Sunday, September 25, 2016

क्या हम सब चोर है ?


दोस्तों ,

क्षमा कीजिये में आप की शान में गुस्ताखी नहीं कर रहा हूँ बल्कि १९९५ में आयी एक फिल्म का जिक्र कर रहा हूँ। और जिक्र कर रहा हूँ मानव स्वभाव का।  असल में होता  क्या है की चोर या चोरी की बात सुनते है हमारे मन में रुपये -पैसे की चोरी का ख्याल आता है। जीवन के अनुभव से यह बात समझ में आयी की रुपए- पैसे  की चोरी  सबसे निकृष्ट श्रेणी की चोरी है और साधारणतया यह अनपढ़ और अथवा गरीबो के द्वारा की जीवन की आवश्यकता पूर्ति के लिए की जाती है अथवा पढ़े लिखें और अपनी रोजी रोटी कमा सकने में समर्थ लोगो के द्वारा जीवन स्तर को बेहतर और बेहतर बनाने के लिए लालच के वशी भूत होने के कारण की जाती है। जैसे जैसे जीवन का अनुभव बढ़ता गया तो यह पता चला की यह चोरी तो बहुत छोटी है और पकडे जाने पर जेल ,मुकदमा इत्यदि तो होगा ही साथ ही समाज में स्वाभिमान के साथ जीने की संभावनाएं भी कम हो जाती है।

लेकिन यदि चोरी ऐसी हो जिसको करने  सम्मान भी मिले और पैसे भी तो कैसा रहेगा? हमारे देश में नकली डिग्री लेकर काम करने वाले इंजीनयर ,डाक्टर, वकील ,प्रोफेसर यहाँ तक की ऐसे  सरकारी कर्मचारियों की भी कमी नहीं जिन्होंने अपनी जाति का गलत सर्टिफिकेट लगा कर नौकरी प्राप्त की और प्रमोशन भी। कंसल्टेंट , साइन्टिस्ट,रिसर्चर्स के बीच तो यह बड़ी साधारण और रोजमर्रा का काम है। जो लोग आईडिया लाते और उस पर काम करते है उनके साथ ऐसा बरताव अक्सर हो जाता है। क्योंकि जब भी आप किसी आईडिया पर काम करते है तो वह आपको अपने दोस्तों अथवा टीम से शेयर करना होता है और शेयर करने के बाद आपका आईडिया केवल आपका  नहीं रह जाता है। अब इसमें कोई ज्यादा सयाना हुआ तो आईडिया को लेकर आपसे पहले ही उसको अपने फेवर में उपयोग कर लेगा। पीएचडी  के लिए रिसर्च कर रहे लोगो के साथ उनके गाइड ने अपने विद्यार्थी का लेख अपने नाम से छाप दिया ऐसा तो बहुत बार होता रहता है और इसको एक स्वाभाविक स्थित मान कर समझौता करने वाले विद्यार्थी भी आपको  मिलेंगे और फिर अधिकांश लोग यही प्रैक्टिस भी करेंगे।

अभी हाल में ही ऐसा एक समाचार डॉ राधा कृष्णन सर्वपल्ली जो की देश के दूसरे राष्ट्रपति बने तथा भारत रत्न का अवार्ड भी उन्हें मिला।  डॉ राधा कृष्णनन के जन्म दिन पर पुरे देश में टीचर्स डे मनाया जाता है और योग्य अध्यापको को पुरष्कृत भी किया जाता है।  इनकी पीएचडी और लिखी हुई पुस्तक के बारे में  महेंद्र यादव जी (वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं संपादक )  ने आरोप लगाया है। प्रथम दृष्टया आरोप ठीक नहीं लगते है किन्तु अब बात उठी है तो उसपर चर्चा और सत्यता जानने की चाहत में यह लेख लिखने की हिम्मत जुटा  पाया हूँ
नई दस्तक ब्लॉग पर प्रकाशित आलेख का लिंक यहाँ क्लिक करे .


लेकिन बात यहाँ तक ही सीमित नहीं पिछले सप्ताह टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित ऐसा ही एक समाचार जिसमे दुनियां के प्रतिष्ठित लेखक शेक्सपियर के बारे में ऐसी ही टिपण्णी की गयी है ध्यान देने योग्य है। और इससे मानव स्वभाव के सार्वभोमिकता और पुरातन समय से हो रहे चलन का पता चलना दिलचस्प है।









अंत में 

 
हम सब चोर हैं
लेखक: यशपाल जैन


पुराने जमाने की बात है। एक आदमी को अपराध में पकड़ा गया। उसे राजा के सामने पेश किया गया। उन दिनों चोरो को फाँसी की सजा दी जाती थी। अपराध सिद्ध हो जाने पर इस आदमी को भी फाँसी की सजा मिली। राजा ने कहा, 'फाँसी पर चढ़ने से पहले तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ।'
आदमी ने कहा, 'राजन! मैं मोती तैयार करना जानता हूँ। मेरी इच्छा है कि मरने से पहले कुछ मोती तैयार कर जाऊँ।'
राजा ने उसकी बात मान ली और उसे कुछ दिन के लिए छोड़ दिया।
आदमी ने महल के पास एक खेत की जमीन को अच्छी तरह खोदा और समतल किया। राजा और उसके अधिकारी वहाँ मौजूद थे।
खेत ठीक होने पर उसने राजा से कहा, 'महाराज, मोती बोने के लिए जमीन तैयार है, लेकिन इसमें बीज वही डाल सकेगा, जिसने तन से या मन से कभी चोरी न की हो। मैं तो चोर हूँ, इसलिए बीज नहीं डाल सकता।'
राजा ने अपने अधिकारियों की ओर देखा। कोई भी उठकर नहीं आया।
तब राजा ने कहा, 'मैं तुम्हारी सजा माफ करता हूँ। हम सब चोर हैं। चोर चोर को क्या दंड देगा!'


अजय सिंह "जे एस के " 









जाने पहचाने अजनबी

दोस्तों ,

आपको पढ़  कर  आश्चर्य हो रहा होगा की अजनबी जाना पहचाना कैसे हो सकता है, मुझे भी हो रहा है। लॉजिकल माइन्ड कहता है की अगर पहचान है तो अजनबी न होगा और अजनबी है तो पहचाना हुआ नहीं हो सकता। लेकिन कुछ बाते लॉजिक के बाहर होती है और वैसी ही बात है यह।

कल गाड़ी चलाते हुए रेडियो पर एक बड़ी दिलचस्प बात पता चली। लन्दन में कुछ लोगो ने "आई  टाक तो स्ट्रेन्जर्स" के नाम से एक अभियान शुरू किया है।  इस अभियान के भागीदार घर से बाहर निकलते हुए अपने कपड़ो पर एक बैज लगते है जिस पर लिखा होता होता है "आई  टाक तो स्ट्रेन्जर्स" और इसे देख कर सामने वाला समझ जाता है की यह स्त्री  या पुरुष भी अकेला है और बात करने के लिए दोस्तों को तलाश कर रहा है। फिर वह दोनों आपस में पहचान करते है और एक दूसरे के दोस्त बन जाते है।

