Friday, January 25, 2013

मैं भी मर्द हूँ

दोस्तों,
विवादस्पद बयान और बडबोला पन नेता के बड़े होने की निशानी है।अखबार और अन्य माध्यमो से समाचार में बने रहने का तरीका भी। तभी तो नितिन गडकरी जो अभी -अभी खुद  बेआबरू होकर और अपने चाहने वाले  बहुतो को बेआबरू होते देख कर अध्यक्ष पद से रुखसत हुएँ हैं और भाजपा को और ज्यादा शर्मिंदगी से बचाने के लिए धन्यवाद के पात्र है, ने 24 घन्टे से भी कम समय में यह बता दिया की वह भी मर्द है इसलिए जब एन डी ऐ की सरकार आयेगी तो उन इन्कम टैक्स अफसरों को कोई बचा नहीं पायेगा जो उन्हें तंग कर रहे है। अब गडकरी कोई मामूली आदमी तो है नहीं आखिर एक राष्ट्रीय पार्टी के पूर्व  अध्यक्ष  है इसलिए उन्हें ऐसे बयान देने से कोई रोक नहीं सकता और अब तो वह उन मर्यादाओं  को भी लाँघ सकते है जो पद पर रहते संभव न थी।लेकिन अपनी मर्दानगी का बखान करने में उन्होंने  तीन महीने यानी  अक्टूबर के महीने से अबतक का समय ख़राब क्यों किया यह आम आदमी और पार्टी कार्यकार्ताओ की समझ के बाहर है।  अगर उसी समय पद से इस्तीफा   देकर ताल ठोकते तो लोग वाकई मर्द समझते और फिर उन्हें इसकी घोषणा नहीं करनी पड़ती। उनकी और पार्टी की इज्जत बढती सो अलग।

लेकिन देश में गडकरी अकेले मर्द नहीं है। इस देश का गृह मंत्री भी मर्द है। तभी तो पाकिस्तानियो द्वारा भारतीय सैनिको के सर काटने पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता। हाफिज सईद को सईद जी कह कर संसद में बयान देता  है।दिल्ली रेप कांड जिससे पूरा देश आंदोलित हो गया उस पर सात दिनों तक चुप्पी साधे रहता है।लेकिन  मर्दानगी का  सबूत देने और  अपनी मालकिन को खुश रखने के लिए देश भक्तो के संगठन आर एस एस को देश द्रोही संगठन करार देता  है।उसी क्रम में देश का गृह सचिव अपने मालिक यानी मंत्री जी को खुश करने के लिए कहते है की उनके पास सबुत भी है लेकिन कोई कार्यवाही  क्यों नहीं कर रहे है यह बताने की हिम्मत इन मर्दों में नहीं है।  भगवा जिसने  देश में शिवाजी महराज जैसे  कितने ही देश भक्तो को बलिदान होने के लिए प्रेरित किया है, को आतंकवाद का प्रतीक बताने में मर्दानगी महसूस कर रहे है। अब इनसे कोई यह पूछे की राहुल के पर नाना (राजीव के नाना) जवाहर लाल जी ने  इसी  संगठन को क्यों  देशभक्त संगठन ही करार नहीं दिया बल्कि 1963 की गणतन्त्र  दिवस परेड में भागीदारी के लिए बुलाकर सम्मान भी किया था।लेकिन इन मर्दों का पढने लिखने से तो कोई सम्बन्ध है नहीं बस तलवे चाटने की आदत ने पद और प्रतिष्ठा दिल दी है तो उसीको बाकी जिन्दगी  में हथियार बनाये रखने की कोशिश जारी है। फिर देश का नफा हो या नुकसान हमें तो बस अपने वोटो से है काम।

राहुल की दादी श्रीमती गाँधी ने भी  1971 पाकिस्तान युद्ध में  संघ को उस  के द्वारा युद्ध के समय देश सेवा के  किये हुए कार्यो के लिए बधाई दी थी . उनका भाषण संसद के दस्तावेजो में दर्ज है और साथ ही अटल जी का वह बयान  भी जिसमे उन्होंने इंद्रा गाँधी की तुलना माँ दुर्गा से की थी। इस लिहाज से तो नेहरु और इंद्रा संघ के आतंक वाद का समर्थन करते हुए माने जाने चाहिए और इस  से जो नतीजा निकलेगा वह यह है की कांग्रेसी कई पीढियो से  आतंकवादी संगठन अर्थात संघ का समर्थन समय समय पर करते रहे है  और राहुल उसी खानदान के कुलदीपक है   तो क्या वह आतंकी समर्थक है , इस सवाल का जवाब यदि आपके (शिंदे के) पास न हो तो कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े मर्द दिग्विजय सिंह  से पूछ लीजिये जिनकी घिघ्घी ओसामा के मर जाने और दफ़न होने की खबर आने  के बाद भी बहुत दिनों तक बंधी रही और उसको ओसामा जी कह कर बुलाते रहे। लेकिन देश भक्तो पर किसी भी तरह का आरोप लगा कर मर्दानगी दिखाने में नहीं चूकते ।

अजय सिंह "एकल"


