Thursday, January 28, 2016

आज कल के हालात पर पत्रकारो/मिडिया को नसीहत

आज कल के हालात पर   पत्रकारो/मिडिया को नसीहत 

आज कलम का कागज से ,मै दंगा करने वाला  हूँ,.
मीडिया की सच्चाई को मै ,नंगा करने वाला हूँ।

मीडिया जिसको लोकतंत्र का ,चौंथा खंभा होना था,
खबरों की पावनता में ,जिसको गंगा होना था। 

आज वही दिखता है हमको,वैश्या के किरदारों में,
बिकने को तैयार खड़ा है ,गली चौक बाजारों में।

दाल में काला होता है ,तुम काली दाल दिखाते हो,
सुरा सुंदरी उपहारों की,खूब मलाई खाते हो।

गले मिले सलमान से आमिर,ये खबरों का स्तर है,
और दिखाते इंद्राणी का ,कितने फिट का बिस्तर है।

म्यंमार में सेना के ,साहस का खंडन करते हो,
और हमेशा दाउद का,तुम महिमा मंडन करते हो।

हिन्दू कोई मर जाए तो ,घर का मसला कहते हो,
मुसलमान की मौत को ,मानवता पे हमला कहते हो।
लोकतंत्र की संप्रभुता पर ,तुमने कैसा मारा चाटा है,
सबसे ज्यादा तुमने हिन्दू,मुसलमान को बाँटा है।

साठ साल की लूट पे भारी ,एक सूट दिखलाते हो,
ओवैसी को भारत का तुम ,रॉबिनहुड बतलाते हो।

दिल्ली में जब पापी वहशी ,चीरहरण मे लगे रहे,
तुम एश्श्वर्या की बेटी के,नामकरण मे लगे रहे।

दिल से' दुनिया समझ रही है, खेल ये बेहद गंदा है,
मीडिया हाउस और नही कुछ,ब्लैकमेलिंग का धंधा है।

गूंगे की आवाज बनो ,अंधे की लाठी हो जाओ,
सत्य लिखो निष्पक्ष लिखो ,और फिर से जिंदा हो जाओ।
 

(उपरोक्त कविता व्हाट्स अप पर प्राप्त हुई है )

Thursday, December 31, 2015

सोने की चिड़िया भारत

 
 

 दोस्तों ,

जिंदगी में कभी -कभी ऐसे क्षण आते की समझ में नहीं  आता  की रोऊँ या हसूँ। साल खत्म होते होते टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे एक संचार को पढ़ने  के बाद मेरा यही हाल हुआ,अब यह आप पर निर्भर करता है की आपको यह कैसा लगता है। 

समाचार यह है की देश  अनुमानित साढ़े तीन लाख भिखारिओ में करीब पाँचवा हिस्सा यानि 70000 लोग कम से कम सीनियर सेकेंडरी अर्थात 12 वी पास है। मुझे लगा की सोने चिड़या कहा जाने वाला यह देश वाकई महान है। जहाँ के भिखारी भी  इतना पढ़े लिखे हो उस देश का यारों क्या कहना। 

लेकिन यही डिस्कशन जब मैंने अपने मित्र से किया तो उन्होंने तो पूरे आधे घंटे का भाषण यह समझाने के लिए से डाला की 1835 में   मैकाले  नामक अगंरेज ने हिंदुस्तान में आकर यहाँ की शिक्षा व्यस्था इतनी ख़राब करवा दी किअब इस देश में ज्यादातर लोग इसी मानसिकता के  है हालांकि उनका व्यसाय भीख माँगना ही हो यह आवश्यक नहीं है। उदाहरण के लिये देश के स्वतन्त्र होने के करीब ६८-६९ वर्षो के बाद भी हमारे नेता लोग पूरी दुनियाँ में जा जा कर और देश की गरीबी का रोना रो कर हर तरह की सहायता प्राप्त करने में महारथ रखते है। उनकी पूरी कोशिश रही की देश का स्वाभिमान जागने न पाये और किसी हद तक मैं उन्हें अपने काम में सफल भी मानता हूँ। 

मागने की आदत केवल नेतावों की है  यह कहना भी शायद उनके साथ ज्यादती होगी। देश के किसी भी मन्दिर में आप जाये तो आपको पता चलेगा की गरीब आदमी मंदिर के बाहर और अमीर मंदिर के अन्दर कुछ न कुछ मागने में ही लगा हुआ है।  इतना ही नहीं  इससे भी एक कदम आगे चले और अच्छी खासी आमदनी वाले  से भी यदि आप किसी की सहायता करने के लिये निवेदन करें तो वोह आपको अपंना ही दुखड़ा सुनाने लग जायेगा और थोड़ा चालाक हुआ तो पिछले दिनों उसने कहाँ - कहाँ दान किया है इसका पूरा विवरण आपको  देकर कर विश्वास दिला देगा  की इस युग में कर्ण वही है। 

चलिए हम भी कहा  से कहा पहुँच गये। जिन्दगी का  एक और   वर्ष  खत्म होने में बस २० घण्टे बचे है। जल्दी से 2015 में  कुछ करना बचा है उसे फटाफट निपटाया जाये ताकि नए साल में हम अपना हुनर फिर दिखा सके। और जाते हुये साल को अलबिदा कहकर नए का स्वागत करे।


 और अन्त में 

 क्या किया मैंने  अधिक ,जो नहीं कर चुका संसार अबतक
वृद्ध जग को क्यों अखरती है क्षणिक मेरी जवानी
मैं छिपाना जानता  तो जग मुझे साधु समझता
शत्रु मेरा बन गया है छल रहित व्यहार मेरा।
                                                                             --हरिवंश राय बच्चन 

अजय सिंह "जे  एस के "


मोदी की बिना योजना लाहौर यात्रा


कवि गौरव चौहान: (मोदी की बिना योजना लाहौर यात्रा का विरोध करने वालों को जवाब देती मेरी नई कविता)
रचनाकार-गौरव चौहान इटावा उ प्र 9557062060

 
जिसकी आँखों में भारत की उन्नति का उजियारा है,
जिसकी गलबहियां करने को व्याकुल भी जग सारा है,
अमरीका जापान चीन इंग्लैंण्ड साथ में बोले हैं,
  घूम घूम कर जिसने दरवाजे विकास के खोले हैं,


जिसके सभी विदेशी दौरे सफल कहानी छोड़ गए,
बड़े बड़े तुर्रम खां तक भी हाथ सामने जोड़ गए,
यूरेनियम दिया सिडनी ने,रूस मिसाइल देता है,
बंगलादेश सरहदों पर चुपचाप सुलह कर लेता है,

उन्ही विदेशी दौरों की अब खिल्ली आज उड़ाते हैं?
देश लूटने वाले उसको कूटनीति सिखलाते हैं,
कायम था ग्यारह वर्षों से,वो वनवास बदल डाला,
मोदी ने लाहौर पहुंचकर सब इतिहास बदल डाला,

जिस धरती पर हिन्द विरोधी नारे छाये रहते हैं,
जिस धरती पर नाग विषैले मुहँ फैलाये रहते हैं,
जिस धरती पर हाफ़िज़ जैसे लेकर बैठे आरी हों,
और हमारे मोदी जी की देते रोज सुपारी हों,

जहाँ सुसाइड बम फटते हैं रोज गली चौराहों में,
बारूदी कालीन बिछी है जहाँ सियासी राहों में,
जहाँ होलियाँ बच्चों के संग खेली खूनी जाती हों,
बेनजीर सी नेता भी गोली से भूनी जाती हों,

उसी पाक में पहुंचे मोदी,शोर मचाया संसद ने,
सभा बीच रावण की देखो पैर जमाया अंगद ने,
बिना सुरक्षा बिना योजना जाना एक दिलेरी है,
लगता है उलझन सुलझाने में कुछ पल की देरी है,

लाहौरी दरबार समूचा ही अंगुली पर नाचा है,
पड़ा मणीशंकर के गालों पर भी एक तमाचा है,
ये गौरव चौहान कहे अब देखो जिगरा मोदी का,
जांबाजी से भरा हुआ है कतरा कतरा मोदी का,

अंगारों को ठंडा करदे,उसे पसीना कहते है,
इसको ही तो प्यारे छप्पन इंची सीना कहते हैं,
------कवि गौरव चौहान(कृपया मूलरूप में ही शेयर करें,कटिंग,पेस्टिंग और जरा सी भी एडिटिंग न करें)

                                                     और  अन्त में 
 बगैर  पाकिस्तानी  वीज़ा लिए अपने 120 सिपहसालारों के साथ
पाकिस्तान में मौजूद था हमारा  पीएम मोदी


ये देख अभिनेता राजकुमार का एक डायलॉग फिर याद आ गया


जानी ,,,,, हम तुमसे मिलेंगे ,,ज़रूर मिलेंगे
लेकिन वो ज़मीन भी तुम्हारी होगी,,,,
प्लेन भी तुम्हारा होगा,,,
पार्टी भी तुम्हारी होगी,,,
लेकिन वक़्त हमारा होगा।
अजय सिंह "जे एस के "

Saturday, December 26, 2015

निर्भया काण्ड के आरोपी की रिहाई के विरुद्ध भारत की आवाज

निर्भया काण्ड के आरोपी की रिहाई के विरुद्ध भारत की न्याय व्यवस्था को निर्भया के स्वर में धिक्कारती नयी कविता। स्वयं पढ़ें और अधिक से अधिक शेयर करें। नीति नियन्ताओं के कानों तक पहुंचनी चाहिये निर्भया की आवाज।
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जिसके वहशीपन से मेरी सांस का धागा टूट गया
बहुत दुखी हूँ तुम्हें बताते मेरा कातिल छूट गया
रौंद गया जो मेरे सपने जिसने मुझको मारा था
केवल मेरा नहीं था वो मानवता का हत्यारा था

मेरी भी अभिलाषा थी मैं खूब उड़ूँ पक्षी बनकर
लेकिन मेरे जीवन में वो आया नरभक्षी बनकर
सीधा साधा मेरा जीवन, कुछ घंटों में बदल गया
सुनकर जिसका क्रूर कृत्य दिल बड़े बड़ों का दहल गया

जिसके कुकृत्य से शर्मशार भारत माता की कोख हुई
उसकी सजा बढ़ाने को जब हाईकोर्ट से रोक हुई
तब मुझे लगा कि भारत शायद अब भी जाग नहीं पाया
किसको कौन सजा देनी है यह भी जान नहीं पाया

उसको बच्चा मान लिया जो जल्लादों से बद्तर है
सच कहती हूँ आज की पीड़ा उस पीड़ा से बढ़कर है
मेरा कातिल निर्भय होकर जब सड़कों पर घूमेगा
लाचार व्यवस्था पर भारत की बच्चा बच्चा थूकेगा

न्याय की आशा में थी मैं तो मेरे संग में घात हुआ
मेरे संग भी वही हुआ जो अरुणा जी के साथ हुआ
सिंघासन पर मुट्ठी भींचे द्रोण नहीं हो सकती हूँ
मौन रहो तुम लोग मगर मैं मौन नहीं हो सकती हूँ 

मैं पूछ रही हूँ तुम सबसे क्या किया करोगे क्या आगे
जिससे कोई किसी बहन की लाज की देहरी न लांघे
इस अंधे कानून की आँखों से पट्टी हटवाने में
कितनी लाशें और लगेंगी ये पट्टी खुलवाने में

Friday, December 11, 2015

हिट एंड रन, बड़े आराम से

दोस्तों,
कल सलमान खान के हिट एंड रन केस का निर्णय हाई कोर्ट ने सुना दिया। कोर्ट ने कहा की सलमान के खिलाफ सुबूत पुख्ता न  होने के कारण सन्देह का लाभ उन्हें देते हुए केस से रिहा कर दिया गया है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की,कि पुलिस के जिन लोगों ने इस केस की जाँच की उन्होंने उसमें अनेक गलतियाँ की जिससे केस कमजोर हुआ और गुनाह साबित नहीं हो सका। लेकिन कोर्ट ने पुलिस के खिलाफ किसी कार्यवाही किये जाने
का कोई आदेश नहीं दिया। पूरे केस में अब तक तेरह साल निकल गये है। यदि केस को लेकर महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट  तो कुछ और साल आराम से निकल जायेंगे। घटना में जिस गरीब की मृत्यु हुई उसके परिवार वालों को इस निर्णय से घोर  निराशा हुई जो उनकी अंतिम उम्मीद थी।

