Thursday, June 19, 2014

तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती हैं

दोस्तों,
१६वीं शताब्दी में  पैदा हुये महा कवि भूषण ने कभी अपनी कविता में समय का चक्र कैसे कैसे परिवर्तन लाता है क्या क्या दिन दिखाता है  का वर्णन करते हुए लिखा था "ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवाली ,ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैँ,तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती  हैं " . ४०० साल पहले कही  हुई बात आज भी बड़ी सटीक बैठी है. देखो न क्या दिन आये है पहले सत्ता मैं आने के लिए समझौते करते थे और अब विपक्ष बनाने के लिए समझौता करने की नौबत आ गयी है. देश में पिछले दस सालो से सत्ता का  केन्द्र बनी सोनिया गांधी नेता विपक्ष के पद के लिए बेबस खड़ी मोदी की ओर निहार रही है और उम्मीद कर रही हैं की उन्होंने सत्ता मैं रहते हुये चाहे जो बर्ताव विपक्ष के साथ किया हो पर एन डी ऐ सरकार के मुखिया नरेंदर मोदी तो सज्जन वयक्ति है और उनकी सज्जनता की वजह से देश के ही नहीं उनके भी दिन कुछ तो अच्छे हो ही जायेंगे। और फिर मोदी ने ही तो सबका साथ सबका विकास का मंत्र दिया था तो उसमे मेरा और बेटे राहुल का हिस्सा मांग लेने में हर्ज है क्या है.
टी वी की बहू स्मिृता  ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय क्या मिला मानो राजनीत मैं भूचाल आ गया
है।  सारे कांग्रेसी उनकी क्वालिफिकेशन पर सवाल उठा रहे  है. जब उमा भारत ने सोनिया गांधी की योग्यता का प्रश्न उठाया तो सारे बगलें जहकने लगे। सही कहा गया है शीशे के घरों मैं रहने वालों को दूसरो  पर पत्थर नहीं फेकने चाहिये। और फिर अभी अभी तो अमेठी में राहुल को नाको चने चबुआ कर लौटी है उसका कुछ तो पुरस्कार मिलना ही चाहिये। सो मोदी जी ने कर दी कृपा।


    
                                                      
                    और अंत में

मैंने पूछा साँप से दोस्त बनेंगे आप। नहीं महाशय ज़हर में आप हमारे बाप।।
 कुत्ता रोया फूटकर यह कैसा जंजाल। सेवा नमकहराम की करता नमकहलाल।
बीज बनाये पेड़ को, पेड़ बनाये बीज। परिवर्तन होता सतत, बदलेगी हर चीज।।
 बारिश चाहे लाख हों, याद नहीं धुल पाय। याद करें जब याद को, दर्द बढ़ाती जाय।।  

अजय सिंह "एकल "



Friday, January 10, 2014

अब भविष्य़ उज्जवल है


 प्रिय मित्रों ,
घपले, घोटाले और तमाम अनिश्चिंताओं  के साल २०१३ के बीतने के साथ ही देश और देशवासिओ के लिए एक अच्छा समय आने के असार बनने लगे है . हाँलाकि चुनाव तो पाँच राज्यो में हुये है लेकिन चर्चा चार की  है क्योंकी मिजोरम के चुनाव में विपक्षी दलो ने कांग्रेस को वहाँ वॉक ओवर  दे दिया था इसलिये मध्य प्रदेश ,राजस्थान ,छत्तीसगढ़ और दिल्ली के चुनावोँ पर पूरे  देश कि निगाह रही।  और निगाह रही भाजपा के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ,प्रधान मंत्री पद के खानदानी उम्मीदवार राहुल गाँधी और अन्ना कि आंधी से निकले हुये अरविन्द केजरीवाल पर ।

साल के अंतिम सप्ताह में अरविन्द केजरीवाल कि आम आदमी पार्टी के सत्ता नसीन हो जाने से कम से कम दिल्ली में तुरन्त चुनाव कि सम्भावना कम हो गई और जनता को  कुछ राहत मिली  और साथ ही "आप " पार्टी का भी  इम्तिहान शुरू हो गया इससे अब लोकसभा चुनाव में अरविन्द यह नहीं कह सकेंगे कि हमको प्रूव करने का मौका नहीं मिला। अरविन्द कि पार्टी ने जिस तरह की  तमाम दुविधाओं और परिस्थितयों  में दिल्ली के मुख्यमन्त्री का पद स्वीकार कर किया है उसके लिये मैं तो यही कह सकता हूँ "इतने रंग तो  न बदले होंगे गिरगिट के भी बाप ने, हद करदी "आप" ने" .

 
 दूसरे साल के शुरू होते ही  देश के प्रधान मंत्री जी ने अपना मौन व्रत तोड़ कर एक फड़कती हुई प्रेस कान्फरेंस अति उत्साही नेता मनीष तिवारी के साथ सम्पन्न कर दी और एक नया रिकॉर्ड बनाया १० साल में तीन बार प्रेस से मुखातिब होने का आम जनता और प्रेस दोनों ने मौन मोहन सिंह जी को मुँह खोलने के लिए धन्यवाद  दिया मगर बात यही तक होती तो ठीक था लेकिन कान्फरेंस में  किंग बने सिंह साहब अपने प्रधान मंत्री के
रोल से ऊबे हुए और सोने के पिंजरे से चार महीने बाद वापस आने को बेताब  दिखे और जनता को आश्वाशन दिया कि दस साल के कुशासन से बाहर आने का वक्त अब दूर नहीं और अगले चार-पाँच महीनो में आयेगा पता नहीं उनका इशारा क्या था पर जनता को लगा कि यह भी वही कह रहे जो देश कि जनता कह रही है कि अब  सुख चैन मोदी के प्रधान मंत्री बनाने के बाद ही मिलेगा और ऐसा होगा पाँच महीने बाद.और मजे कि बात यह है की प्रधान मंत्री के आर्थिक  सलाहकार कौशिक बासु ने २०१२ में भी यही कहा था बस इसको स्वीकार करने में २ साल लग गए चलो "देर आएद दुरुस्त आएद".