Saturday, January 19, 2013

लोक तंत्र को दे आधार करे चुनाव सुधार

दोस्तों,
आदमी की जिन्दगी में पाँच  साल का जो महत्व है वही महत्व देश की जिन्दगी में सौ साल का होता है।हमारे देश में पंच वर्षीय योजना की शुरुवात लोक सभा एवं विधान सभाओ की पांच साल से सह सम्बद्ध है।अर्थात पांच वर्ष की योजना केंद्र सरकार द्वारा पांच साल की लोकसभा के  माध्यम से कार्यान्वन  किये जाने की संकल्पना है। बस यहीं चूक हो गयी। एक सरकार ने अपनी सुविधा के हिसाब से पांच हिसाब की योजना बनाई और उसको लागू  करवा दिया।और उसके बाद आने वाली सरकार ने अपने नेता और पार्टी की इच्छा अनुसार कुछ पुरानी नीतियो को लागू रखा और जो सुविधा जनक नहीं लगी उन्हें बदल दिया।ऐसा करने पर देश की दिशा में क्या परिवर्तन होगा,लगे हुए कितने पैसे ख़राब हो जायंगे,जनता के ऊपर इसका परिणाम क्या होगा इसकी चिंता करने का समय और इच्छा दोनों  शक्ति की कमी हमारे नेताओ में रही है। जिसका नतीजा देश दिशा हीन होकर कहाँ जा रहा है इसकी जवाब देही भी शायद ही किसी की है। ऐसा कब तक ऐसे  ही चलने दिया जाये ?क्या कुछ किया जा सकता है।आइए इस पर विचार करे।देश गणतंत्र की 63वी जयन्ती  मनाने  को तैआर है,अत:इस पर विचार करना आवशयक है ताकि हम आने वाली पीढ़ी के लिये जो भारत बनाए उस पर उसे गर्व हो, ताकि  वह पढ़ लिख कर किसी तरह अच्छी नौकरी पाकर या विदेश में जा कर बसने का लक्ष्य न बनाने के बजाए देश में रहने और इसकी सेवा करने में गर्व महसूस करे। हमारे इस विषय में सुझाव है :
  1. देश की अगले सौ सालो की जरूरतों का आंकलन किया जाये और उसको 50,25 और 5 वर्षो में प्राप्त किये जाने योग्य भागो में बाँट कर लागू करने की योजना बनायीं जाये।
  2. देश की योजनाओ को दो हिस्सों में बाटा  जाये ,एक वह जो नेताओ और  पार्टी हितो के ऊपर देश हित में हो और नेताओ अथवा पार्टी के आने -जाने से उन नीतिओ के प्रभावी कार्यान्वन प्रभावित न हो। जैसे देश की शिक्षा नीत क्या होगी, विदेश नीत अथवा रक्षा नीति क्या होगी अथवा बुनियादी ढांचे को बनाने की नीति क्या हो  यह  पार्टी अथवा नेताओ से प्रभावित न हो और यह अपने दीर्घ कालीन आवश्यकताओ के अनुसार  चले ताकि एक निश्चित समय में हमारे देश की दीर्घ कालीन अवश्यक्ताये पूर्ण होना निश्चित हो जाये।
  3. बची हुए क्षेत्रो की  नीतिया पांच  वर्ष की आवश्यकताओ के हिसाब से बनाई जाये जिसको चुनी हुई सरकार अपनी नीतिओ के हिसाब से बना  कर लागू कर सके।
  4. सरकार के द्वारा वस्तुओं  के दाम बढ़ाये जाने  अथवा अन्य किसी प्रकार भी परवर्तित किये जाने की मियाद एक साल में एक बार ही हो। ताकि एक बार नीति निर्धारण हो जाने के बाद आम आदमी और देश का व्यापारी उन नियमो  के हिसाब से अपनी योजना बना सके और जीवन यापन की व्यवस्था कर सके। साल में कई बार  बीच -बीच में महंगाई बढ़ जाने से आम आदमी की कमाई अथवा वेतन  वृद्धी  नहीं होती अत: उसके लिए जीवन दुश्वार हो जाता है। इसलिए बार-बार वृद्धि से बचा जाना चाहिए।किसी आपात जनक स्थिति में संसद में तीन  चौथाई बहुमत से उसका निर्णय किया जाये। 
  5.  किसान से ख़रीदे जाने का दाम साल में एक बार तय होता है तो फिर उसके खेत में लगने वाले सामानों जैसे खाद,डीजल इत्यादि के दामो में साल में कई बार वृद्धि करने से उसे निरंतर नुक्सान होगा और वह अपने काम को छोड़ने में ज्यादा रूचि रहेगी बजाय काम करने में।यह अच्छा चिन्ह नहीं है। भारत देश जिसकी अर्थव्यस्था कृषि आधारित है किसानो को लगातार अनादर देश की ऐसी क्षति करेगा की उसकी पूर्ति मुश्किल है।
  6. राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों में निर्णय लेने में आम जनता की राय  इलेक्ट्रोनिक सुविधाओं  का इस्तेमाल कर संसदीय क्षेत्रानुसार करवा कर सांसदों का अपने क्षेत्र की राय के हिसाब से ही समर्थन देना अनिवार्य हो। उदहारण  के लिए ऍफ़ डी आइ के मामले में क्षेत्रियो पार्टियो ने जिस तरह का व्यहार किया वह वास्तव में जनतंत्र का अपमान है।ऐसे मुद्दों पर जनता की राय जानना आवाश्यक हो।और इसकी मोनीटरिंग चुनाव आयोग  स्वयं करे।और सांसदों के लिए उनके क्षेत्र की जनता का निर्णय मानने की बाध्यता होनी चाहिए।
  7.  सरकार जब भी किसी चीज पर दाम बढाती  है तो साथ ही बताना चाहिए की उसका बढ़ा हुआ पैसा कहा खर्च करंगे। और बढ़ी कमाई तथा खर्च दोनों में आपस में सम्बन्ध होना चाहिए।उदाहरण  के लिए यदि सड़क पर नियम तोड़ने के लिए जुर्माना बढ़ाते है तो उसका निवेश सड़क के गढ़ों को पाटने में ,सड़क बत्तियो को ठीक करने  में लगाया जाये।
  8.  जब भी सब्सिडी देने की घोषणा सरकार करती है तो उसे यह बताना चाहिए की इसकी भरपाई कहाँ से करने वाली है।किस तरह के अतरिक्त टैक्स इत्यादि लगाये जाने प्रस्तावित है।ताकि आम जनता को पता चले की किस कीमत पर किसको लाभ पहुँचाई जा रही है। यह उचित नहीं की एक बार सब्सिडी दी जाये और फिर थोड़े दिन बाद घाटे के नाम पर दाम बढ़ाये जाये ये टैक्स लगाये जाये।
  9.  जब कोई पार्टी अपने चुनाव घोषणा पत्र में  अर्थ सम्बन्धी घोषणाऐ करती है तो उसे भी यह बताना आवश्यक हो की खर्च का उपयोग कैसे होगा और धन कैसे आयेगा।जैसे किसान का कर्ज माफ़ किया जायेगा तो इस पैसे की व्यवस्था कैसे होगी।हम बैंक में घाटा करके इसी नीत कैसे बना सकते है। और फिर उसको पूरा करने लिए नए टैक्स लगाये ये दाम बढ़ाये यह उचित नहीं।
  10.  सभी उम्मीदवारों के लिए यह आवश्यक हो की वह जन प्रतिनधि  बने रहने के दौरान अपनी माली हैसियत के बारे में स्पष्ट घोषणा करे और बताये की उनकी कमाई में वृद्धि किस तरह अर्थात कितनी वृद्धि सम्पत्ति पुनर्मूल्यांकन  के कारण हुयी है और कितनी कमाई के कारण। 
  11.  यदि कोई उम्मीदवार अपनी सुरक्षा कारणों से एक से ज्यादा जगह से चुनाव लड़ता है तो उसे अतरिक्त
     सीटो पर उपचुनाव करवाने का खर्च चुनाव आयोग  के पास जमा करवाना चाहिए। यदि उम्मीदवार एक से अधिक स्थान से जीत  जाता है तो छोड़े जाने वाली सीट  पर उपचुनाव का खर्चा उस उम्मीदवार से लिया जाये न की सरकारी खजाने से। पिछले लोकसभा चुनाव में करीब 10000 करोड़ रुपये लोकसभा की 540-542 सीटो  पर खर्च हुए थे। जिसके अनुसार करीब 20 करोड़ रुपये  एक  सीट का खर्च होता है .यदि  यही चुनाव  एक साथ न होकर अलग अलग होता है तो खर्च लगभग दूना अर्थात उपचुनाव में 40-50 करोड़ होता है। इतना पैसा बैंक में जमा करवा कर ही एक से ज्यादा सीट   पर चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाये। किसी उम्मीदवार को चुनाव में विजयी होने की सुरक्षा जनता के पैसे से नहीं दी जा सकती 
     