इस निर्णय की चारों तरफ चर्चा हो रही है। सुरेश जरीवाला मोदी के बड़े मुस्लिम समर्थक है और गुजरात से आते है उन्होंने कहा की " हम तो पहले से कह रहे थे की सलमान निर्दोश और उन्हें जान कर फँसाया  गया था। कई और नामी गिरामी फ़िल्मी और सामाजिक  हस्तियों ने भी अपने ऐसे ही विचार प्रकट किये हैं । 

इस निर्णय से मुझे एक ज्ञान तो यह हुआ की न्यूटन का  दूसरा नियम "हर एक्शन का बराबर और उल्टा रिएक्शन" होता है  को नयी तरह परिभाषित करने  जरुरत महसूस हो रही है। नई परिभाषा कुछ ऐसी होगी "हर  एक्शन  रिएक्शन होता है लेकिन यह कब होगा, कितना होगा और होगा भी  नहीं होगा यह समय, जगह और किन  लोगो के  बीच होना है पर निर्भर करेगा। उदाहरण  के लिए यदि आपको चींटी काट ले तो आप नहीं काट सकते ,हाथी अपनी सूंड़ में लपेट कर फेक दे  तो भी आप  इसके बराबर और उलटी रिएक्शन  नहीं सकते है। यदि कोई मुस्लिम किसी हिन्दू को  गाली दे और आप हिंदुस्तान  है तो इसकी रिएक्शन  आपको इजाजत नहीं  सकती और यदि उसने आपको मार दिया हो तो उसे सक  आधार पर छोड़ा सकता है लेकिन यदि कोई हिन्दू किसी मुस्लिम को गाली दे  रिएक्शन आपकी पिटाई और जेल दोनों  सकती है और यदि हिन्दू ने मुसलमान की पिटाई  कर दी तो आपको दंगा फैलने  के डर से या उसके आरोप  जेल  तो होगी ही साथ ही आप की  सम्पति इत्यादि  जब्त  सकती है। अतः न्यूटन के   दूसरे नियम के बारे  में आप अपनी समझ को जितनी  जल्दी  ठीक कर सके उतना ही सुरक्षित आप अपने को महसूस कर  सकते है। 

इस निर्णय से दूसरी यह बात भी समझ आ गई वैसे तो शक सन्देह करना बहुत बुरा माना जाता है और इसे न करने की सीख हमेशा हम अपने लोगो तो देते रहते है लेकिन। इसके कुछ अनकहे लाभ भी है इसलिये मौका देख कर कभी कभी शक  संदेह करना देश हित  में होता है और इससे आप के पैसे कमाने की सम्भावनाये भी बढ़ती है और इज्ज़त भी। इसका क्या और कितना लाभ मिलेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा की आपके शक की क्वालिटी और उसकी टाइमिंग क्या है और उससे दूसरे आदमी का क्या और कितना लाभ हो सकता है। यानि न्यूटन का नियम यहाँ भी लागू होगा।

मुझे पूरी उम्मीद है जैसे इस नियम बारे में संशोधन बताने से आइन्स्टीन को नोबल प्राइज मिला था,उसी तरह  मेरा नाम भी इस बार के भारत रत्न के लिए रिकमेंड किया जायेगा। अन्यथा अपनी कथा की व्यथा लेकर मैं यूनाइटेड नेशन जाने के लिए स्वतंत्र हूँ। कम से कम इतनी रिएक्शन तो मेरा अधिकार है। 

अजय सिंह "जे एस के "

 


Friday, December 4, 2015

मोदी के मंत्र


दोस्तों ,
पिछले कई  महीनो से सहिष्णुता पर  छिड़े हुये विवाद पर  संसद में हुई बहस के दौरान मोदी जी ने जो बयान दिया उसे सुन कर ऐसा लगा की वही इस तरह बात कर  सकता है जिसने भारत की आत्मा  समझा हो। बहस में भारत के संविधान निर्माताओं ने जिन मार्ग दर्शक सिद्धांतो का जिक्र किया है उन्हें संसद में अपने भाषण  शामिल किया है उन्हें नीचे उद्धृत की गया है :

  • आईडिया ऑफ़ इंडिया - सत्यमेव जयते 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-अहिंसा परमोधर्म:
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-एकम सद्विप्रा:बहुधा 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-पौधे में भी परमात्मा होते है 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-वसुधैव कुटुंबकम 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-सर्वपन्थ सम्भाव 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-अप्प दीप भव 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-तेन त्यक्तेन भुंजिता 
  •  आईडिया ऑफ़ इंडिया-सर्वे भवन्तु सुखिना: सर्वे सन्तु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्च्यन्तु माँ कश्चित् भाग्भवेत
  •  आईडिया ऑफ़ इंडिया- न त्वहं कामये राज्यम ,न मोक्षम् न पुनर्भवेत् कामये दुःख -तत्पनाम प्राणिनाम आतिरनाशनम्
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड़ पराई जाने रे 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-जनसेवा ही प्रभु सेवा 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-सहना भवतु साहनो भुनक्तु सह वीर्यम् करवावहै 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया- नर करनी करे तो नारायण हो जाये
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-नारी तो नारायणी 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-यत्र नारायस्ते पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-आनो भद्र: कृत्वो यन्तु विस्वतः 
  • आईडिया ऑफ़ इंडिया-जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि  
 अजय सिंह "जी एस के"

Thursday, November 26, 2015

आमिर खान के बयान पर भावना व्यक्त करती दो भाव पूर्ण कवितायेँ


दोस्तों ,
अभिनेता आमिर खान के हालिया बयान पर भारतीयों के मन की भावना व्यक्त करती दो भाव पूर्ण कवितायेँ।  यह कवितायेँ मुझे व्हाटस अप पर प्राप्त हुई है।


 
शाहरुख़ का मुँह बन्द हुआ था फिर से आमिर बोल गया ।
भारत माँ के शीतल चन्दन पर वो अपना विष घोल गया ।।
सत्यमेव के नायक का जब कर्म घिनौना होता है ।
इन पर लिखने से कवीता का स्तर भी बौना होता है ।।


पर तटस्थ रहना कब सीखा दिनकर की संतानों ने ।
भारत का ठेका ले रखा है बॉलीवुड के इन दो खानों ने ।।


श्री राम की पावन भूमि पर जिनको डर लगता है ।

पाक सीरिया यमन क्या इन्हें मनमानस का घर लगता है ।।

इनसे कह दो भारत में खुशहाल मवेशी भी रहते हैं ।
कश्मीरी पण्डित से ज्यादा बंग्लादेशी रहते हैं ।।


बचपन में खेले जिस पर उस माटी से मतभेद किया ।
जिस थाली में खाया आमिर तुमने उसमे छेद किया ।।


भारत ही बस मौन रहा है शिव जी के अपमान में ।
पी के जैसी फ़िल्म बनाते यदि जो पाकिस्तान में ।।


जीवन रक्षा की खातिर हाफिज को मना रहे होते ।
अभिनेता न बन पाते बस काम के लिए रो रहे होते ।।


जितना भारत से पाया अब देते  हुए लगान चलो ।
बोरिया बिस्तर बाँधो आमिरजल्दी तुम पाकिस्तान चलो ।।


अभिनेता आमीर खान के बढ़ती 'असहिष्णुता' के बयान पर जयपुर
के कवि अब्दुल गफ्फार की ताजा रचना

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"तूने कहा,सुना हमने अब मन टटोलकर सुन ले तू,
सुन  ओ आमीर  खान,अब कान खोलकर सुन ले तू,"
तुमको शायद इस हरकत पे शरम नहीं आने की,
तुमने हिम्मत कैसे की जोखिम में हमें बताने की ।।

शस्य श्यामला इस धरती के जैसा जग में और नहीं
भारत माता की गोदी से प्यारा कोई ठौर नहीं
घर से बाहर जरा निकल के अकल खुजाकर पूछो
हम कितने हैं यहां सुरक्षित, हम से आकर पूछो ।।

पूछो हमसे गैर मुल्क में मुस्लिम कैसे जीते हैं
पाक, सीरिया, फिलस्तीन में खूं के आंसू पीते हैं
लेबनान, टर्की,इराक में भीषण हाहाकार हुए
अल बगदादी के हाथों मस्जिद में नर संहार हुए।।

इजरायल की गली गली में मुस्लिम मारा जाता है
अफगानी सडकों पर जिंदा शीश उतारा जाता है
यही सिर्फ वह देश जहां सिर गौरव से तन जाता है
यही मुल्क है जहां मुसलमान राष्ट्रपति बन जाता है ।।

इसकी आजादी की खातिर हम भी सबकुछ भूले थे
हम ही अशफाकुल्ला बन फांसी के फंदे झूले थे
हमने ही अंग्रेजों की लाशों से धरा पटा दी थी
खान अजीमुल्ला बन लंदन को धूल चटा दी थी।।

ब्रिगेडियर उस्मान अली इक शोला थे,अंगारे थे
उस सिर्फ अकेले ने सौ पाकिस्तानी मारे थे
हवलदार अब्दुल हमीद बेखौफ रहे आघातों से
जान गई पर नहीं छूटने दिया तिरंगा हाथों से ।।

करगिल में भी हमने बनकर हनीफ हुंकारा था
वहाँ मुसर्रफ के चूहों को खेंच खेंच के मारा था
मिटे मगर मरते दम तक हम में जिंदा ईमान रहा
होठों पे कलमा रसूल का दिल में हिंदुस्तान रहा ।।

इसीलिए कहता हूँ तुझसे,यूँ भड़काना बंद करो
जाकर अपनी फिल्में कर लो हमें लडाना बंद करो
बंद करो नफरत की स्याही से लिक्खी पर्चेबाजी
बंद करो इस हंगामें को, बंद करो ये लफ्फाजी ।।

यहां सभी को राष्ट्र वाद के धारे में बहना होगा
भारत में भारत माता का बनकर ही रहना होगा
भारत माता की बोली भाषा से जिनको प्यार नहीं
उनको भारत में रहने का कोई भी अधिकार नहीं" ।।
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---"कवि अब्दुल गफ्फार(जयपुर) की ताजा रचना"



Monday, November 23, 2015

ताज महल है शिव मन्दिर....तेजोमहालय

दोस्तों ,

ताजमहल में शिव का पाँचवा रूप अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजित है
श्री पी.एन. ओक अपनी पुस्तक “Tajmahal is a Hindu Temple Palace” में 100 से भी अधिक प्रमाण और तर्को का हवाला देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजोमहालय है। श्री पी.एन. ओक साहब को उस इतिहासकार के रूप मे जाना जाता है तो भारत के विकृत इतिहास को पुर्नोत्‍थान और सही दिशा में ले जाने का किया है। मुगलो और अग्रेजो के समय मे जिस प्रकार भारत के इतिहास के साथ जिस प्रकार छेड़छाड की गई और आज वर्तमान तक मे की जा रही है, उसका विरोध और सही प्रस्तुतिकारण करने वाले प्रमुख इतिहासकारो में पुरूषोत्तम नाथ ओक साहब का नाम लिया जाता है। ओक साहब ने ताजमहल की भूमिका, इतिहास और पृष्‍ठभूमि से लेकर सभी का अध्‍ययन किया और छायाचित्रों छाया चित्रो के द्वारा उसे प्रमाणित करने का सार्थक प्रयास किया। श्री ओक के इन तथ्‍यो पर आ सरकार और प्रमुख विश्वविद्यालय आदि मौन जबकि इस विषय पर शोध किया जाना चाहिये और सही इतिहास से हमे अवगत करना चाहिये। किन्‍तु दुःख की बात तो यह है कि आज तक उनकी किसी भी प्रकार से अधिकारिक जाँच नहीं हुई। यदि ताजमहल के शिव मंदिर होने में सच्चाई है तो भारतीयता के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। आज भी हम जैसे विद्यार्थियों को झूठे इतिहास की शिक्षा देना स्वयं शिक्षा के लिये अपमान की बात है, क्‍योकि जिस इतिहास से हम सबक सीखने की बात कहते है यदि वह ही गलत हो, इससे बड़ा राष्‍ट्रीय शर्म और क्‍या हो सकता है ?
श्री पी.एन. ओक का दावा है कि ताजमहल शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजो महालय है। इस सम्बंध में उनके द्वारा दिये गये तर्कों में कुछ इस प्रकार हैं –

 

1.शाहज़हां और यहां तक कि औरंगज़ेब के शासनकाल तक में भी कभी भी किसी शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में ताजमहल शब्द का उल्लेख नहीं आया है। ताजमहल को ताज-ए-महल समझना हास्यास्पद है।

2.शब्द ताजमहल के अंत में आये ‘महल’ मुस्लिम शब्द है ही नहीं, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में एक भी ऐसी इमारत नहीं है जिसे कि महल के नाम से पुकारा जाता हो।

