Monday, June 26, 2017

डा0 राजेन्द्र प्रसाद के जीवन के कुछ अंतिम दुखद पीड़ादायी वर्ष

डा0 राजेन्द्र प्रसाद के जीवन के कुछ अंतिम दुखद पीड़ादायी वर्ष

प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद एक बहुत ही विनम्र, सज्जन पुरुष और विद्वान व्यक्ति थे, संविधान के निर्माण में बाबा साहब आंबेडकर के साथ बहुत ज्यादा समय और सहयोग देते थे,,, नेहरू उन के प्रति दुराग्रह रखते थे

डा.राजेन्द्र प्रसाद की शख्सियत से पंडित नेहरु हमेशा अपने को असुरक्षित महसूस करते रहे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू को नीचा दिखाने का कोई अवसर भी हाथ से जाने नहीं दिया। 

हद तो तब हो गई जब 12 वर्षों तक रा्ष्ट्रपति रहने के बाद राजेन्द्र बाबू देश के राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद पटना जाकर रहने लगे, तो नेहरु ने उनके लिए वहां पर एक सरकारी आवास तक की व्यवस्था नहीं की, उनकी सेहत का ध्यान नहीं रखा गया। दिल्ली से पटना पहुंचने पर राजेन्द्र बाबू बिहार विद्यापीठ, सदाकत आश्रम के एक सीलन से भरे कमरे में रहने लगे। उनकी तबीयत पहले से खराब रहती थी, पटना जाकर ज्यादा खराब रहने लगी। वे दमा के रोगी थे, इसलिए सीलनभरे कमरे में रहने के बाद उनका दमा ज्यादा बढ़ गया। 

वहां उनसे मिलने के लिए श्री जयप्रकाश नारायण पहुंचे। वे उनकी हालत देखकर हिल गए। उस कमरे को देखकर जिसमें देश के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के पहले अध्यक्ष डा.राजेन्द्र प्रसाद रहते थे, उनकी आंखें नम हो गईं। उन्होंने उसके बाद उस सीलन भरे कमरे को अपने मित्रों और सहयोगियों से कहकर कामचलाउ रहने लायक करवाया। 

लेकिन, उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हो गई। 

क्या आप मानेंगे कि उनकी अंत्येष्टि में पंडित नेहरु ने शिरकत करना तक भी उचित नहीं समझा। वे उस दिन जयपुर में एक अपनी ‘‘तुलादान’’ करवाने जैसे एक मामूली से कार्यक्रम में चले गए। यही नहीं, उन्होंने राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल डा.संपूर्णानंद को राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में शामिल होने से रोका। 

नेहरु ने राजेन्द्र बाबू के उतराधिकारी डा. एस. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दे दी। लेकिन, डा0 राधाकृष्णन ने नेहरू के परामर्श को नहीं माना और वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि नेहरू किस कदर राजेन्द्र प्रसाद से दूरियां बनाकर रखते थे।

इस मार्मिक और सनसनीखेज तथ्य का खुलासा खुद डा.संपूर्णानंद ने किया है। संपूर्णानंद जी ने जब नेहरू को कहा कि वे पटना जाना चाहते हैं, राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में भाग लेने के लिए तो उन्होंने (नेहरु) संपूर्णानंद से कहा कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो। इसके बाद डा. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया। हालांकि, उनके मन में हमेशा यह मलाल रहा कि वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं कर सके। वे राजेन्द्र बाबू का बहुत सम्मान करते थे। 

डॉक्टर सम्पूर्णानंद ने राजेन्द बाबू के सहयोगी प्रमोद पारिजात शास्त्री को लिखे गए पत्र में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए लिखा था कि ‘‘घोर आश्चर्य हुआ कि बिहार के जो प्रमुख लोग दिल्ली में थे उनमें से भी कोई पटना नहीं गया, (किसके डर से?)

ये बात भी अब सबको मालूम है कि पटना में डा. राजेन्द्र बाबू को उत्तम क्या मामूली स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं मिलीं। उनके साथ बेहद बेरुखी वाला व्यवहार होता रहा, मानो सबकुछ केन्द्र के निर्देश पर हो रहा हो। उन्हें कफ की खासी शिकायत रहती थी। उनकी कफ की शिकायत को दूर करने के लिए पटना मेडिकल कालेज में एक मशीन थी कफ निकालने वाली। उसे भी केन्द्र के निर्देश पर मुख्यमंत्री ने राजेन्द्र बाबू के कमरे से निकालकर वापस पटना मेडिकल काॅलेज भेज दिया गया। जिस दिन कफ निकालने की मशीन वापस मंगाई गई उसके दो दिन बाद ही राजेन्द बाबू खाँसते-खाँसते चल बसे, यानी राजेन्द्र बाबू को मारने का पूरा और पुख्ता इंतजाम किया गया था. कफ निकालने वाली मशीन वापस लेने की बात तो अखबारों में भी आ गई हैं.