  12. चुनाव में आचार संघिता का तोडा जाना एक आम बात है।ज्यादातर मामलों में चुनाव आयोग चेतावनी दे कर उम्मीदवार को छोड़ देता है।इस सम्बन्ध में नियम स्पष्ट होना चाहिए।एक बार चेतावनी  देने के बाद दुबारा गलती होने पर उम्मीदवारी रद्द करने का अधिकार चुनाव आयोग  के पास होना चाहिए।और चुनाव आयोग  इस पर सख्ती से अमल करे इसके लिए सभी पार्टियों के एक-एक प्रतिनिधियों का अधिकरण बने जो इस विषय पर बहुमत से अपनी राय निर्धारित दो-तीन दिन में  दे और चुनावआयोग उसे सख्ती से लागू  करे।
  13. यदि कोई नेता किसी दूसरी पार्टी के बारे में आपत्तिजनक अथवा भद्दा टीका -टिप्पणी करता है तो उसे इस के लिए पर्याप्त सबूत  देने चाहिये।इसके बिना यह कहना की मैंने तो आरोप  लगा दिया है अब आरोपी इस को गलत सिद्ध करे अथवा अदालत में जाये उचित नहीं है। क्योंकि ज्यादातर मामलो में यह केवल बदनाम करने की साजिश  होती है जो आम आदमी को गुमराह करने के लिए की जाती है।
  14. सभी राजनैतिक पार्टियों द्वारा लिए जाने वाला पैसा व खर्च का ब्यौरा  इनकी बैलेंस शीट में हो और वह  वेब साईट पर आम आदमी के लिए उपलब्ध हो ताकि।पच्चीस हजार से ज्यादा दान देने वाले का नाम और पता उसी तरह जांचा जा सके जैसे समाज सेवी संस्थाओ को दिया जाने वाला धन जांचा जाता है। दिए जाने वाले धन पर 20-25% टैक्स वसूलना भी ठीक रहेगा।ताकि काले धन को  चुनाव के माध्यम से सफ़ेद करने के काम पर रोक लग सके।
  15. जो  पब्लिक लिमिटेड कंपनिया दान देती है यह केवल उन्ही को इजाजत होनी चाहिए जिन्होंने अपनी सालाना बैठक में ऐसा  प्रस्ताव पास किया हो।यह केवल 2%शेयर रखने वाले और मालिको की तरह कम्पनी चलाने की मन मर्जी से नहीं होना चाहिए।
  16. जिन कंपनियो पर सरकारी देनदारी बाकी है उन्हें दान देने की इजाजत तब तक न दी जाये जब तक वह देनदारी  दे न दे अथवा उतना पैसा सरकारी खजाने में जमा न कर दे।ताकि सरकारी पैसा देने के बजाय दान देकर जीतने वाली पार्टी की सरकार बनने के बाद दान की दुहाई दे कर सरकारी खजाने को चूना   न लगा  सके।
 अजय सिंह "एकल"

Wednesday, January 16, 2013

करे कोई भरे कोई

 दोस्तों ,
क्या अपने कभी ऐसा  देखा है की किसी के द्वारा की गयी गलतियों का खामियाजा कोई दूसरा आदमी या व्यवस्था भरे। शायद नहीं। आपने तो शायद यह भी नहीं देखा होगा की यदि आप किसी योजना के बनाने और उसे लागू  करने के लिए जिम्मेदार हो तो उस योजना के बुरी तरह फेल  हो जाने पर आपको किसी  भी प्रकार न तो दण्डित किया जा सकता है  न ही  और किसी प्रकार की जवाबदेही आपकी बनती है। और आप मजे से अपनी सेवा पूरी करते हुए यानि सेवा में तरक्की का लाभ उठाते हुए सभी प्रकार के सेवा लाभ लेते हुए शान से सेवानिवृत्ति के लाभ उठा सकते है।

लेकिन  ऐसा हो रहा है और आप की नाक के नीचे हो रहा है और आप खूटें में बंधी बकरी की तरह कसाई को देख कर में-में तो कर रहे है लेकिन इससे ज्यादा कुछ नही कर सकते। हालाकिं इसमें दोष उन लोगो का नहीं है जो ऐसा कर रहे है ।बल्कि दोष उन लोगो का है जो ऐसा होते हुए देख रहे है, और कभी -कभी चर्चा भी करते है लेकिन उससे बाहर आने के लिए कोई प्रयत्न इसलिए नहीं करते की उन्होंने मान लिया  है की यही भाग्य है , यही विधि का विधान है अत: प्रयास करने से भी कुछ सार्थक होने वाला नहीं है।

आईये,हम अब आते है असली मुद्दे पर। हमारी संसदीय व्यव्य्स्थाओ के अनुसार साल में एक बार संसद में बजट पेश करने का प्रावधान है। यह बजट सरकार में तरह तरह के विशेषज्ञ और अनुभवी लोगो की मदद से बनाया जाता है और जनता के करोडो रुपये बजट बनाने में सरकार  खर्च करती है। यह बजट साल भर में तमाम मदों पर खर्च का आय और व्यय का अनुमान होता है। इसी अनुमान के हिसाब से  माननीय वित् मंत्री जी जनता पर टैक्स लगाते है अपने  राजनीतक हितो को ध्यान रखते हुए अनुदान और अन्य रियायतों की घोषणा करते है। इस बजट के बनने और फिर संसद में रखे जाने के बाद बजट सत्र में माननीय सांसदों द्वारा इस पर बहस कर इसे पारित किया जाता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार लगभग सौं करोड़ रुपये तो केवल बजट सत्र में संसद पर भत्ते तथा अन्य व्यय  किये जाते है। एक बार संसद से पास हो जाने के बाद इसे जनता पर लाद दिया जाता है। जिसे जनता ढोने के अलावा कुछ नहीं कर सकती।

बजट पास होने के बाद अभी आप नए टैक्स इत्यादी के हिसाब से अपने अपने परिवार के बजट को नए खर्चो के हिसाब से  समायोजित ही कर पाए थे की तीसरे महीने ही नए अनुमान मंत्री जी और उनकी मंडली ने लगा दिए और  जीवन उपयोगी तमाम चीजो के दाम बढ़ा दिये, अब  आप एक बार फिर से उन अनुमानों के हिसाब से अपनी जिन्दगी को व्यवस्थित करने लग जाते है और यह कभी न रुकने वाला क्रम जैसे इस देश की जनता की नियति बन गया  है। और आम आदमी जिसकी कमाई (तन्खा )साल में एक बार बढती है साल में कई बार छोटे -बड़े झटके खाते हुए फिर अगले बजट में लगने वाले नए करो के बारे में अनुमान लगाता रहता है। और इस बीच सरकार और उनके लिए काम करने वाली फ़ौज के लिए तरह -तरह से दिए जाने वाले भत्ते और सुविधाए बढती जाती है। तभी तो प्लानिंग कमीसन के उपप्रधान दिल्ली में 30 रूपये रोज में जीवन यापन करने की वकालत करते है और अपने बाथरूम में 35 लाख लगाकर नवीकरण करते है।

पिछले एक साल में अनेक बार पेट्रोल डीजल और एल पी   जी इत्यादी के रेट बढ़ाये गए। मंत्री जी ने घोषणा कर दी की अब सिलंडर पर अनुदान नहीं मिलेगा और साल में छे आपको सस्ते दाम पर पर और उसके बाद लगभग दूने  दाम पर मिलेंगे।  पेट्रोल के दाम बजट के बाद बढ़ाये गये क्योकि कहते है की अब हमें डालर मूल्य बढ़ने के कारण कंपनी को घाटा हो रहा है। लेकिन जिन कम्पनियो के घाटे की बात मंत्री जी कर रहे है वह कम्पनिया सरकार को डिविडेंड यानि मुनाफे का हिस्सा दे रही है।और कंपनियो के शेयर मूल्य भी बढ़ रहे है।
उदाहरन के लिए इंडियन आयल कारपोरेशन का पिछले 10 सालो का नियमित डिविडेंड देने का रिकार्ड है। कम से कम 4 बार इस कम्पनी ने बोनस शेयर भी एलाट किये है।

जिन कंपनियो की स्तिथी सुधरने के लिए मूल्य बढ़ा कर ज्यादा दाम देंने को जनता मजबूर है उन कंपनियो को अपने खर्चो पर कटोती करने के कोई संकेत नहीं और न ही उन्नत तकनीक से प्रक्रमण करने के कोई उपाए अपनाये जा रहे है। यानि जब भी आपकी योजना फेल  हो दाम बढ़ा दो। क्या सरकार बता सकती है अन्य व्यापारी जो आयातित मॉल से बना उत्पाद बनाते है उनके दाम ऐसे क्यों नहीं बढ़ते।