 देश कि राजनीत में महात्मा गांधी से ज्यादा बिकाऊ नाम और कोई नहीं है इसलिए समय समय पर इसका उपयोग होता रहता है, कभी भ्रष्टाचार मिटाने कि कसम खाने में और कभी सत्ता में बैठे लोगो को हटाने में. सो

 आज भाजपाइयों ने भी "आम आदमी" की सफ़ेद टोपी का जवाब  भाजपाई "केसरिया टोपी" लगा कर राज घाट में धरना देकर दिया. कुछ आरोप प्रत्यारोप हुये फ़ोटो खींची नाश्ता हुआ और बात ख़तम. दिल्ली कि हांड कपाऊ सर्दी में धूप खाने कि इससे बेहतर जगह हो ही नहीं सकती जहाँ हरियाली में बैठे चाय पीते हुये फोटो शेशन करवाये टीवी में भी आये और अगले दिन अख़बार में भी छप जाये. इसे कहते है आम के आम और गुठलियों के भी दाम और भाजपाइयों से ज्यादा इसे कौन समझता है.

और अंत में 
डाला तो मत आप को ,किन्तु न आया काम
उलटे दिल्ली में बढे अब झाडू  के दाम
अब झाड़ू के दाम बढ़ा कर बेचे बनिए
 होकर मालामाल कहे झाड़ू को चुनिए
कहे केजरीवाल जपो झाड़ू की  माला
होगा देश त्रिशुंक वोट जो हम  को डाला
अजय सिंह "एकल"

 

Tuesday, September 17, 2013

तो मैं क्या करूँ ?

दोस्तों,
इस देश में एक प्रधान मंत्री है यह बात मैं पूरे  होशो हवास में भगवान को हाजिर और नाजिर मान कर कह रहा हूँ। आप यह सोच सकते है की यह बात तो देश के हर बच्चे तक को पता है फिर इसमें ऐसा क्या है जो आप बेफजूल  बात का बतंगड़ बना रहे है तो मैं आपको बतादूँ की बात खास है इसीलिए मैं सौगंध खा रहा हूँ प्रधान मंत्री का वजूद सिद्ध करने के लिये।
कल चंडीगढ़ के एक कार्यक्रम में मनमोहन सिंह ने गरीबो के लिए एक आवासीय योजना का उद्घाटन करते हुए कहा की देश को अब झुग्गी झोपड़ी मुक्त बनाया जायेगा लेकिन एक पत्रकार ने जब यह पूंछा की दिल्ली को यह वादा तो पाँच साल पहले किया था और वहाँ तो चार लाख से ज्यादा  झुग्गी झोपड़ी अभी भी है तो जवाब सीधा था तो मैं क्या करूँ?
आज कल देश में जैसा राजनैतिक माहौल चल रहा इसमें केवल ४ करेक्टर  फ्रंट मैं है बाकी सब साइड रोल में।इसमें सबसे पहले नम्बर पर है नरेन्द्र मोदी। संघ का एक प्रचारक जिसने देश के लिए घर छोड़ दिया हो वह सबसे महत्वपूर्ण कुर्सी का प्रत्याशी बन जाये तो चर्चा का विषय तो बनेगा ही। लेकिन उससे बड़ी बात यह है की जिस आदमी ने सारा जीवन इस कुर्सी तक पहुँचने की योजना बनाकर उन सिद्धान्तों  से भी समझोता करलिया हो जिनका उसने हमेशा विरोध किया (आप ठीक समझे मैं जिन्ना की ही बात
 कर रहा हूँ) अब उसके सामने से कुर्सी निकलती नजर आये तो वह जो कुछ भी करेगा उस पर चर्चा तो होगी ही।  लेकिन तीसरा चेहरा राहुल गाँधी जिनको पूरी कांग्रेस पार्टी प्रधान मंत्री बनाने में लगी  है और खुद राहुल न तो इसकेलिए उत्साहित दिखते है और न ही अपनी कोई योग्यता सिद्ध कर पाए है को रेस में बनाये रख कर भाजपा को वाक ओवर नहीं देना चाहती। चौथे फ्रंट खिलाड़ी खुद मनमोहन सिंह है जिन्होंने साफ़ कर दिया है की उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की परम्परा को अभी तक जिन्दा रखा है जिन्होंने एक बार कहा था की यदि इन्द्रा जी कहे तो झाड़ू भी लगा सकता हूँ उसी तर्ज पर मनमोहन सिंह ने भी गाँधी परिवार का एहसान यह कह कर उतार दिया है की मैं  राहुल के नेतृत्व में सहर्ष काम करूँगा उन्हें  देश का अगला प्रधानमन्त्री बनना चाहिये। दोनों सरदारों ने इस देश के सबसे ऊँचे पदों को  शुषोभित किया है और दोनों कांग्रेस पार्टी  की दो सबसे शक्तिशाली महिलाओं  की कृपा से यह पद प्राप्त कर पाये और दोनों ने उनका ऐहसान उतारने मैं कोई कसर नहीं छोड़ी।
कोयला मन्त्रालय में घोटाले से सम्बंधित  फाइले गायब होने की खबर पर संसद में जबरदस्त हंगामा हुआ। कोयेला मंत्री श्री प्रकाश जैसवाल जी ने अपने स्वभाव के अनुसार समस्या का निदान सुझाया और संसद को आश्वासन दिया की फाईलें ढूढी जा रही है जैसे ही मिलेगी संसद को बता दिया जायेगा,मानों फाईलें न हुई प्याज हो गया पैदावार तो खूब हुई पर बाजार में ढूढे नहीं मिल रहा।  और जब सवाल यह उठा की उस समय क्योकीं प्रधान मंत्री जी के पास ही यह मंत्रालय भी था इसलिये उनको भी जिम्मेदार माना जाये तो मनमोहन जी ने बिना देर लगाये जवाब दिया की फाईलें खो गई तो में क्या करूँ। मैं कोई चौकीदार हूँ जो रखवाली करूँ।और यह तो तब करूँ जब मुझे आलाकमान का एहसान उतारने से फुर्सत मिले।