3.साधारणतः समझा जाता है कि ताजमहल नाम मुमताजमहल, जो कि वहां पर दफनाई गई थी, के कारण पड़ा है। यह बात कम से कम दो कारणों से तर्कसम्मत नहीं है – पहला यह कि शाहजहां के बेगम का नाम मुमताजमहल था ही नहीं, उसका नाम मुमताज़-उल-ज़मानी था और दूसरा यह कि किसी इमारत का नाम रखने के लिय मुमताज़ नामक औरत के नाम से “मुम” को हटा देने का कुछ मतलब नहीं निकलता।

4.चूँकि महिला का नाम मुमताज़ था जो कि ज़ अक्षर मे समाप्त होता है न कि ज में (अंग्रेजी का Z न कि J), भवन का नाम में भी ताज के स्थान पर ताज़ होना चाहिये था (अर्थात् यदि अंग्रेजी में लिखें तो Taj के स्थान पर Taz होना था)।

5.शाहज़हां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन का उल्लेख ‘ताज-ए-महल’ के नाम से किया है जो कि उसके शिव मंदिर वाले परंपरागत संस्कृत नाम तेजोमहालय से मेल खाता है। इसके विरुद्ध शाहज़हां और औरंगज़ेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल खाते इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग न करते हुये उसके स्थान पर पवित्र मकब़रा शब्द का ही प्रयोग किया है।

6.मकब़रे को कब्रगाह ही समझना चाहिये, न कि महल। इस प्रकार से समझने से यह सत्य अपने आप समझ में आ जायेगा कि कि हुमायुँ, अकबर, मुमताज़, एतमातुद्दौला और सफ़दरजंग जैसे सारे शाही और दरबारी लोगों को हिंदू महलों या मंदिरों में दफ़नाया गया है।

7.और यदि ताज का अर्थ कब्रिस्तान है तो उसके साथ महल शब्द जोड़ने का कोई तुक ही नहीं है।

8.चूँकि ताजमहल शब्द का प्रयोग मुग़ल दरबारों में कभी किया ही नहीं जाता था, ताजमहल के विषय में किसी प्रकार की मुग़ल व्याख्या ढूंढना ही असंगत है। ‘ताज’ और ‘महल’ दोनों ही संस्कृत मूल के शब्द हैं।

9. ताजमहल शिव मंदिर को इंगित करने वाले शब्द तेजोमहालय शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मंदिर में अग्रेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे।

10. संगमरमर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले जूते उतारने की परंपरा शाहज़हां के समय से भी पहले की थी जब ताज शिव मंदिर था। यदि ताज का निर्माण मक़बरे के रूप में हुआ होता तो जूते उतारने की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि किसी मक़बरे में जाने के लिये जूता उतारना अनिवार्य नहीं होता।

11. देखने वालों ने अवलोकन किया होगा कि तहखाने के अंदर कब्र वाले कमरे में केवल सफेद संगमरमर के पत्थर लगे हैं जबकि अटारी व कब्रों वाले कमरे में पुष्प लता आदि से चित्रित पच्चीकारी की गई है। इससे साफ जाहिर होता है कि मुमताज़ के मक़बरे वाला कमरा ही शिव मंदिर का गर्भगृह है।

12. संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित उसके ऊपर 108 कलश आरूढ़ हैं, हिंदू मंदिर परंपरा में 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।

13. ताजमहल के रख-रखाव तथा मरम्मत करने वाले ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने कि प्राचीन पवित्र शिव लिंग तथा अन्य मूर्तियों को चौड़ी दीवारों के बीच दबा हुआ और संगमरमर वाले तहखाने के नीचे की मंजिलों के लाल पत्थरों वाले गुप्त कक्षों, जिन्हें कि बंद (seal) कर दिया गया है, के भीतर देखा है।

14. भारतवर्ष में 12 ज्योतिर्लिंग है। ऐसा प्रतीत होता है कि तेजोमहालय उर्फ ताजमहल उनमें से एक है जिसे कि नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। जब से शाहज़हां ने उस पर कब्ज़ा किया, उसकी पवित्रता और हिंदुत्व समाप्त हो गई।

15. वास्तुकला की विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में शिवलिंगों में ‘तेज-लिंग’ का वर्णन आता है। ताजमहल में ‘तेज-लिंग’ प्रतिष्ठित था इसीलिये उसका नाम तेजोमहालय पड़ा था।

16. आगरा नगर, जहां पर ताजमहल स्थित है, एक प्राचीन शिव पूजा केन्द्र है। यहां के धर्मावलम्बी निवासियों की सदियों से दिन में पाँच शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करने की परंपरा रही है विशेषकर श्रावन के महीने में। पिछले कुछ सदियों से यहां के भक्तजनों को बालकेश्वर, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राजराजेश्वर नामक केवल चार ही शिव मंदिरों में दर्शन-पूजन उपलब्ध हो पा रही है। वे अपने पाँचवे शिव मंदिर को खो चुके हैं जहां जाकर उनके पूर्वज पूजा पाठ किया करते थे। स्पष्टतः वह पाँचवाँ शिवमंदिर आगरा के इष्टदेव नागराज अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर ही है जो कि तेजोमहालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे।

7red lotus at apex of the entrance
17. आगरा मुख्यतः जाटों की नगरी है। जाट लोग भगवान शिव को तेजाजी के नाम से जानते हैं। The Illustrated Weekly of India के जाट विशेषांक (28 जून, 1971) के अनुसार जाट लोगों के तेजा मंदिर हुआ करते थे। अनेक शिवलिंगों में एक तेजलिंग भी होता है जिसके जाट लोग उपासक थे। इस वर्णन से भी ऐसा प्रतीत होता है कि ताजमहल भगवान तेजाजी का निवासस्थल तेजोमहालय था।

18. बादशाहनामा, जो कि शाहज़हां के दरबार के लेखाजोखा की पुस्तक है, में स्वीकारोक्ति है (पृष्ठ 403 भाग 1) कि मुमताज को दफ़नाने के लिये जयपुर के महाराजा जयसिंह से एक चमकदार, बड़े गुम्बद वाला विशाल भवन (इमारत-ए-आलीशान व गुम्ब़ज) लिया गया जो कि राजा मानसिंह के भवन के नाम से जाना जाता था।

19. ताजमहल के बाहर पुरातत्व विभाग में रखे हुये शिलालेख में वर्णित है कि शाहज़हां ने अपनी बेग़म मुमताज़ महल को दफ़नाने के लिये एक विशाल इमारत बनवाया जिसे बनाने में सन् 1631 से लेकर 1653 तक 22 वर्ष लगे। यह शिलालेख ऐतिहासिक घपले का नमूना है। पहली बात तो यह है कि शिलालेख उचित व अधिकारिक स्थान पर नहीं है। दूसरी यह कि महिला का नाम मुमताज़-उल-ज़मानी था न कि मुमताज़ महल। तीसरी, इमारत के 22 वर्ष में बनने की बात सारे मुस्लिम वर्णनों को ताक में रख कर टॉवेर्नियर नामक एक फ्रांसीसी अभ्यागत के अविश्वसनीय रुक्के से येन केन प्रकारेण ले लिया गया है जो कि एक बेतुकी बात है।

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20. शाहजादा औरंगज़ेब के द्वारा अपने पिता को लिखी गई चिट्ठी को कम से कम तीन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वृतान्तों में दर्ज किया गया है, जिनके नाम ‘आदाब-ए-आलमगिरी’, ‘यादगारनामा’ और ‘मुरुक्का-ए-अकब़राबादी’ (1931 में सैद अहमद, आगरा द्वारा संपादित, पृष्ठ 43, टीका 2) हैं। उस चिट्ठी में सन् 1662 में औरंगज़ेब ने खुद लिखा है कि मुमताज़ के सातमंजिला लोकप्रिय दफ़न स्थान के प्रांगण में स्थित कई इमारतें इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि उनमें पानी चू रहा है और गुम्बद के उत्तरी सिरे में दरार पैदा हो गई है। इसी कारण से औरंगज़ेब ने खुद के खर्च से इमारतों की तुरंत मरम्मत के लिये फरमान जारी किया और बादशाह से सिफ़ारिश की कि बाद में और भी विस्तारपूर्वक मरम्मत कार्य करवाया जाये। यह इस बात का साक्ष्य है कि शाहज़हाँ के समय में ही ताज प्रांगण इतना पुराना हो चुका था कि तुरंत मरम्मत करवाने की जरूरत थी।

21. जयपुर के भूतपूर्व महाराजा ने अपनी दैनंदिनी में 18 दिसंबर, 1633 को जारी किये गये शाहज़हां के ताज भवन समूह को मांगने के बाबत दो फ़रमानों (नये क्रमांक आर. 176 और 177) के विषय में लिख रखा है। यह बात जयपुर के उस समय के शासक के लिये घोर लज्जाजनक थी और इसे कभी भी आम नहीं किया गया।

22. राजस्थान प्रदेश के बीकानेर स्थित लेखागार में शाहज़हां के द्वारा (मुमताज़ के मकबरे तथा कुरान की आयतें खुदवाने के लिये) मरकाना के खदानों से संगमरमर पत्थर और उन पत्थरों को तराशने वाले शिल्पी भिजवाने बाबत जयपुर के शासक जयसिंह को जारी किये गये तीन फ़रमान संरक्षित हैं। स्पष्टतः शाहज़हां के ताजमहल पर जबरदस्ती कब्ज़ा कर लेने के कारण जयसिंह इतने कुपित थे कि उन्होंने शाहज़हां के फरमान को नकारते हुये संगमरमर पत्थर तथा (मुमताज़ के मकब़रे के ढोंग पर कुरान की आयतें खोदने का अपवित्र काम करने के लिये) शिल्पी देने के लिये इंकार कर दिया। जयसिंह ने शाहज़हां की मांगों को अपमानजनक और अत्याचारयुक्त समझा। और इसीलिये पत्थर देने के लिये मना कर दिया साथ ही शिल्पियों को सुरक्षित स्थानों में छुपा दिया।

23. शाहज़हां ने पत्थर और शिल्पियों की मांग वाले ये तीनों फ़रमान मुमताज़ की मौत के बाद के दो वर्षों में जारी किया था। यदि सचमुच में शाहज़हां ने ताजमहल को 22 साल की अवधि में बनवाया होता तो पत्थरों और शिल्पियों की आवश्यकता मुमताज़ की मृत्यु के 15-20 वर्ष बाद ही पड़ी होती।

24. और फिर किसी भी ऐतिहासिक वृतान्त में ताजमहल, मुमताज़ तथा दफ़न का कहीं भी जिक्र नहीं है। न ही पत्थरों के परिमाण और दाम का कहीं जिक्र है। इससे सिद्ध होता है कि पहले से ही निर्मित भवन को कपट रूप देने के लिये केवल थोड़े से पत्थरों की जरूरत थी। जयसिंह के सहयोग के अभाव में शाहज़हां संगमरमर पत्थर वाले विशाल ताजमहल बनवाने की उम्मीद ही नहीं कर सकता था।

25. टॉवेर्नियर, जो कि एक फ्रांसीसी जौहरी था, ने अपने यात्रा संस्मरण में उल्लेख किया है कि शाहज़हां ने जानबूझ कर मुमताज़ को ‘ताज-ए-मकान’, जहाँ पर विदेशी लोग आया करते थे जैसे कि आज भी आते हैं, के पास दफ़नाया था ताकि पूरे संसार में उसकी प्रशंसा हो। वह आगे और भी लिखता है कि केवल चबूतरा बनाने में पूरी इमारत बनाने से अधिक खर्च हुआ था। शाहज़हां ने केवल लूटे गये तेजोमहालय के केवल दो मंजिलों में स्थित शिवलिंगों तथा अन्य देवी देवता की मूर्तियों के तोड़फोड़ करने, उस स्थान को कब्र का रूप देने और वहाँ के महराबों तथा दीवारों पर कुरान की आयतें खुदवाने के लिये ही खर्च किया था। मंदिर को अपवित्र करने, मूर्तियों को तोड़फोड़ कर छुपाने और मकब़रे का कपट रूप देने में ही उसे 22 वर्ष लगे थे।

26. एक अंग्रेज अभ्यागत पीटर मुंडी ने सन् 1632 में (अर्थात् मुमताज की मौत को जब केवल एक ही साल हुआ था) आगरा तथा उसके आसपास के विशेष ध्यान देने वाले स्थानों के विषय में लिखा है जिसमें के ताज-ए-महल के गुम्बद, वाटिकाओं तथा बाजारों का जिक्र आया है। इस तरह से वे ताजमहल के स्मरणीय स्थान होने की पुष्टि करते हैं।