दरअसल नेहरु अपने को राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष बहुत बौना महसूस करते थे। उनमें इस कारण से बड़ी हीन भावना पैदा हो गई थी और वे उनसे छतीस का आंकड़ा रखते थे। वे डा. राजेन्द्र प्रसाद को किसी न किसी तरह से आदेश देने की मुद्रा में रहते थे, जिसे राजेन्द्र बाबू मुस्कुराकर टाल दिया करते थे। 

नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद से सोमनाथ मंदिर का 1951 में उदघाटन न करने का आग्रह किया था। उनका तर्क था कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उदघाटन से बचना चाहिए। हालांकि, नेहरू के आग्रह को न मानते हुए डा. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना की. डा. राजेन्द्र प्रसाद मानते थे कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अपने संस्कारों से दूर होना या धर्मविरोधी होना नहीं हो सकता।’’ सोमनाथ मंदिर के उदघाटन के वक्त डा. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन नास्तिक राष्ट्र नहीं है. डा. राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि उन्हें सभी धर्मों के प्रति बराबर और सार्वजनिक सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए। एक तरफ तो नेहरु डा. राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर में जाने से मना करते रहे लेकिन, दूसरी तरफ वे स्वयं 1956 के इलाहाबाद में हुए कुंभ मेले में डुबकी लगाने चले गए. बताते चलें कि नेहरु के वहां अचानक पहुँच जाने से कुंभ में अव्यवस्था फैली और भारी भगदड़ में करीब 800 लोग मारे गए।
हिन्दू कोड बिल पर भी राजेन्द्र प्रसाद, नेहरु से अलग राय रखते थे. जब पंडित जवाहर लाल नेहरू हिन्दुओं के पारिवारिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए हिंदू कोड बिल लाने की कोशिश में थे, तब डा.राजेंद्र प्रसाद इसका खुलकर विरोध कर रहे थे। डा. राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि लोगों के जीवन और संस्कृति को प्रभावित करने वाले कानून न बनाये जायें। दरअसल जवाहर लाल नेहरू चाहते ही नहीं थे कि डा. राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बनें। उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए उन्होंने ‘‘झूठ’’ तक का सहारा लिया था। नेहरु ने 10 सितंबर, 1949 को डा. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी.राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना सबसे बेहतर होंगा। नेहरू ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था, उससे डा.राजेंद्र प्रसाद को घोर कष्ट हुआ और उन्होंने पत्र की एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। पटेल उस वक्त बम्बई में थे। कहते हैं कि सरदार पटेल उस पत्र को पढ़ कर सन्न थे, क्योंकि, उनकी इस बारे में नेहरू से कोई चर्चा नहीं हुई थी कि राजाजी (राजगोपालाचारी) या डा. राजेंद्र प्रसाद में से किसे राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। न ही उन्होंने नेहरू के साथ मिलकर यह तय किया था कि राजाजी राष्ट्रपति पद के लिए उनकी पसंद के उम्मीदवार होंगे। यह बात उन्होंने राजेन्द्र बाबू को बताई। इसके बाद डा. राजेंद्र प्रसाद ने 11 सितंबर,1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘‘पार्टी में उनकी (डा0 राजेन्द प्रसाद की) जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वे बेहतर व्यवहार के पात्र हैं। नेहरू को जब यह पत्र मिला तो उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया। अपनी फजीहत कराने के बदले उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करने का निर्णय लिया।
नेहरू यह भी नहीं चाहते थे कि हालात उनके नियंत्रण से बाहर हों और इसलिए ऐसा बताते हैं कि उन्होंने इस संबंध में रातभर जाग कर डा. राजेन्द्र प्रसाद को जवाब लिखा। डा. राजेन्द्र बाबू, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के विरोध के बावजूद दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुने गए थे। बेशक, नेहरू सी राजगोपालाचारी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन सरदार पटेल और कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं की राय डा. राजेंद्र प्रसाद के हक में थी। आखिर नेहरू को कांग्रेस नेताओं सर्वानुमति की बात माननी ही पड़ी और राष्ट्रपति के तौर पर डा. राजेन्द्र प्रसाद को ही अपना समर्थन देना पड़ा।