इस तरह देश की जनता सरकार के रहमो करम पर निर्भर हो गयी है।और सारे निर्णय राजनैतिक नफा नुकसान देख कर किये जा रहे है। क्या यही सोच कर हमारे संविधान निर्माताओ ने इसके नियम बनाये थे।क्या ऐसे ही देश की कल्पना की गयी थी। यह एक बड़ा प्रश्न है और गणतंत्र की 63वी जयंती मनाते समय इस स्थिति पर विचार करना उपयुक्त रहेगा।

अजय सिंह "एकल"


Saturday, January 5, 2013

क्या हम अगले 65 वर्ष भी वैसे ही गुजारना चाहते है जैसे पिछले 65 वर्ष


दोस्तों,
सवाल यह नहीं है की हमने पिछले पैसठ साल कैसे गुजारे  है सवाल यह है की हम आगे कैसे जीना चाहते है और उसको प्राप्त करने के लिए हम क्या कीमत देने को तैयार है?हम गणतंत्र का 63वां वर्ष मनाने की तैयारियो में लगे है फिर एक दिन की छुट्टी मिलेगी, राष्ट्र के नाम संबोधन होगा, कुछ झाँकिया राजपथ पर निकलेंगी और स्कूलों में लड्डू बांटे जायँगे।कभी न पूरी होने वाली कुछ घोषणlये  राजनैतिक हितो को साधने के लिए की जाएँगी  लेकिन क्या इस सबके लिए ही गणतंत्र दिवस देश में  मनाया जाता है? या हम इस दिन बैठ कर आत्मविश्लेषण कर सकते है की देश के सामने क्या लक्ष्य है,हमारे नैतिक मूल्य में क्या बदलाव लाने की जरुरत है हम आखिर जाना कहाँ चाहते  और हम ऐसा क्या करे की हमें वह मिले जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओ ने की थी।


राष्ट्रीय शर्म के काम तो हम लोग, हमारे राजनीतिज्ञ और पत्रकार बन्धू जाने अनजाने करते ही रहते है।सरकारी अधिकारियो खास कर पुलिस और अन्य सबसे ऊँचे तबके के अधिकारियो को तो बाकायदा सरकार ने ऐसा करने का लाइसेंस भी दिया है और तन्खवा  भी देती है।और अब यह सब धीरे धीरे आम जनता के सामने आ भी रहा है। लेकिन इस सबका दोषी केवल उन्ही लोगो को नहीं ठहराया जा सकता है जिनके ऊपर गलत करने का आरोप है दोषी तो हम लोग भी है जिन्होंने परिवर्तन के लिए आवाज नहीं उठाई और यथा स्थिति को स्वीकार किया या जो थोड़ी बहुत परिवर्तन की कोशिश समय समय पर हुई उसको ऊपर -ऊपर से परवर्तित होते देख संतोष कर लिया। जैसा 1974 में  जय प्रकाश जी के आन्दोलन के बाद हुआ था और  आपात काल के बाद जनता पार्टी का राज्य आया था और कई नए राजनीतिज्ञों के उदय होने पर नयी आशा की जो किरण दिखी थी मुश्किल से 3-4 साल में ही लुप्त हो गयी और फिर वही लोग सत्ता पर काबिज हो गए जिन्हें जनता ने थोडा पहले ही हटाया था।

अब हम फिर अपने मूल प्रश्न पर लौटते है,की हम क्या परिवर्तन चाहते है और उसके लिए क्या मूल्य दे सकते है?क्योंकि चाहने और प्राप्त करने के बीच मूल्य देने के प्रश्न पर हम आमतौर पर  बगले झाकते नजर आते है और उम्मीद करते है की यह काम कोई और ही करदे तो अच्छा है लेकिन ऐसा होता नहीं है। नयी पीढ़ी को कोसना भी हमारी आदतों में शुमार है।मगर दिल्ली रैप कांड की  एक घटना ने दिखा दिया की देश के नवजवानों में आज भी भगत सिंह की तरह आत्म बलिदान करने का जज्बा है,पिछले साल अन्ना आन्दोलन के समय नौजवानों के उत्साह को देख कर लोगो ने इसे क्षणिक उत्साह की संज्ञा देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी।लेकिन इसबार नौजवानों ने जिस तरह का उत्साह दिखाया है और व्यवस्था को नंगा किया है उससे
यह तय है की  देश के नौजवान ऊर्जा से भरपूर है।

आश्चर्य है की इस देश की व्यस्था ऐसी है की फेस बुक पर कमेन्ट लिखने के लिए जेल दी जाती है,पीड़ित का इंटरव्यू दिखाने के लिये चैनल पर मुकदमा किया जाता है पीड़ित को मरना निश्चित हो जाने के बाद ड़ेमेज कंट्रोल के लिए सिंगापुर भेज देते है लेकिन उसी के साथ घायल हुए लड़के का इलाज हिन्दुस्तान में भी सरकार नहीं करवा रही है और उसे इसके लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। दूसरी ओर आंध्र प्रदेश के एक एम् एल ये द्वारा दिए गए हिंसक और भड़काऊ बयांन  के बाद प्रदेश या केन्द्र  सरकार की और से कोई कार्यवाही नहीं  हो रही है। देश के गृह मंत्री जो अतंकवादियो  को भी  जी लगा कर बुलाते है वही मंत्री यह पूछे जाने पर की  नवजवान प्रदर्शनकारियो से मिल कर बात क्यों नहीं करते कहते है की यदि नक्सली राजपथ पर आ आजाएं तो क्या मंत्री उनसे मिलने जायेगा।राहुल गाँधी जिन युवाओं का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते है वोह भी कहीं नजर नहीं आये।  क्या हमारी सोंच की दिशा केवल जनता के वोट लेकर उसको ही जलील करने का प्रयास करती है। समस्याए बहुत है समाधान भी हमें सोचना है। आगे की कुछ कड़ियो पर हम इसकी चर्चा करेंगे।


और अंत में 
आदमी को पैर का जूता मत समझ 
वक्त का जूता पड़ेगा आदमी बन जायेगा।


अजय सिंह "एकल"

Sunday, December 23, 2012

चित भी मेरी पट भी मेरी खड़ा तो मेरे ..............का

प्रिय दोस्तों,
कुछ इसी तर्ज पर भाई मुलायम सिंह और मायावती बहनजी संसद में बता रहे थे।तभी तो दोनों ही पार्टियो ने ऍफ़ डी आइ का विरोध भाषण   में तो किया लेकिन वोट डालने की जब  बारी आयी तो सदन से बाहर चली गयी। और इस तरह से बिना लाठी तोड़े साँप मार दिया।लेकिन जनता को इससे एक बात तो यह समझ में आ ही गयी की भाई यदि ऍफ़ डी आइ लागू होने के बाद जनता को फायदा मिला तो कहेंगे की इसीलिए प्रस्ताव को संसद में गिरने नहीं दिया और अगर नुकसान हुआ तो कहेंगे की इसलिए तो प्रस्ताव के पक्ष में मत नहींदिया।दूसरी बात यह समझ में आ गयी "इस देश की राजनीत में नीतियों पर फैसला सड़क या संसद में नहीं बंद कमरों की सौदेबाजी से होता है। यहाँ समर्थन भी बिकता है और विरोध भी। बस खरीदार चाहिए।"और ऐसा हर पाँच साल में होते रहना चाहिए ताकि पैसे बटते रहे और नेताओ की  अर्थव्यस्था  अगले चुनाव के लिए ठीक हो जाये।