जब मनमोहन सिंह को खबर मिली की मोदी को भाजपा ने अपना प्रधान मंत्री का उम्मीदवार बनाया है और उनको जैसा जन समर्थन मिल रहा है तो बोले की मैं क्या करूँ और जब उनकी यह कहा गया की इससे कांग्रेस और खास कर युवराज  के लिए मुश्किल खड़ी होने की सम्भावना है तो बोले की मैंने तो पहले ही यह घोषणा कर दी की मैं राहुल के अन्डर काम करके भी खुश रहूँगा फिर धीरे से बोले की इसकी नौबत ही नहीं आयेंगी मैं इस पद पर रहते हुये ऐसा कर दूँगा सरदार का असर सरदार के जाने के बाद पता चलेगा।




और अंत में

 इस नए दौर की   किताबो में , क्या  खाक तुलसी   कबीर ढूंढेंगे 
बिक गया जो चन्द  सिक्को में, उसमे हम क्या जमीर ढूंढेंगे। 
ये  तो  शतरंज   है सियासत  की , गोंटिया खुद वजीर ढूंढेंगे 
पीर अपनी हम भुला कर "शेरी", दिन दुखियों की पीर ढूंढेंगे  ।
                                                                - चाँद शेरी


Thursday, August 15, 2013

कैन वी? विल वी?

प्रिय मित्रो,
हैदराबाद  में नरेन्द्र मोदी ने वी कैन और वी विल का नारा लगा कर जनता
को झकझोर दिया तो विरोधिओं ने भी  बिना देर करे आरोप लगा दिया की मोदी अमरीका के ओबामा नहीं है वह तो मात्र उनकी नक़ल कर रहे है।  शक तो हमें भी है लेकिन वी कैन पर नहीं बल्कि इस बात पर की विल वी। रास्ता साफ़ है सीधा है  यू.पी. ए. के 9 सालके कुशासन से  नतीजे  में जनता के लिए में महगाई , भ्रष्टाचार और अथाह समस्याये ही आयी है। और इन परिस्थितिओं में नरेन्द्र मोदी का लाल किले पर पहुचना बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन रास्ता इतना आसान नहीं है  कांग्रेसियो की वजह से ही नहीं भाजपाईयों की वजह से भी।

आजादी की ६७वीं वर्षगाँठ देश के लिए जितनी महत्व पूर्ण है  मनमोहन सरकार के लिए और खास तौर  पर मनमोहन सिंह के लिए उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। मनमोहन सरकार के लिये इसलिए  कि इसकी कृपा
 से बहुत से लोग अकूत सम्पत्ति के मालिक पिछले दस सालों में  बन गये, नकारा मंत्रियों की टीम ने देश की अर्थव्यस्था को चौपट कर दिया और महंगाई की वजह से आम आदमी का जीना  मुहाल हो गया है। इस  सबसे बड़ी उपलब्धि यह की पोलियो जनता के बजाय मनमोहन सरकार को हो गया है। व्यक्तिगत रूप से मनमोहन १० बार लाल किले से झन्डा फहराने वाले देश के तीसरे प्रधान मंत्री हो गए है और वह भी अपने करिश्मे  से नहीं सोनिया की कृपा से। दूसरे की कृपा से प्रधानमंत्री बनने वाले  मनमोहन सिंह पहले और शायद आखरी प्रधान मन्त्री भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में होंगे।  

आजादी की पूर्व सन्ध्या पर मुम्बई में आइ एन एस सिन्धुरक्षक (भारतीय नौ सेना की शक्तिशाली अणु पनडुब्बी )  में रहस्यमय विस्फोट से देश और सेना विस्मय में है।  कई तरह के अनुमान लगाये जा रहे है।  एक अनुमान यह भी है की यह आतंकवादी घटना हो सकती है। पिछले कई महीनों और खास तौर पर पाकिस्तान के प्रधान मन्त्री नवाज शरीफ के आने के बाद से पाकिस्तान भारत को हर तरह से नुकसान पहुचाने  पर लगा है कभी एल ओ सी पर गोलीबारी और कभी पी ओ के में और कश्मीर में दंगे और फिर खबर आयी की स्वतन्त्रता दिवस पर पाकिस्तानी आतंकवादी  दिल्ली और मुम्बई में घुस आये  है और विस्फोट की फ़िराक में है इसलिये आश्चर्य  नहीं की यह विस्फोट भी उसी योजना का अंग हो। 

पाकिस्तान  के मुकाबले में भारत देश बहुत बड़ा है  हमारी सेना भी  बहुत  शक्तिशाली है और हम चाहे तो
पाकिस्तान का आस्तित्व  खत्म हो सकता।  पर सवाल है की विल वी ? देश की जनता यू.पी.ए.सरकार की नाकामी से दुखी है। हर ओर त्राहि -त्राहि मची है।  महंगाई, अराजकता ,भ्रष्टाचार ने आम आदमी को जीना तो  छोड़ मरना भी मुश्किल कर रखा है। कांग्रेस सरकार को बाहर का रास्ता दिखाने का मौका भी बस चन्द महीनों में ही आने  वाला है। डेमोक्रेसी में यह ताकत जनता के  हाथ में होती ही  है  इसलिये सर्टेनली वी कैन पर सवाल फिर वही है विल वी ?

और अंत मे
हम  उनसे  क्रोध   जता पूंछ  रहे है,अब तक हुई  है किस से खता पूंछ रहे है,
न जाने कौन से महल में कैद पड़ी जो,हम उस स्वतंत्रता का पता पूंछ रहे है। 


स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ 

 

अजय सिंह "एकल "

Saturday, July 20, 2013

मेढकों के कमान्डर इन चीफ

प्रिय पाठकों,
देश में फिर चुनाओं की बरसात का मौसम आ गया है और साथ ही आ गया है मेढकों की बयान बाजी का।इन मेढकों को दिशा देने  और एक तराजू में रखने के लिए दोनों प्रमुख पार्टियो ने अपने अपने कमान्डर बना दिये है। आइये देखते है इन दोनों कमांडरो की क्या स्टाइल है और यह कैसे रखेंगे अपने-अपने मेढको को अपनी कमांड में।