जवाहर लाल नेहरू और डा. राजेंद्र प्रसाद में वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद बराबर बने रहे थे। ये मतभेद शुरू से ही थे, लेकिन 1950 से 1962 तक राजेन्द्र बाबू के राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्यादा मुखर और सार्वजनिक हो गए। नेहरु पश्चिमी सभ्यता के कायल थे जबकि राजेंद्र प्रसाद भारतीय सभ्यता देश के एकता का मूल तत्व मानते थे। राजेन्द्र बाबू को देश के गांवों में जाना पसंद था, वहीं नेहरु लन्दन और पेरिस में चले जाते थे। पेरिस के धुले कपड़े तक पहनते थे। 

सरदार पटेल भी भारतीय सभ्यता के पूर्णतया पक्षधर थे। इसी कारण सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद में खासी घनिष्ठता थी। सोमनाथ मंदिर मुद्दे पर डा. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल ने एक जुट होकर कहा की यह भारतीय अस्मिता का केंद्र है इसका निर्माण होना ही चाहिए। लंबे समय तक देश के राष्ट्रपति रहने के बाद भी राजेन्द्र बाबू ने कभी भी अपने किसी परिवार के सदस्य को न पोषित किया और न लाभान्वित किया।

 हालांकि नेहरु इसके ठीक विपरीत थे। उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी और बहन विजयालक्ष्मी पंडित को सत्ता की रेवडि़यां खुलकर बांटीं। सारे दूर-दराज के रिश्तेदारों को राजदूत, गवर्नर, जज बनाया। राजेन्द्र प्रसाद नेहरू की तिब्बत नीति और हिन्दी-चीनी भाई-भाई की नीति से असहमत थे। नेहरु की चीन नीति के कारण भारत 1962 की जंग में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। 

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे थे हमारे-आपके पंडित जवाहरलाल नेहरू... स्वाभाविक है कि उनकी पीढियाँ और पुरखे भी ऐसे ही षडयंत्रकारी, तानाशाही किस्म की मानसिकता के और हिन्दू द्वेषी हैं. 
 
आलेख सोशल मीडिया से लिया गया है. 
 

Saturday, June 24, 2017

मीरा ने फिर पिया जहर

दोस्तों ,
अगर जीत पक्की हो तो साथ  वाले अनगिनत होते है। क्योंकि जीत के बाद जीते हुये आदमी से कुछ लाभ न भी हो तो कम से  कम इज्जत तो बढ़ती ही  है। लेकिन जब हार पक्की हो तो वोह कौन लोग है जो आपका साथ देंगे ?  अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है, यह वह लोग है जो आपके ऊपर दांव लगाएंगे और दांव लगाने का श्रेय लेकर
जिसके ऊपर दांव लगाएंगे उसे तो छोड़ देंगे जहर पीने के लिए और खुद उसका  चाहे व्यापारिक लाभ हो या सामाजिक लाभ उठाने में न तो गलती करेंगे न देर। ऐसा नहीं है की यह पहली बार हो रहा है।

 महाभारत के युद्ध में दुर्योधन की हार निश्चित जानते हुए भी कर्ण ने उसका साथ नहीं छोड़ा और मृत्युपर्यन्त युद्ध करता रहा। कर्ण  ने अपने वचन को निभाने के लिए अपना सबकुछ त्याग कर दोस्ती की मिसाल कायम की। दूसरी ओर दुर्योधन ने जितने भी एहसान कर्ण  पर किये थे वह सब  चुकता करवा कर ही दम  लिया। 



वैसे ही राष्ट्रपति के चुनाव में राम नाथ कोविंद की जीत सुनिश्चित है जानकार भी मीरा कुमार ने कांग्रेस और अन्य दलों के संगठन यू पी ये के आग्रह पर राष्ट्रपति का चुनाव  लड़ने का आग्रह स्वीकार कर अपने ऊपर कांग्रेस पार्टी और गाँधी परिवार के द्वारा किये गए सभी ऐहसानो का बदला चुका  दिया है। कांग्रेस को
पता है की अगले कुछ सालो सत्ता में वापसी मुश्किल है और जब वापसी होगी तब तक सत्ता में नए दावेदार भी आ चुके होंगे। इसलिए इस समय तो ज्यादा ज्यादा यही हो सकता है की जिन लोगो पर एहसान है उनका हिसाब कर लिया जाये। लेकिन तारीफ करनी होगी मीरा कुमार की जिन्होंने सब जानते समझते एक बार फिर जहर पी लिया ,पिछले जन्म  में गोविन्द के लिए और इस जन्म  में कोविंद के लिए।