देश की दो राजनेत्री प्रियंका और वृंदा करात ने अपने अंग दान करने की घोषणा कर दी है। समाचार ने बड़ा हर्षित किया। एक तो इसलिए दोनों सुंदर नेत्रियो ने कुछ दान करने की बात कही है मरने के बाद ही सही, दूसरे इसलिए की जिन्हें लेने की आदत हो वह कुछ देने की बात करे तो इसका असर दूना होता है। अब अन्दर की बात यह है की जीते जी कुछ नहीं देंगे मरने के बाद चाहे जो हो।

राष्ट्रीय शर्म के काम राजनीतिज्ञ अक्सर करते ही रहते है, यह बात दीगर है की शर्म आती नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति  ने भारतीय ओलम्पिक संघ पर प्रतिबंध लगाया है जिसका कारण यह है की हमारे यहाँ पदाधिकारियों के चुनाव में धांधागर्दी और भाई भतीजावाद इस कदर हावी है की  बेसिक दिशा निर्देशों का भी पालन नही हो पा  रहा है।  वास्तव में राजनीत का विस्तार इतना ज्यादा हो गया है की अब देश में  कुछ भी राजनीत से परे नहीं है। राजनीत में खेल और खेलो में राजनीत तो हिन्दुस्तानियो की  पुरानी  फितरत  है।

अजय सिंह "एकल "

Saturday, December 8, 2012

एफ डी आइ इन रिटेल


प्रिय मित्रो ,
कल राज्य सभा मे एफ डी आइ इन रिटेल का बिल पास हो जाने के बाद इसका देश में लागू  होना तय है।जिस तरह से लोक सभा में मुलायम सिंह और मायावती की पार्टी ने वोट  का बहिष्कार कर के  अप्रत्यक्ष रूप से बिल का समर्थन किया और सरकार को वोटिंग में जीता  दिया और फिर राज्य सभा में मायावती ने बी जे पी  पर आरोप  लगा कर अपनी पार्टी के द्वारा बिल के समर्थन को उचित सिद्ध किया और मुलायम सिंह की पार्टी  ने बहिष्कार करके अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन   दिया है इस से देश की जनता का अपमान भी हुआ है और इस राजनीत ने  लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी सवाल उठाये है। क्या वास्तव में इस बिल को जनतंत्र का समर्थन प्राप्त है अथवा यह जनतांत्रिक प्रक्रिया में छिद्र के कारण ऐसा हो सका है।

अत: इसको जाचने और निदान का इससे उचित  समय और क्या हो सकता है। आइये इस समस्या से निपटने पर विचार  करे।

1.एक बार चुनाव हो जाने के बाद किसी भी तरह के जनमत संग्रह की व्यस्था नहीं होने के कारण महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर आम जनता की राय जानने का कोई उपाए नहीं है। अत: ऐसे प्रस्तावों पर निर्णय करने को   राजनैतिक पार्टिया अपनी सुविधा  के अनुसार  स्वतन्त्र रहती है और अपने पक्ष में उसी तरह के तर्क देकर जन भावना को प्रभावित करने का प्रयत्न करती है।

2. अधिकांश घटनाओ में  किसी प्रकार  के लालच, वित्तीय अनियमित करण  अथवा भ्रस्टाचार  के कारण  ऐसा होना पाया जाता  है। । जैसा की पिछली बार परमाणु बिजली प्रस्ताव पर सामने आया था ,इस बार भी ऐसा होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

3 ख़राब .राजनैतिक चरित्र के कारण देश पर ऐसी योजनाए उन लोगो के द्वारा थोपी जाये जिनका व्यहार देश हित में सन्दिग्ध है कहाँ तक उचित है? क्योकिं जो जितना भ्रस्टाचारी है धन और बाहू बल के कारण उसके चुने सांसद अथवा दूसरे  संवैधानिक पद पर चुने  जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इन परिस्थितियो में  आम आदमी को केवल पाँच साल में एक बार वोट दे कर चुनने का अधिकार देंना  काफी नहीं है।

4.देश के 271  माननीय  संसद किसी भी बात पर सहमत हो जाये तो उसे देश में लागू  किया जा सकता है फिर चाहे यह प्रधान मंत्री चुनने की ही बात क्यों न हो यानि 271@20 करोड़  रुपए में देश में मनचाहा कानून बनवा सकते है।यह धनराशी करीब 1080 मिलियन  डालर  बैठती है ।  केवल एप्पल कंपनी का पिछले साल का मुनाफा इससे 4 गुना ज्यादा है। ऍफ़ डी आइ बिल के आने के कुछ माह  पहले ही ऐसी खबर आई  थी की वालमार्ट जो की रिटेल की दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है,ने भारत में अपनी कंपनी का व्यक्ति भारी  तन्खा पर नियुक्त किया हुआ है। जिसका काम देश के बड़े राजनेताओ और अधिकारियो के साथ कम्पनी हित के काम करवाना है।और इसके खिलाफ आर्थिक मामले में जाँच भी  चल रही है।

5.इन परिस्थितयों में आम आदमी एक बार वोट देकर माननीय सांसदों और पार्टियों के हाथ अपने को गिरवीं रखने को मजबूर है। क्योंकि बाद में केवल निर्णय करने की शक्ति केवल राजनेताओ और अधिकारिओ के पास होती है।और आम जनता का इससे  कोई लेना देना  या कंट्रोल नहीं है।

6.इस तरह की धटनाओ को भविष्य में रोकने के लिए आम जनता के द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग इंटरनेट द्वारा फेस बुक के मध्यम से अथवा अलग से इसी उद्देश्य के लिए बनाई गयी वेब साईट पर  करवाई जा सकती है। जैसे की अभी  भी तमाम तरह की प्रतियोगताओ में पुरूस्कार वितरण हेतु प्रत्याशी अथवा संगठन के  चुनाव हेतु किया जाता है।

7. साथ ही विकल्प के तौर पर  यदि  दो फ़ोन नम्बरों में से एक पर पक्ष में और दूसरे  पर विपक्ष में  मिस काल देने की  सुविधा प्रदान की जाये तो गाँव में रहने वाला व्यक्ति भी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर अपनी राय दे सकता है। इस तरह के प्रयोग मनोरंजन उद्योग में "कौन बनेगा करोडपती" अथवा "सा रे गा माँ" इत्यादि प्रोग्रामो में प्रत्याशियों की लोकप्रियता जानने के लिए सफलता पूर्वक किये जा रहे है।

8.इस तरह की वोटिंग की  देखरेख चुनाव आयोग  जैसे संवेधानिक संस्थानों द्वारा अथवा सीधे लोक सभा और राज्य सभा कार्यालय द्वारा हो जिससे पार्टी अथवा सत्ता के  दुरपयोग की सम्भावना को कम किया जा सके।

9. इस तरह पांच वर्षो के लिए एक बार सांसद चुनने के बावजूद देश के लिए महत्व पूर्ण विषयों पर आम जनता की राय जानना संभव हो सकेगा और देश को सत्ता अथवा विपक्ष की देश हित के बजाये अपने हित की राजनीत करने से रोकना सम्भव हो सकेगा।

10.इस प्रकार  सत्ता के विकेंद्री करण में मदद मिलेगी और सही मायने में जनता की ताकत जनता के हाथ में रहेगी।

11. इस प्रकार की प्रक्रिया अपनाने से राजनेतिक भ्रष्टाचार को रोकने में भी मदद मिलेगी।

अजय सिंह "एकल "