27. डी लॉएट नामक डच अफसर ने सूचीबद्ध किया है कि मानसिंह का भवन, जो कि आगरा से एक मील की दूरी पर स्थित है, शाहज़हां के समय से भी पहले का एक उत्कृष्ट भवन है। शाहज़हां के दरबार का लेखाजोखा रखने वाली पुस्तक, बादशाहनामा में किस मुमताज़ को उसी मानसिंह के भवन में दफ़नाना दर्ज है।

28. बेर्नियर नामक एक समकालीन फ्रांसीसी अभ्यागत ने टिप्पणी की है कि गैर मुस्लिम लोगों का (जब मानसिंह के भवन को शाहज़हां ने हथिया लिया था उस समय) चकाचौंध करने वाली प्रकाश वाले तहखानों के भीतर प्रवेश वर्जित था। उन्होंने चांदी के दरवाजों, सोने के खंभों, रत्नजटित जालियों और शिवलिंग के ऊपर लटकने वाली मोती के लड़ियों को स्पष्टतः संदर्भित किया है।

29. जॉन अल्बर्ट मान्डेल्सो ने (अपनी पुस्तक `Voyages and Travels to West-Indies’ जो कि John Starkey and John Basset, London के द्वारा प्रकाशित की गई है) में सन् 1638 में (मुमताज़ के मौत के केवल 7 साल बाद) आगरा के जन-जीवन का विस्तृत वर्णन किया है परंतु उसमें ताजमहल के निर्माण के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है जबकि सामान्यतः दृढ़तापूर्वक यह कहा या माना जाता है कि सन् 1631 से 1653 तक ताज का निर्माण होता रहा है।

30. एक संस्कृत शिलालेख भी ताज के मूलतः शिव मंदिर होने का समर्थन करता है। इस शिलालेख में, जिसे कि गलती से बटेश्वर शिलालेख कहा जाता है (वर्तमान में यह शिलालेख लखनऊ अजायबघर के सबसे ऊपर मंजिल स्थित कक्ष में संरक्षित है) में संदर्भित है, “एक विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने का निश्चय कर लिया।” शाहज़हां के आदेशानुसार सन् 1155 के इस शिलालेख को ताजमहल के वाटिका से उखाड़ दिया गया। इस शिलालेख को ‘बटेश्वर शिलालेख’ नाम देकर इतिहासज्ञों और पुरातत्वविज्ञों ने बहुत बड़ी भूल की है क्योंकि क्योंकि कहीं भी कोई ऐसा अभिलेख नहीं है कि यह बटेश्वर में पाया गया था। वास्तविकता तो यह है कि इस शिलालेख का नाम ‘तेजोमहालय शिलालेख’ होना चाहिये क्योंकि यह ताज के वाटिका में जड़ा हुआ था और शाहज़हां के आदेश से इसे निकाल कर फेंक दिया गया था।

शाहज़हां के कपट का एक सूत्र Archealogiical Survey of India Reports (1874 में प्रकाशित) के पृष्ठ 216-217, खंड 4 में मिलता है जिसमें लिखा है, great square black balistic pillar which, with the base and capital of another pillar….now in the grounds of Agra,…it is well known, once stood in the garden of Tajmahal”.

31. ताज के निर्माण के अनेक वर्षों बाद शाहज़हां ने इसके संस्कृत शिलालेखों व देवी-देवताओं की प्रतिमाओं तथा दो हाथियों की दो विशाल प्रस्तर प्रतिमाओं के साथ बुरी तरह तोड़फोड़ करके वहाँ कुरान की आयतों को लिखवा कर ताज को विकृत कर दिया, हाथियों की इन दो प्रतिमाओं के सूंड आपस में स्वागतद्वार के रूप में जुड़े हुये थे, जहाँ पर दर्शक आजकल प्रवेश की टिकट प्राप्त करते हैं वहीं ये प्रतिमाएँ स्थित थीं। थॉमस ट्विनिंग नामक एक अंग्रेज (अपनी पुस्तक “Travels in India A Hundred Years ago” के पृष्ठ 191 में) लिखता है, “सन् 1794 के नवम्बर माह में मैं ताज-ए-महल और उससे लगे हुये अन्य भवनों को घेरने वाली ऊँची दीवार के पास पहुँचा। वहाँ से मैंने पालकी ली और….. बीचोबीच बनी हुई एक सुंदर दरवाजे जिसे कि गजद्वार (‘COURT OF ELEPHANTS’) कहा जाता था की ओर जाने वाली छोटे कदमों वाली सीढ़ियों पर चढ़ा।”

32. ताजमहल में कुरान की 14 आयतों को काले अक्षरों में अस्पष्ट रूप में खुदवाया गया है किंतु इस इस्लाम के इस अधिलेखन में ताज पर शाहज़हां के मालिकाना ह़क होने के बाबत दूर दूर तक लेशमात्र भी कोई संकेत नहीं है। यदि शाहज़हां ही ताज का निर्माता होता तो कुरान की आयतों के आरंभ में ही उसके निर्माण के विषय में अवश्य ही जानकारी दिया होता।

33. शाहज़हां ने शुभ्र ताज के निर्माण के कई वर्षों बाद उस पर काले अक्षर बनवाकर केवल उसे विकृत ही किया है ऐसा उन अक्षरों को खोदने वाले अमानत ख़ान शिराज़ी ने खुद ही उसी इमारत के एक शिलालेख में लिखा है। कुरान के उन आयतों के अक्षरों को ध्यान से देखने से पता चलता है कि उन्हें एक प्राचीन शिव मंदिर के पत्थरों के टुकड़ों से बनाया गया है।

34. ताज के नदी के तरफ के दरवाजे के लकड़ी के एक टुकड़े के एक अमेरिकन प्रयोगशाला में किये गये कार्बन 14 जाँच से पता चला है कि लकड़ी का वो टुकड़ा शाहज़हां के काल से 300 वर्ष पहले का है, क्योंकि ताज के दरवाजों को 11वी सदी से ही मुस्लिम आक्रामकों के द्वारा कई बार तोड़कर खोला गया है और फिर से बंद करने के लिये दूसरे दरवाजे भी लगाये गये हैं, ताज और भी पुराना हो सकता है। असल में ताज को सन् 1115 में अर्थात् शाहज़हां के समय से लगभग 500 वर्ष पूर्व बनवाया गया था।

35. ई.बी. हॉवेल, श्रीमती केनोयर और सर डब्लू.डब्लू. हंटर जैसे पश्चिम के जाने माने वास्तुशास्त्री, जिन्हें कि अपने विषय पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है, ने ताजमहल के अभिलेखों का अध्ययन करके यह राय दी है कि ताजमहल हिंदू मंदिरों जैसा भवन है। हॉवेल ने तर्क दिया है कि जावा देश के चांदी सेवा मंदिर का ground plan ताज के समान है।

36. चार छोटे छोटे सजावटी गुम्बदों के मध्य एक बड़ा मुख्य गुम्बद होना हिंदू मंदिरों की सार्वभौमिक विशेषता है।

37. चार कोणों में चार स्तम्भ बनाना हिंदू विशेषता रही है। इन चार स्तम्भों से दिन में चौकसी का कार्य होता था और रात्रि में प्रकाश स्तम्भ का कार्य लिया जाता था। ये स्तम्भ भवन के पवित्र अधिसीमाओं का निर्धारण का भी करती थीं। हिंदू विवाह वेदी और भगवान सत्यनारायण के पूजा वेदी में भी चारों कोणों में इसी प्रकार के चार खम्भे बनाये जाते हैं।

38. ताजमहल की अष्टकोणीय संरचना विशेष हिंदू अभिप्राय की अभिव्यक्ति है क्योंकि केवल हिंदुओं में ही आठ दिशाओं के विशेष नाम होते हैं और उनके लिये खगोलीय रक्षकों का निर्धारण किया जाता है। स्तम्भों के नींव तथा बुर्ज क्रमशः धरती और आकाश के प्रतीक होते हैं। हिंदू दुर्ग, नगर, भवन या तो अष्टकोणीय बनाये जाते हैं या फिर उनमें किसी न किसी प्रकार के अष्टकोणीय लक्षण बनाये जाते हैं तथा उनमें धरती और आकाश के प्रतीक स्तम्भ बनाये जाते हैं, इस प्रकार से आठों दिशाओं, धरती और आकाश सभी की अभिव्यक्ति हो जाती है जहाँ पर कि हिंदू विश्वास के अनुसार ईश्वर की सत्ता है।

39. ताजमहल के गुम्बद के बुर्ज पर एक त्रिशूल लगा हुआ है। इस त्रिशूल का का प्रतिरूप ताजमहल के पूर्व दिशा में लाल पत्थरों से बने प्रांगण में नक्काशा गया है। त्रिशूल के मध्य वाली डंडी एक कलश को प्रदर्शित करता है जिस पर आम की दो पत्तियाँ और एक नारियल रखा हुआ है। यह हिंदुओं का एक पवित्र रूपांकन है। इसी प्रकार के बुर्ज हिमालय में स्थित हिंदू तथा बौद्ध मंदिरों में भी देखे गये हैं। ताजमहल के चारों दशाओं में बहुमूल्य व उत्कृष्ट संगमरमर से बने दरवाजों के शीर्ष पर भी लाल कमल की पृष्ठभूमि वाले त्रिशूल बने हुये हैं। सदियों से लोग बड़े प्यार के साथ परंतु गलती से इन त्रिशूलों को इस्लाम का प्रतीक चांद-तारा मानते आ रहे हैं और यह भी समझा जाता है कि अंग्रेज शासकों ने इसे विद्युत चालित करके इसमें चमक पैदा कर दिया था। जबकि इस लोकप्रिय मानना के विरुद्ध यह हिंदू धातुविद्या का चमत्कार है क्योंकि यह जंगरहित मिश्रधातु का बना है और प्रकाश विक्षेपक भी है। त्रिशूल के प्रतिरूप का पूर्व दिशा में होना भी अर्थसूचक है क्योकि हिंदुओं में पूर्व दिशा को, उसी दिशा से सूर्योदय होने के कारण, विशेष महत्व दिया गया है. गुम्बद के बुर्ज अर्थात् (त्रिशूल) पर ताजमहल के अधिग्रहण के बाद ‘अल्लाह’ शब्द लिख दिया गया है जबकि लाल पत्थर वाले पूर्वी प्रांगण में बने प्रतिरूप में ‘अल्लाह’ शब्द कहीं भी नहीं है।

40. शुभ्र ताज के पूर्व तथा पश्चिम में बने दोनों भवनों के ढांचे, माप और आकृति में एक समान हैं और आज तक इस्लाम की परंपरानुसार पूर्वी भवन को सामुदायिक कक्ष (community hall) बताया जाता है जबकि पश्चिमी भवन पर मस्ज़िद होने का दावा किया जाता है। दो अलग-अलग उद्देश्य वाले भवन एक समान कैसे हो सकते हैं? इससे सिद्ध होता है कि ताज पर शाहज़हां के आधिपत्य हो जाने के बाद पश्चिमी भवन को मस्ज़िद के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। आश्चर्य की बात है कि बिना मीनार के भवन को मस्ज़िद बताया जाने लगा। वास्तव में ये दोनों भवन तेजोमहालय के स्वागत भवन थे।

41. उसी किनारे में कुछ गज की दूरी पर नक्कारख़ाना है जो कि इस्लाम के लिये एक बहुत बड़ी असंगति है (क्योंकि शोरगुल वाला स्थान होने के कारण नक्कारख़ाने के पास मस्ज़िद नहीं बनाया जाता)। इससे इंगित होता है कि पश्चिमी भवन मूलतः मस्ज़िद नहीं था। इसके विरुद्ध हिंदू मंदिरों में सुबह शाम आरती में विजयघंट, घंटियों, नगाड़ों आदि का मधुर नाद अनिवार्य होने के कारण इन वस्तुओं के रखने का स्थान होना आवश्यक है।

42. ताजमहल में मुमताज़ महल के नकली कब्र वाले कमरे की दीवालों पर बनी पच्चीकारी में फूल-पत्ती, शंख, घोंघा तथा हिंदू अक्षर ॐ चित्रित है। कमरे में बनी संगमरमर की अष्टकोणीय जाली के ऊपरी कठघरे में गुलाबी रंग के कमल फूलों की खुदाई की गई है। कमल, शंख और ॐ के हिंदू देवी-देवताओं के साथ संयुक्त होने के कारण उनको हिंदू मंदिरों में मूलभाव के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