                                                                             अंत में 
असली दोस्‍त वे नहीं होते जो कामयाबी में आपके साथ होते हैं, 
बल्कि वे होते हैं, जो मुश्‍किल में आपके साथ  होते हैं।

अजय सिंह "जे एस के "
 

 
 
 

Sunday, April 2, 2017

जूते की अभिलाषा



चाह नही मैं विश्व सुंदरी के
पग में पहना जाऊँ,

चाह नही दूल्हे के पग में रह
साली को ललचाऊँ।

चाह नहीं धनिकों के चरणो में, 
हे हरि डाला जाऊँ,

ए.सी. में कालीन पे घूमूं
और भाग्य पर इठलाऊ।

बस निकाल कर मुझे पैर से 
उस मुंह पर तुम देना फेंक,

जिस मुँह से भी निकल रहे हो 
देशद्रोह के शब्द अनेक !

 
                जय हिंद, जय भारत.

जीवन की सीख



मौन प्रार्थना जल्दी पहुँचती हैं गुरु तक 
क्यों की मुक्त होतीं हैं शब्दों के बोझ से।


सलाह गलत हो सकती है,   साथ नहीं"
 
मेरे व्यक्तित्व और मेरे व्यवहार को
कभी मत मिलाईयेगा !!
क्योंकि मेरा व्यक्तिव मै हूँ और मेरा
व्यवहार आप पर निर्भर करता है.!
 
 
 हर नजर में मुमकिन नहीं है, बेगुनाह रहना,

वादा ये करें की खुद,की नजर में बेदाग रहें।
 
यहाँ सब खामोश हैं, कोई आवाज़ नहीं करता, 
बोल के सच, कोई किसी को नाराज़ नहीं करता..!!
 

जीवन का सच


 

मैं गिरा,और न मेरी उम्मीदों के मीनार गिरे..! 

पर.....

लोग मुझे गिराने मे कई बार गिरे...!!


सवाल जहर का नहीं था वो तो मैं पी गया,

तकलीफ लोगों को तब हुई, जब मैं जी गया।

 

  कौन कहता हैं साहब,की नेचर और सिग्नेचर कभी बदलता नही।।_

साहब,, बस एक चोट की दरकार हैं।।_

अगर ऊँगली पे लगी,, तो सिग्नेचर बदल जाएगा।।

और दिल पे लगी,, तो नेचर बदल जाएगा।

 

 

 
 
 
 
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जीवन की सीख




जो आनंद अपनी छोटी पहचान बनाने में है,
वो किसी बड़े की परछाई बनने में नहीं है.
 
 बेहिसाब हसरतें भी पालिए,
मगर जो मिला है उसे पहले सम्भालिए.
 
बेवजह अच्छे बनो,
वजह से तो बहुत बनते हैं।
 
होने वाले ख़ुद ही अपने हो जाते हैं,
किसी को कहकर,अपना बनाया नहीं जाता.
 
 टूटा हुआ फूल खुश्बू दे जाता है,
बिता हुआ पल यादें दे जाता है.
हर शख्स का अपना अंदाज़ होता है,
कोई ज़िंदगी मे प्यार,तो कोई प्यार मे ज़िंदगी दे जाता है.
 
 एक जैसी ही होती हैं ये चिनगारियां,
कोई दीप जलाती हैं तो कोई आशियाँ.
मत पहनाओ इन्हें शर्तों का लिबास,
रिश्ते तो बिंदास ही अच्छे लगते हैं.
 
 
 तालाब सदा कुँऐ से कइ गुना बड़ा होता है,
फिर भी लोग कुँऐ का पानी पीते थे,
क्योंकि कुँऐ में गहराई और शुद्धता होती है.
 
 
मनुष्य का बड़ा होना अच्छी बात है,
लेकिन उसके व्यक्तित्व में गहराई और विचारों में शुद्धता होनी चाहीए.

कुछ दर्द होना ही चाहिए जिंदगी में,
ज़िंदा होने का अनुमान बना रहता है.
 
