Sunday, October 8, 2017

क्षद्म सत्य

क्षद्म सत्य


अश्वथामा मारा गया , नर या कुञ्जर
तुमने तो सत्य ही बोला था युधिष्ठर
किन्तु वे तुम्हारे ही साथी थे धनुर्धर
जिन्होंने गुंजाया था शंख स्वर ,
जब तुमने कहा था नर या कुंजर

ठीक है

तुम सत्यवती भी बने रहे ,और काम भी हो गया
युद्ध जीत गये दुनिया में बड़ा नाम भी हो गया
किन्तु उस छण जो सम्प्रेषित हुआ था
तुम्हारे द्वारा तुम्हे पता है असत्य था

गुरुद्रोण

पुत्र वध सुनकर नहीं मरे
शिष्य का छद्म सत्य देख कर
लज्जा से देह छोड़ चले गए II 



अंत में

कितने है दीवाने लोग
आते है समझाने लोग
मन्दिर मस्जिद में मिलती शांति
तो क्यों जाते मैखाने लोग II






अभी जमीर में थोड़ी सी जान बाकी है


अभी जमीर में थोड़ी सी जान बाकी है



अभी जमीर में थोड़ी सी जान बाकी है
अभी हमारा कोई इम्तिहान बाकी है
हमारे जेहन की बस्ती में आग लगी ऐसी
की जो था वह खाक हुआ बस एक दुकान बाकी है ll


हमारे घर को उजड़े तो एक जमाना हुआ
मगर सुना है अभी वो मकान  बाकी है
अब आया तीर चलाने का फन तो क्या आया
हमारे हाथ खाली कमान बाकी है II

जरा सी बात फैली तो दास्तान हुई
वो बात खतम हुई सिर्फ दास्तान बाकी है
वो जखम भर गये तो अर्सा हुआ मगर अबतक
जरा सा दर्द और निशान बाकी है II


2nd One


बयाबां हमें इसलिए पूछता है
              की बहारों की दुनिया से हम आ रहे है ,
बताये कोई अपनी नाकामियों को क्या
            की सहारों की दुनिया से हम आ रहे है II

न कलिओं का मजमा , न काटों का सदमा
       खुदा जाने गुलशन को क्या हो गया है
महकने के मौसम को आबाद रखने
        निखारो की दुनियाँ से हम आ रहे हैII

कभी शामे गम में जो खुल के न रोये
            वो क्या मुस्कराएंगे लुत्फे सहर में
हमें चांदनी की चकाचोंध से क्या
              सितारों की दुनियाँ से हम आ रहे है II

हमारे लिए क्या नहीं आबेजमजम
           फ़रिश्तो ने क्या उसका ठेका लिया है
तुम्हारे लिए मैकदा हो मुबारक
           खुमारी की दुनिया से हम आ रहे है II

बी एस रँग



                               


विषधरों  की नगरिया

विषधरों  की नगरिया



आदमी का  नहीं कोई नामों निशा

विषधरों की नागरिया में बसते है हम

संस्कारो का यह अजब सिलसिला

आदतन एक दूजे को डसते हैं   हम ll


घूमते है सड़क पर छलावे  यहाँ

दोस्ती के भी झूठे वादे यहॉ

प्यार के रह गए दिखावे यहाँ

पीठ पीछे सदा   व्यंग कसते   है हम ll


जिंदगी पर कुकर्मो की पालिश जमी

और क्या रह गयी अब पतन में कमी

आवरण पर चंद आवरण रेशमी

आचरण में मगर कितने सस्ते है हम ll


विष के सागर में डूबा नगर देखिये

पी चुके हम कितना जहर देखिये

देखना हो तो हमारा हुनर देखिये

कैसे हर हाल में खुल के हॅसते है हम   ll


अल्लहड़ बीकानेरी