Wednesday, May 11, 2011

वाह ओबामा,बाय ओसामा

दोस्तों,  
आखिर वो घड़ी आ ही गई जिसके इंतजार में बिचारे किल्टन की कुर्सी चली गई और ओबामा की जाते-जाते रह गई . ओसामा जी (दिग्विजय जी का संबोधन यही है) आखिर को मारे गए ,लेकिन ओसामा मरा वीरो की तरह ही ,एक  निहत्थे को मारने पूरी फ़ौज आई और मार कर अपने साथ ओसामा के बेटे को भी ले गई है(वैसे  डकैत भी यही करते है मरने के बाद लूट का माल साथ ले जाते है )   अमरीका ने मारे डर  के  ओबामा के मरने के फोटो तक सार्वजनिक नहीं किये है अब कौन जाने की मरा वही ओसामा है की कोई और .मैंने तो सुना है  की  बड़े आदमी  अपने साथ बहुत सारे हमशकल लोगो
 को साथ रखते है  ताकि दुनिया को धोखा दे सके (ये अलग बात है ही बिना धोखा दिए बड़ा बनना मुश्किल है   और अगर बन गए तो बने रहना मुश्किल है ) और ये पता ही नहीं चले  की  असली कौन है .भगवान जाने की असलियत क्या है लेकिन इतना तय है ओसामा के मरने के बाद भी अभी ओसामा का जिन  अमरीका को आसानी से जीने नहीं देगा ,अच्छा है अमेरिका     और किसी से तो डरने से रहा.

लेकिन इन सारी घटनाओ से कुछ बाते तो अब स्पष्ट ही है ,मसलन ओबामा जब भारत आये तो उनके भारत की पार्लियामेंट में दिए भाषण में ३६ बार तालिया बजी थी जिसमे  कम से कम तीन बार ओबामा ने अपने भाषण में गाँधी जी का नाम ले कर अपने को गाँधी ही नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला ,जो की जाने माने गाँधी वादी है का भी फालोवर बता दिया था और हमारे लोगो ने उनकी इस बात को सुन कर के तरह -तरह से कशीदे काढने शुरू कर दिए. हम हिन्दुस्तानी तो मौके के इन्तजार में ही रहतेहै और जैसे ही मौका मिलता है ताकतवर ,पैसे वालो की तारीफ में लग जाते है और अपना फायदा ढूंढने  लगते है . नतीजा यह की आम  लोगो ने विश्वाश कर लिया की अब इतना बड़ा आदमी १० हजार  किलोमीटर चल कर कोई झूठ बोलने थोड़ी आयेगा ,मगर भाई ये तो राष्ट्रपति से ज्यादा सेल्स मैन निकल गया . गाँधी का नाम ले कर   लड़ाकू जहाज हिंदुस्तान को बेचने का सौदा किया, और दुनिया में  अहिंसा की बात करते करते मौका मिलते ही हिंसा कर गया .
गाँधी लेकिन अब हिंदुस्तान में भी गाँधी वादी कहाँ है? बस इज्जत बचा ली दिग्विजय सिंह जी ने. ओसामा को ओसामा जी कह कर और सिद्ध कर दिया की नफरत पापी के पापे करो न की पापी से . अब लोग चाहे जो भी कहे ,अगर दिग्विजय ऐसा नहीं करते तो दुनिया में लोग तो यही कहते की जब गाँधी के देश में ही कोई गाँधी वादी नहीं बचा तो फिर ओबामा का क्या वो तो है ही सेल्स मैन, अरे वो तो वही कहेगा जो खरीदार को पसंद हो इसलिए जब खरीदार गाँधी के देश का हो तो  गाँधी  की तारीफ करने में क्या हर्ज है .
हालाँकि दिग्विजय ने तो उसी दिन कह दिया था की ओसामा ने चाहे जो किया है ,कितना भी बड़ा आतंक वादी है लेकिन मरने के बाद तो उसकी अंतिम क्रिया उसके धर्म के हिसाब से ही होनी चाहिए,लेकिन उसदिन सारी दुनिया ओसामा के मरने की ख़ुशी मना रही थी तो टायमिंग गलत हो गई और लोगो ने ध्यान ही नहीं दिया ,इसलिए दुबारा ओसामा जी कह कर दुनिया का ध्यान खीचना  पड़ा .धन्यवाद दिग्विजय  सिंह जी    बड़ीसेबड़ी घटना होने पर भी अपने  कर्त्तव्य से न डिगने के लिए.