43. जहाँ पर आज मुमताज़ का कब्र बना हुआ है वहाँ पहले तेज लिंग हुआ करता था जो कि भगवान शिव का पवित्र प्रतीक है। इसके चारों ओर परिक्रमा करने के लिये पाँच गलियारे हैं। संगमरमर के अष्टकोणीय जाली के चारों ओर घूम कर या कमरे से लगे विभिन्न विशाल कक्षों में घूम कर और बाहरी चबूतरे में भी घूम कर परिक्रमा किया जा सकता है। हिंदू रिवाजों के अनुसार परिक्रमा गलियारों में देवता के दर्शन हेतु झरोखे बनाये जाते हैं। इसी प्रकार की व्यवस्था इन गलियारों में भी है।

44. ताज के इस पवित्र स्थान में चांदी के दरवाजे और सोने के कठघरे थे जैसा कि हिंदू मंदिरों में होता है। संगमरमर के अष्टकोणीय जाली में मोती और रत्नों की लड़ियाँ भी लटकती थीं। ये इन ही वस्तुओं की लालच थी जिसने शाहज़हां को अपने असहाय मातहत राजा जयसिंह से ताज को लूट लेने के लिये प्रेरित किया था।

45. पीटर मुंडी, जो कि एक अंग्रेज था, ने सन् में, मुमताज़ की मौत के एक वर्ष के भीतर ही चांदी के दरवाजे, सोने के कठघरे तथा मोती और रत्नों की लड़ियों को देखने का जिक्र किया है। यदि ताज का निर्माणकाल 22 वर्षों का होता तो पीटर मुंडी मुमताज़ की मौत के एक वर्ष के भीतर ही इन बहुमूल्य वस्तुओं को कदापि न देख पाया होता। ऐसी बहुमूल्य सजावट के सामान भवन के निर्माण के बाद और उसके उपयोग में आने के पूर्व ही लगाये जाते हैं। ये इस बात का इशारा है कि मुमताज़ का कब्र बहुमूल्य सजावट वाले शिव लिंग वाले स्थान पर कपट रूप से बनाया गया।

46. मुमताज़ के कब्र वाले कक्ष फर्श के संगमरमर के पत्थरों में छोटे छोटे रिक्त स्थान देखे जा सकते हैं। ये स्थान चुगली करते हैं कि बहुमूल्य सजावट के सामान के विलोप हो जाने के कारण वे रिक्त हो गये।

47. मुमताज़ की कब्र के ऊपर एक जंजीर लटकती है जिसमें अब एक कंदील लटका दिया है। ताज को शाहज़हां के द्वारा हथिया लेने के पहले वहाँ एक शिव लिंग पर बूंद बूंद पानी टपकाने वाला घड़ा लटका करता था।

48. ताज भवन में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि हिंदू परंपरा के अनुसार शरदपूर्णिमा की रात्रि में अपने आप शिव लिंग पर जल की बूंद टपके। इस पानी के टपकने को इस्लाम धारणा का रूप दे कर शाहज़हां के प्रेमाश्रु बताया जाने लगा।

49. तथाकथित मस्ज़िद और नक्कारखाने के बीच एक अष्टकोणीय कुआँ है जिसमें पानी के तल तक सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। यह हिंदू मंदिरों का परंपरागत खजाने वाला कुआँ है। खजाने के संदूक नीचे की मंजिलों में रखे जाते थे जबकि खजाने के कर्मचारियों के कार्यालय ऊपरी मंजिलों में हुआ करता था। सीढ़ियों के वृतीय संरचना के कारण घुसपैठिये या आक्रमणकारी न तो आसानी के साथ खजाने तक पहुँच सकते थे और न ही एक बार अंदर आने के बाद आसानी के साथ भाग सकते थे, और वे पहचान लिये जाते थे। यदि कभी घेरा डाले हुये शक्तिशाली शत्रु के सामने समर्पण की स्थिति आ भी जाती थी तो खजाने के संदूकों को पानी में धकेल दिया जाता था जिससे कि वह पुनर्विजय तक सुरक्षित रूप से छुपा रहे। एक मकब़रे में इतना परिश्रम करके बहुमंजिला कुआँ बनाना बेमानी है। इतना विशाल दीर्घाकार कुआँ किसी कब्र के लिये अनावश्यक भी है।

50. यदि शाहज़हां ने सचमुच ही ताजमहल जैसा आश्चर्यजनक मकब़रा होता तो उसके तामझाम का विवरण और मुमताज़ के दफ़न की तारीख इतिहास में अवश्य ही दर्ज हुई होती। परंतु दफ़न की तारीख कभी भी दर्ज नहीं की गई। इतिहास में इस तरह का ब्यौरा न होना ही ताजमहल की झूठी कहानी का पोल खोल देती है।

51. यहाँ तक कि मुमताज़ की मृत्यु किस वर्ष हुई यह भी अज्ञात है। विभिन्न लोगों ने सन् 1629,1630, 1631 या 1632 में मुमताज़ की मौत होने का अनुमान लगाया है। यदि मुमताज़ का इतना उत्कृष्ट दफ़न हुआ होता, जितना कि दावा किया जाता है, तो उसके मौत की तारीख अनुमान का विषय कदापि न होता। 5000 औरतों वाली हरम में किस औरत की मौत कब हुई इसका हिसाब रखना एक कठिन कार्य है। स्पष्टतः मुमताज़ की मौत की तारीख़ महत्वहीन थी इसीलिये उस पर ध्यान नहीं दिया गया। फिर उसके दफ़न के लिये ताज किसने बनवाय

52. शाहज़हां और मुमताज़ के प्रेम की कहानियाँ मूर्खतापूर्ण तथा कपटजाल हैं। न तो इन कहानियों का कोई ऐतिहासिक आधार है न ही उनके कल्पित प्रेम प्रसंग पर कोई पुस्तक ही लिखी गई है। ताज के शाहज़हां के द्वारा अधिग्रहण के बाद उसके आधिपत्य दर्शाने के लिये ही इन कहानियों को गढ़ लिया गया।

53. शाहज़हां के शाही और दरबारी दस्तावेज़ों में ताज की कीमत का कहीं उल्लेख नहीं है क्योंकि शाहज़हां ने कभी ताजमहल को बनवाया ही नहीं। इसी कारण से नादान लेखकों के द्वारा ताज की कीमत 40 लाख से 9 करोड़ 17 लाख तक होने का काल्पनिक अनुमान लगाया जाता है।

54. इसी प्रकार से ताज का निर्माणकाल 10 से 22 वर्ष तक के होने का अनुमान लगाया जाता है। यदि शाहज़हां ने ताजमहल को बनवाया होता तो उसके निर्माणकाल के विषय में अनुमान लगाने की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि उसकी प्रविष्टि शाही दस्तावेज़ों में अवश्य ही की गई होत

55. ताज भवन के भवननिर्माणशास्त्री (designer, architect) के विषय में भी अनेक नाम लिये जाते हैं जैसे कि ईसा इफेंडी जो कि एक तुर्क था, अहमद़ मेंहदी या एक फ्रांसीसी, आस्टीन डी बोरडीक्स या गेरोनिमो वेरेनियो जो कि एक इटालियन था, या शाहज़हां स्वयं।

56. ऐसा समझा जाता है कि शाहज़हां के काल में ताजमहल को बनाने के लिये 20 हजार लोगों ने 22 साल तक काम किया। यदि यह सच है तो ताजमहल का नक्शा (design drawings), मजदूरों की हाजिरी रजिस्टर (labour muster rolls), दैनिक खर्च (daily expenditure sheets), भवन निर्माण सामग्रियों के खरीदी के बिल और रसीद (bills and receipts of material ordered) आदि दस्तावेज़ शाही अभिलेखागार में उपलब्ध होते। वहाँ पर इस प्रकार के कागज का एक टुकड़ा भी नहीं है।

57. अतः ताजमहल को शाहज़हाँ ने बनवाया और उस पर उसका व्यक्तिगत तथा सांप्रदायिक अधिकार था जैसे ढोंग को समूचे संसार को मानने के लिये मजबूर करने की जिम्मेदारी चापलूस दरबारी, भयंकर भूल करने वाले इतिहासकार, अंधे भवननिर्माणशस्त्री, कल्पित कथा लेखक, मूर्ख कवि, लापरवाह पर्यटन अधिकारी और भटके हुये पथप्रदर्शकों (guides) पर है।

58. शाहज़हां के समय में ताज के वाटिकाओं के विषय में किये गये वर्णनों में केतकी, जै, जूही, चम्पा, मौलश्री, हारश्रिंगार और बेल का जिक्र आता है। ये वे ही पौधे हैं जिनके फूलों या पत्तियों का उपयोग हिंदू देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में होता है। भगवान शिव की पूजा में बेल पत्तियों का विशेष प्रयोग होता है। किसी कब्रगाह में केवल छायादार वृक्ष लगाये जाते हैं क्योंकि श्मशान के पेड़ पौधों के फूल और फल का प्रयोग को वीभत्स मानते हुये मानव अंतरात्मा स्वीकार नहीं करती। ताज के वाटिकाओं में बेल तथा अन्य फूलों के पौधों की उपस्थिति सिद्ध करती है कि शाहज़हां के हथियाने के पहले ताज एक शिव मंदिर हुआ करता था।

59. हिंदू मंदिर प्रायः नदी या समुद्र तट पर बनाये जाते हैं। ताज भी यमुना नदी के तट पर बना है जो कि शिव मंदिर के लिये एक उपयुक्त स्थान है।

60. मोहम्मद पैगम्बर ने निर्देश दिये हैं कि कब्रगाह में केवल एक कब्र होना चाहिये और उसे कम से कम एक पत्थर से चिन्हित करना चाहिये। ताजमहल में एक कब्र तहखाने में और एक कब्र उसके ऊपर के मंज़िल के कक्ष में है तथा दोनों ही कब्रों को मुमताज़ का बताया जाता है, यह मोहम्मद पैगम्बर के निर्देश के निन्दनीय अवहेलना है। वास्तव में शाहज़हां को इन दोनों स्थानों के शिवलिंगों को दबाने के लिये दो कब्र बनवाने पड़े थे। शिव मंदिर में, एक मंजिल के ऊपर एक और मंजिल में, दो शिव लिंग स्थापित करने का हिंदुओं में रिवाज था जैसा कि उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और सोमनाथ मंदिर, जो कि अहिल्याबाई के द्वारा बनवाये गये हैं, में देखा जा सकता है।

61. ताजमहल में चारों ओर चार एक समान प्रवेशद्वार हैं जो कि हिंदू भवन निर्माण का एक विलक्षण तरीका है जिसे कि चतुर्मुखी भवन कहा जाता है।

62. ताजमहल में ध्वनि को गुंजाने वाला गुम्बद है। ऐसा गुम्बज किसी कब्र के लिये होना एक विसंगति है क्योंकि कब्रगाह एक शांतिपूर्ण स्थान होता है। इसके विरुद्ध हिंदू मंदिरों के लिये गूंज उत्पन्न करने वाले गुम्बजों का होना अनिवार्य है क्योंकि वे देवी-देवता आरती के समय बजने वाले घंटियों, नगाड़ों आदि के ध्वनि के उल्लास और मधुरता को कई गुणा अधिक कर देते हैं।

63. ताजमहल का गुम्बज कमल की आकृति से अलंकृत है। इस्लाम के गुम्बज अनालंकृत होते हैं, दिल्ली के चाणक्यपुरी में स्थित पाकिस्तानी दूतावास और पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के गुम्बज उनके उदाहरण हैं।

64. ताजमहल दक्षिणमुखी भवन है। यदि ताज का सम्बंध इस्लाम से होता तो उसका मुख पश्चिम की ओर होता।

65. महल को कब्र का रूप देने की गलती के परिणामस्वरूप एक व्यापक भ्रामक स्थिति उत्पन्न हुई है। इस्लाम के आक्रमण स्वरूप, जिस किसी देश में वे गये वहाँ के, विजित भवनों में लाश दफन करके उन्हें कब्र का रूप दे दिया गया। अतः दिमाग से इस भ्रम को निकाल देना चाहिये कि वे विजित भवन कब्र के ऊपर बनाये गये हैं जैसे कि लाश दफ़न करने के बाद मिट्टी का टीला बना दिया जाता है। ताजमहल का प्रकरण भी इसी सच्चाई का उदाहरण है। (भले ही केवल तर्क करने के लिये) इस बात को स्वीकारना ही होगा कि ताजमहल के पहले से बने ताज के भीतर मुमताज़ की लाश दफ़नाई गई न कि लाश दफ़नाने के बाद उसके ऊपर ताज का निर्माण किया गया।