रेडियो सुनकर मेरे मन में एक प्रश्न उठा, की इंग्लैंड में रहने वाला यह समाज आखिर इस स्थिति में पहुँचा कैसे ? जिस देश ने आधी दुनिया में राज्य किया हो ,जिस देश का सूरज कभी न डूबता हो वहाँ ऐसी परिस्थितियाँ  कैसे उत्पन्न हुईं  और इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न यह की कहीं हम भी तो उसी रास्ते पर नहीं चल रहे है। इसकी सम्भावना इसलिए भी दिखती है की हमारा देश अमरीका और इंगलैंड में जो कुछ भी होता है उसे दस -पंद्रह साल बाद बड़ी आसानी और स्वाभाविक तरीके से अपना लेता है।

इस सन्दर्भ में एक बात और याद आ रही है।  मैं जब भी रेलवेस्टेशन पर घोषणा सुनता हूँ किसी अजनबी से दोस्ती न करे ,अजनबी का दिया हुआ  खाना न खाएं इत्यादि।तो  यह सुनकर मन में स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है की जब  भी आप किसी नए व्यक्ति से दोस्ती करते है तो वह पहले अजनबी ही होता है।  और यदि रेलवे की सलाह मान ली तो कभी नया दोस्त तो बनेगा ही नहीं केवल एक स्थित को को छोड़ कर। जब किसी अजनबी से आपकी मुलाकात किसी दूसरे दोस्त या पहचान वाले के माध्यम से हो रही हो। अब खतरा तो इसमें भी है, कम हो सकता है, क्योंकि आप जिसको पहले से जानते हो उसके द्वारा आपसे नए व्यक्ति का परिचय हुआ है लेकिन खतरा जीरो नहीं हो सकता। इसके कई कारण हो सकते है।

मानव स्वभाव बदलता रहता है।  जो आपका आज मित्र है सम्भव की परिस्थितयों वस  कुछ वर्षो के बाद वह आपका मित्र न रहे। इसका उल्टा यानि कोई ऐसा भी आपका मित्र बन सकता है जो पहले आपको अच्छा नहीं लगता था । जिंदगी में कई बार गलतिया और गलतफहमिया भी बरसो की दोस्ती यहाँ तक की रिश्तेदारियां ख़तम करवाने के लिए जिम्मेदार होती है। और फिर बदसलूकी और ठगने की  जितनी भी घटनायें टीवी और न्यूज़ पेपर में पढ़ने को मिलती है उसमे काफी पड़ोसियों और रिश्तेदारों के द्वारा की जाती है। अजनबीओ के द्वारा ठगे जाने या बदसलूकी किये जाने की संभावनाओ को देखते हुए सावधानी हमेशा ही अपेक्षित है, अतः सिद्धान्त रूप में इसे स्वीकार करना की सभी अजनबी खतरनाक हो सकते है ठीक नहीं है। वैसे भी ऐसे लोग समाज में १-२ प्रतिशत ही होते है तो सम्भावना के गणतीय सिद्धान्त द्वारा भी इतनी सावधानी रखना की ऐसी संभावनों से  बचना  ठीक व्यहार हो सकता है। अन्यथा भविष्य में भारत में भी इंग्लैंड  जैसे  अभियान की जरुरत पड़  सकती है।  कहते है की बुद्धिमान व्यक्ति और समाज वही है जो दूसरों के साथ हुई घटनाओ से सीख  लेले नहीं तो तैयार हो जाइए आप भी बैज लगाने के लिए।

और अंत में 
जिंदगी समझ नहीं आयी तो मेले में अकेला 
और समझ आ गयी तो अकेले में मेला 

अजय सिंह "जे ऐस के"




Sunday, August 14, 2016

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश के मन की बात




कायरता का नशा दिया है गांधी के पैमाने ने ।
भारत को बर्बाद किया नेहरू के राजघराने ने ॥

हिन्दू अरमानों की जलती एक चिता थे गांधी जी ।
कौरव का साथ निभाने वाले भीष्म पिता थे गांधी जी ॥

अपनी शर्तों पर इरविन तक को भी झुकवा सकते थे ।
भगत सिंह की फांसी दो पल में ही रुकवा सकते थे ॥

मन्दिर में पढ़कर कुरान वो विश्व विजेता बने रहे ।
ऐसा करके मुस्लिम जनमानस के नेता बने रहे ॥

एक नवल गौरव गढ़ने की हिम्मत तो करते बापू ।
मस्जिद में गीता पढ़ने की हिम्मत तो करते बापू ॥

रेलों में हिन्दू काट काट कर भेज रहे पाकिस्तानी ।
टोपी के लिए दुखी थे पर चोटी की एक नहीं मानी ॥

मानों फूलों के प्रति ममता खतम हो गई माली में ।
गांधी जी दंगों में बैठे थे छिपकर नोहाखाली में ॥

तीन दिवस में श्री राम का धीरज संयम टूट गया ।
सौवीं गाली सुन कान्हा का चक्र हाथ से छूट गया ॥

गांधी जी की पाक परस्ती पर भारत लाचार हुआ ।
तब जाकर नाथू उनका वध करने को तैयार हुआ ॥

गये प्रार्थना सभा में गांधी को करने अंतिम प्रणाम ।
ऐसी गोली मारी उनको याद आ गए श्री राम ॥

मूक अहिंसा के कारण भारत का आँचल फट जाता ।
गांधी जीवित होते तो फिर देश दुबारा बंट जाता ॥

थक गए हैं हम प्रखर सत्य की अर्थी को ढोते ढोते ।
कितना अच्छा होता जो नेता जी राष्ट्रपिता होते ॥

नाथू को फाँसी लटकाकर गांधी जो को न्याय मिला ।
और मेरी भारत माँ को बंटवारे का अध्याय मिला ॥

लेकिन जब भी कोई भीष्म कौरव का साथ निभाएगा ।
तब तब कोई अर्जुन रण में उन पर तीर चलाएगा ॥

अगर गोडसे की गोली उतरी न होती सीने में ।
तो हर हिन्दू पढ़ता नमाज फिर मक्का और मदीने में ॥

भारत की बिखरी भूमि अब तलक समाहित नहीं हुई ।
नाथू की रखी अस्थि अब तलक प्रवाहित नहीं हुई ॥

इससे पहले अस्थिकलश को सिंधु की लहरें सींचे ।
पूरा पाक समाहित कर लो भगवा झंडे के नीचें ॥.

लेखक का नाम पता नहीं है यह कविता मुझे व्हाट्स अप पर प्राप्त हुई है। 

अजय सिंह

मुगल-राजपूत वैवाहिक सम्बन्धों का सच


यह एक एतिहासिक सच्चाई है इसे पूरा पढ़े ।।

आदि-काल से क्षत्रियों के राजनीतिक शत्रु उनके प्रभुत्व को चुनौती देते आये है। किन्तु क्षत्रिय अपने क्षात्र-धर्म के पालन से उन सभी षड्यंत्रों का मुकाबला सफलतापूर्वक करते रहे है। क्षत्रियों से सत्ता हथियाने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार से आडम्बर और कुचक्रों को रचते रहे। कुरुक्षेत्र के महाभारत में जब अधिकांश ज्ञानवान क्षत्रियों ने एक साथ वीरगति प्राप्त कर ली, उसके बाद से ही क्षत्रिय इतिहास को केवल कलम के बल पर दूषित कर दिया गया। इतिहास में क्षत्रिय शत्रुओं को महिमामंडित करने का भरसक प्रयास किया गया ताकि क्षत्रिय गौरव को नष्ट किया जा सके। किन्तु जिस प्रकार हीरे के ऊपर लाख धूल डालने पर भी उसकी चमक फीकी नहीं पड़ती, ठीक वैसे ही क्षत्रिय गौरव उस दूषित किये गए इतिहास से भी अपनी चमक बिखेरता रहा। फिर धार्मिक आडम्बरों के जरिये क्षत्रियों को प्रथम स्थान से दुसरे स्थान पर धकेलने का कुचक्र प्रारम्भ हुआ, जिसमंे शत्रओं को आंशिक सफलता भी मिली। क्षत्रियों की राज्य शक्ति को कमजोर करने के लिए क्षत्रिय इतिहास को कलंकित कर क्षत्रियों के गौरव पर चोट करने की दिशा में आमेर नरेशों के मुगलों से विवादित वैवाहिक सम्बन्धों (Amer-Mughal marital relationship) के बारे में इतिहास में भ्रामक बातें लिखकर क्षत्रियों को नीचा दिखाने की कोशिश की गई। इतिहास में असत्य तथ्यों पर आधारित यह प्रकरण आमजन में काफी चर्चित रहा है।