Thursday, November 15, 2012

फोर मोर इअर्स आफ अंकल सैम


                                                                          दोस्तों,
ओबामा  4 साल के लिए अमरीका के राष्ट्रपति और पूरी दुनिया के लिए चाचा चौधरी(Uncle Sam)फिर   बन  गये है ।फोर मोर इअर्स  के नारे ने  कमाल  का करिश्मा  कर दिया, प्रचार के दौरान एक बार तो लगा की शायद इसबार मिट रोमनी मिटा  देंगे डेमोक्रट ओबामा को ।वोटों कि गिनती होते समय कई राज्यों में उन्होंने ओबामा को हराया भी लेकिन अंत में ओबामा अपना परचम लहराने में सफल रहे।पूरी दुनिया में अधिकतर देशो ने बधाई भी दी , कुछ ने दिल से तो कुछ ने केवल  शिष्टाचार वस ।हिंदुस्तान के उद्योगपतियों तथा राजनेताओ ने भी बधाई दी, हालाकि बहुत से  लोगो के मन में आउट सोर्सिंग की स्थिति  तथा परमाणु विद्युत् के समझौतों को  लेकर मन में संदेह भी है। लेकिन अब कोई उपाय तो है नहीं इसलिए  चलो हम भी बधाई दे देते है आखिरहाथी के पावँ में ही सबका पावँ होता है।और इस धरती पर अमरीका से बड़ा हाथी कौन है?

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पर आरोप लगे तो कांग्रेस की बाछे खिल गई।उन्हें लगा की  देश को केवल वही बेमानी कर के नहीं लूट रहे है बल्कि विरोधी पार्टी जो चाल , चरित्र और चेहरा अलग बताती उसका चरित्र और चेहरा  कमोबेस उसके जैसे  ही है और इसलिए पहला मौका मिलते ही कांग्रेस के रण नीत कारो ने आरोपों की तोप का मुह वाड्रा और कोल घोटाले की बजाय गडकरी  की और घुमा दिया   और सरकार के मंत्रियो ने  भी स्वामिभक्ति का परिचय देते हुये    इन्कम टैक्स से ले कर मीडिया तक को सच्चाई पता लगाने में लगा  दिया और सबने मिल कर ऐसा माहोल बना दिया की बी जे पी से लेकर संघ तक में  गडकरी को बचाने और इस्तीफा  मागने वालो का अन्तर्द्वंद जनता के बीच  में आ गया और जो फजीहत  होनी शुरू हुयी वोह अब बिना इस्तीफे  के खत्म होगी ऐसा  लगता  नहीं है। पार्टी से ले कर गडकरी तक को भी यह लग रहा है कि जाना तो है ही लेकिन बे आबरू होकर न जाना पड़े तो अच्छा है।बस बी जे पी के रण नीत  कारो से यहीं समय की  चूक  हो गयी।आखिर गडकरी कोई हीरा तो है नहीं जो सदा के लिए होता है।अगर आरोप लगने के तुरन्त  बाद इस्तीफा दे  देते तो गडकरी की इज्जत बच जाती पार्टी की इमेज बनती सो अलग। और फिर कांग्रेस के ऊपर पूरी ताकत से आक्रमण करने का मौका बी जे पी को मिलता  इससे देश का भी और पार्टी का भी भला होता । खैर अब तो सिर्फ डैमेज कंट्रोल हो सकता है लेकिन  अभी भी डैमेज कंट्रोल उपायों के  बजाये कभी गुरुमूर्ति का और कभी कुछ  और तरह -तरह के ड्रामे हों रहे  हालाकि उपाय सिर्फ इस्तीफा ही  है,राजी खुशी  दे-दे तो ठीक नहीं तो बेआबरू होकर जायेंगे।
जिस तरह डेविड पेट्रास जो एफ बी आइ के डाइरेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत थे   एक महिला कर्मी  के साथ   सेक्स  रिश्तो का आरोप लगते ही इस्तीफा दे दिया है यह अपने आप में एक मिसाल है।लग भग ऐसे ही आरोप जब कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पर लगे थे तो वह तुरन्त 5-7 महीनो के लिए छिप गए और अब फिर जब यह भरोसा हो गया की जनता इतने दिनों में भूल  गई  होगी तो पार्टी को फिर सेवा देने और नए शिकार करने को हाजिर हो गए है। बस यही  फर्क है अमरीका और भारत में।

ऐसा लगता है कांग्रेस के राजकुमार राहुल गाँधी अब देश के साथ कांग्रेस पार्टी के लिए भी असेट के बजाये लाएबिल्टी बनते जा रहे है।कांग्रेस के लोग  बहुत  दिनों से उन्हें बड़ी जिम्मेदारी  दे कर अपनी क़ाबलियत सिद्ध करने की मांग कर रहे है लेकिन एक के बाद एक असफलताओ के कारण ऐसा करने की उनकी हिम्मत  पड़ नहीं रही है और वह  बाकी लोगो की प्रगति में बाधा बन रहे है। लेकिन आज लोगो ने उन्हें चुनाव की समिति का प्रधान बना दिया है।पद सजावटी है  इसलिए क़ाबलियत की जरुरत नहीं है।इस तरह साँप बिना लाठी तोड़े ही  मर गया।वैसे भी कहते है की बेटर टू यूज दैन  रस्ट आउट अर्थात जंग लगा कर बेकार करने से अच्छा  है की इस्तेमाल  कर लो। चलो देखते है की बाहें समेटने के अलावा और क्या कुछ कर सकते कुंवर साहेब।

और अंत में 

मुल्क का कौम का इतना भी मियार (स्तर ) न गिरे 
कि सुर्खिया देखते ही हाथ से  अख़बार गिरे।

अजय सिंह "एकल "

Tuesday, October 23, 2012

हमाम में नंगे लोग

दोस्तों,
लोग पहले हमाम में नंगे होते थे अब पब्लिक में है, कुछ की खुल गई है कुछ की खुलने वाली है।किसी को 10 करोड़ का फ्लैट 80 लाख में मिलता है तो किसी की कार के ड्राईवर  कम्पनी  में डायरेक्टर है। एक को करोड़ो रुपये बिना ब्याज बिना सिकुरिटी के  एक नहीं कई सालो के लिए मिल जाते है तो एक के सेबों के बाग़  सात लाख सालना आमदनी के बजाये  एक साल में  पांच करोड़ की आमदनी करने लग  गए है।कौन किसकी कहे इसलिए सब एक दूसरे की तारीफ में लगे है। दुनिया के बड़े-बड़े मैनेजमेन्ट कालेजो के लिए यह अच्छी केस स्टडी हो सकती है।कंपनी मुनाफा कैसे कमाती है ,कुशल व्यापारी 50 लाख की पूंजी लगा कर चाँद सालो में 300 करोड़ के मालिक कैसे बनते है।मुंबई की चाल में करोड़ो का व्यापर करने वाली कंपनी कैसे अपना दफ्तर चलाती है। देश के प्रधान मंत्री को पता ही नहीं चला कब  उनकी नाक के नीचे ही  पैसे पेड पर उगने लगगये और उनका अर्थ शास्त्र कब और कैसे फेल हो गया।