 


 

Friday, January 13, 2017

पाप का महत्त्व




 स्वर्गीय भारत भूषण जी की लिखी पाप के महत्व को समझती  हुई कविता

न जन्म लेता अगर कहीं में ,धरा बनी ये मसान होती,
न मंदिरों में मृदङ्ग  बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.
मुझे सुलाते रहे मसीहा ,मुझे मिटाने रसूल आये,
कभी सुनी मोहनी मुरलिया,कभी अयोध्या बजे बधाये,
मुझे दुआ दो बुला रहा हूँ हज़ार गौतम,हज़ार गाँधी,
बना दिए देवता अनेकों ,मुझे मगर न तुम पूज पाए,
मुझे रुलाकर न स्रष्टि हंसती,न सुर ,तुलसी , कबीर आते,
न क्रास का ये निशाँ होता , न पाक-पावन कुरान होती,
 न जन्म लेता अगर कहीं में ,धरा बनी ये मसान होती,
न मंदिरों में मृदङ्ग  बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.

बुरा बता लें मुझे  मोलवी,की दें पुरोहित हज़ार गली,
सभी चित्र या  शकल बना लें बहुत भयानक ,कुरूप , काली,
मगर ये ही जब मिलें अकेले सवाल पूछो यही कहेंगे,
की पाप ही ज़िन्दगी हमारी ,वही ईद है वही दीवाली,
न सीचता अगर में जड़ों को कभी जहां में पुण्य न फलता,
न रूप का यूँ बखान होता , न प्यास इतनी जवान होती.
न जन्म लेता अगर कहीं में ,धरा बनी ये मसान होती,
न मंदिरों में मृदङ्ग  बजते,न मस्जिदों में अज़ान होती.

अजय सिंह  


Saturday, December 31, 2016

महात्मा की सच्चाई

एक संस्मरण रजनीश ओशो के प्रवचन से।महात्मा गांधी और ओशो के सम्बन्ध (ओशो की जुबानी-1)

मैं अभी भी उस रेलगाड़ी को देख सकता हूं जिसमें गांधी सफर कर रहे थे। वे सदा तीसरे

दर्जे, थर्ड क्लास में सफर करते थे .

परंतु उनका यह थर्ड क्लास फ़र्स्ट क्लास,प्रथम श्रेणी से भी अधिक अच्छा था। साठ सीटों के डिब्बे में वे  उनकी पत्नी और उनका सैक्रेटरी—केवल यह तीन लोग थे। सारा डिब्बा आरक्षित था।और वह कोई साधारण प्रथम श्रेणी का डिब्बा नहीं था क्योंकि ऐसा डिब्बा तो दुबारा मैंने कभी देखा ही नहीं। वह तो प्रथम श्रेणी का डिब्बा ही रहा होगा। और सिर्फ प्रथम श्रेणी का ही नहीं बल्कि विशेष प्रथम श्रेणी का, सिर्फ उस पर ‘’तृतीय श्रेणी’’ लिख दिया

गया था और तृतीय श्रेणी बन गया था। और इस प्रकार महात्मा गांधी के सिद्धांत और उनके दर्शन की रक्षा हो गई थी।

उस समय मैं केवल दस साल का था। मेरी मां यानी मेरी नानी ने मुझे तीन रूपये देते हुए कहा कि स्टेशन बहुत दूर है और तुम भोजन के समय तक शायद वापस घर न पहुच सको। और इन गाड़ियों का कोई भरोसा नहीं है। बारह-तेरह घंटे देर से आना तो इनके लिए आम बात है। इसलिए ये तीन रूपये अपने पास रख लो। भारत में उन दिनों तीन रुपयों को तो एक अच्छा खासा खजाना माना जाता था। तीन रुपयों में तो एक आदमी तीन महीने तक अच्छी तरह से रह सकता था।

नानी ने मेरे लिए एक बहुत सुंदर कुर्ता बनवाया था। उनको मालूम था कि मुझे लंबी पतलून अच्छी नहीं लगती । ज्यादा से ज्यादा मैं कुरता-पायजामा पहन लेता था। कुर्ता मुझे बहुत प्रिय था, और पायजामा तो धीरे-धीरे गायब हो गया केवल लंबा कुर्ता ही बचा।

लोगों ने शरीर को दो हिस्सों में बाट रखा है। एक ऊपर का हिस्सा और दूसरा नीचे का हिस्सा। और इन दोनों के लिए कपड़े भी अलग- अलग तरह के बनाए है। शरीर के ऊपरी हिस्से के लिए तो सुंदर-सुंदर कपडे बनाए है और निचले शरीर को तो ढाँक लेने का प्रयास किया गया है बस।

नानी ने मेरे लिए बहुत सुंदर कुर्ता बनवाया था। उन दिनों बहुत गर्मी थी। मध्य-भारत के उस अंचल में बहुत       अधिक गर्मी पड़ती है। दिन-रात लू चलती रहती है, उस के थपेड़ों से मुंह और नाक को बहुत परेशानी होती। बस केवल आधी रात को लोगों के कुछ राहत मिलती। 

उस समय सोने की मोहरें गायब हो गई थीं और चाँदी के रुपयों का प्रचलन था। अब उस मलमल के कुरते की जेब के लिए चाँदी के तीन रूपये बहुत भारी थे—जेब लटक रही थी। ऐसा मैं क्यों कह रहा हूं, क्योंकि इसको जाने बिना आप लोग उस बात को समझ नहीं सकोगे जो मैं कहने जा रहा हूं।

गाड़ी हमेशा की तरह तेरह घंटे लेट आई। बाकीसभी लोग चले गए थे। सिवाय मेरे। तूम तो जानते है कि मैं कितना जिद्दी हूं। स्टेशन मास्टर ने भी मुझसे कहा: बेटा तुम्हारा तो कोई जवाब नहीं है। सब लोग चले गए हैं किंतु

तुम तो शायद रात को भी यहीं पर ठहरने के लिए तैयार हो। और अभी भी गाड़ी के आने को कुछ पता नहीं है। और तुम सुबह चार बजे से उसका इंतजार कर रहे हो।

स्टेशन पर चार बजे पहुंचने के लिए मुझे अपने घर से आधीरात को ही चलना पडा था। फिर भी मुझे अपने उन तीन रुपयों को खर्च ने की जरूरत नहीं पड़ी थी क्योंकि स्टेशन पर जितने लोग थेसब कुछ न कुछ लाए थे और वे सब इस छोटे लड़के की देखभाल कर रहे थे। वे मुझे फल, मिठाइयोंऔर मेवा खिला रहे थे। सो मुझे भूख लगने का कोई सवाल ही नहीं था। आखिर जब गाड़ी आई तो बस एक दस बरस का लड़का स्टेशन मास्टर के साथ वहां खड़ा था।

स्टेशन मास्टर ने महात्मा गांधी से मुझे मिलवाते हुए कहा: इसे केवल छोटा सा लड़का ही मत समझिए। दिन भर मैंने इसे देखा है और क विषयों पर इससे चर्चा की है, क्योंकि और कोई काम तो था नहीं। बहुत लोग आए थे और

बहुत पहले चले गए, किंतु यह लड़का कहीं गया नहीं। सुबह से आपकी गाड़ी का इंतजार कररहा है। मैं इसका आदर करता हूं, क्योंकि मुझे पता है कि अगर गाड़ी न आती तो यह यहां से जानेवाला नहीं था। यह यहीं पर रहता। आस्तित्व के अंत तक यह यहीं रहता। अगर ट्रेन न आती तो यह कभी नहीं जाता।

महात्मा गांधी बूढे आदमी थे। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मुझे देखा। परंतु वे मेरी और देखने के बजाए मेरी जेब की और देख रहे थे।बस उनकी इसी बात ने मुझे उनसे हमेशा के लिए विरक्त कर दिया। उन्होंने कहा: यह क्या है?

, मैंने कहा: तीन रूपये।

इस पर तुरंत उन्होंने मुझसे कहा, इनको दान कर दो। उनके पास एक दान पेटी होती थी,जिसमें सूराख बना हुआ था। दान में दिए जाने वाले पैसों को उस सूराख से पेटी के भीतर डालदिया जाता था। चाबी तो उनके पास रहती थी। बाद में वे उसे खोल कर उसमें से पैसे निकाल लेते थे।मैंने कहा: अगर आप में हिम्मत है तो आप इन्हें ले ले।

लीजिए,जेब भी यहां है रूपये भी यहां है, लेकिन क्या मैं आप से पूछ सकता हूं कि ये रूपये आप किस लिए इक्कठा कर रहे है। उन्होंने कहा: गरीबों के लिए। मैंने कहा: तब यह बिलकुल ठीक है। तब मैंने स्वयं उन तीन रुपयों को उस पेटी में डाल दिया, लेकिन आश्चर्य तो उन्हें होना था क्योंकि  जब मै वहां से चला तो उस पेटी को उठा कर चल पडा।

उन्होंने कहा: अरे, यह तुम क्या कर रहे हो। यह तो गरीबों के लिए हे। मैंने उत्तर दिया: हां, मैंने सुन लिया है, आपको फिर से कहने की जरूरत नहीं है। मैं भी तो गरीबों के लिए ही ले जा रहा हूं। मेरे गांव मेंबहुत से गरीब है। अब मेहरबानी करके मुझे इसकी चाबी दे दीजिए, नहीं तो इसको खोलने के लिए मुझे किसी चोर को बुलाना पड़ेगा। क्योंकि चोर ही बंद ताले को खोलने की कला जानते है।

उन्होंने कहा: यह अजीब बात है….उन्होंने अपने सैक्रेटरी की और देखा। वह गूंगा बना था जैसे की सैक्रेटरी होते है। अन्यथा वे सैक्रेटरी ही क्यों बने? उन्होंने कस्तूरबा, अपनी पत्नी की और देखा। कस्तूरबा ने उनसे कहा: अच्छा हुआ, अब आपको अपने बराबरी का व्यक्ति मिला। आप सबको बेवकूफ बनाते हो, अब यह लड़काआपका बक्सा ही उठा कर ले जा रहा है। अच्छा हुआ। बहुत अच्छा हुआ,मैं इस बक्से कोदेख-देख कर तंग आ गई हूं।

परंतु मुझे उन पर दया आ गई और मैंने उस पेटी को वहीं पर छोड़ते हुए कहा: आप सबसे गरीब मालूम

होते है। आपके सैक्रेटरी को तो कोई अक्ल नहीं है। न आपकी पत्नी का आपसे कोई प्रेम दिखाई देता है। मैं यह बक्सा नहीं ले जा सकता,इसे आप अपने पास ही रखिए। परंतु इतना याद रखिए कि मैं तो आया था एक महात्मा से मिलने परंतु उस छोटी सी उम्र में भी महात्मा गांधी मुझे व्यवसायी ही लगे।

व्हाटस अप पर प्राप्त 

अजय सिंह "जे एस के "

मैखाने मे आऊंगा मगर

 

मैखाने मे आऊंगा मगर... 

पिऊंगा नही साकी... 

ये शराब मेरा गम मिटाने की औकात नही रखती......


"खामोश बैठें तो लोग कहते हैं उदासी अच्छी नहीं,

 ज़रा सा हँस लें तो मुस्कुराने की वजह पूछ लेते हैं" ! 


हद-ए-शहर से निकली तो गाँव गाँव चली। 

कुछ यादें मेरे संग पांव पांव चली। 

सफ़र जो धूप का किया तो तजुर्बा हुआ। 

वो जिंदगी ही क्या जो छाँव छाँव चली।।.... 


तू होश में थी फिर भी हमें पहचान न पायी; 

एक हम है कि पी कर भी तेरा नाम लेते रहे! 


हजार जवाबों से अच्छी है खामोशी, 

ना जाने कितने सवालों की आबरू रखती है ! 


"सूरज ढला तो कद से ऊँचे हो गए साये, 

कभी पैरों से रौंदी थी, यहीं परछाइयां हमने.. 


काग़ज़ की कश्ती थी पानी का किनारा था। 

खेलने की मस्ती थी ये दिल अवारा था। 

कहाँ आ गए इस समझदारी के दलदल में। 

वो नादान बचपन भी कितना प्यारा था ...! 


जमीन छुपाने के लिए गगन होता है.. 

दिल छुपाने के लिए बदन होता है.... 

शायद मरने के बाद भी छुपाये जाते है ग़म....

इस लिए हर लाश पे कफ़न होता है 


 मेरे लफ़्ज़ों से न कर मेरे क़िरदार का फ़ैसला ll 

तेरा वज़ूद मिट जायेगा मेरी हकीक़त ढूंढ़ते ढूंढ़ते l


कब्र की मिट्टी हाथ में लिए सोच रहा हूं, 

लोग मरते हैं तो गु़रूर कहाँ जाता है. 


किनारे पर तैरने वाली लाश को देखकर ये समझ आया… 

बोझ शरीर का नही साँसों का था..!! 


 यह जो मेरी क़ब्र पर रोते हैं, 

अभी ऊठ जाऊँ, तो ये जीने न दे..!! 

 

मेरे पीठ पर जो जख्म़ है, वो अपनों की निशानी हैं, 

वरना सीना तो आज भी दुश्मनो के इंतजार मे बैठा है.. 


 जरुरत तोड देती है इन्सान के घमंड को.. 

न होती मजबूरी तो हर बंदा खुदा होता.!!! 


 जिसको गलत तस्वीर दिखाई, 

उसको ही बस खुश रख पाया.

 जिसके सामने आईना रक्खा, 

हर शख्स वो मुझसे रूठ गया..!! 


इस जमाने मे वफा की तलाश ना कर 

गाफि़ल वो वक्त और था.. 

जब मकान कच्चे और लोग सच्चे होते थे..!!! 