वैसे तो कई कोशिशें की दुनिया ने हमें बदनाम करने के लिये लेकिन एक सच ये भी है।।

1 – अकबरनामा(Akbarnama) में जोधा का कहीं कोई उल्लेख या प्रचलन नही है।।(There is no any name of Jodha found in the book “Akbarnama” written by Abul Fazal )

2- तुजुक-ए-जहांगिरी /Tuzuk-E-Jahangiri(जहांगीर की आत्मकथा /BIOGRAPHY of Jahangir) में भी जोधा का कहीं कोई उल्लेख नही है(There is no any name of “JODHA Bai”Found in Tujuk -E- Jahangiri ) जब की एतिहासिक दावे और झूठे सीरियल यह कहते हैं की जोधा बाई अकबर की पत्नि व जहांगीर की माँ थी जब की हकीकत यह है की “जोधा बाई” का पूरे इतिहास में कहीं कोइ नाम नहीं है, जोधा का असली नाम {मरियम- उल-जमानी}( Mariam uz-Zamani ) था जो कि आमेर के राजा भारमल के विवाह के दहेज में आई परसीयन दासी की पुत्री थी उसका लालन पालन राजपुताना में हुआ था इसलिए वह राजपूती रीती रिवाजों को भली भाँती जान्ती थी और राजपूतों में उसे हीरा कुँवरनी (हरका) कहते थे, यह राजा भारमल की कूटनीतिक चाल थी, राजा भारमल जान्ते थे की अकबर की सेना जंसंख्या में उनकी सेना से बड़ी है तो राजा भारमल ने हवसी अकबर बेवकूफ बनाकर उस्से संधी करना ठीक समझा , इससे पूर्व में अकबर ने एक बार राजा भारमल की पुत्री से विवाह करने का प्रस्ताव रखा था जिस पर भारमल ने कड़े शब्दों में क्रोधित होकर प्रस्ताव ठुकरा दिया था , परंतु बाद में राजा के दिमाग में युक्ती सूझी , उन्होने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और परसियन दासी को हरका बाइ बनाकर उसका विवाह रचा दिया , क्योकी राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था इसलिये वह राजा भारमल की धर्म पुत्री थी लेकिन वह कचछ्वाहा राजकुमारी नही थी ।। उन्होंने यह प्रस्ताव को एक AGREEMENT की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन किया था ।।

3- अरब में बहुत सी किताबों में लिखा है written in parsi ( “ونحن في شك حول أكبر أو جعل الزواج راجبوت الأميرة في هندوستان آرياس كذبة لمجلس”) हम यकीन नहीं करते इस निकाह पर हमें संदेह है ।।

4- ईरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में इन्डियन मुघलों का विवाह एक परसियन दासी से करवाए जाने की बात लिखी है ।।

5- अकबर-ए-महुरियत में यह साफ-साफ लिखा है कि (written in persian “ہم راجپوت شہزادی یا اکبر کے بارے میں شک میں ہیں” (we dont have trust in this Rajput marriage because at the time of mariage there was not even a single tear in any one’s eye even then the Hindu’s God Bharai Rasam was also not Happened ) “हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है क्यौकी निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आखों में आँसू नही थे और ना ही हिन्दू गोद भरई की रस्म हुई थी ।।

6- सिक्ख धर्म के गुरू अर्जुन और गुरू गोविन्द सिंह ने इस विवाह के समय यह बात स्वीकारी थी कि (written in Punjabi font – “ਰਾਜਪੁਤਾਨਾ ਆਬ ਤਲਵਾਰੋ ਓਰ ਦਿਮਾਗ ਦੋਨੋ ਸੇ ਕਾਮ ਲੇਨੇ ਲਾਗਹ ਗਯਾ ਹੈ “ ) कि क्षत्रीय , ने अब तलवारों और बुद्धी दोनो का इस्तेमाल करना सीख लिया है , मत्लब राजपुताना अब तलवारों के साथ-साथ बुद्धी का भी काम लेने लगा है ।।( At the time of this fake mariage the Guru of Sikh Religion ” Arjun Dev and Guru Govind Singh” also admited that now Kshatriya Rajputs have learned to use the swords with brain also !! )ैै

7- 17वी सदी में जब परसि भारत भ्रमन के लिये आये तब उन्होंने अपनी रचना (Book) ” परसी तित्ता/PersiTitta ” में यह लिखा है की “यह भारतीय राजा एक परसियन वैश्या को सही हरम में भेज रहा है , अत: हमारे देव (अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें ” ( In 17 th centuary when the Persian came to India So they wrote in there book (Persi Titta)that ” This Indian King is sending a Persian prostitude to her right And deservable place and May our God (Ahura Mazda) give Heaven to this Indian King .ं

8- हमारे इतिहास में राव और भट्ट होते हैं , जो हमारा ईतिहास लिखते हैं !! उन्होंने साफ साफ लिखा है की ” गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज ,ले ग्याली पसवान कुमारी ,राण राज्या राजपूता लेली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत (1563 AD )।”मत्लब आमेर किले में मुघल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है, हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने इतिहास में ले ली बिना लड़े पहली जीत 1563 AD (In our Rajputana History our History writers were “Raos and Bhatts ” They clearly wrote “Garh Amer ayi Turkaan Fauj Le gyali Paswaan Kumari , Ran Rajya Rajputa leli itihasa Pehlibar le bin ladiya jeet !! This means that when Mughal army came at Amer fort their Emperor got married with persian female servant of RajputsThe Rajputs who born for war And in history this was the first time that the Rajput has got a victory without any violence

9-यह वो अकबर महान था जिसके समय मे लाखों राजपुतानी अपनी इज्जत बचाने के लिये जोहर की आग में कूद गई ( अगनी कुन्ड में )कूद गई ताकी मुघल सेना उन्हे छू भी ना सके , क्या उनका बलिदान व्यर्थ हे जो हम उस जलाल उद्दीन मोहोम्मद अकबर को अकबर महान कहते हे सिर्फ महसूर कर माफ कर देने के कारण भारतीय व्यापारीयों ने उसे अकबर महान का दर्जा दिया !!अब ये बात बताईये की क्या हिन्दूस्तान में हिन्दूओं पर तीर्थ यात्रा पर से कोई टेक्स हटा देना कौन सी बड़ी महानता है , यह तो वैसे भी हमारा हक था और बेवकूफ ने एक कायर को अकबर महान का दर्जा दि (हिन्दूस्तान पर राज करने के लिये अकबर ने अपने दरबार में नौ लोगों को नवरत्न बनाया जिसमे 4 हिन्दू थे । राजा मान सिंह जो कि अकबर के समकालीन थे और अकबर के नवरत्नो में से एक थे उन्होंने अकबर से हिन्दूओं पर से तीर्थ यात्रा(महसूर)कर माफ करने की मांग उठाई सत्ता के लालची अकबर को डर था क्यौ कि उसके 4 रत्न हिन्दू थे और अगर वह मान सिंह की मांग को खारिज कर देता तो बाकी के हिन्दू रत्न उसके लिये काम छोड़ सक्ते थे क्यों की अकबर की झूटी सेक्यूलर छवी का असली चहरा सामने आजाता (और सच्चाई भी यही थी की वह एक कट्टरवादी और डरपोक(फट्टू) किस्म का शासक था उसको यह बात पता थी कि हिन्द पर कट्टर छवी के बदोलत राज नही किया जा सक्ता यही वजह थी की उसके पूर्वज हिन्द पर राज ना कर सके थे इस बात को समझते हुए अकबर ने हिन्दू राजाओं में फूट डालने का राजनितिक तरीका अपनाया ) और उसका हिन्दुस्थान पर शासन का सपना अधूरा रह सक्ता था इस बात के भय से उसने तीर्थ यात्रा कर(टेक्स) हटा दिया ।।यह वो समय था जब राणा प्रताप, राणा उदय सिंह,दुर्गा दास, जयमल और फत्ता(फतेह सिंह) जैसे वीर सपूत हुए , यह वही समय था जब रानी दुर्गावती रानी भानूमती रानी रूप मती जैसी वीर राजपुतानीयो ने अकबर से युद्घ लड़ा !!

10- मुघलों ने जब चित्तौड़ किले पर आक्रमण किया तब मात्र 5,000 से 10,000 राजपूत किले पर मैजूद थे जिन से अकबर ने 50,000 से 80,000 मुघलों को लड़वाया , मत्लब साफ है की अकबर राजपुताना से बराबरी से लड़ने की दम नहीं रखता था , इस युद्ध में जयमल सिंह राठौढ़ मेड़तिया और फतेह सिंह सिसौदिया ने अकबर के दांत खट्टे कर दिये थे । उस युद्ध में अकबर की आधी से ज्यादा सेना को राजपूतों ने मौत के घाट उतार दिया था और भारी मात्रा में नुकसान पहुंचाया था इस नुकसान को देखकर खिस्याए अकबर ने चित्तौड़ के लगभग 25,000 गैर इस्लामिक परिवारों को मौत के घाट उतरवा दिया था ।। लाखों मासूमों के सर कटवा दिये , लाखों औरतोको अपने हरम का शिकार बनाया इस युद्ध के दौराम 8,000 राजपुतानीयाँ जैहर कुण्ड में प्राण त्याग जिन्दा जल गईं ।।नोट- अकबर ने राजपूतों के आपसी मन मुटाव का फाएदा उठाया क्यो की वह जान्ता था कि आपसी फूट डालकर ही क्षत्रीय से लड़ा जा सक्ता हे।।

11 .- 1947 की आजादी के बाद पं नेहरू को यह डर था कि जम्म् -कश्मीर के राजा हरी सींह ने जिस तरह अपने क्षेत्र पर अपना अधिपथ्य और राज पाठ त्यागने से मना कर दिया था उसी तरह कहीं बाकी की क्षत्रीय रियासतें फिरसे अपना रूतबा कायम कर देश पर अपना अधिपथ्य स्थापित ना कर लें इसलिए भारतीय इतिहास में से राजपूताना , मराठा , जाट व अन्य हिन्दू जातीयों के गौरवशाली इतिहास को हटा कर मुघलों का झूटा इतिहास ठूस(भर) दिया ताकी क्षत्रीय जातीयों का मनोबल हमेशा इस झूटे इतिहास को पड़ के गिरता रहे , लेकिन कुछ बहादुर वीरों के कारनामे छुपाए भी नही छुप सके जैसै राणा प्रताप , क्षत्रपती शिवाजी व जाट् सामराज्य।अगर मुघल कभी राजपूतों से जीत पाए थे तो सिर्फ मेवाड़ के राणा प्रताप से हल्दी घाटी युद्घ में अकबर की इतनी बड़ी सेना क्यों नही जीत पाई जब की उस वक्त राणा जी मेवाड़ भी खो चुके थे अत: उनकी आधी सेना मुघलों के चितौड़ आक्रमण में ही समाप्त हो चुकी थी बावजूद इसके नपुंसक व हवसी अकबर क्यों नही जीत पाया ।। अत: क्यों अकबर ने कभी राणा प्रताप का सामना नही किया !! क्योकी जो राणा का मात्र भाला ही 75 किलो का हो जो राणा रणभूमी में 250 किलो से अधिक वजन के अश्त्र शश्त्र लेके पूरा दिन रणभूमी में एसे लड़ता हो जैसे खेल रहा हो उसका सामना करना मौत का सामना करने के बराबर हे और यह बात अकबर को तब पता चली जब राणा प्रताप ने अकबर के सबसे ताकतवर सेनापती व सेना नायक बहलोल खाँ को अपने भाले के प्रथम प्रहार में नाभी से गरदन तक के धड़ को सीध में फाड़ दिया था ।। इस घटना की खबर सुनकर अकबर इतना डर गया की वह स्वयम कभी राणा प्रताप से नही लड़ा अब जरा यह सोचिए की सिर्फ कुछ वीरों ने अकबर की सेना को इस तरह नुकसान पहुचाया तो क्या किसी भी तुर्क मुघलिया, अफगानी या कोइ अन्य नपुंसक किन्नर फौज में इतना दम था कि पूरे राजपूताना , पूरा मराठा व सम्पूर्ण जाटों से लड़ पाते !! ना तो इनमें इतना साहस था ना ही शौर्य इन्का साहस तो गंदे राजनितिक कीड़ो ने झूटी किताबों में लिखवाया है !!

12 – प्रथवीराज रासो जो कि चंद्रबरदाई (प्रथवी राज के दरबार में मंत्री) द्वार की गई रचनात्मक किताब को राजनितिक तरिके से पहले उसके साक्षों को नष्ट करवा दिया गया बाद में एतिहासिक दर्जे से हटा कर मात्र पौराणिक कहानी सिद्ध करवा दिया ।नोट – भारतीय इतिहास मे लिखित तौर पर सिर्फ उन वंशों का भारी जिक्र हे जिनके वंश और रियासत पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकीं है मत्लब इनके गौरवशाली इतिहास से पंडित नेहरू की सत्ता को कोइ भी क्षती नही पहुचनी थी क्यों की राजपूत , मराठा इत्यादी यह वो ताकतवर रियासतें हें जिनका अस्तित्व आज भी जीवित है ।। े
13 – मात्र बुंदेला राजपूतों ने मराठों के साथ मिलकर अपने सामराज्य से अकबर के पुत्र एवं उत्तराधिकारी जहांगीर ( कच्छवाहा राजपूतों की परसियन दासी मरियम-उज्-जवानी का पुत्र था ) को अपने राज्य क्षेत्र से खदेढ़ दिया था ।।