66. ताज एक सातमंजिला भवन है। शाहज़ादा औरंगज़ेब के शाहज़हां को लिखे पत्र में भी इस बात का विवरण है। भवन के चार मंजिल संगमरमर पत्थरों से बने हैं जिनमें चबूतरा, चबूतरे के ऊपर विशाल वृतीय मुख्य कक्ष और तहखाने का कक्ष शामिल है। मध्य में दो मंजिलें और हैं जिनमें 12 से 15 विशाल कक्ष हैं। संगमरमर के इन चार मंजिलों के नीचे लाल पत्थरों से बने दो और मंजिलें हैं जो कि पिछवाड़े में नदी तट तक चली जाती हैं। सातवीं मंजिल अवश्य ही नदी तट से लगी भूमि के नीचे होनी चाहिये क्योंकि सभी प्राचीन हिंदू भवनों में भूमिगत मंजिल हुआ करती है।

67. नदी तट से भाग में संगमरमर के नींव के ठीक नीचे लाल पत्थरों वाले 22 कमरे हैं जिनके झरोखों को शाहज़हां ने चुनवा दिया है। इन कमरों को जिन्हें कि शाहज़हां ने अतिगोपनीय बना दिया है भारत के पुरातत्व विभाग के द्वारा तालों में बंद रखा जाता है। सामान्य दर्शनार्थियों को इनके विषय में अंधेरे में रखा जाता है। इन 22 कमरों के दीवारों तथा भीतरी छतों पर अभी भी प्राचीन हिंदू चित्रकारी अंकित हैं। इन कमरों से लगा हुआ लगभग 33 फुट लंबा गलियारा है। गलियारे के दोनों सिरों में एक एक दरवाजे बने हुये हैं। इन दोनों दरवाजों को इस प्रकार से आकर्षक रूप से ईंटों और गारा से चुनवा दिया गया है कि वे दीवाल जैसे प्रतीत हों।

68. स्पष्तः मूल रूप से शाहज़हां के द्वारा चुनवाये गये इन दरवाजों को कई बार खुलवाया और फिर से चुनवाया गया है। सन् 1934 में दिल्ली के एक निवासी ने चुनवाये हुये दरवाजे के ऊपर पड़ी एक दरार से झाँक कर देखा था। उसके भीतर एक वृहत कक्ष (huge hall) और वहाँ के दृश्य को‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍ देख कर वह हक्का-बक्का रह गया तथा भयभीत सा हो गया। वहाँ बीचोबीच भगवान शिव का चित्र था जिसका सिर कटा हुआ था और उसके चारों ओर बहुत सारे मूर्तियों का जमावड़ा था। ऐसा भी हो सकता है कि वहाँ पर संस्कृत के शिलालेख भी हों। यह सुनिश्चित करने के लिये कि ताजमहल हिंदू चित्र, संस्कृत शिलालेख, धार्मिक लेख, सिक्के तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे कौन कौन से साक्ष्य छुपे हुये हैं उसके के सातों मंजिलों को खोल कर उसकी साफ सफाई करने की नितांत आवश्यकता है।

69. अध्ययन से पता चलता है कि इन बंद कमरों के साथ ही साथ ताज के चौड़ी दीवारों के बीच में भी हिंदू चित्रों, मूर्तियों आदि छिपे हुये हैं। सन् 1959 से 1962 के अंतराल में श्री एस.आर. राव, जब वे आगरा पुरातत्व विभाग के सुपरिन्टेन्डेंट हुआ करते थे, का ध्यान ताजमहल के मध्यवर्तीय अष्टकोणीय कक्ष के दीवार में एक चौड़ी दरार पर गया। उस दरार का पूरी तरह से अध्ययन करने के लिये जब दीवार की एक परत उखाड़ी गई तो संगमरमर की दो या तीन प्रतिमाएँ वहाँ से निकल कर गिर पड़ीं। इस बात को खामोशी के साथ छुपा दिया गया और प्रतिमाओं को फिर से वहीं दफ़न कर दिया गया जहाँ शाहज़हां के आदेश से पहले दफ़न की गई थीं। इस बात की पुष्टि अनेक अन्य स्रोतों से हो चुकी है। जिन दिनों मैंने ताज के पूर्ववर्ती काल के विषय में खोजकार्य आरंभ किया उन्हीं दिनों मुझे इस बात की जानकारी मिली थी जो कि अब तक एक भूला बिसरा रहस्य बन कर रह गया है। ताज के मंदिर होने के प्रमाण में इससे अच्छा साक्ष्य और क्या हो सकता है? उन देव प्रतिमाओं को जो शाहज़हां के द्वारा ताज को हथियाये जाने से पहले उसमें प्रतिष्ठित थे ताज की दीवारें और चुनवाये हुये कमरे आज भी छुपाये हुये हैं।

70. स्पष्टतः के केन्द्रीय भवन का इतिहास अत्यंत पेचीदा प्रतीत होता है। शायद महमूद गज़नी और उसके बाद के मुस्लिम प्रत्येक आक्रमणकारी ने लूट कर अपवित्र किया है परंतु हिंदुओं का इस पर पुनर्विजय के बाद पुनः भगवान शिव की प्रतिष्ठा करके इसकी पवित्रता को फिर से बरकरार कर दिया जाता था। शाहज़हां अंतिम मुसलमान था जिसने तेजोमहालय उर्फ ताजमहल के पवित्रता को भ्रष्ट किया।

71. विंसेंट स्मिथ अपनी पुस्तक ‘Akbar the Great Moghul’ में लिखते हैं, “बाबर ने सन् 1630 आगरा के वाटिका वाले महल में अपने उपद्रवी जीवन से मुक्ति पाई”। वाटिका वाला वो महल यही ताजमहल था।

72. बाबर की पुत्री गुलबदन ‘हुमायूँनामा’ नामक अपने ऐतिहासिक वृतांत में ताज का संदर्भ ‘रहस्य महल’ (Mystic House) के नाम से देती है।

73. बाबर स्वयं अपने संस्मरण में इब्राहिम लोधी के कब्जे में एक मध्यवर्ती अष्टकोणीय चारों कोणों में चार खम्भों वाली इमारत का जिक्र करता है जो कि ताज ही था। ये सारे संदर्भ ताज के शाहज़हां से कम से कम सौ साल पहले का होने का संकेत देते हैं।

74. ताजमहल की सीमाएँ चारों ओर कई सौ गज की दूरी में फैली हुई है। नदी के पार ताज से जुड़ी अन्य भवनों, स्नान के घाटों और नौका घाटों के अवशेष हैं। विक्टोरिया गार्डन के बाहरी हिस्से में एक लंबी, सर्पीली, लताच्छादित प्राचीन दीवार है जो कि एक लाल पत्थरों से बनी अष्टकोणीय स्तंभ तक जाती है। इतने वस्तृत भूभाग को कब्रिस्तान का रूप दे दिया गया।

75. यदि ताज को विशेषतः मुमताज़ के दफ़नाने के लिये बनवाया गया होता तो वहाँ पर अन्य और भी कब्रों का जमघट नहीं होता। परंतु ताज प्रांगण में अनेक कब्रें विद्यमान हैं कम से कम उसके पूर्वी एवं दक्षिणी भागों के गुम्बजदार भवनों में।

76. दक्षिणी की ओर ताजगंज गेट के दूसरे किनारे के दो गुम्बजदार भवनों में रानी सरहंडी ब़ेगम, फतेहपुरी ब़ेगम और कु. सातुन्निसा को दफ़नाया गया है। इस प्रकार से एक साथ दफ़नाना तभी न्यायसंगत हो सकता है जबकि या तो रानी का दर्जा कम किया गया हो या कु. का दर्जा बढ़ाया गया हो। शाहज़हां ने अपने वंशानुगत स्वभाव के अनुसार ताज को एक साधारण मुस्लिम कब्रिस्तान के रूप में परिवर्तित कर के रख दिया क्योंकि उसने उसे अधिग्रहित किया था (ध्यान रहे बनवाया नहीं था)।

77. शाहज़हां ने मुमताज़ से निक़ाह के पहले और बाद में भी कई और औरतों से निक़ाह किया था, अतः मुमताज़ को कोई ह़क नहीँ था कि उसके लिये आश्चर्यजनक कब्र बनवाया जावे।

78. मुमताज़ का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था और उसमें ऐसा कोई विशेष योग्यता भी नहीं थी कि उसके लिये ताम-झाम वाला कब्र बनवाया जावे।

79. शाहज़हां तो केवल एक मौका ढूंढ रहा था कि कैसे अपने क्रूर सेना के साथ मंदिर पर हमला करके वहाँ की सारी दौलत हथिया ले, मुमताज़ को दफ़नाना तो एक बहाना मात्र था। इस बात की पुष्टि बादशाहनामा में की गई इस प्रविष्टि से होती है कि मुमताज़ की लाश को बुरहानपुर के कब्र से निकाल कर आगरा लाया गया और ‘अगले साल’ दफ़नाया गया। बादशाहनामा जैसे अधिकारिक दस्तावेज़ में सही तारीख के स्थान पर ‘अगले साल’ लिखने से ही जाहिर होता है कि शाहज़हां दफ़न से सम्बंधित विवरण को छुपाना चाहता था।

80. विचार करने योग्य बात है कि जिस शाहज़हां ने मुमताज़ के जीवनकाल में उसके लिये एक भी भवन नहीं बनवाया, मर जाने के बाद एक लाश के लिये आश्चर्यमय कब्र कभी नहीं बनवा सकता।

81. एक विचारणीय बात यह भी है कि शाहज़हां के बादशाह बनने के तो या तीन साल बाद ही मुमताज़ की मौत हो गई। तो क्या शाहज़हां ने इन दो तीन साल के छोटे समय में ही इतना अधिक धन संचय कर लिया कि एक कब्र बनवाने में उसे उड़ा सके?

82. जहाँ इतिहास में शाहज़हां के मुमताज़ के प्रति विशेष आसक्ति का कोई विवरण नहीं मिलता वहीं शाहज़हां के अनेक औरतों के साथ, जिनमें दासी, औरत के आकार के पुतले, यहाँ तक कि उसकी स्वयं की बेटी जहांआरा भी शामिल है, के साथ यौन सम्बंधों ने उसके काल में अधिक महत्व पाया। क्या शाहज़हां मुमताज़ की लाश पर अपनी गाढ़ी कमाई लुटाता?

83. शाहज़हां एक कृपण सूदखोर बादशाह था। अपने सारे प्रतिद्वंदियों का कत्ल करके उसने राज सिंहासन प्राप्त किया था। जितना खर्चीला उसे बताया जाता है उतना वो हो ही नहीं सकता था।

84. मुमताज़ की मौत से खिन्न शाहज़हां ने एकाएक ताज बनवाने का निश्चय कर लिया। ये बात एक मनोवैज्ञानिक असंगति है। दुख एक ऐसी संवेदना है जो इंसान को अयोग्य और अकर्मण्य बनाती है।

85. शाहज़हां यदि मूर्ख या बावला होता तो समझा जा सकता है कि वो मृत मुमताज़ के लिये ताज बनवा सकता है परंतु सांसारिक और यौन सुख में लिप्त शाहज़हां तो कभी भी ताज नहीं बनवा सकता क्योंकि यौन भी इंसान को अयोग्य बनाने वाली संवेदना है।

86. सन् 1973 के आरंभ में जब ताज के सामने वाली वाटिका की खुदाई हुई तो वर्तमान फौवारों के लगभग छः फुट नीचे और भी फौवारे पाये गये। इससे दो बातें सिद्ध होती हैं। पहली तो यह कि जमीन के नीचे वाले फौवारे शाहज़हां के काल से पहले ही मौजूद थे। दूसरी यह कि पहले से मौजूद फौवारे चूँकि ताज से जाकर मिले थे अतः ताज भी शाहज़हां के काल से पहले ही से मौजूद था। स्पष्ट है कि इस्लाम शासन के दौरान रख रखाव न होने के कारण ताज के सामने की वाटिका और फौवारे बरसात के पानी की बाढ़ में डूब गये थे।

87. ताजमहल के ऊपरी मंजिल के गौरवमय कक्षों से कई जगह से संगमरमर के पत्थर उखाड़ लिये गये थे जिनका उपयोग मुमताज़ के नकली कब्रों को बनाने के लिये किया गया। इसी कारण से ताज के भूतल के फर्श और दीवारों में लगे मूल्यवान संगमरमर के पत्थरों की तुलना में ऊपरी तल के कक्ष भद्दे, कुरूप और लूट का शिकार बने नजर आते हैं। चूँकि ताज के ऊपरी तलों के कक्षों में दर्शकों का प्रवेश वर्जित है, शाहज़हां के द्वारा की गई ये बरबादी एक सुरक्षित रहस्य बन कर रह गई है। ऐसा कोई कारण नहीं है कि मुगलों के शासन काल की समाप्ति के 200 वर्षों से भी अधिक समय व्यतीत हो जाने के बाद भी शाहज़हां के द्वारा ताज के ऊपरी कक्षों से संगमरमर की इस लूट को आज भी छुपाये रखा जावे।

