Saturday, June 1, 2013

गुबार देख रहें है हम, गुजरते कारवां का

मित्रो,
समय का चक्र अबाध गति से घूम रहा है और कारवाँ हमारे सामने से  हर छण गुजरता जा  रहा है।आप इसका हिस्सा जानबूझ कर बन जाये और होशोहवास में रह कर इसके गवाह बने तो अच्छा, नहीं तो यह सबकुछ तो होने वाला है ही बस आपको ही पता नहीं चलेगा की जीवन की कब शाम हो गयी और जब आप पीछे मुड़ कर अपने योगदान का मूल्यांकन करेंगे तो लगेगा की जो कुछ कर पाए वह काफी नहीं था और इससे बेहतर करने की सम्भावना थी लेकिन चूक  गये।

बस यही सोच कर शायद  अरुणा राय, सोनिया गाँधी का काफिला छोड़ दूसरे पाले  में आगयी है।कुछ लोगो का मानना है की उन्होंने सोनिया की डूबती नाव से किनारा वैसे ही किया है जैसे डूबते  जहाज में पानी भरने पर चूहे सबसे पहले बाहर निकल कर आते है। कुछ की राय यह भी हो सकती है की जब सोया हुआ जमीर जाग गया तब लिया है उन्होंने यह निर्णय।लेकिन कुछ की राय यह है कि लोग बहुत हिसाबी किताबी होते है और मौके की नजाकत के हिसाब से  पाला बदल लेते है और कभी पासा उल्टा पड़ जाय  तो बयान से ही किनारा कर लेंगे या फिर किसी और को बली  का बकरा बना देंगे। और जिस जहाज से भागे थे उसी पर फिर चढ़ जायेंगे।
कभी जेन्टिल मैनो  का खेल समझा जाने वाले  क्रिकेट   के खेल में कितना घाल मेल है इसका पता सभी को है। इसी लिए इसके मलाई दर पदों पर राजनेता काबिज है जिनका दूर- दूर तक क्रिकेट से कोई लेना देना नहीं है। राजीव शुक्ल से लगा कर लालू यादव तक इनके पदों पर मजे उड़ाते हुये बयान  देते है की खेलो में राजनीत नहीं
होनी चाहिये। और मजे की बात यह की यह भी राजनीत होती है। तीन  साल पहले ललित मोदी इसी खेल के कमिश्नर थे और जब उनकी तिकड़म पकड़ी गयी तो हिंदुस्तान छोड़ लन्दन में जा कर बस गये। फिर उनसे ज्यादा बड़े खिलाडियो मसलन राजीव शुक्ला और शरद पवार जैसे दिग्गजों ने कमान सम्भाली, मलाई खाई बदनामी की टोपी पहनाई और चलने की तैआरी कर ली।इस खेल से किसका भला हो रहा है यह  सभी को पता है फिर भी हमारी सहने की क्षमता देखिये की हम विरोध केवल उतना ही करते है की विरोध करते हुए दिखे, लोग हमको ईमानदार समझे और   खेल चलता रहे।

जिस मामले की वजह से से क्रिकेट अभी चर्चा में आया है वोह है सट्टे बाजी।अब कोई गरीब आदमी तो सट्टे  बाजी  करेगा नहीं, इसलिए बड़े लोगो के चमचो ने इसे लीगल ठहराने की मुहीम चला दी है। तर्क यह है की दुनिया के बहुत से देशो में यह लीगल है। लेकिन अगर इनसे कोई पूछे जिन देशो की बात यह लोग कर रहे है वहाँ कितने लोग ऐसे है जो भूख से मरते है या इतने गरीब है की दो जोड़ी कपडे भी नसीब नहीं है तो इसका जवाब शायद ही दे पायें। दर असल जब से सुधारो का दौर इस देश में शुरू हुआ है तब से यह एक आम बात हो गयी है की बात -बात में अमरीका और इंग्लैंड से  सुविधा की तुलना करना। लेकिन जब देश के लिए काम करने   या त्याग करने की बात हो  तो खाटी हिन्दुस्तानी बन जायंगे और दूसरे  को दोष दे कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेंगे ।असल में  यह क्लास  मलाई खाने का इतना आदी  हो गया है कि  अमरीका और यूरोप में रह कर जिन्दगी के मजे उठाता है जब मलाई खाने की बात हो तो हिंदुस्तान आ जाता है और जब देश के लिए  कुछ करने की बात हो तो अपनी मजबूरिया गिनवाता है।

आज सुबह पार्क में घूमते हुए एक 12-13 साल के बच्चे से मुलाकात हुयी जो चंडीगढ़ में रहता है देश के एक अत्यंत नामी  गिरामी स्कूल में  कक्षा ९ का विद्यार्थी है। उससे थोडा परिचय किया तो एक आश्चर्य जनक बात यह पता चली की उसके स्कूल में कबड्डी का खेल कभी नहीं हुआ  और तो और कभी चर्चा भी नहीं हुई  इसलिए इसके बारे में उसे कुछ भी पता नहीं था। मुझे आश्चर्य इसलिए हुआ की इस खेल में भारत को अन्तर्रष्ट्रीय प्रतियोगताओ  में अनेक इनाम मिले है और एशियन  गेम्स की प्रतियोगिताओ में यह  खेल नियमित
 खेला  जाता है। क्या इस देश के खेल मंत्री कोई ऐसी नीति बना सकते है की अन्तरराष्ट्रीय खेलो में खेले जाने वाले सभी खेलों  के बारे में  न्यूनतम जान कारी सभी बच्चो को  स्कूलों में करवाई जाये और फिर जिसकी जिस खेल में रूचि हो उसमे वह जा सके। आखिर क्रिकेट ,फुटबाल और हाकी ही खेल नहीं है बाकी  खेलो में भी  तमाम अवसर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध है। इसलिए सभी खेलो के बारे स्कूल स्तर पर बच्चों को पता चले और खेलने का अवसर मिले ताकि खेल प्रतिभा  का विकास वही से शुरू हो और देश  के लिए अन्तराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी पैदा हो सके और भारतको सम्मानित स्थान खेलो में भी प्राप्त हो। आखिर सवासो  करोड़ के देश में हम सौ खिलाड़ी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के क्यों नहीं पैदा कर पा रहे है?देश के नीति नियन्ता इस प्रश्न पर विचार कर खेलो को प्रोत्साहन देने वाली नीतियाँ क्यों नहीं बनाते है।



और अंत में
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो  गोय 
सुन इठ्लाइए  लोग सब बाँट न लेहे  कोय .



अजय सिंह"एकल"

1 comment:

sanjay seth said...

I agree with you.
And like to tell you that all this is starting from the school level there they teach PT not Yoga.
So we are under the British rule the day we are born. Either in city or in village.

Sanjay Seth