14- जहांगीर की माँ व अकबर की बेगम मरियम उज्जवानी अगर राजपूत होती तो अपने पुत्र जहांगीर को बुंदेला राजपूत व मराठों से कभी लड़ने ना देती !! और वैसे भी किसी तुर्की का विवाह किसी असली राजपूत से कर दिया जाए तो वह या तो क्रोध से मर जाएगा या फिर अपने रहते उस तुर्क को जिंन्दा नहीं रहने देगा ।।

15 – अब सवाल यह उठता है की अजकल के यह मन घड़ित नाटक(सीरियल) क्यों चलाए जाते है यह इसलिए क्यों की यह इतिहास के किसी भी पन्ने में दर्ज नही है कि मरियम जिसे हम जोधा बोलते हैं वह राजपूत थी दूसरी बात ये की यह एक विवादित मुद्दा है जिसका राजपूत समुदाय कड़ा विरोध करता है इसलिये यह विवादों में आ जाता है और इस झूटे सीरियल को फ्री की प्बलिसिटी मिल जाती है जिसका लाभ प्रोड्यूसर(एकता कपूर) को मिल जाता है !! और कुछ मासूस हिन्दू लड़कियाँ इस झूठी लव स्टोरी वाले सीरियल को देखकर अकबर के प्रती इम्प्रेस हो जाती है जो की एक कायर और एक अत्याचारी व क्रूर शासक था जिसने लाखों औरतों को अपने हरम का जबरन शिकार बनाया उनकी मजबूरियों का फाएदा उठाकर ।।और आजकल की मोर्डन लड़कियाँ बड़े आसानी से लव जिहाद ( इसका मत्लब धर्म को बड़ाना ज्यादा से ज्यादा लोगों को मुसलमान बनाना मार के जबरन या प्यार से भी ) का शिकार बन जातीं है और किसी बी मुसलमान लड़के के झूटे प्यार में फस जातीं है , बाद में जों होता है उसे में यहाँ लिख नही सक्ता लेकिन इन सब के पीछे इस्लामिक कट्टरता और धार्मिक राजनीति होति है जिसमें वर्षो से कान्ग्रेस का हाथ रहा है लिकिन हकीकत तो यही ह मित्रों की अकबर एक क्रूर व अत्याचारी शासक था !! जिसने अपना झूटा इतिहास लिखवाया और मरियम(जोधा) जो कि खुद एक दासी होकर भी अकबर की बेगम नहीं बनना नही चाहती थी ।।ँ

16- अकबर की अकबरनामा जिसे कुछ मूर्ख अकबर की आत्मकथा कहते है वह उसकी आत्मकथा नहीं कहला सक्ती क्योकी आत्म कथा एक मनुष्य खुद लिखता है और अकबर एक अनपढ़ शाषक था अकबर नामा के रचनाकार मोहोम्मद अबुल फजल थे जो की अकबर के उत्तीर्ण दर्जे ( उच्च कोटी ) के चाटुकार थे अब अगर वो उसमें ये भी लिख देते की अकबर आसमान के तारे गिनने की क्षमता रखता था तो आप आज एक्झाम में इस प्रश्न को भी पढ़ रहे होते ।।

17 क्षत्रपती शिवाजी ने ओरंगजेब के कई बार दांत खट्टे किये और उससे कई महत्वपूर्ण राज्य छीन लिए और अपने राज्य को स्वतंत्र राज्य बनाया ।। मालुम हो कि शिवाजी ने अपना सामराज्य का जमीनी स्तर से विस्तार किया था जब की औरंगजेब को सत्ता विरासत में मिली थी और शिवाजी ने अपने सामराज्य को इस कदर ताकतवर बनाया कि मुघल आँख उठाकर देखने की भी चेष्ठा ना करें बाद में ओरंगजेब ने संधी करने के लिए शिवाजी को आगरा बुलाया और छल पूर्वक शिवाजी को बंधी बना लिया और आगरा किले में कैद कर लिया और शिवाजी के सभी राज्यों को हड़प लिया अंत: शिवाजी काराग्रह से भाग गए और अपने सभी राज्य ओरंगजेब से छीन लिए ।।

18- औरंगजेब को जब अकबर का विवाह दासी की पुत्री से होने वाली बात पता चली तो उसने अकबर के द्वारा हटाए गए जिजया कर(tax for non muslims) और महसूर कर(tax for hindus for doing tirath तीर्थ) को दोबारा चलवाया इसके साथ – साथ उसने इस्लामिक कट्टरवाद को बड़ावा दिया जो कि मुघलिया सल्तनत के पतन का कारण बनी अंत: राजपूतों , मराठों ने मिलकर मुघलों को खत्म कर डाला और यह थी इतिहास की पहली क्रांती इसके बाद अंग्रेजों का विस्तार हुआ जिन्हें मुघलों ने ही निमंत्रण दिया था

19- नेशनल जियोग्रेफिक(National Geographic Channel) चैनल पर (डेड्लीलीएस्ट वारीयर/Deadliest warrior) नाम के कार्यक्रम में बहुत से विदेशी इतिहासकारों ने दावा किया है की हल्दीघाटी त्रतीय युद्घ में राणा प्रताप की 20,000 की जन संख्या वाली सेना जिसमे ब्राहमण वैश्य शूद्र व सभी जाती के लोग अकबर की 60,000 की आबादी वाली सेना से लड़े थे जिसमें युद्ध का कोई परिणाम नही निकला या ये कह लो की अकबर की सेना को रण भूमी छोड़ भागना पड़ गया ।।ेयाद रहे विक्कीपेडिया पर लिखी हर बात सच नहीं होती आप खुद भी उसमे मेनिपुलेशन (Manipulation)कर सक्ते हैं !! क्षत्रीयों का इतिहास क्षत्रीय बता सक्ते है और मुघलों का इतिहास कोन्ग्रेस ।।

कुछ लोग हार के भी जीत जातेहैं, कुछ लोग जीत के भी हार जाते हैं…
नहीं दिखते अकबर के बुत कहीं ,राणा के घोड़े हर चौराहे पे नजर आते हैं..
इसी तरह का एक और उदाहरण आमेर के इतिहास में मिलता है। राजा मानसिंह द्वारा अपनी पोत्री (राजकुमार जगत सिंह की पुत्री) का जहाँगीर के साथ विवाह किया गया। जहाँगीर के साथ मानसिंह ने अपनी जिस कथित पोत्री का विवाह किया, उससे संबंधित कई चौंकाने वाली जानकारियां इतिहास में दर्ज है। जिस पर ज्यादातर इतिहासकारों ने ध्यान ही नहीं दिया कि वह लड़की एक मुस्लिम महिला बेगम जैनब कयूम की कोख से जन्मी थी। जिसका विवाह राजपूत समाज में होना असंभव था। जिसके बारे में जानकारी हम आगे चल कर देंगे।

लेखिका- मनीषा सिंह 
(व्हाट्स अप पर प्राप्त लेख इसकी सत्यता का पता आप खुद करे )

_*हरिवंशराय बच्चन की एक सुंदर कविता*

*खवाहिश  नही  मुझे  मशहूर  होने  की*।
*आप  मुझे  पहचानते  हो  बस  इतना  ही  काफी  है*।
*अच्छे  ने  अच्छा  और  बुरे  ने  बुरा  जाना  मुझे*।
*क्यों  कि  जिसकी  जितनी  जरुरत  थी  उसने  उतना  ही  पहचाना  मुझे*।

*ज़िन्दगी  का  फ़लसफ़ा  भी   कितना  अजीब  है*,
*शामें  कटती  नहीं,  और  साल  गुज़रते  चले  जा  रहे  हैं*....!!
*एक  अजीब  सी  दौड़  है  ये  ज़िन्दगी*,
*जीत  जाओ  तो  कई  अपने  पीछे  छूट  जाते  हैं*,
*और  हार  जाओ  तो  अपने  ही  पीछे  छोड़  जाते  हैं*।

*बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर*...
*क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है*..
*मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा*,
*चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना*।।

*ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है*
*पर सच कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है*

*जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक मुद्दत से मैंने*
*न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले* .!!.
*एक घड़ी ख़रीदकर हाथ मे क्या बाँध ली*..
*वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे*..!!