88. फ्रांसीसी यात्री बेर्नियर ने लिखा है कि ताज के निचले रहस्यमय कक्षों में गैर मुस्लिमों को जाने की इजाजत नहीं थी क्योंकि वहाँ चौंधिया देने वाली वस्तुएँ थीं। यदि वे वस्तुएँ शाहज़हां ने खुद ही रखवाये होते तो वह जनता के सामने उनका प्रदर्शन गौरव के साथ करता। परंतु वे तो लूटी हुई वस्तुएँ थीं और शाहज़हां उन्हें अपने खजाने में ले जाना चाहता था इसीलिये वह नहीं चाहता था कि कोई उन्हें देखे।

89. ताज की सुरक्षा के लिये उसके चारों ओर खाई खोद कर की गई है। किलों, मंदिरों तथा भवनों की सुरक्षा के लिये खाई बनाना हिंदुओं में सामान्य सुरक्षा व्यवस्था रही है।

90. पीटर मुंडी ने लिखा है कि शाहज़हां ने उन खाइयों को पाटने के लिये हजारों मजदूर लगवाये थे। यह भी ताज के शाहज़हां के समय से पहले के होने का एक लिखित प्रमाण है।

91. नदी के पिछवाड़े में हिंदू बस्तियाँ, बहुत से हिंदू प्राचीन घाट और प्राचीन हिंदू शव-दाह गृह है। यदि शाहज़हाँ ने ताज को बनवाया होता तो इन सबको नष्ट कर दिया गया होता।

92. यह कथन कि शाहज़हाँ नदी के दूसरी तरफ एक काले पत्थर का ताज बनवाना चाहता था भी एक प्रायोजित कपोल कल्पना है। नदी के उस पार के गड्ढे मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा हिंदू भवनों के लूटमार और तोड़फोड़ के कारण बने हैं न कि दूसरे ताज के नींव खुदवाने के कारण। शाहज़हां, जिसने कि सफेद ताजमहल को ही नहीं बनवाया था, काले ताजमहल बनवाने के विषय में कभी सोच भी नहीं सकता था। वह तो इतना कंजूस था कि हिंदू भवनों को मुस्लिम रूप देने के लिये भी मजदूरों से उसने सेंत मेंत में और जोर जबर्दस्ती से काम लिया था।

93. जिन संगमरमर के पत्थरों पर कुरान की आयतें लिखी हुई हैं उनके रंग में पीलापन है जबकि शेष पत्थर ऊँची गुणवत्ता वाले शुभ्र रंग के हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि कुरान की आयतों वाले पत्थर बाद में लगाये गये हैं।

94. कुछ कल्पनाशील इतिहासकारों तो ने ताज के भवननिर्माणशास्त्री के रूप में कुछ काल्पनिक नाम सुझाये हैं पर और ही अधिक कल्पनाशील इतिहासकारों ने तो स्वयं शाहज़हां को ताज के भवननिर्माणशास्त्री होने का श्रेय दे दिया है जैसे कि वह सर्वगुणसम्पन्न विद्वान एवं कला का ज्ञाता था। ऐसे ही इतिहासकारों ने अपने इतिहास के अल्पज्ञान की वजह से इतिहास के साथ ही विश्वासघात किया है वरना शाहज़हां तो एक क्रूर, निरंकुश, औरतखोर और नशेड़ी व्यक्ति था।

95. और भी कई भ्रमित करने वाली लुभावनी बातें बना दी गई हैं। कुछ लोग विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि शाहज़हां ने पूरे संसार के सर्वश्रेष्ठ भवननिर्माणशास्त्रियों से संपर्क करने के बाद उनमें से एक को चुना था। तो कुछ लोगों का यग विश्वास है कि उसने अपने ही एक भवननिर्माणशास्त्री को चुना था। यदि यह बातें सच होती तो शाहज़हां के शाही दस्तावेजों में इमारत के नक्शों का पुलिंदा मिला होता। परंतु वहाँ तो नक्शे का एक टुकड़ा भी नहीं है। नक्शों का न मिलना भी इस बात का पक्का सबूत है कि ताज को शाहज़हां ने नहीं बनवाया।

96. ताजमहल बड़े बड़े खंडहरों से घिरा हुआ है जो कि इस बात की ओर इशारा करती है कि वहाँ पर अनेक बार युद्ध हुये थे।

97. ताज के दक्षिण में एक प्रचीन पशुशाला है। वहाँ पर तेजोमहालय के पालतू गायों को बांधा जाता था। मुस्लिम कब्र में गाय कोठा होना एक असंगत बात है।

98. ताज के पश्चिमी छोर में लाल पत्थरों के अनेक उपभवन हैं जो कि एक कब्र के लिया अनावश्यक है।

99. संपूर्ण ताज में 400 से 500 कमरे हैं। कब्र जैसे स्थान में इतने सारे रहाइशी कमरों का होना समझ के बाहर की बात है।

100. ताज के पड़ोस के ताजगंज नामक नगरीय क्षेत्र का स्थूल सुरक्षा दीवार ताजमहल से लगा हुआ है। ये इस बात का स्पष्ट निशानी है कि तेजोमहालय नगरीय क्षेत्र का ही एक हिस्सा था। ताजगंज से एक सड़क सीधे ताजमहल तक आता है। ताजगंज द्वार ताजमहल के द्वार तथा उसके लाल पत्थरों से बनी अष्टकोणीय वाटिका के ठीक सीध में है।

101. ताजमहल के सभी गुम्बजदार भवन आनंददायक हैं जो कि एक मकब़रे के लिय उपयुक्त नहीं है।

102. आगरे के लाल किले के एक बरामदे में एक छोटा सा शीशा लगा हुआ है जिससे पूरा ताजमहल प्रतिबिंबित होता है। ऐसा कहा जाता है कि शाहज़हां ने अपने जीवन के अंतिम आठ साल एक कैदी के रूप में इसी शीशे से ताजमहल को देखते हुये और मुमताज़ के नाम से आहें भरते हुये बिताया था। इस कथन में अनेक झूठ का संमिश्रण है। सबसे पहले तो यह कि वृद्ध शाहज़हां को उसके बेटे औरंगज़ेब ने लाल किले के तहखाने के भीतर कैद किया था न कि सजे-धजे और चारों ओर से खुले ऊपर के मंजिल के बरामदे में। दूसरा यह कि उस छोटे से शीशे को सन् 1930 में इंशा अल्लाह ख़ान नामक पुरातत्व विभाग के एक चपरासी ने लगाया था केवल दर्शकों को यह दिखाने के लिये कि पुराने समय में लोग कैसे पूरे तेजोमहालय को एक छोटे से शीशे के टुकड़े में देख लिया करते थे। तीसरे, वृद्ध शाहज़हाँ, जिसके जोड़ों में दर्द और आँखों में मोतियाबिंद था घंटो गर्दन उठाये हुये कमजोर नजरों से उस शीशे में झाँकते रहने के काबिल ही नहीं था जब लाल किले से ताजमहल सीधे ही पूरा का पूरा दिखाई देता है तो छोटे से शीशे से केवल उसकी परछाईं को देखने की आवश्कता भी नहीं है। पर हमारी भोली-भाली जनता इतनी नादान है कि धूर्त पथप्रदर्शकों (guides) की इन अविश्वासपूर्ण और विवेकहीन बातों को आसानी के साथ पचा लेती है।

103. ताजमहल के गुम्बज में सैकड़ों लोहे के छल्ले लगे हुये हैं जिस पर बहुत ही कम लोगों का ध्यान जा पाता है। इन छल्लों पर मिट्टी के आलोकित दिये रखे जाते थे जिससे कि संपूर्ण मंदिर आलोकमय हो जाता था।

104. ताजमहल पर शाहज़हां के स्वामित्व तथा शाहज़हां और मुमताज़ के अलौकिक प्रेम की कहानी पर विश्वास कर लेने वाले लोगों को लगता है कि शाहज़हाँ एक सहृदय व्यक्ति था और शाहज़हां तथा मुमताज़ रोम्यो और जूलियट जैसे प्रेमी युगल थे। परंतु तथ्य बताते हैं कि शाहज़हां एक हृदयहीन, अत्याचारी और क्रूर व्यक्ति था जिसने मुमताज़ के साथ जीवन भर अत्याचार किये थे।

105. विद्यालयों और महाविद्यालयों में इतिहास की कक्षा में बताया जाता है कि शाहज़हां का काल अमन और शांति का काल था तथा शाहज़हां ने अनेकों भवनों का निर्माण किया और अनेक सत्कार्य किये जो कि पूर्णतः मनगढ़ंत और कपोल कल्पित हैं। जैसा कि इस ताजमहल प्रकरण में बताया जा चुका है, शाहज़हां ने कभी भी कोई भवन नहीं बनाया उल्टे बने बनाये भवनों का नाश ही किया और अपनी सेना की 48 टुकड़ियों की सहायता से लगातार 30 वर्षों तक अत्याचार करता रहा जो कि सिद्ध करता है कि उसके काल में कभी भी अमन और शांति नहीं रही।

106. जहाँ मुमताज़ का कब्र बना है उस गुम्बज के भीतरी छत में सुनहरे रंग में सूर्य और नाग के चित्र हैं। हिंदू योद्धा अपने आपको सूर्यवंशी कहते हैं अतः सूर्य का उनके लिये बहुत अधिक महत्व है जबकि मुसलमानों के लिये सूर्य का महत्व केवल एक शब्द से अधिक कुछ भी नहीं है। और नाग का सम्बंध भगवान शंकर के साथ हमेशा से ही रहा है।

107. ताज के गुम्बज की देखरेख करने वाले मुसलमानों के पास एक दस्तावेज़ है जिसे के वे “तारीख-ए-ताजमहल” कहते हैं। इतिहासकार एच.जी. कीन ने उस पर ‘वास्तविक न होने की शंका वाला दस्तावेज़’ का मुहर लगा दिया है। कीन का कथन एक रहस्यमय सत्य है क्योंकि हम जानते हैं कि जब शाहज़हां ने ताजमहल को नहीं बनवाया ही नहीं तो किसी भी दस्तावेज़ को जो कि ताजमहल को बनाने का श्रेय शाहज़हां को देता है झूठा ही माना जायेगा।

108. पेशेवर इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता तथा भवनशास्त्रियों के दिमाग में ताज से जुड़े बहुत सारे कुतर्क और चतुराई से भरे झूठे तर्क या कम से कम भ्रामक विचार भरे हैं। शुरू से ही उनका विश्वास रहा है कि ताज पूरी तरह से मुस्लिम भवन है। उन्हें यह बताने पर कि ताज का कमलाकार होना, चार स्तंभों का होना आदि हिंदू लक्षण हैं, वे गुणवान लोग इस प्रकार से अपना पक्ष रखते हैं कि ताज को बनाने वाले कारीगर, कर्मचारी आदि हिंदू थे और शायद इसीलिये उन्होंने हिंदू शैली से उसे बनाया। पर उनका पक्ष गलत है क्योंकि मुस्लिम वृतान्त दावा करता है कि ताज के रूपांकक (designers) बनवाने वाले शासक मुस्लिम थे, और कारीगर, कर्मचारी इत्यादि लोग मुस्लिम तानाशाही के विरुद्ध अपनी मनमानी कर ही नहीं सकते थे।

इस्‍लाम का मुख्‍य काम भारत को लूटना मात्र था, उन्‍होने तत्‍कालीन मन्दिरो अपना निशाना बनया। हिन्‍दू मंदिर उस समय अपने ऐश्वर्य के चरम पर रहे थे। इसी प्रकार आज का ताजमहल नाम से विख्‍यात तेजोमहाजय को भी अपना निशाना बनाया। मुस्लिम शासकों ने देश के हिंदू भवनों को मुस्लिम रूप देकर उन्हें बनवाने का श्रेय स्वयं ले लिया इस बात का ताज एक आदर्श उदारहरण है।

दुःख की बात तो यह है कि आज तक उनकी किसी भी प्रकार से अधिकारिक जाँच नहीं हुई। यदि ताजमहल के शिव मंदिर होने में सच्चाई है तो भारतीयता के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। विद्यार्थियों को झूठे इतिहास की शिक्षा देना स्वयं शिक्षा के लिये अपमान की बात है। 



अजय सिंह

Monday, November 9, 2015

दी (बि) हार के सबक

 दोस्तो ,
बिहार के चुनाव खत्म हो गये और साथ ही खत्म हो गये कुछ के अरमान ,कुछ के फरमान और कुछ नेताओं के बारे में गलफहमियाँ। जो अपने को बहुत बड़ा रणनीतकार मानते थे वह अब जमीं पर है। बड़े बड़े बयान देने वालों के मुह बंद है कुछ नेता अपने पद को बचाने के लिए जोड़ तोड़ में लग गए है। बहुत से लोग ऐसे है जिनका कैरियर खत्म हो गया तो नई पीढ़ी के नेताओं के लिए स्थान बना है। बिहार का चुनाव भाजपा के लिए दी हार का विशेषण बन गया है।
बड़े नेता हार के  डिसेक्शन में लगे है छोटे नेता उनको मदद कर रहे है और बता रहे है की सेंध कहाँ  कहाँ पर लगी है ताकि उनका नाम वफादारों की लिस्ट में बना रहे। कई नेताओं को तो परिणाम वाली रात सपने में हार के कारण पता चल गए और सुबह उठ कर उन्होंने जनता और अखबारों को बता भी दिया ताकि कारणों का जिक्र करने वालों में उनका नाम पहला हो,   उनका अनुभव चुनाव जीतने  में भले काम न आया हो कम से कम कारण बताने में तो आ ही जाये। आखिर इतने दिनों से राजनीत कर रहे है तो ऐसे ही थोड़ी सीनियर समझे जाते है। लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं से  अभी भी कोई बात करने को तैयार नहीं है ,अरे उन्हें इतनी ही अकल होती तो वह भी वरिष्ठ हो जाते और जमीन पर क्यों  होते।

आइये   आम आदमी की साधारण समझ के आधार पर कुछ विश्लेषण करें और देखें गलती कहा हुई और भावी रणनीत पर पर विचार करें ताकि आने वाले चुनावो में बात बन सके।
1 . मोदी जी के साथ 2102 में विधान सभा चुनाव और फिर 2014 में लोक सभा चुनावों में जिस टीम ने रणनीत बना कर मोदी को  ब्रांड बनाने का काम किया ,चाय पर चर्चा जैसे कार्यक्रम बनवा कर आम में पैठ बनवाई और
हर हर मोदी घर घर मोदी जैसे नारों को गढ़ कर हर जुबान पर मोदी का नाम चढाने की रणनीत बनाने का काम किया ,मोदी जी की टीम ने उस को उचित सम्मान देने के बजाय उसको अपने विरोधियों के खेमे में जाकर काम करने पर मजबूर किया। ऐसे रणनीतिक प्रशांत किशोर को नितीश ने करीब छै महीने पहले अपनी टीम में शामिल किया और उन्हें पूरा सम्मान देकर उनकी प्रतिभा का  उठाया।

2.  कहते है की भाग्य एक सीमित समय तक ही साथ देता है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव की 73 सीटों की जीत का सेहरा अमित शाह के सर बन्धवा कर उन्हें भाजपा का बड़ा रणनीत कार घोषित किया गया और फिर मोदी इफ़ेक्ट के चलते कुछ राज्यों के चुनावों में मिली जीत का श्रेय भी उन्हीं को दे दिया गया। हालांकि महाराष्ट्र जहाँ केवल सात महीने पहले लोक सभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर चूका था वहाँ शिव सेना के सहयोग से सरकार बना पायी। हिमाचल का चुनाव बुरी तरह हारने के बावजूद हार के सतही कारण बता अमित शाह सीधी आलोचना से बच गए.इस बीच हरियाणा में अच्छी जीत हो जाने के कारण पुनः ऐसा सिद्ध किया गया  की मोदी और अमित की जोड़ी अजेय है। दिल्ली में बुरी तरह केजरीवाल के हाथों पराजित हुए तो कहा गया की यहाँ
मिडिया ने उनका फेवर कर दिया और दिल्ली में तो लोग टीवी देख कर और अख़बार पढ़  कर वोट देते  है।  कामो बेश यही हाल जम्मू और कश्मीर के चुनाव का भी रहा है। लेकिन बिहार के इन चुनावो ने सिद्ध कर दिया की पिछली जीते केवल अमित शाह की रणनीत का परिणाम नहीं थी वरन मोदी इफेक्ट को खतम होने में टाइम लगा इसलीये जब  बराबरी के स्तर पर मामला आया तो हवा निकल गयी। लेकिन भाजपा का संसदीय बोर्ड मोदी को न पसंद आने वाली कोई बात तय करेगा इसमें संदेह है। और कहने  लिए भी खतरा तुरंत हो जाएगा जबकि चापलूसी करके कम से काम अगले साढ़े तीन साल सत्ता का सुख बिना किसी खतरे के उठाया जा सकता है।

3. सबसे बड़ी बात जो अटल जी चुनाव हारने और और अभी विधान सभाओं के चुनाव हरने में कामन है वोह यह भारतीय जनता पार्टी की देश में अपनी एक पहचान है और इसका एक कैडर है। सब जानते है की दक्षिण पंथी सोंच  कारण जनता का एक विशेष वर्ग इन्ही कारणों से पार्टी को कभी सपोर्ट करेगा यह सन्धेयास्पद। हालाँकि इसी सोच के कुछ ग्रुप विशेष कारणों से समय समय पर भाजपा को सपोर्ट करते है लेकिन यह बहुत लिमिटेड है अतः अपनी विचार धारा को छोड़ने का अच्छा परिणाम जल्दी कुछ तात्कालिक किये हुए कारणों से हो जायेगा यह मुश्किल है। यही गलत फहमी अटल जी के नेतृत्व में लड़े गए 2004 के चुनाव में हुई थी और फिर उसी को दोहराने की गलती मोदी के सलाहकारों ने की परिणाम सामने है।

4. सभी जानते है की कांग्रेस और इसके सहयोगी झूठ बोलने और मैनी पुलेट करने में में महारथ हासिल कर चुके है। इनके द्वारा ओब्लाइज किये हुए गुर्गे बड़ी -बड़ी पोस्ट पर बैठे है और समय समय पर स्वामी भक्ति का साबुत भी देते  रहते है इसका नमूना अभी कुछ तथा कथित साहित्यकारों तथा कलाकारों ने हॉल में ही किया है और देश में वैचारिक युद्ध की नयी जमीं तैयार कर दी है इसने तीन काम किये। एक जिन्हे साहित्य पुरस्कारों को प्राप्त कर
प्रसिद्ध नहीं मिली वोह वापस करके प्राप्त करली। दूसरा स्वामी भक्ति दिखाने का सुन्दर मौका  प्राप्त हो गया  तीसरा तात्कालिक लाभ बिहार चुनाव में जितवा  दिया।  मोदी के रणनीत कार समझ रहे थे की  वह  मैनी पुलेसन कर लेंगे। भाजपा की प्रतिभा  2004  में भी फ़ैल  हुई  और फिर उसकी पुनरावृति थोड़ी थोड़ी पहले हुई और गलतियों से सबक न सीखने  के कारण औंधे मुँह गिरपड़े।

उम्मीद की जानी चाहिये किसी  भी होशियार  और समझदार व्यक्ति की तरह मोदी जी अपनी ताकत जो उन्होंने विकास का वादा करके सिद्ध की थी उसी पर  स्थिर रहेंगे।  यही उनकी ताकत है और इसी मुद्दे पर देश की जनता खास तोर पर युवा वोटर को लुभाने में सफल हो सकती है। अपने को श्रेष्ठ समझने और टीम वर्क न करके केवल दो -तीन लोगो की पार्टी बनाने की कोशिश भविष्य में नहीं की जाएगी। तभी बेहतर कार्य प्रदर्शन करके भाजपा आने वाले उत्तर प्रदेश ,वेस्ट बंगाल इत्यादि के चुनाव में  संतोष जनक प्रदर्शन कर पाएगी।

 अन्त  में 
क्या हार  में क्या जीत में 
किंचित नहीं भयभीतमैँ 
संघर्ष पथ पर जो भी मिले यह भी सही वह भी सही 
वरदान माँगूँगा नहीं। 
लघुता अब न मेरी छुओ 
तुम ही महान बने रहो 
अपने हृदय की वेदना में व्यर्थ त्यागूँगा नही 
वरदान माँगूँगा नहीं। 
चाहे हृदय को ताप दो 
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्त्तव्य पथ से किन्तु भागूंगा नहीं 
वरदान माँगूँगा नहीं। 

अजय सिंह "जे एस के "
 
 

 

Sunday, November 8, 2015

शाहरुख़ खान की असहिष्णुता




 अभिनेता शाहरुख़ खान के बढ़ती 'असहिष्णुता' के बयान पर जयपुर
के कवि अब्दुल गफ्फार की ताजा रचना
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"तूने कहा,सुना हमने अब मन टटोलकर सुन ले तू
सुन सुन ओ शाहरुख खान,अब कान खोलकर सुन ले तू
तुमको शायद इस हरकत पे शरम नहीं है आने की
तुमने हिम्मत कैसे की जोखिम में हमें बताने की
शस्य श्यामला इस धरती के जैसा जग में और नहीं
भारत माता की गोदी से प्यारी कोई ठोर नहीं

घर से बाहर जरा निकल के अकल खुजाकर के पूछो
हम कितने हैं यहां सुरक्षित, हम से आकर के पूछो
पूछो हमसे गैर मुल्क में मुस्लिम कैसे जीते हैं
पाक, सीरिया, फिलस्तीन में खूं के आंसू पीते हैं

लेबनान, टर्की,इराक में भीषण हाहाकार हुए
अल बगदादी के हाथों मस्जिद में नर संहार हुए
इजरायल की गली गली में मुस्लिम मारा जाता है

अफगानी सडकों पर जिंदा शीश उतारा जाता है
यही सिर्फ वह देश जहां सिर गौरव से तन जाता है
यही मुल्क है जहां मुसलमान राष्ट्रपति बन जाता है
इसकी आजादी के खातिर हम भी सबकुछ भूले थे
हम ही अशफाकुल्ला बन फांसी के फंदे झूले थे
हमने ही अंग्रेजों की लाशों से धरा पटा दी थी
खान अजीमुल्ला बन के लंदन को धूल चटा दी थी
ब्रिगेडियर उस्मान अली इक शोला थे,अंगारे थे
उसने सिर्फ अकेले ने सौ पाकिस्तानी मारे थे
हवलदार अब्दुल हमीद बेखौफ रहे आ घातों से
जान गई पर नहीं छूटने दिया तिरंगा हाथों से
करगिल में भी हमने भी बनके हनीफ हुंकारा था
वहाँ मुसर्रफ के चूहों को खेंच खेंच के मारा था
मिटे मगर मरते दम तक हम में जिंदा ईमान रहा
होठों पे कलमा रसूल का दिल में हिंदुस्तान रहा
इसीलिए कहता हूँ तुझसे,यों भडकाना बंद करो
जाकर अपनी फिल्में कर लो हमें लडाना बंद करो
बंद करो नफरत की स्याही से लिक्खी पर्चेबाजी
बंद करो इस हंगामें को, बंद करो ये लफ्फाजी
यहां सभी को राष्ट्र वाद के धारे में बहना होगा
भारत में भारत माता का बनकर ही रहना होगा
भारत माता की बोली भाषा से जिनको प्यार नहीं
उनको भारत में रहने का कोई भी अधिकार नहीं"



पुरस्कार तो लौटेंगे ही
अब गीता पढ़ने वाला पीएम जो मिला है ।
पुरस्कार तो लौटेंगे ही
पाकिस्तान में मोदी हाय हाय जो मचा हुआ है ।
पुरस्कार तो लौटेंगे ही
क्योंकि,अब राष्ट्रपति भवन में रोज़ा इफ़्तार के साथ नवरात्री का कन्या पूजन भी जो हो रहा है ।
पुरस्कार तो लौटेंगे ही
जो इस देश का पीएम जाकर अरब देशों में मंदिर बनवा रहा है ।
पुरस्कार तो लौटेंगे ही
जो इस देश का पीएम विदेशों में भी भगवा धारण कर रहा है ।
पुरस्कार तो लौटेंगे ही
जो आज मोदी की वजह से विश्व योगा दिवस मना रहा है ।
पुरस्कार तो लौटेंगे ही
जो अब फिर से दूरदर्शन के लोगों में "सत्यम शिवम् सुन्दरम्" अंकित हो गया है
पुरस्कार तो लौटेंगे ही
जो आज पूरे देश में गौहत्या रोकने की बात जो हो रही है ।
इंतज़ार करिये ।
अभी बहुत पुरस्कार लौटने हैं ।
देश जाग जो रहा हैं ॥