँ तो महामहिम बनने के बाद प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने अपने कार्य काल  मैं अनेक मानदंड स्थापित किये है  जो वर्षो तक लोगो द्वारा याद किये जायेंगे. किन्तु एक काम ऐसा भी किया जो दुनिया मैं केवल वाही करसकती थी . आप भी आश्चर्य मैं पड़ गए होंगे मेरी बात सुन कर . क्योकीं  उनके कार्यकाल में कोई काम हुआ हो येसा  याद नहीं आता तो फिर ऐसा क्या काम उन्होंने कर दिया  है जो दुनिया मैं केवल वही कर सकी .जी हां महामहिम ने अपने कार्यकाल मैं जिन 35 लोग, जिन्हें   फाँसी की सजा  विभिन्न अदालतों ने दी थी को क्षमा दान दिया उनमे एक बंदू  बाबूराव  तिड़के नामक  सख्स ऐसा है जिसकी मृत्यु 2007 मैं हो चुकी हैं उसे महामहिम ने फांसी  की सजा माफ़ कर  जीवन  दान दे दिया है।अब आपको समझ  आ गया होगा की ऐसा केवल वही करसकती है।यदि महामहिम को बुरा न लगे तो मैं भी उनके लिए भारत के दूसरे आम नागरिको के साथ  यही दुआ कर सकता हूँ की भगवान महामहिम को जल्द ठीक करे यानि गेट वेल  सून ताकि अगला एक महीना ठीक से गुजर जाये और   जब वह कुर्सी से हटे तो  भूत पूर्व कहलाये अभूतपूर्व नहीं।



एक  और मजेदार समाचार यह है की आम आदमी जिसको एक गैस सिलिंडर 21दिन मैं मिलता है और जिस पर भारत सरकार सब्सिडी ख़तम करने की बात लगभग हर महीने करती है उसका उपयोग सरकार और उसके मंत्री सबसे ज्यादा करते है . उदाहरण के लिए उपराष्ट्रपति साहेब ने साल मैं 171 सिलिंडर इस्तेमाल कर लिए यानि हर दूसरे दिन एक .भाजपा के शाहनवाज साहब ने  56 यानि हर हफ्ते एक और विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर साहिबा ने 79 हर पांचवें दिन एक .और ये हाल तो तब है जब डाक्टर ने सबकुछ खाने पीने  पर प्रतिबन्ध लगा रखा .भगवान जाने अगर ये लोग स्वस्थ हो जाये और आम आदमी की तरह दो टाइम  खाने -पीने लगे तो  न जाने यह कितने सिलंडर खर्च करेंगे. हम लोगों को यानि आम आदमी को उसकी जरुरत भर गैस सिलिन्डर मिलते रहे इसलिए  हम तो यही दुआ करेंगे और  कहेंगे डू नाट  गेट वेल  सून  नहीं तो हमारा चूल्हा कैसे जलेगा .यानि देश हित मैं इनका बीमार होना ही अच्छा .
और अन्त में 


                          अभी जमीर में थोड़ी सी  जान बाकी है 
जो था वोह सब  ख़त्म हुआ,
बस कुछ निशान  बाकी है 
अभी तो सिर्फ आप परेशान है मुझसे 
जबकि पूरा हिन्दोस्तान बाकी है 






अजय सिंह"एकल "