चपन मैं पढाई गयी पंचतन्त्र की कहानिया केवल चरित्र निर्माण ही नहीं करती बल्कि आदमी की समझ भी बढाती है और जीवन जीने की कला सिखाती है।भारत के कानून मंत्री की पत्नी के द्वारा चलाये जाने वाले एनजीओ पर भ्रष्टाचार के खुलासे के बाद खुर्शिद साहेब को कुछ सूझ नहीं रहा है इसीलिए तो कभी हाई कमांड तो छोड़िये उनके के दामाद को क्लीन चिट भी दे रहे है और उनके लिए जान देने को भी  तैयार है और कभी अरविन्द केजरीवाल को  फरुखाबाद से सलामत वापस आने की चुनौती दे रहे है। आज तो उनके एक बयान ने सिद्ध कर  दिया  की उनका व्यहारिक ज्ञान बिलकुल जीरो है नहीं तो अरविन्द केजरीवाल को  चीटी  कह कर  वह  हाथी की तुलना अपने से नहीं करते।शायद उन्हें नहीं पता की चीटी अगर हाथी  की  सूँड में घुस जाये तो जान भी ले सकती है। दूसरी विशेषता यह  भी की हाथी की पीठ  पर चीटी नाच सकती है लेकिन हाथी ऐसा नहीं कर  सकता। इसलिए मंत्री जी सावधान चींटियो  ने झंडा उठा लिया है और आपका मंत्री पद खतरे मैं है।

भारत सरकार  के इस्पात मंत्री तो अजब -गजब है कहते है आखिर केंद्र के मंत्री की भी   कोई इज्जत है,हैसियत है।अब वोह घोटाला करे तो कम से कम 71 करोड़ का तो होना चाहिए क्या आपने 71 लाख का आरोप लगा दिया है। इतने रुपये का घोटाला तो हमारे यहाँ बाबू  लोग कर लेते है। यानि मंत्री जी एनजीओ की बेमानी की मुकालफत करने के बजाय अपनी बेमानी के स्टैण्डर्ड का बखान कर रहे है।और अपने दोस्त का  पूरी शिद्दत से साथ दे रहे है इसे कहते है मौसेरे भाई का रिश्ता।
मैंने तो बच्चो को कैरियर काउंसलिंग मे  इंजिनियर, डाक्टर वगैरा की पढाई  छोड़ कर किसी गडकरी जैसे के यहाँ ड्राईवर या बेनी बाबू जैसे लोगो के यहाँ बाबू  बनने की सलाह देना शुरू कर दिया है।और अगर ज्यादा  महत्वाकान्छी  हो और आवारा गर्दी के अलावा कुछ नहीं कर सकते तो वाड्रा की तरह किसी खानदानी लड़की से शादी करने की योजना बनाना अबकी की जिन्दगी आराम से काटने के लिए अच्छा पेशा हो सकता है। नहीं तो पढ़ लिख कर नवीन जिंदल  या मनोज जैसवाल जैसे किसी घोटाले बाज के यहाँ चंद रुपयों की नौकरी करते नजर आओगे। यदि घोटाले की जाँच हुई और जेल जाने को नौबत आयी तो गौतम दोषी या हरी नैअर की तरह तिहाड़ में भी जाना
 पड़ सकता है। वैसे रावन की सेना में भर्ती खुले तो उसमे भी जाने का विचार अच्छा है।अब राम तो सतयुग मैं आएंगे और तब तक तो रावन का ही राज् रहने वाला है। इसलिए सबसे अच्छा कैरिअर  और अकूत पैसे की वर्षा वही होगी।तो या तो उसे स्वीकार कर लो नहीं तो जिन्दगी भर पता ही नहीं चलेगा की आप  महान भारत में  रहते है या  बनाना रिपब्लिक में जहाँ वोट देकर और  अपने ऊपर टैक्स लगवा कर चोरो और लुटेरो की तिजोरी भरने की व्यवस्था करते है।


नव रात्रि एवं विजय दशमी की शुभ कामनाओ के साथ 

अजय सिंह "एकल"

Sunday, October 14, 2012

बनाना रिपब्लिक का आम आदमी

 दोस्तों,
पिछले सप्ताह देश में एक ऐसी घटना घट गई जिसने मेरी नींद उड़ा दी है और बेचैन  कर दिया हालाकिं इस समाचार पर  समाचार पत्रों और दूरदर्शन पर बहस बहुत हुयी है लेकिन मेरी चिंता कुछ फर्क है और लोगो की चिंता से।

हुआ ये की अरविन्द केजरीवाल के डी .एल .एफ . और  वाड्रा सम्बन्धो के खुलासे पर वाड्रा साहेब खुन्दक खा गये और भारत देश और जनता की तुलना "मैंगो मैन आफ बनाना रिपब्लिक " कहकर कर दी .यहाँ तक तो ठीक था भारत के आम को कोई कुछ भी कहे इस से कहने वाले को भले आत्म संतुष्टि मिलती हो, आम आदमी कोई फर्क नहीं पड़ता इसलिए नहीं की वह कुछ  जानती समझती नहीं  बल्कि इस लिए कि उसकी अपनी मजबूरिया उसे और कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं देती। खैर देश के पहले परिवार के दामाद का यह सोचना मुझे कुछ ज्यादा  ठीक नहीं लगा फिरभी मैंने सोचा की चलो कोई बात नहीं, आम तो होता इसीलिए है जो चाहे निचोड़े चूसे और फेंक दे. आम को क्या फर्क पड़ता है। लेकिन अब समस्या ज्यादा विकट  है।
आम जनता का ख़िताब पाए हर आदमी की आखरी तम्मना होती है खास बनना।और वो सारी  जिन्दगी इसी कोशिश में लगा रहता है।इसके लिए चोरी करना, राजनीत करना और भी बहुत कुछ करना पड़ता है लेकिन अब तो हद हो गयी है । गाँधी परिवार के  दामाद राबर्ट बडेरा जो दामाद बनने के पहले आम (दसहरी ) थे   और गाँधी परिवार में शादी करके खास बन गये  है वो फिर  से आम (अलफांसो )बनना चाहते  है।एक ऐसा आम आदमी जिसके पास रु 300 करोड़ का बैंक बैलेंस है जिसको बचाने  के लिए देश का कानून मंत्री जान देने को तैयार है, वित्त मंत्री कानून बदलने को तत्पर है।

कहाँ   चोराहे की लाल बत्ती पर पुलिस द्वारा  रोके जाने  पर गिडगिडाने वाला बेचारा आम आदमी राशन की दुकानों का चक्कर लगने वाला आदमी ,कहाँ एक अदद राशन कार्ड के लिए धक्के खाने वाला आदमी ,कहा सरकारी बस में पसीना बहाने  वाला जिसको मैं अबतक देश का आम आदमी समझता  था, मुझे अचानक लगा की मैं स्वप्न लोक मैं विचरण कर रहा हूँ जहाँ आम आदमी का बैंक बैलेंस इतना है की आधा शहर  खरीद ले,चमचमाती बड़ी कार मे  घूम रहा है, पुलिस वाला सलाम कर रहा है और साल मैं 6-7 नहीं सब्सिडी वाले  60-70 गैस सिलेण्डर मिलते है और कोई मंत्री इस सब्सिडी का भार सहने के लिए मना नहीं करता बल्कि और भी भार  सहने को ख़ुशी-ख़ुशी तैआर है।फर्जी बैलेंस शीट में जारी आकड़ो को खुद कार्पोरेट अफेअर मंत्री सही होने का प्रमाण दे रहे है। बड़ी मुश्किल से वफादारी का प्रमाण देने का समय मिला है अतः हरकोई एक दूसरे से आगे निकलना चाहता है।पता नहीं फिर  मौका कब मिलेगा अरविन्द केजरीवाल भी मानते है की इस मौके पर चूके तो अगला मौका चालीस साल बाद आयेगा।