भाजपा के नमो मन्त्र ने देश में जितनी उथल पुथल राजनीत में इस समय मचा रखी है, आजादी  के बाद इतनी हलचल  इसके पहले जिन लोगो ने मचाई है उनमे एक है जय प्रकाश नारायण  और दूसरे है विश्वनाथ प्रताप सिंह। एक ने देश में आपात काल में जनता का नेतृत्व किया और इन्द्रा गाँधी जैसी महिला को सत्ता से बेदखल करवा कर जनता पार्टी की सरकार बनवा दी और इस तरह कभी हार ना मानने वाली इन्द्रा को जेल तक जाना पड़ा। दूसरे ने राजीव गाँधी सरकार में बोफोर्स घूस कांड को लेकर पूरे देश में जागरूकता फैलाने का अभूत पूर्व काम किया था। और राजीव गाँधी को सत्ता से ऐसा बाहर किया की कांग्रेस को मज़बूरी में नरसिंघा राव को प्रधानमन्त्री बनाना पड़ा और देश का शाही गाँधी परिवार करीब तेरह साल शक्ति हीन होकर सत्ता से दूर रहा ।

लेकिन अब परस्थितिया फर्क है।यू पी ए के दस सालों  के कुशासन ने  भ्रष्टाचार ,महंगाई और अराजकता की वजह से ऐसा माहौल देश में बन गया है की नेताओ की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया है। बी जे पी के नेता भी इसका अपवाद नहीं है। ऐसे में जनता नरेंद्र मोदी को प्रधान मन्त्री पद का सबसे शशक्त उम्मीदवार मानने लगी है और भाजपा जो अब तक देश की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी होने के बावजूद डिफेन्सिव  खेल रही थी अब लीड रोल में आ गई है। विरोधी पार्टी होने के नाते तो यह रोल ठीक है लेकिन इसकी वजह से पार्टी के अन्दर कई महत्वाकान्छी नेताओ को यह स्थिति स्वीकारने में दिक्कत हो रही है। तीसरी बार गुजरात में जीतने  के बाद नरेन्द्र मोदी ने सिद्ध कर दिया की शेर को कोई राजा नहीं बनाता बल्कि उसकी दहाड़ सुन कर बाकी लोग उसे राजा मान लेते है।अतः मज़बूरी में भाजपा के बाकी नेताओ ने इसे भाग्य मान कर स्वीकार कर लिया है। अब इन सभी लोगों को  एक साथ रखना और अगले लोक सभा चुनाव तक जोड़े रखना ताकि  अंतिम लक्ष्य प्राप्त करने तक सिर्फ लक्ष्य पर निगाहें रहे  और कोई अपनी टर्र से नई बकवास कर नये विवादों को जन्म न दे इस पर काबू पाना  मेढको को एक तराजू में तोलने से कुछ कम नहीं है और मोदी को राजनीतिक विरोधियो के साथ इस चुनोती से भी निपटना है।

मगर ऐसा नहीं है की मेंढक केवल भाजपा में है। कांग्रेसी नेता भी कुछ कम नहीं है। दिग्गी राजा यानी दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी,अजय माकन , रेणुका चौधरी जैसों की लम्बी लाइन  है मगर एक फर्क है कांग्रेसी और भाजपाईयो  में। इनको एक तराजू में तोलना सम्भव है। एक हंटरवाली के काबू में सब है और फेविकोल से  जुड़े है।सुबह शाम जी मेम साहब  और युवराज की जय बोलने के बाद इन्हें दिन भर कुछ भी टर्र -टर्र करने की छूट है शाम को एक बार इनके विचारों कों वफ़ादारी की तराजू में तोला जाता है और इसके हिसाब से इनका इनाम तय किया जाता है।जिसकी टर्र ज्यादा  उसका इनाम भी जोरदार। मंत्री से लगा कर राज्यपाल तक का पद आपको सुलभ हो सकता है पुरस्कार मे।अतः लोग जल्दी से जल्दी अपनी पोजीशन ले लेना चाहते है फिर  इसके लिये चाहे  कितनी भी टर्र करनी  पड़े।

मोदी की हर अदा पर पक्ष और विपक्ष दोनों फ़िदा है चाहे उनकी बुर्के का डायेलाग हो या बिना बुर्के का।टिकट लगा कर भाषण करना हो या बिना टिकट का। टिकट के दाम को कोई  मोदी का रेट बता रहा है और कोई इस बात  को हैवी वैट नेता की पहचान बता रहा है। बाकी नेताओ को डर सता रहा है यह नया कम्पटीसन है,उनकी बात कोई मुफ्त में तो सुनता नहीं फिर पैसे दे कर क्यों सुनेगा।क्या मुंह दिखायेंगे  जनता को किसके बूते पहचाने जायेंगे  इसलिए पूरा जोर लगाकर ख़ारिज कर दिया। वैसे आइडिया बुरा नहीं है आखिर लोग सरकस भी तो पैसे देकर ही देखने जाते है और फिल्म, टेलीविजन में भी बकवास देखने और सुनने के पैसे देते है फिर नेताओ कि बाह सिकोड़ अदा और बकवास भी मुफ्त में क्यों?  तो साहब मौसम आ गया है राग भैरवी से राग मल्हार तक सुनने को मिलेगा और पैर पटक से धोबी पछाड़ तक  देखने को  मिलेगा इस चुनावी साल में।बस थोड़ा इन्तजार कीजये और देखते जाईये आगे आगे होता है क्या ।

और अन्त में
सिर्फ खन्जर  नहीं आंख में पानी  चाहिये 
ऐ खुदा मुझे दुश्मन खानदानी चाहिये।


Sunday, June 30, 2013

आधा सच आधा झूठ

प्रिय मित्रो,
बीड से भाजपा   के मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट और लोकसभा में उप नेता विपक्ष  गोपी नाथ मुंडे ने पिछले दिनों एक समारोह में रहस्योद्घाटन करते हुए बताया की उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में आठ करोड़ रूपये खर्च किये और साथ ही चालीस लाख खर्च करने की चुनाव योग द्वारा   तय की गयी सीमा को ख़ारिज कर दिया।  क्योंकि इस महंगाई के ज़माने में इतने पैसे में चुनाव जितना लगभग असम्भव है।समाचार पत्रों और दूरदर्शन पर इनदिनों बड़ी बहस इस बात पर हो रही है की क्या केवल गोपीनाथ मुंडे ने
खर्च सीमा का पालन न कर कानून तोड़ा है? या यह तो सभी कर रहे है बस स्वीकार गोपी ने किया है? तो गोपी नाथ को सच बोलने का इनाम दिया जाये और बाकी लोगो की जाँच की जाये की उन्होंने कितने पैसे खर्च कर चुनाव जीता है और इतने पैसे इनके पास कहाँ से आये यानि इस आय   का श्रोत क्या है?  या  सजा मुंडे को मिले क्योंकि इस देश में  झूंठ बोलना बड़ी सामान्य बात है और आमतोर पर सजा सच बोलने वाले को ही मिलती है ? चलिये देखते है सच बोलने की सजा मिलेगी या झूठ बोलने का इनाम।

मगर  झूठ केवल  चुनाव खर्च बताने में नेता बोलते है ऐसा नहीं है। पिछले सप्ताह उत्तराखंड में आयी विपदा में किस नेता ने  कितना झूठ बोला इसका हिसाब तो कैग भी अपनी जाँच से नहीं पकड़ पायेगा। दरअसल बहुआयामी झूंठ बोलना  जितना आसान होता उसको पकड़ना उतना ही मुश्किल। दुर्घटना में कितने लोग मारे गये और कितने बचाये गये , सहायता पहुचाने में देर क्यों हुई और सहायता के लिए भेजे गए हजारो करोड़ रुपयों  में से कितने रूपये उन लोगो के पास पहुँच पाये जिनके लिए भेजे गए थे और कितने नेता और दलाल मिल कर खा गये,इन सब विषयों पर चर्चा चाहे जितनी हो हम सब को पता है की सच्चाई  का पता लगना असम्भव है और यह भी की किस नेता ने कितना सच और कितना झूठ बोल कर अपने लिए पैसे और सहानभूति बटोर कर अगले चुनाव में जीते जाने का प्रबंध कर लिया है। आम आदमी तो केवल इनकी आधी  सच और आधी  झूठ बातों को सुन कर केवल इतना ही कह सकता है की चलो आधा सच बोल कर भी इन्होने अहसान ही किया है वर्ना हम कोई इनके पूरे  झूठ पर भी इनका क्या कर लेते। .

हमारे जैसे करोड़ो आम आदमियो  की ताकत तो केवल यह विश्वास  ही है जो बताता है सत्य मेव जयते । बस इसी  विश्वास की वजह से ही  आम आदमी इतनी मुसीबत के बावजूद भी अगले चुनाव में वोट देने के लिए जिन्दा है। और जिन्दा है नेताओ का आधा झूठ और आधा सच सुनने के लिए।

अजय सिंह "एकल"

Saturday, June 1, 2013

गुबार देख रहें है हम, गुजरते कारवां का

मित्रो,
समय का चक्र अबाध गति से घूम रहा है और कारवाँ हमारे सामने से  हर छण गुजरता जा  रहा है।आप इसका हिस्सा जानबूझ कर बन जाये और होशोहवास में रह कर इसके गवाह बने तो अच्छा, नहीं तो यह सबकुछ तो होने वाला है ही बस आपको ही पता नहीं चलेगा की जीवन की कब शाम हो गयी और जब आप पीछे मुड़ कर अपने योगदान का मूल्यांकन करेंगे तो लगेगा की जो कुछ कर पाए वह काफी नहीं था और इससे बेहतर करने की सम्भावना थी लेकिन चूक  गये।

बस यही सोच कर शायद  अरुणा राय, सोनिया गाँधी का काफिला छोड़ दूसरे पाले  में आगयी है।कुछ लोगो का मानना है की उन्होंने सोनिया की डूबती नाव से किनारा वैसे ही किया है जैसे डूबते  जहाज में पानी भरने पर चूहे सबसे पहले बाहर निकल कर आते है। कुछ की राय यह भी हो सकती है की जब सोया हुआ जमीर जाग गया तब लिया है उन्होंने यह निर्णय।लेकिन कुछ की राय यह है कि लोग बहुत हिसाबी किताबी होते है और मौके की नजाकत के हिसाब से  पाला बदल लेते है और कभी पासा उल्टा पड़ जाय  तो बयान से ही किनारा कर लेंगे या फिर किसी और को बली  का बकरा बना देंगे। और जिस जहाज से भागे थे उसी पर फिर चढ़ जायेंगे।
कभी जेन्टिल मैनो  का खेल समझा जाने वाले  क्रिकेट   के खेल में कितना घाल मेल है इसका पता सभी को है। इसी लिए इसके मलाई दर पदों पर राजनेता काबिज है जिनका दूर- दूर तक क्रिकेट से कोई लेना देना नहीं है। राजीव शुक्ल से लगा कर लालू यादव तक इनके पदों पर मजे उड़ाते हुये बयान  देते है की खेलो में राजनीत नहीं
होनी चाहिये। और मजे की बात यह की यह भी राजनीत होती है। तीन  साल पहले ललित मोदी इसी खेल के कमिश्नर थे और जब उनकी तिकड़म पकड़ी गयी तो हिंदुस्तान छोड़ लन्दन में जा कर बस गये। फिर उनसे ज्यादा बड़े खिलाडियो मसलन राजीव शुक्ला और शरद पवार जैसे दिग्गजों ने कमान सम्भाली, मलाई खाई बदनामी की टोपी पहनाई और चलने की तैआरी कर ली।इस खेल से किसका भला हो रहा है यह  सभी को पता है फिर भी हमारी सहने की क्षमता देखिये की हम विरोध केवल उतना ही करते है की विरोध करते हुए दिखे, लोग हमको ईमानदार समझे और   खेल चलता रहे।

जिस मामले की वजह से से क्रिकेट अभी चर्चा में आया है वोह है सट्टे बाजी।अब कोई गरीब आदमी तो सट्टे  बाजी  करेगा नहीं, इसलिए बड़े लोगो के चमचो ने इसे लीगल ठहराने की मुहीम चला दी है। तर्क यह है की दुनिया के बहुत से देशो में यह लीगल है। लेकिन अगर इनसे कोई पूछे जिन देशो की बात यह लोग कर रहे है वहाँ कितने लोग ऐसे है जो भूख से मरते है या इतने गरीब है की दो जोड़ी कपडे भी नसीब नहीं है तो इसका जवाब शायद ही दे पायें। दर असल जब से सुधारो का दौर इस देश में शुरू हुआ है तब से यह एक आम बात हो गयी है की बात -बात में अमरीका और इंग्लैंड से  सुविधा की तुलना करना। लेकिन जब देश के लिए काम करने   या त्याग करने की बात हो  तो खाटी हिन्दुस्तानी बन जायंगे और दूसरे  को दोष दे कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेंगे ।असल में  यह क्लास  मलाई खाने का इतना आदी  हो गया है कि  अमरीका और यूरोप में रह कर जिन्दगी के मजे उठाता है जब मलाई खाने की बात हो तो हिंदुस्तान आ जाता है और जब देश के लिए  कुछ करने की बात हो तो अपनी मजबूरिया गिनवाता है।

आज सुबह पार्क में घूमते हुए एक 12-13 साल के बच्चे से मुलाकात हुयी जो चंडीगढ़ में रहता है देश के एक अत्यंत नामी  गिरामी स्कूल में  कक्षा ९ का विद्यार्थी है। उससे थोडा परिचय किया तो एक आश्चर्य जनक बात यह पता चली की उसके स्कूल में कबड्डी का खेल कभी नहीं हुआ  और तो और कभी चर्चा भी नहीं हुई  इसलिए इसके बारे में उसे कुछ भी पता नहीं था। मुझे आश्चर्य इसलिए हुआ की इस खेल में भारत को अन्तर्रष्ट्रीय प्रतियोगताओ  में अनेक इनाम मिले है और एशियन  गेम्स की प्रतियोगिताओ में यह  खेल नियमित
 खेला  जाता है। क्या इस देश के खेल मंत्री कोई ऐसी नीति बना सकते है की अन्तरराष्ट्रीय खेलो में खेले जाने वाले सभी खेलों  के बारे में  न्यूनतम जान कारी सभी बच्चो को  स्कूलों में करवाई जाये और फिर जिसकी जिस खेल में रूचि हो उसमे वह जा सके। आखिर क्रिकेट ,फुटबाल और हाकी ही खेल नहीं है बाकी  खेलो में भी  तमाम अवसर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध है। इसलिए सभी खेलो के बारे स्कूल स्तर पर बच्चों को पता चले और खेलने का अवसर मिले ताकि खेल प्रतिभा  का विकास वही से शुरू हो और देश  के लिए अन्तराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी पैदा हो सके और भारतको सम्मानित स्थान खेलो में भी प्राप्त हो। आखिर सवासो  करोड़ के देश में हम सौ खिलाड़ी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के क्यों नहीं पैदा कर पा रहे है?देश के नीति नियन्ता इस प्रश्न पर विचार कर खेलो को प्रोत्साहन देने वाली नीतियाँ क्यों नहीं बनाते है।



और अंत में
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो  गोय 
सुन इठ्लाइए  लोग सब बाँट न लेहे  कोय .



अजय सिंह"एकल"

Friday, May 17, 2013

उम्र न पूछों नेता की

मित्रो,
यह तो आपने सुना ही होगा   कि औरतों  की उम्र और मर्द की कमाई नहीं पूछनी चाहिए। पर जनाब समय ऐसा बदल गया है कि  अब नेता और अफसरों चाहे वह मर्द हो या औरत की उम्र और कमाई आप कुछ भी  न पूंछे तो ही ठीक है।बात दरअसल यह है की पहले जब आप उम्र और कमाई पूछते थे तो वह व्यक्ति केवल उस समय का फैक्ट और फीगर बता देता था अर्थात  सूचना टू डाईमेंसनल हुआ करती थी। समय बदला लोग बदले और बदल गए सदाचार के नियम और फिर हम उन्नति भी तो कर गए है । इसलिये अब इसमें एक डाईमेंसन और जुड़ गई है अर्थात अब किसको बता रहे है उसके हिसाब से उम्र और आय बतानी पड़ती। जैसे मनमोहन सिंह ने पिछले चुनाव जो सन 2007 में हुए थे अपने को 74 का बताया था वही मनमोहन    सन 2013 में चुनाव आयोग के सामने हलफ नामा दे रहे  है की उनकी  उम्र 80 के बजाये 82 साल  हो गयी है। अर्थात उम्र अंकगणित के हिसाब से नहीं बढ़ी  बल्कि महंगाई की तरह बे काबू है, अब कर लो जो करना है। और नेता ही क्यों आर्मी के पूर्व प्रमुख जनरल वी के सिंह भी देश की 32 साल सेवा करने के बाद भी मन नहीं  भरा  एक  और साल देश सेवा करने का मन किया तो बस घटा दी उम्र एक साल।

कमाई तो आप नेता और अफसर की पूछने की गलती न ही करे तो ही ठीक है वर्ना पता चलेगा की जिन्दगी  भर में कुल तनखा मिली २ करोड़ और नौकरी से रिटयारमेंट के बाद सौ करोड़ के मालिक है। अभी दो साल पहले ही मध्य प्रदेश के एक आइ ए एस दम्पति के पास तीनसो करोड़ से भी ज्यादा की सम्पत्ति की मल्कियत का पता चला। और ये ही क्यों रोड ट्रांसपोर्ट और मैनुस्पल्टी के  बाबू से लगा कर इंजिनिअर तक सब करोड़पती  है इस देश में ।