व्हाटअप से प्राप्त 

अजय सिंह "जे एस के "

बैसवारा के श्री राव रामबख्श सिंह का बलिदान


 मित्रों,

श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या और लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) का निकटवर्ती क्षेत्र सदा से अवध कहलाता है। इसी अवध में उन्नाव जनपद का कुछ क्षेत्र बैसवारा कहा जाता है। इसी बैसवारा की वीरभूमि में राव रामबख्श सिंह का जन्म हुआ, जिन्होंने मातृभूमि को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अन्तिम दम तक संघर्ष किया और फिर हँसते हुए फाँसी का फन्दा चूम लिया।

राव रामबख्श सिंह बैसवारा के संस्थापक राजा त्रिलोक चन्द्र की 16वीं पीढ़ी में जन्मे थे। रामबख्श सिंह ने 1840 में बैसवारा क्षेत्र की ही एक रियासत डौडियाखेड़ा का राज्य सँभाला। यह वह समय था, जब अंग्रेज छल-बल से अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। इसी के साथ स्वाधीनता संग्राम के लिए रानी लक्ष्मीबाई, बहादुरशाह जफर, नाना साहब, तात्या टोपे आदि के नेतृत्व में लोग संगठित भी हो रहे थे। राव साहब भी इस अभियान में जुड़ गये।

31 मई, 1857 को एक साथ अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक छावनियों में हल्ला बोलना था; पर दुर्भाग्यवश समय से पहले ही विस्फोट हो गया, जिससे अंग्रेज सतर्क हो गये। कानपुर पर नानासाहब के अधिकार के बाद वहाँ से भागे 13 अंग्रेज बक्सर में गंगा के किनारे स्थित एक शिव मन्दिर में छिप गये। 

वहाँ के ठाकुर यदुनाथ सिंह ने अंग्रेजों से कहा कि वे बाहर आ जायें, तो उन्हें सुरक्षा दी जाएगी; पर अंग्रेज छल से बाज नहीं आये। उन्होंने गोली चला दी, जिससे यदुनाथ सिंह वहीं मारे गये। क्रोधित होकर लोगों ने मन्दिर को सूखी घास से ढककर आग लगा दी। इसमें दस अंग्रेज जल मरे; पर तीन गंगा में कूद गये और किसी तरह गहरौली, मौरावाँ होते हुए लखनऊ आ गये।*

लखनऊ में अंग्रेज अधिकारियों को जब यह वृत्तान्त पता लगा, तो उन्होंने मई 1858 में सर होप ग्राण्ट के नेतृत्व में एक बड़ी फौज बैसवारा के दमन के लिए भेज दी। इस फौज ने पुरवा, पश्चिम गाँव, निहस्था, बिहार और सेमरी को रौंदते हुए दिसम्बर 1858 में राव रामबख्श सिंह के डौडियाखेड़ा दुर्ग को घेर लिया। राव साहब ने सम्पूर्ण क्षमता के साथ युद्ध किया; पर अंग्रेजों की सामरिक शक्ति अधिक होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा।

इसके बाद भी राव साहब गुरिल्ला पद्धति से अंग्रेजों को छकाते रहे; पर उनके कुछ परिचितों ने अंग्रेजों द्वारा दिये गये चाँदी के टुकड़ों के बदले अपनी देशनिष्ठा गिरवी रख दी। इनमें एक था उनका नौकर चन्दी केवट। उसकी सूचना पर अंग्रेजों ने राव साहब को काशी में गिरफ्तार कर लिया।*

रायबरेली के तत्कालीन जज डब्ल्यू. ग्लाइन के सामने न्याय का नाटक खेला गया। मौरावाँ के देशद्रोही चन्दनलाल खत्री व दिग्विजय सिंह की गवाही पर राव साहब को मृत्युदंड दिया गया। अंग्रेज अधिकारी बैसवारा तथा सम्पूर्ण अवध में अपना आतंक फैलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बक्सर के उसी मन्दिर में स्थित वटवृक्ष पर 28 दिसम्बर, 1861 को राव रामबख्श सिंह को फाँसी दी, जहाँ दस अंग्रेजों को जलाया गया था। राव साहब डौडियाखेड़ा के कामेश्वर महादेव तथा बक्सर की माँ चन्द्रिका देवी के उपासक थे। इन दोनों का ही प्रताप था कि फाँसी की रस्सी दो बार टूट गयी। 

राव रामबख्श सिंह भले ही चले गये; पर डौडियाखेड़ा दुर्ग एक तीर्थ बन गया, जहाँ भरने वाले मेले में अवध के लोकगायक आज भी गाते हैं*  - 

अवध मा राव भये मरदाना।
 
अजय सिंह "जे एस के "