जब से अरविन्द  और वाड्रा  साहेब में आम आदमी बनने को होड़ लगी है लोग खास की बजाय आम बनना चाहते है।    मैनेजमेन्ट  की भाषा मैं इसे कहते है प्रतिमान बदलना अर्थात पैराडाइम   शिफ्ट।अब इस देश का आम आदमी खास बनने की कोशिश नहीं करेगा बल्कि खास लोग आम बनने की कोशिश  करेंगे।चाहे वो देश के प्रथम राजनैतिक परिवार के दामाद राबर्ट वाड्रा हो या भारतीय रेवेन्यू सेवा के पूर्व अधिकारी अरविन्द केजरीवाल।चलो इस बहाने कम से कम देश के 70 करोड़ लोगो को खाना मिलने लगेगा और लंगोटी भी।

और अंत में  


हम जानते है जन्नत की हकीकत को    
दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है।
                                                        मिर्जा ग़ालिब 

अजय सिंह "एकल"

Tuesday, October 2, 2012

असली गाँधी नकली गाँधी

दोस्तों ,
दुनिया के लिए दुनिया में एक ही गाँधी होंगे,जिनको लोग प्यार और सम्मान से महात्मा गाँधी पुकारते थे।लेकिन गाँधी के देश में इतने गाँधी हैं की पहचानना मुश्किल है की कौन असली है और कौन नकली।दर असल नकली गाँधी की पैकिंग  इतनी अच्छी और आकर्षक है की लगता है असली को छोड़ नकली से ही काम चला ले। अब आप सोच रहे होंगे की गाँधी के जन्म दिन पर यह क्या राग अलापने लग गए ,पर घबराइए नहीं हम आपको कुछ मजेदार बाते बताने जा रहे है जो आपको आनंदित भी करेंगी और मनोरंजन भी।

आज सुबह मैंने एक मित्र को फोन कर गाँधी जयंती की जब बधाई दी तो उन्होंने रिटर्न गिफ्ट की तरह मुझे भी बधाई दे दी और कहा की मैं चाहता हूँ की गाँधी जी हमेशा आप की जेब मैं रहे ( I wish Gandhi should always remain in your pocket)  । यह सुन कर मैं आश्चर्य में  पड़ गया क्योकि अब तक मैं गाँधी को दिल मैं रखकर उनके आचरण का पालन करने की ही कामना करता था तो मैंने उनसे पूछ लिया की येसा क्यों कह रहे है   तो वह  बोले  कि भईया गाँधी दिल -विल मैं तो बहुत रह लिए अब तो दुनिया उसी की सुनती है, उसी को पूजती  है जिसकी जेब मैं गाँधी यानि वोह करेन्सी नोट है जिस पर देश के  राष्ट्र पिता की फोटो छपी है।

भौतिक शास्त्र (Physics) का  एक  सिद्धान्त है की समान चीजे  एक दूसरे  को आकर्षित करती है इस नियम के हिसाब से गाँधी (करेंसी ) गाँधी नाम वालो के पास ही  जा रही है। कल गुजरात के मुख्यमंत्री जी ने बताया की श्रीमती सोनिया गाँधी ने यू पी ये (दो ) के कार्य काल में अपनी विदेश यात्रा में 1800 करोड़ गांधियो को खर्च किया है।अब इनकी कोई फैक्टरियां तो चलती नहीं है और न पिता जी इटली के राजा थे तो इतने गाँधी तो नाम से ही आकर्षित हुए होंगे न। और आपको पता है की दूध देने  (कमाई करने )वाली काली मोटी भैंस जब अपनी  नांद मैं   खाना खाती है तो चारो ओर इतना गिर जाता है  की अगल बगल वालो यानि दिग्विजय और सिब्बल जैसे लोग उसी से काम चला लेते है।

देश के वर्तमान प्रधान मंत्री गाँधी जी के आदर्शो पर चलने के कारण ही कुर्ता - पैजामा  पहनते है और न बोलते है न सुनते है और न देखते है। कहते है कि  एक ख़ामोशी हजारो बातो से बेहतर है ,लोग चाहे मोटा माल कमाए या पतला, चाहे कैग कुछ कहे या सुप्रीम कोर्ट मैं तो गाँधी वादी हूँ मैं न देखता हूँ न सुनता हूँ न बोलता हूँ।और करेंसी नोटों छपे गाँधी को अगर इस देश ने पिता माना है तो उसपर हस्ताक्षर तो मेरे ही है इसलिए देख लेना एक दिन लोग मुझे भी पापा (सरदारों को लोग वैसे भी पापा कहते है ) मानेंगे।इस देश  की जनता ऐसी है कि मौका पड़ने पर तो गधे को भी बाप बना लेती है तो फिर मैंने तो रुपये देने का वचन देकर हस्ताक्षर भी  किया है।
पता नहीं महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने कब और क्यों कहा था की सौं साल बाद यह कल्पना भी मुश्किल होगी की दुनिया मैं महात्मा गाँधी जैसा कोई व्यक्ति पैदा हुआ था। लेकिन  मुझे तो लगता है की अब से पचास साल बाद ही यह बात कल्पना के बाहर होगी की गाँधी के देश मैं पैदा हुए गांधियों ने देश का बेड़ा कैसे गर्क किया है। महात्मा गाँधी जहाँ अपनी सारी परिभाषा देश के अन्तिम आदमी को ध्यान में रखकर गढ़ते थे, उसी देश के सत्ता मैं बैठे महान नेताओं की कोशिश है की कोई भी लाभ उसको न पहुचे जिसके वोट ले कर यह यहाँ तक  पहुचे हैं।अगर ऐसा न होता तो नवीन जिंदल और मनोज जयसवाल जैसे लोगो को झूठे कागजो पर कोयले की खाने न बटती। रिलाएंस और भारती मित्तल के घरानों को सस्ते स्पेक्ट्रम न बटते।वालमार्ट जैसे उद्योगों को जिन्हें अमरीका की जनता और सरकार ने अस्वीकार कर दिया, को भारत मैं लाने  की वकालत गाँधी वादी काँग्रेसी नेता और सरकार न करती।  और देश की गरीब जनता का निवाला देश के अरबपतियो को मुहायिया न कराती। इस देश की अर्थव्यस्था गैस सिलिंडर की सब्सडी का बोझ इस लिए नहीं उठा सकती की  नकली गांधियो का बोझ इतना ज्यादा है कि उसी को उठाने मैं वह ख़राब हुई जा रही है।

मुझे देश के प्राचीन  शहर बनारस के बारे मैं कही गयी बात "रांड ,सांड सीढ़ी सन्यासी ,इनसे बचे तो सेवे काशी " याद आ रही हैजिसका सीधा अर्थ यह है की भ्रष्टाचार और देश को बेचने की तरकीबे ढूढने से फुर्सत मिले तो देश हित की बात सोंचे। नेता लोग भजन गा रहे है "मेरे तो गाँधी ही गाँधी ,केवल गाँधी ,बूढ़े गाँधी ,जवान गाँधी, जिन्दा गाँधी ,मुर्दा गाँधी दूसरो न कोई, जो नोट पर छपा हुआ वही मेरो सब कोई  "
गाँधी का  जन्म दिन मुबारक,और शास्त्री जी का भी  .

हर  भारतीय की  अंतिम इच्छा 
जिसदिन T20 का फाइनल मैच हो उसदिन किसी की मौत न हो ,क्योंकी भारत  में उस दिन कन्धा देने वाले नहीं  मिलेंगे।
 और 
 2अक्टूबर को घर में कोई पैदा न हो, नहीं  तो फिर चाहे वह लाल बहादुर शास्त्री की तरह का महान व्यक्ति  ही क्यों न हो जाये न जनता याद करेगी और न मीडिया।

अजय सिंह "एकल"