 यदि आप नेताओ  की कमाई का हाल जानने की कोशिश करेंगे  तब  तो  फिर बस भगवान  ही मालिक।उत्तर प्रदेश में बहन जी के राज्य में बने एक पूर्व परिवहन  मन्त्री की हैसियत  पाँच साल में एक करोड़ से एक हजार  करोड़ हो गयी।लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई  बात नहीं है।  जब उनकी आका मायावती  पाँच साल में पाँच  हजार करोड़ से ज्यादा कमा सकती है तो उनके मातहत का इतना हक़ तो बनता ही  है। लेकिन यह  हाल तो  है छुट भईया नेताओ का। अब अगर नेता केंद्र में हो और जरा जमा हुआ भी हो फिर तो इतने पैसे तो एक साल में ही हो जाते है। देखिये न एक -एक ट्रान्सफर और  पोस्टिंग का खर्चा और लगाईये कमाई का हिसाब।अरे नेता तो छोड़िये साहब साले, भांजे और जीजा तक की कमाई हजारो करोड़ है। अब जनता भूखी मरे तो मरती रहे नेताओ ने क्या ठेका लिया है  जनता का ? पाँच साल में एक बार वोट ही तो दिया था।उसके बदले दे तो दिया मनरेगा की स्कीम और गैस की सब्सिडी।और उतार दिया जनता का एहसान।
 डेमोक्रटिक देश के ईमानदार प्रधान मंत्री  का हाल देखिये कहते है कि उनके  पास अपनी  पन्द्रह साल पुरानी मारुती कार है बस। बहुत खूब मनमोहन सिंह जी। आपके योजना आयोग के उपाध्यक्ष कहते है  29रुपये रोज से ज्यादा कमाने वाला गरीबी रेखा के ऊपर और आपके पास  पन्द्रह साल  पुरानी कार। कही इसी वजह से तो देश का प्रोडक्शन नहीं घट रहा और मंदी आ गयी  है। लेकिन  जनता को आपके पास बड़ी कार न होने का कारण समझ में आ गया है। आखिर जब  बड़ी-बड़ी कारे  सरकार के खर्चे पर ड्राईवर और ईंधन के साथ सब्जी लाने   से लेकर बच्चो को स्कूल पहुचाने के लिए उपलब्ध  है तो क्या जरुरत है अपने पैसे खर्च करने की। जब सब कुछ मुफ्त में  सरकारी खर्चे पर मिलता है तो फिर  क्यों पड़े झंझट में। अब आप  कोई आम आदमी तो है नहीं जो नोन तेल लकड़ी का हिसाब लगाते घूमे।




और अंत में  
सरकार हमारी अपनी है,  और ये बस तो सरकारी है 
हम क्यों टिकट ख़रीदे, अपनी तो  बस कंडक्टर से यारी है। 

अजय सिंह "एकल"

Sunday, May 5, 2013

घोर कलयुग आ गया है

 दोस्तों,
वैसे तो कलयुग आये कई सौ साल हो चुके है और इस समय के समर्थन में कई लोगो ने जैसी भविष्यवांणियाँ   की थी वह  सच भी हो रही है जैसे कहा गया कि  "हंस चुनेगा दाना कौवा मोती खायेगा" तो आप आजकल  देश में कौओ को मोती खाते आसानी से देख सकते है। पर पिछले दिनों तो बस कमाल ही हो गया,आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या हो गया की घोर कलयुग दिखने लगा है।तो आप को याद  दिला  दे की  द्वापर यानि कलयुग  से पहले वाले युग में आपने कंस मामा को अपने भांजे कृष्ण और शकुनी  मामा को भांजे दुर्योधन का  बेड़ा गर्क करते सुना होगा।अब  भांजे विजय सिंगला ने मामा और देश के रेल मंत्री पवन बंसल का बेड़ा गर्क किया है यानि अब मामा ने भांजे का नहीं बल्कि भांजे ने मामा को पलिता लगा कर  घोर कलयुग के आने  की घोषणा की  है ।

लेकिन इसी कलयुग में  सतयुग में हुई एक  घटना की पुनरावृत्ति भी हो रही है। यानी विभीषण ने एक बार फिर
रावण की लंका ढहाने का काम घर के भेदिया होने के कारण कर दिया है। आपने  ठीक समझा पिछले पाँच सालों में कर्नाटक की सत्ता पर काबिज भा .जा .पा .के पूर्व मुख्यमंत्रियो विशेष रूप से यद्दुराप्पा जी ने अपनी पार्टी बना कर कर्नाटक में कांग्रेस का रास्ता आसान  कर दिया है।और अपनी पूर्व पार्टी को धूल चटा कर "न खायंगे और न खाने देंगे" की कहावत को चरितार्थ किया है। वैसे यदुरप्पा और विभीषण में कई और समानताये भी है, मसलन दोनों ब्राह्मण है और दोनों दक्षिण भारत से आते है।

कांग्रेस ब्यूरो आफ इन्वेस्टीगेशन यानी सी. बी .आइ. के प्रमुख को बुला कर कोल घोटाले की रिपोर्ट को मन मुताबिक बदलवाने का महत्वपूर्ण काम करवा कर अश्वनी कुमार यानि देश के कानून मन्त्री ने कोल घोटाले में   फँसे अपने साथियो और पार्टी के प्रति वफ़ादारी का जो प्रदर्शन किया है उससे मोगेम्बो यानी  मनमोहन सिंह  और टीम तो जरुर खुश हुए है और इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पड़ी के बावजूद पूरी कांग्रेस पार्टी मजबूती से अश्वनी के पक्ष में खड़ी है और घोषणा कर दी है की जाँच पूरी होने तक इस्तीफे का  तो सवाल  ही नहीं और कांग्रेस के शासन में रहते जाँच पूरी हो जाये इसका भी कोई सवाल नहीं। यानी  यदि अगले चुनावो में यू . पी . ऐ . हार जाये तो ही इन घोटालो की जाँच हो सकती है नहीं  तो देश लुटेरों के हाथ लुटता ही रहेगा और फिर भगवान  ही मालिक है इस  देश का।

और अंत में  
आंधियों के बीच जो जलता हुआ मिल जायेगा 
उस दिए से पूछना मेरा पता मिल जायेगा।

अजय सिंह "एकल "


Sunday, April 7, 2013

जाकी रही भावना जैसी ........

