Monday, June 8, 2020

देश की उन्नति के लिए करे श्रम और श्रमिकों का सम्मान

प्रिय दोस्तों ,

भारत में हम लोगो के  घरों में श्रमिक झाड़ू पोछा, बर्तन, बागवानी और कपड़े प्रेस इत्यादि का काम  करते हैं।आम तोर पर पुरुष श्रमिक बाहर  के और भारी काम  तथा    घर के अंदर के काम जिसमे खाना बनाने से लेकर बर्तन ,घर की सफाई इत्यादि  श्रमिक महिलाएं करती है।  यह घर में  तय समय पर आती हैं प्रायः  उनके साथ शिशु या छोटी बच्चे  भी होते है  जो श्रमिक की कार्यअवधि  में घर में  जमीन पर इधर उधर  खेलते रहते हैं।

घर  में काम पर आने  के बाद हम उन्हें चाय या कुछ बचा हुआ खाना दे देते हैं। जो वे महिलाएं वहीं जमीन पर बैठकर ही खा लेती हैं। कभी सफाई ठीक से नहीं हुई या काम में कुछ कमी रह गई तो उन्हें बुरी तरह डांट भी देते हैं। अगर किसी कारणवश वे काम पर नहीं आ पाती तो कई बार उनके पैसे भी काट लिए जाते हैं। हम यह भी जानने की कोशिश नहीं करते कि वह क्यों नहीं आ पाई?कहीं वह या उसके परिवार का कोई सदस्य बीमार तो नहीं था या कोई अन्य समस्या तो नहीं है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह तबियत ठीक न होने के बावजूद  भी हमारे यहां काम करने चली आई हो? कारण,आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगो को  अपनी पगार में  कटौती करवाना बहुत भारी पड़ता है।  ऊपर से यह भी डर कि  ना आने के कारण हम उसे काम से ही ना निकाल दें। अपनी और अपने परिवार की  आर्थिक सुरक्षा कैसे की जाये इस बारे में कोई ज्ञान व्  अनुभव इन्हे नहीं होता  है। देश के कानून भी इनको किसी तरह का सपोर्ट नहीं करते  है। हालांकि मोदी सरकार  ने कुछ ऐसे कानून अभी हाल में बनाये है जिससे अब इन्हे बीमा इत्यादि का लाभ और पेन्सन बगैरह मिलने की राह निकली है लेकिन अभी भी यह  पर्याप्त नहीं है। 


एक तरह से हमने उनके अस्तित्व और आत्मसम्मान को इग्नोर करना सीख लिया। ग्रहणी को छोड़कर परिवार के बाकी सदस्य उस किशोरी या महिला  और उसके साथ आए बच्चे को आमतौर पर  नोटिस नहीं करते। सिवाय तब के जब वह घर में रखा कोई सामान छूने की  कोशिश करता है जिससे उसके टूटने या खराब होने का डर रहता है।  इन लोगो को  अभिवादन करना या उनके अभिवादन करने का जवाब देना भी  दूर की बात है। ऐसा लगता है कि अभिवादन   की शिष्टता  से हम कोसों दूर हैं।

उनके जीवन में क्या उथल  पुथल है यह  वही जाने।उनके परिवार के बारे में जानने में  किसी को कोई दिलचस्पी  नहीं है ।  उनके बच्चों की पढ़ाई या उनकी उन्नति के बारे में किसी प्रकार के सहयोग के लिए कोई प्रयास आमतौर पर हम लोग  नहीं करते हैं। इन लोगो  पर कभी कभी चोरी इत्यादि का आरोप  बिना किसी सबूत के भी लगा देते हैं। बिल्डिंग के चौकीदार बाहर कूड़ा उठाने वाला , नाली साफ करने वाले कर्मचारी, घर की पुताई करने वाले और शेष कर्मचारी  भी हमारी बेरुखी से नहीं बचते। यही बर्ताव हम फल सब्जी बेचने वालों से भी करते हैं। छोटे दुकानदारों से अभद्र भाषा में बात करना  दाम सुनकर सीधे लूटने का आरोप लगा देना रोज की बात है । फिर उनके बताये दाम  को 30 - 40% कम कर के बोलते हैं। रिक्शा चालक के साथ भरी दोपहरी में भी 5 -10  रुपये का मोल भाव करने की भी आदत हमारी है। 