*सोचा था घर बना कर बैठुंगा सुकून से*..
*पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला* !!!

*सुकून की बात मत कर ऐ ग़ालिब*....
*बचपन वाला 'इतवार' अब नहीं आता*
*जीवन की भाग-दौड़ में*
*क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है* ?
*हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है*..

*एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम और*
*आज कई बार बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है*..
*कितने दूर निकल गए*,
*रिश्तो को निभाते निभाते*..
*खुद को खो दिया हमने, अपनों को पाते पाते*..

*लोग कहते है हम मुस्कुराते बहोत है*,
*और हम थक गए दर्द छुपाते छुपाते*..
*खुश* *हूँ और* *सबको खुश* *रखता हूँ*,
*लापरवाह* *हूँ फिर भी सबकी परवाह*
*करता हूँ*..
*मालूम है कोई मोल नहीं मेरा, फिर भी*,
*कुछ अनमोल लोगो से रिश्ता रखता हूँ*...!

(यह कविता श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रची गई है तथा यह जानकारी व्हाट्स अप पर मिले सन्देश पर आधारित है अतः आवश्यकता होने पर सत्यता की जाँच स्वयं कर ले और मुझ से भी शेयर करले ताकि गलती ठीक हो सके. )

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर भारत की पुकार




बेबस हूँ बिखरी हूँ उलझी हूँ सत्ता के जालो में,
एक दिवस को छोड़ बरस भर बंद रही हूँ तालों में,
बस केवल पंद्रह अगस्त को मुस्काने की आदी हूँ,
लालकिले से चीख रही मैं भारत की आज़ादी हूँ,
जन्म हुआ सन सैतालिस में,बचपन मेरा बाँट दिया,
मेरे ही अपनों ने मेरा दायाँ बाजू काट दिया,
जब मेरे पोषण के दिन थे तब मुझको कंगाल किया
मस्तक पर तलवार चला दी,और अलग बंगाल किया
मुझको जीवनदान दिया था लाल बहादुर नाहर ने,
वर्ना मुझको मार दिया था जिन्ना और जवाहर ने,
मैंने अपना यौवन काटा था काँटों की सेजों पर,
और बहुत नीलाम हुयी हूँ ताशकंद की मेजों पर,
नरम सुपाड़ी बनी रही मैं,कटती रही सरौतों से,
मेरी अस्मत बहुत लुटी है उन शिमला समझौतों से,                
मुझको सौ सौ बार डसा है,कायर दहशतगर्दी ने,
सदा झुकायीं मेरी नज़रे,दिल्ली की नामर्दी ने,
मेरा नाता टूट चूका है,पायल कंगन रोली से,
छलनी पड़ा हुआ है सीना नक्सलियों की गोली से,
तीन रंग की मेरी चूनर रोज़ जलायी जाती है,
मुझको नंगा करके मुझमे आग लगाई जाती है
मेरी चमड़ी तक बेची है मेरे राजदुलारों ने,
मुझको ही अँधा कर डाला मेरे श्रवण कुमारों ने
उजड़ चुकी हूँ बिना रंग के फगवा जैसी दिखती हूँ,
भारत तो ज़िंदा है पर मैं विधवा जैसी दिखती हूँ,
मेरे सारे ज़ख्मों पर ये नमक लगाने आये हैं,
लालकिले पर एक दिवस का जश्न मनाने आये हैं
जो मुझसे हो लूट चुके वो पाई पाई कब दोगे,
मैं कब से बीमार पड़ी हूँ मुझे दवाई कब दोगे,
सत्य न्याय ईमान धरम का पहले उचित प्रबंध करो,
तब तक ऐसे लालकिले का नाटक बिलकुल बंद करो,



देवालय की घंटी टूटी,घायल कलश पताका है,
गायत्री के स्वर शोषित हैं,आरतियों  पर डाका है,
राम राम के अभिनन्दन पर वालेकुम का वार हुआ,
तिलक कलावा,पैजामी हुड़दंगों से लाचार हुआ,

होली दीवाली को लूटा रमजानी अफ्तारों ने,
देवनागरी नंगी कर दी,उर्दू के अखबारों ने,
सतिया-चौक-रंगोली,आँगन की तुलसी भी रोई है,
कायरता की चादर ओढ़े कौम सनातन सोई है,

हुआ बताओ क्या उन गंगा जमुनी वाले नारों का?
कैराना से हुआ पलायन क्यों हिन्दू परिवारों का,
अब ये शोर नमाज़ी हमको हमलावर सा लगता है,
कैराना का आलम पूरा पेशावर सा लगता है,

कादिर,अली,मुहम्मद,हाफ़िज़,पूरा शहर संभाले हैं,
शर्मा,यादव,जाटव,गुर्जर के घर लटके ताले हैं,
ताले नही कहो इनको ये कायरता की ताली है,
सौ करोड़ हिन्दू पुत्रों के स्वाभिमान को गाली है,

नेताओं को नहीं दिखा अब तक रोना कैराना का,
काश्मीर सा तड़प रहा है हर कौना कैराना का,
कितने हिन्दू क़त्ल हुए,बस गुमनामी के किस्से हैं,
केरल से कैराना तक,गहरी साज़िश के हिस्से हैं,

बंटे रहो तुम माया और मुलायम की परछाईं में,
बंटे रहो तुम जाटव यादव बनिया या ठकुराई में,
कैराना पर आँख मूंदकर बैठे हो,पछताओगे,
आने वाली नस्लों को फिर कैसे मुँह दिखलाओगे,

कवि बोले,पुरखों के बलिदानो को याद करो,
कैराना में फिर से धर्म सनातन को आबाद करों,
हम हिन्दू हैं माना सबको गले लगाने वाले हैं,
सदियों से सीने पर कितने हमले सहने वाले हैं,

लेकिन अब भी मौन रहे तो,सिर्फ लाश हो जाएंगे,
अमन अमन रटते रटते सब वंश नाश हो जायँगे,
राम कृष्ण की छाती पर चढ़कर पैगम्बर आएंगे,
कैराना तो एक झलक है,सबके नंबर आएंगे ।  


(यह दोनों कविताये मुझे व्हाट्स अप पर प्राप्त हुई है ,लेखक का नाम नहीं दिया है )

Sunday, June 5, 2016

चित्रों में मोदी के सत्ता में दो साल




दोस्तों ,
मोदी सरकार ने दो साल सत्ता में पूरे किये है। इन कार्यो को लेकर सत्ता पक्ष के लोग अति उत्साहित है और जनता तक अपने किये कार्यो को पहुंचने में व्यस्त है। वही जैसा होता है विपक्ष के लोग निंदा पुराण में लगे है और ऐसे प्रचार कर रहे है मानों सबकुछ पहले से भी बुरा हो रहा है।  इन्ही भावनाओ को व्यक्त किया चित्रों में ,जो मुझे मेरे व्हाट्स एप ग्रुप में प्राप्त हुए है। ये अन्य संदेशों की तरह कही खो न जाये इसलिए इन्हे मैंने ब्लॉग पर डालने का उपक्रम किया है। नीचे दो हुई कविता भी व्हाट्स एप ग्रुप  में ही प्राप्त हुई है आप इसका भी आनंद ले सकते है। 























































अंत में
दो साल की कीमत तुम क्या जानो मोदी बाबू.......
बहुत याद आते हैं ... वो "घोटाले भरे दिन" ....
वो "दामाद बाबू" के खेती-किसानी के चर्चे .... उनके करामती बिजनेस के नुस्खे ।
वो शहजादे का "अध्यादेश के पन्ने फाड़ हवा मे लहराना ....
"राजमाता" का 'गुप्त रोग' के इलाज मे अमेरिका के चक्कर लगाना ....
शहजादे के कमरे मे टेंसूए बहाना ।
वो जिज्जी की चौपाल...... दिग्गी की भौकाल.......
वो जीरो लोस की थ्योरी.....
वो वो... बब्बर की वो 12 रूपये की थाली ....वो घड़ी-घड़ी मोदी को गाली ।
वो डॉलर और पेट्रोल की रेस .... वो CBI तोते के केस ।
वो "मन्नू" का ठुमक-ठुमक कर चलना .... वो हजार सवालों की आबरू रखना ... वो पेड़ पे पैसे का उगना .... .
बहुत याद आते हैं । बहुत याद आते हैं... वो "घोटाले भरे दिन" ।
कहाँ गए वो घोटाले वाले दिन

अजय सिंह"जे एस के "

मथुरा का दर्द


 दोस्तों ,
जय गुरुदेव के कथित शिष्य राम वृक्ष यादव ने पिछले दो वर्षो से ज्यादा समय तक मथुरा के २८० एकड़ में फैले जवाहर मैदान में अपने अंध अनुनाईयो के साथ डेरा दाल रखा था। राम वृक्ष यादव के अनुनायी किस लालच और भ्र्म में थे उन्हें कैसे बरगलाया गया यह जाँच का विषय है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह की मथुरा एक अंतर्राष्टीय ख्याति प्राप्त तीर्थ एवं पर्यटक स्थल है वहां पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे लम्बे समय तकबिना प्रशासनिक इजाजत के इतने लोगो का गैरकानूनी ढंग से सरकारी सम्पत्ति पर कब्ज़ा करके बैठना बिना राजनीतिज्ञों की मिली भगत के संभव ही नहीं है। राजनैतिक कारणों से  भाजपा के लोग इसे प्रदेश की सरकार की असफलता बता सकते है ,हो सकता है की क़ानूनी रूप से या संवैधानिक रूप से यह सही भी हो तो भी केंद्र सरकार और खास तोर पर गृह मंत्रालय को यह समाचार नहीं मिला हो ऐसा असम्भव है। इस जगह से करीब बीस किलोमीटर दूर फरह नाम की जगह है जो जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पंडित दीनदयाल जी की जन्म स्थली है।  पंडित जी के जन्म दिन २५ सितम्बर २०१४ में प्रधान मंत्री जी और २०१५ गृह मंत्री जी का कार्यक्रम हुआ था। इन लोगो की सुरक्षा की दृस्टि से पूरे  इलाके की जाँच और उपयुक्त व्यस्था केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है  अतः केंद्र भी अपनी नाकामी से पीछे है नहीं सकता। 

इस घटना की समुचित जाँच सभी तरह की मिलीभगत को सामने लायेगी। किन कारणों से बिना तैयारी पुलिस दल वहाँ कार्यवाही को  वहाँ पहुँचा जिसमे शहर के एस पी और एक इंस्पेक्टर की जान भी चली गयी। यह भी किसी साजिश की तरफ इशारा कर रहा है। स्थानीय सांसद हेमा मालनी को वहाँ जाने से किन कारणों से रोका  गया यह भी जाँच करके सामने लाया जाना चाहिये। 

इस घटना पर जनता की भावनाओं को व्यक्त  करती इटावा के श्री गौरव चौहान की एक कविता व्हाटस अप पर प्राप्त हुई है जिसमे इन बातों  को बहुत अच्छी तरह बताया गया है।

मैं मथुरा नगरी हूँ,घायल हूँ सत्ता की चोटों से,
कैसे कहूँ वेदना अपनी इन झुलसाये होठों से,
मैं तो प्रेम रंग में डूबी मदमस्तों की नगरी थी,
होली के रंगों में छायी प्रेम सुधा की बदरी थी,
वंशीवट पर बजी बांसुरी,मैं खुल कर इठलाई थी,
मैं कान्हा के बाल रूप पर मंद मंद मुस्काई थी,
मैं मीरा का प्रेम ग्रन्थ थी,सूर दास की स्याही थी,
वासुदेव की लीलाओं की पावन एक गवाही थी,
मैं यमुना के निर्मल तट पर ग्वालों के संग झूमी थी,
गोवर्धन से वृन्दावन तक कृष्णप्रेम मे घूमी थी,
लेकिन आज बहुत घायल हूँ,ह्रदय कष्ट में रोया है,
कांधों पर अपने मैंने चौबिस लाशों को ढोया है,
लुटी पिटी हूँ,पूछ रही हूँ लखनऊ के सरपंचो से,
मेरा सीना क्यों घायल है कट्टों और तमंचो से,
मोहन की मुरली को आखिर किसने चकनाचूर किया,
किसने दो सालों तक गुंडों को सहना मंजूर किया,
लगता है अपने ही कुत्ते पाल रहे थे नेता जी,
रामवृक्ष की जड़ में पानी डाल रहे थे नेता जी,
क्या कारण था,मथुरा की रखवाली नही करा पाये,
दो सालों से बाग़ जवाहर खाली नही करा पाये,
जिस में सारी खीर पकी है,बोलो बर्तन किसका था,
दो सालों तक इसके पीछे मौन समर्थन किसका था,
20 लाख में दो वर्दी वालों का मरण भुलाया है,
गौ भक्षी अख़लाक मरा तो,पूरा कोष लुटाया है,
ना तो ख़ान,हुसैन,अली,ना वोट बैंक के बिंदू थे,
जो कुर्बान हुए वर्दी वाले दोनों ही हिन्दू थे,
मुस्लिम होते तो सत्ता की अंतड़ियां तक फट जातीं,
चार फ़्लैट,रुपये करोड़,नौकरियां तक भी बंट जातीं,
अब ,वर्दी की यही कहानी है,
खुद नेता का हुक्म बजाएं,खुद देनी कुर्बानी है,
कब तक खेल चलेगा भईया,अब जवाब देना होगा,
आने वाले हैं चुनाव सबका हिसाब देना होगा,

अजय सिंह "जे एस के "

Wednesday, May 18, 2016

हिन्दू और मुसलमान धर्म


 आइए देखे हिन्दू धर्म क्यों सरेहश्रेष्ठ है और मुसलमान धर्म मात्र एक नक़ल :