दोस्तों,
यह कोई पहली बार नहीं है जब भारत  की उपमा किसी ने  माँ या मधुमक्खी से की  है। इससे पहले उस समय  देश की प्रधान मंत्री और राहुल की   दादी मां की  तुलना  इंदिरा इज इंडिया कह कर की थी।जमाना  आपात काल का था और   उनकी चौकड़ी के एक सदस्य ने  ऐसी तुलना करके पहली बार चमचा गिरी के नए कीर्तिमान स्थापित किये थे और उसकी जब किरकिरी  हुयी तो  कांग्रेस चौकड़ी  के लोगो ने बड़े -बड़े तर्क दे कर उसको तर्क सिद्ध करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी । उत्तर प्रदेश के एक पदासीन मंत्री आजम खान  भारत माँ की तुलना डाईन से भी  कर चुके है और शान से मंत्री बने हुये है। इतिहास ने एक बार  फिर अपने को दोहराया है।

अब राहुल ने भारत की तुलना मधुमक्खी के छत्ते से की है। ऐसा नहीं है की मधुमक्खी में कुछ गुण नहीं है।यहअत्यंत मेहनती होती है और शहद के लिए बड़ी दूर दूर तक जाती है और  खास बात यह की सारी मक्खियाँ रानी मक्खी के लिए काम करती है। अब राहुल ने जन्म से यही देखा है पहले दादी मां और अब उनकी माँ रानी  मक्खी  बनी बैठी है और ऐसा  लगता है कि  पूरा देश  उनके लिए  मधुमक्खियों की तरह ही मेहनत से काम कर रहा  है। और ख़ास बात यह कि   यदि कोई उस छत्ते को हाथ लगायेगा तो  सारे   कांग्रेसी नेता मधुमक्खियों  की तरह ही पीछे लग जायेंगे। क्योंकी  रानी मधुमक्खी के लिए काम करते हुये कुछ शहद तो इनके हाथ भी लग जाता है।बस यही फर्क है, इसीलिए देश    मधुमक्खी नहीं है क्योंकी वहाँ बाकी मक्खियाँ रानी मक्खी के लिये पूरी ईमानदारी से काम करती है और यहाँ रानी के लिए काम करते हुए कुछ  शहद काम करने वाले  अपने लिए निकाल लेते है  जैसे की टू जी और कोल गेट जैसे अनंत घोटालों में पिछले सालो इस देश में हुआ  है। इसी वजह से राहुल के बयान पर तरह तरह के तर्क उनके मंत्री दे कर  उसको तर्क सिद्ध करने की कोशिश कर रहे है।
राहुल ब्रिगेड के सबसे उर्जावान सूचना और प्रसारण मंत्री ने राज उजागर करते हुए बताया की भ्रामरी देवी का एक मंदिर उत्तरांचल  में है और मधु मक्खी से देश की तुलना का  बयान देते हुए राहुल के दिमाग में वह देवी थी  इसलिए उन्होंने  भारत देश की तुलना   मधुमक्खी से  की थी। दूसरे उर्जावान  मंत्री राजीव शुक्ला साहब बताते है  की भाजपा को मुहावरे नहीं समझ आते है। इसलिये वह राहुल के बयान को समझ नहीं पाए है और बात का बतंगड़ बना रहे है। और इस तरह से राहुल कवच बनने की कोशिश कर रहे है।ठीक ही  है आखिर आदमी अपने स्वार्थ के आगे न देखने की प्रैक्टिस करके ही  वहाँ  तक पहुँच सकता जहाँ तक आप लोग पहुंचे है वर्ना आपसे ज्यादा काबिल लोग तो सैकड़ो पड़े है आपकी पार्टी में और  देश में तो हजारों  धक्के खा रहे है।आखिर जब आपको आपकी चमचा गिरी  का इनाम मिल जाये तो भी आपको यह लगातार करते रहना पड़ता है लगातार शहद पाने के लिये।

एक आदमी जिसने पूरा जीवन देश सेवा में  लगाया हो और सोते जागते केवल देश की भलाई का सपना  देखता हो सुबह शाम भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में विश्व गुरु बनाने की कल्पना और प्रार्थना करता हो तो निश्चित रूप से उसके लिए भारत माता ही हो सकती है। क्योकि कोई भी तर्क संगत बात करने वाला  बुद्धिमान  व्यक्ति शहद के लिए यह सब नहीं करेगा।और उसके लिए ही क्यों आखिर भगत सिंह   और उनके जैसे
अनगिनत क्रन्तिकारी साथियों ने हँसते हँसते फांसी का फंदा मधुमक्खी के लिए नहीं भारत को माँ समझ इसको  स्वाधीन कराने को चूमा था।गुरू गोविन्द सिंह सरीखे लोगो ने अपने बच्चो को जिन्दा दीवार में मधुमक्खी के छत्ते के लिए नहीं भारत माता की आन बान  और शान बचाने के लिए किया था। और महाराणा प्रताप ने भी घास की रोटी  मधुमक्खी के छत्ते को बचाने के लिये नहीं बल्कि भारत को अपना जन्म देने वाली माता से भी ज्यादा प्यार और सम्मान देने के लिए
खाई थी। लेकिन विदेशी माता और भारतीय पिता की सन्तान राहुल को तो देश भारत माता के बजाये रानी माँ के लिये शहद इकट्ठा करने का टूल ही दिखाई देगा।और आश्चर्य नहीं की अन्दर खाने मन में यह बात भी हो की शहद इकट्ठा होने के बाद इसको बर्तन  में   भरकर कहीं  ले भी  जाया  जा सकता है।

ठीक ही है पत्थर में भगवान देखने वाले को पत्थर के बने खम्बे से भी भगवान निकलते नजर आते है वर्ना भगवान के अस्तित्व को भी हलफ़नामा देकर नकारा  जा सकता है।ऐसे ही लोगो के लिए तुलसी दास ने चार सौ साल पहले कहा था
 
जाकी रही भावना जैसी प्रभु  मूरत देखी तिन तैसी
अब हमारे जैसे  मधुमक्खी की तरह  मेहनत  करने वाले  लोग तो केवल ईश्वर से इन लोगो को सद्बुद्धि  देने की प्रार्थना ही कर सकते है।और यह कामना भी कि  हमारा लाया और कमाया हुआ शहद खाये कोई भी लेकिन कम से कम देश में ही रहे और देश के काम आये।


और अंत मे  

वो जिसके हाथ मैं छाले हैं ,पैरों मैं बिंवाई है 
उसी के दम से रौनक आपके बंगले मैं आयी है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखो में गाँधी जी के चेलो की कमाई है।

अजय सिंह "एकल "