सड़क पर चलते ठेले वाले रिक्शे वाले का पहिया अगर किसी की मोटरसाइकिल या कार से छू जाए तो गाली देना तो छोटी बात है कई लोग हाथ भी उठा देते हैं।अधिकतर दुकान व्यवसाय और छोटी फैक्ट्री के मालिक अपने यहां काम करने वालों से ऐसा ही बर्ताव करते हैं। कई लोग वेटर को शायद मनुष्य ही नहीं मानते। अक्सर उन के हिस्से में डाट  और हिकारत ही आती है।

विदेशो में आम तोर पर जब आप दुकान में जाते है तो वहाँ बैठा सेल्स मैन आपको अभिवादन करता है और आप भी शिष्टाचारवश उसका जवाब मुस्करा कर देते है। विदेशो में ही क्यों यहाँ पर भी बड़ी दुकान में यदि आप जायेंगे तो वहाँ बैठा हुआ  दुकानदार या सेल्स परसन आपका मुस्करा कर अभिवादन करेगा और ज्यादातर लोग उसे इग्नोर भी नहीं करते है।  लेकिन छोटी दुकान या ठेले वाले और रिक्शावाले के साथ व्यहार करते समय इसको जान बूझ कर इग्नोर करने में अपनी शान और बड़ाई समझते है। 

यहाँ  यह बात समझना बहुत जरुरी है  कि शॉपिंग पहले एक सामाजिक प्रक्रिया है फिर आर्थिक गतिविधि है।हम दैनिक व्यवहार में शिष्टाचार बरतते हैं, खरीदार और विक्रेता दोनों पहले सामाजिक व्यक्ति हैं बाद में आर्थिक एजेंट। इन दिनों शहरों से पलायन को लेकर मजदूरों की व्यथा पर कई लोगों का हृदय द्रवित है। वे सोशल मीडिया पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं और सरकारों को कोस रहे हैं।उस जनसमुदाय को जिसके बारे में हम जानते थे कि वह यही कहीं  है, लेकिन आशा करते थे कि वह हमारी आंखों के सामने ना आए। यही वह  विशाल मानव समूह है  जिसके कारण हमारा  जीवन  और घर गृहस्थी  चलती रहती है। उनकी वजह से ही हमारा घर बन जाता है घर के अंदर पानी आ जाता है घर में सफाई भी हो जाती है। 

एक तरह से हम लोगो की  सुख समृद्धि में इस मानव समूह का बड़ा योगदान है और इसको इग्नोर करना कठिन तो है ही साथ ही अशिष्ट भी । मुझे खुशी है कि हमने उस विशाल जनसमुदाय के अस्तित्व को करोना कल में  नोटिस किया है।उम्मीद है कि उनके लौटकर आने पर अभी इसी समय से हम उनके अस्तित्व और गरिमा को सम्मान देंगे। उन्हें भी अपने जैसा इंसान समझेंगे।ठीक वैसे ही जैसे हम चाहते हैं कि दूसरा इंसान हमसे एक इंसान का बर्ताव करें। देश की उन्नति के लिए आवश्यक है की हम श्रम और श्रमिकों का सम्मान करना शुरू करे और इसे अपनी आदत में शुमार करे।  तभी हम देश की उन्नति सुनिश्चित कर पायंगे। 

अजय सिंह "एकल"

और अंत में 

हम उठाये फिरते है किश्ती को अपने सर पर 
शायद अगले मोड़ पर कहीं दरिया मिल जाये।  



3 comments:

Ajay Singh Ekal said...