मै तो खैर वैसे भी आपकी और आपकी टीम की कर्त्तव्य शीलता का कायल हूँ, अब देखो न आखिर कसाब को पकडे जाने के ३ साल बाद भी आपकी  सरकार ने     क्या उसको मारा ,क्या उसको फांसी दी, हालाँकि विपक्ष के लोग तो पीछे पड़े है तरह -तरह के आरोप भी लगा रहे है ,मगर कोई मजाल की आप टस से मस हो जाये . अब आप ही बताइए जब नफरत पाप से करना है तो पापी को फाँसी क्यों दे .उलटे हम तो उसको वकील दे रहे है, जज बदल रहे है की शायद कोई  तो जज गाँधी वादी निकलेगा जो इसके कसूर को माफ़ कर देगा इस देश में .यही हमने अफजल गुरु के लिए भी किया है .रोज लाखो खर्च हो रहे है तो क्या हुआ , अब हम गाँधी के देश में पैदा हुए है, सोनिया गाँधी का नमक खा रहे है और ये ही हल रहा तो जल्दी ही राहुल गाँधी का नमक खाना पड़ेगा तो भइया अपनी CR क्यों ख़राब करवाएं पता नहीं कब नंबर आ जाये  मिनिस्टर बनने का .आखिर आदमी के भविष्य और त्रिया चरित्र का पता जब देवताओं को नहीं चलता तो मैं तो कांग्रेस का एक कार्यकर्ता मात्र हूँ ये पंगा मैं तो नहीं लूँगा .और गाँधी से जिसने पंगा लिया उन सबका हस्स्र क्या हुआ ,पानी देने वाला भी नहीं मिलता है जनाब .वायु यान से गिरने के बाद लाश तक नहीं मिलती सुभाष चन्द्र बोस से लेकर माधव राव सिंधिया  का उदाहरण सामने है .तो फिर काहे को शूरवीर बनना .पिता जी ने नाम दिग्विजय रख दिया तो इसका मतलब ये तो नहीं की गाँधी से पंगा लूँ ,इसलिये समझदार आदमी हूँ और समझदारी से काम करता हूँ. मुझे पता है की "एक साधे सब सधे ,सब साधे सब जाये ,रहिमन सींचे मूल  को फूले फले अघाए " इसलिए भैया मेरे तो गाँधी ही गाँधी दूसरो न कोई.


तो बस आप लोग भी समझ जाओ और समझ दारी दिखाओ ,गाँधी के नाम पर देश लूटना आसान है तो बस चुप चाप लूटे जाओ और कोई कुछ बोले तो उसको गाँधी का दुश्मन बता के गोडसे की जमात में खड़ा कर दो बस हो गई उसकी छुट्टी .एक बार गाँधी विरोधी  इमेज बना दो तो फिर जिन्दगी में इलेक्शन नहीं जीत सकता और कोई कहे कुछ भी  आखिर जीतने वाले लोग तो सब पार्टियो को ही चाहिए .

अंत में गाँधी बापू जिंदाबाद ,फिर कोई मरा तो देखेंगे की क्या बयान देना है,बयान    पार्टी को सूट करेगा    तो अधिकारिक मान लेना नहीं तो मुझे दो चार गाली दे लेना .

अजय सिंह "एकल"















5 comments:

Jasvinder said...

Rever'dShriAjay Singh, Notedwith avid interest your candid and forthright views onthe eventuality of asasination of Ossama whichthe Americans hail as their great success. There isa wave of contentment among the Americans and exuberance among the Pakistan politicians who have been eschewing defeat and are exposed of their hypocrisy over theissue of co-operation in fight against terrorism. It is hightime that USA correctly understands the intents and purposes of Pakistan and being well equipped with ways and means must be more active to wrest the menace of terrorism globally.
With profound regards,
Jasvinder Singh

Viveca, Monica, Lily & Dola said...

Very well written and thought provoking piece. The sarcasm is quite subtle. I thoroughly enjoyed reading this. Our over indulgence with the high and mighty is what we are paying for actuually. Our adulation and sychophancy spreads all over ... The American President is anyway a big shot, all goes in the name of power anyway.

Superb writing.

anil agarwal said...

ajay singh ji apke vichar bahut thought provoking hain aur behinf the scene ki thinking karney ko badhya karten hain.
2. Dr Gyan Pathak ka lekh may /june 2011 ki ekal patrika me Tribal......towards the mainstream bahut hi acha laga aur bahut si baten jo tribals kiproblem ke baren me hamari futies kya hon bata gaya. Excellent
anil agarwal

Japs, Indian said...

tani jara - Poly Tickle

- PJ gHansee

Jasvinder said...

Rever'd Sh. Ajay Singh,I fondly admire the sting in your pen which you exhibit every time by hitting uponthe head of a nail by expressing yourself meticulously and bodly on burning issues which have been posing gnawing problems and people are left to their fate or suffer in silence. Although such conttions often fall flat onthe ears or so called representatives who more often than not rule the roost while at the helm of affairs. Still, I feel at there is one among many who dares to raise voice against the social shortcomings. Hts off to you sir for your candid assertions.
With progound regards, Jasvinder Singh