1.कितने हिन्दू भाइयों को ही क्या मुसलमानो को भी ये न पता होगा की पैगम्बर सिकंदर के 500 साल बाद पैदा हुए था।
2. भारत को छोड़ पूरे संसार में रमजान को”रामदान”कहते है,आप गूगल परभी देख सकते हैं । भारत में अपनी नक़ल छुपानेको इन्होने इसे “रमजान” कर दिया | इस्लाम के पवित्र महीना रमजान संस्कृत शब्द”रामज्ञान”का अपभ्रंस है । और मक्का में विश्वप्रसिद्ध शिव लिंग भी था और अभीभी है और ये मुस्लिम हज के समय इस शिवलिंग को ही सज़दा करते हैं।
3. मुहम्मद के चाचा एक हिन्दू थे और अरब में भी आर्य संस्कृति का प्रभाव बहुत था। मुहम्मद के चाचा ने एक पुस्तक भी लिखी थी”शायर उलओकुल “जिसमें हिन्दू संस्कृति की भूरी भूरी प्रसंसा थी बाद में मुहम्मद के बदमाशों नेउन्हें मार दिया था |
4-“मुसलमानो का “नमाज”भी संस्कृत के नमत शब्द से बना है जिसका अर्थ है झुकना |
5- मुसलमानो की दिन में ५ बार नमाज हमारे वेदों के”पञ्च महायज्ञ”की ही नक़ल है |
6-मुसलामानों का त्यौहार “शब्बेरात”शिवरात्री का हीअपभ्रंस है |
7-*नमाज के पहले ५ अंगों को धुलना वेदों के”शरीर शुद्ध्यर्थं पंचांग न्यासः”का ही नियम है |
8-ईद उल फितर भी हिन्दुओं के पित्री पक्षकी नक़ल है और ईद उल फ़ित्र में मुसलमान अपने
पुरखों को ही याद करते हैं |
9-नक़ल यहीं बंद नहीं हुई : गर्भा बना काबा,पुराण बना कुराण, संगे अश्वेत बना संगे अस्वाद, हमारा मलमास बना सफ़र मास, रविसे उनका रबी महिना, उनका ग्यारहवीशरीफ हमारे एकादशी कीही नक़ल है| गृह से ही उनका गाह शब्द बना ईदगाह , दरगाह*********** बस  बिना अकल नक़ल ही नकल 

Friday, May 6, 2016

तेरी कमीज मेरी कमीज से सफ़ेद कैसे?

 मित्रो,
जब से  मोदी  प्रधान मंत्री बने है रोज  कोई न कोई नया बवाल खड़ा हो जाता है। इसमें अधिकांश ऐसे है जिनका समाज अथवा देश के लिए  केवल इतना महत्व है की वह देश की अथवा मोदी की बदनामी करवाने की असफल कोशिश करते दिखाई देते है। हालाँकि ज्यादातर  ऐसे आरोप प्रिंट या सोशल मिडिया अथवा और कहीं भी एक या दो दिन ज्यादा चर्चा में  नहीं रहते है । लेकिन चटखारे लगा लगा कर गॉसिप करने वालो का टाइम पास तो हो ही जाता है।

अरविन्द केजरीवाल के मुख्य मंत्री बन जाने के बाद  मानों बन्दर के हाथ अस्तुरा लग गया है। अपने पद और बुद्धि पर घमन्ड ने पहले तो उन्हें उन अपनों से दूर किया जिनकी सहयता से  पद पर पहुंचे। फिर पार्टी के सिद्धांतो के लिए समर्पित सैकड़ो कार्य कर्ताओ से दूर किया। पता नहीं कैसे और किन सलाहकारों ने केजरीवाल को अपना काम छोड़ कर बाकी दुनियाँ की चिंता करने की सलाह दी है। इसीलिए कभी मोदी  खिलाफ चुनाव कभी योगेन्द्र यादव से मारपीट और अब मोदी की डिग्री की की चिंता उन्हें  दिन सता रही है। शायद उन्हें यह ग़लतफ़हमी गयी है की यदि मोदी की डिग्री नकली साबित हो जाये तो उनका प्रमोशन हो जाएगा और वह मुख्यमंत्री  प्रधान मंत्री  जायेंगे।
वैसे यह ख्वाब देखने वाले वह अकेले मुख्यमंत्री नहीं है। नितीश बाबू ने भी  ख्वाब सजाया है और हो भी क्यों न आखिर जिन के खिलाफ  लड़ाई लड़ कर राजनीत में अपनी जगह बनाई उनकी गोद में बैठ कर एक बार फिर पद प्राप्त हो गया है इसलिए  बिहार की चिंता कम देश की चिंता ज्यादा कर रहे रहे है। इसीलिए अब उन्होंने संघ मुक्त भारत बनाने की घोषणा कर दी है।

मैंने सुना था की पढ़ लिख कर आदमी विनम्र हो जाता है समझदार हो जाता है लेकिन अरविन्द को देख कर लगता है की बड़े और नामी गिरमी संस्थानों में पढाई करके आदमी चालक और घमण्डी हो जाता है जिसको अपने स्वार्थो के सिवाय न कुछ दिखाई देता है न सुनाई देता है। नहीं तो दिल्ली की दशा सुधरने के बजाय ख़राब न होती। जिन वादों से कुर्सी मिली उनका कोई जिक्र पद पर आने  के बाद न होना हर दिन केवल और केवल नए विवादों को जन्म देकर सुर्खियों में बने रहना ही उनका काम रह गया है।  इसलिए केजरीवाल अपनी सारी  ताकत ने मोदी की डिग्री को नकली सिद्ध करने में लगा दिया है।  हम तो केवल उन्हें भगवान सद्बुद्धि दे यह प्रार्थना ही कर सकते है। अरविन्द को पता नहीं की कितने ही ऐसे लोग जिन्होंने स्कूल या कालेज का मुंह भी नहीं देखा बड़े बड़े संस्थानों से पढ़ने वल उनकी नौकरी करते है। उदाहरण के लिए धीरु भाई अम्बानी ,जमशेद जी टाटा जैसे सैकड़ो लोग मौजूद है। नौकरी पाने के लिए बड़ी पढाई जरुरी है लेकिन जीवन में सफलता बुद्धिमानी ,विनम्रता और दूसरों को सम्मान देने से मिलती है।
मोदी का विरोध चाहे व्यक्तिगत हो अथवा सैद्धांतिक इसी काम को प्राथमिकता  देकर सभी विरोधी जिसमे कांग्रेस भी शामिल है कर रहे है।  मोदी देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को ठीक करने के लिए रात दिन जुटे है और बाकी मिलकर इस कोशिश में लगे है की अपनी  कमीज को मोदी की कमीज से ज्यादा सफ़ेद कैसे सिद्ध कर दे। लेकिन शायद इन्हे पता नहीं कीदूसरे की कमीज गन्दी करने से अपनी कमीज साफ़ नहीं होती बल्कि अपनी कमीज को साफ़ करने से वह दूसरे कमीज से ज्यादा साफ़ दिखती है।
भगवान सभी को सद्बुद्धि दे।और जो जिम्मेदारी अरविन्द को दिल्ली की जनता ने उन्हें देकर अपना विश्वास दिया था उसे वह  पूरा करेंगे ताकि त्राहि त्राहि करती जनता को राहत मिले। 

और अंत में 

दुश्मनी करो तो इतनी 
की गर हम फिर दोस्त 
हो जाये तो शर्मिंदा  हो।
अजय सिंह "जे एस के "