बौद्धिक श्रम को शारीरिक श्रम से अधिक श्रेष्ठ मानना ही इस समस्या का मूल कारण है ।

इस कारण श्रम मूल्य के निर्धारण का कोई सही आधार अभी तक बन नहीं पाया है ।

हर क्षण या हम शोषण करते हैं या हम शोषित होते हैं ।
सत्य यह है कि ना हम शोषण करना चाहते हैं और ना ही हम शोषित होना चाहते हैं ।

हमारी अगली पीढ़ी हमसे इस समस्या के समाधान की अपेक्षा करती है

Prof Rajneesh Arora
Ex VC
Punjab Technical University

Unknown said...

समसामयिक चिंतन, श्रेष्ठ विचार

ajay karmyogi said...

🙏🙏लोहा गर्म है हथोडा उसी समय चलाएं तो बिना अतिरिक्त प्रयास के ही भगवत कृपा से हमारा कार्य सिद्ध हो सकता है
जिनके पास एक मिनट भी फुर्सत नहीं थी बात करने की आज वह सब लोग अपने घरों में कैद हैं उनका हाल चाल लेकर उन्हें सांत्वना का मलहम लगाएं और इस समय उन सबका संयोजन करें और एक निश्चित टाइम पर सभी ऐसे लोगों को गौ-गांव गुरुकुल व्यवस्था में सहभागी बनने हेतु ऑनलाइन एक गोष्ठी आयोजन करें
जिसका विषय 21वीं सदी में मानव के सामने चुनौतियां और भारतीय समाधान
हालाकि आप बहुत सारे प्रश्नों के हल स्वयं जानते हैं पर सभी उत्तर स्वयं देने का प्रयास में ना उलझे कुछ प्रश्न हमारे लिए छोड़ दे तो कार्य सिद्धि में काफी बादल छंट जाएंगे और गाय गांव गुरुकुल के लिए रास्ता साफ हो सकता है
मेरी सहभागीता के लिए गोष्ठी के लिए पूर्व निर्धारित समय अवश्य सुनिश्चित करलें जिसे गोष्ठी में मेरा उपस्थिति बन सके नीचे लिंक भेज रहा हूं उस लिंक पर जाकर क्रिएट न्यू मीटिंग पर जाकर मीटिंग id और पासवर्ड लोगों को भेजकर और किस समय मिटिंग होगी उनको फोन कर सूचित करें इस तरह से आप अपने लोगों को संयोजन कर अपनी मानवीय संवेदना के साथ राष्ट्रीय चेतना का परिचय दें धंयवाद आभार अजय कर्मयोगी राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 7984113987
https://www.saynamaste.in कृपया इधर उधर अपनी उर्जा ना बिखेरें आज चारों तरफ बचाओ बचाओ का करुण क्रंदन सुनाई दे रहा है गाय बचाओ बेटी बचाओ धर्म बचाओ संस्कृति बचाओ जंगल बचाओ आदि आदि पर आप एक केवल ज्ञान को बचाइए सब बच जाएगा अन्यथा आपका सारा पुरुषार्थ नष्ट हो जाएगी हरदिन एक से दो नए गुरुकुलों के प्रस्ताव मिल रहे है और कितने लोग बच्चों को गुरुकुल में प्रवेश हेतु वेटिंग भी कर रहे हैं आप किसी भी संस्था या संगठन से क्यों ना जुड़े हो पर गाय गांव गुरुकुल के लिए आपका एक छोटा सा प्रयास राष्ट्र और समाज की दिशा बदलने में सार्थक परिणाम सुनिश्चित करेगा
आप स्वयं संयोजन का दायित्व राष्ट्र राज्य जिला तहसील ब्लॉक या ग्राम स्तर पर अपनी क्षमता अनुसार चुनें और और आत्मदीपो भव को चरितार्थ करें whatsapp या sms 9336919081 पे करें अजय कर्मयोगी राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान