Tuesday, April 10, 2012

मूर्ख मकान बनाते है और अकलमन्द उसमे ......

मित्रो ,

मुझे पता नहीं यह कहावत कब कही गई और क्यों कही गई पर इतनी जिन्दगी जी लेने के बाद यह समझ आ गया है कहने वाले ने ठीक ही कहा है. तीन कमरे के मकान का किराया ४ लाख सालाना और कीमत डेढ़ -दो करोड़ .यानि निवेश पर ब्याज भी न निकले .तो अर्थशात्र के हिसाब से तो यह निरी मुर्खता ही है,  समाज शास्त्र के हिसाब से भी अकलमंदी नहीं . यानि आपका पडोसी अगर ठीक न हो और पसंद न आये  तो  जिन्दगी भर साथ रहने की मज़बूरी नहीं घर बदल दो और चुन लो मन का पडोसी.

केवल इतना ही नहीं मूर्ख और भी कई काम करते है मसलन इंजिनिअर या डाक्टरी की पढाई करने में जिन्दगी के कीमती साल और पैसे ख़राब करते है, और फिर किसी अनपढ़ (बेवकूफ या गंवार नहीं) की नौकरी करके   अपनी शान बढ़ाते है, आज के इकनोमिक टाइम्स में छपी खबर पढ़ी मनोज भार्गव  (समाचार पढने के लिए नाम पर क्लिक करे)     के बारे में .प्रिन्सटन विश्वविद्यालय, अमरीका में पढाई छोड़ कर एनेर्जी ड्रिंक बेचते है और साल में बिलियन  डालर की बिक्री करके अमरीका में सबसे अमीर भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया है.और पिछले कई सालो से इस सिंहासन पर विराजमान आइ आइ टी दिल्ली से पढ़े और अमरीका में बढे वेंचर कैप्तालिस्ट विनोद खोसला को पीछे छोड़ दिया.


पढ़े लिखे अकलमंद और भी कई काम करते है जैसे पैसे को कमाने और बढ़ाने के साथ ही उसको ऐसे पकड़ कर रखते है जैसे वोह इस दुनिया में कमाई हुई जागीर के माली न होकर मालिक है और वह सदा ही उनके पास रहने वाली है . तभी तो मनोज भार्गव जैसे अनपढ़ लोगो ने पिछले  दस सालो में ५ हजार करोड़ की सम्पति समाज के काम के लिए दान की है . ऐसा ही  कुछ हाल और दूसरे  अमीरों   जैसे नरायण मूर्ति और अजीम प्रेम जी तथा बिल गेट जैसे स्कूल ड्रॉप आउट्स लोगो का भी है जिन्होंने अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज के काम के लिए दान कर दिया है.

 एक अनपढ़ संत कबीर दास ने  लिखा है -


पानी बाढ़े   नाव में ,जेब में बाढ़े दाम ,
दोउ हाथ उलीचिये ,यही सज्जन को काम l

और   इन अनपढ़ लोगो ने  कबीर  का कहना मान कर अपनी जीवन रूपी नाव को डूबने से बचा लिया वरना पढ़ा लिखा अकलमंद आदमी तो हर काम में लाजिक  खोजता है, और अनपढ़ जनता  है, दुनिया में चीजे लाजिक  से नहीं बुद्धि से चलती है जैसे मनोज भार्गव जी कहते है बड़े-बड़े कालिजो के पढ़े हुए लोग अव्याहरिक ज्ञान से युक्त होते  है जबकि सफलता के लिए  पढ़े होने के बजाये कढ़े होने की जरुरत है .

अजय सिंह  "एकल "


और अंत मैं  

किसने कहा, और मत भेधो हृदय वहिव्य के शर  से
भरो कुसुम का अंग कसुम  से ,कुमकुम से केसर से
कुमकुम किसे लगाऊ  ?सुनाऊं किसको कोमल गान ?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिंदुस्तान I 
                                     "राम धारी सिंह दिनकर" 




   

3 comments:

Pawan for Social Development and spirituality said...

That's good one. I totally agree with you. I also gone through various thought and just remembered the comment by lalu Ji on general Yeh General( V.K.Singh)frustrated hai, Apne kuch kar nahi sakta toh logo ke upar ilzam laga raha hai. Kya zindagi me hum kuch nahi kar paate hai toh aisa sochte hai ? Is tarah to sare NGO bhi frustated ho jayenge. Kya Hum Frustrated hai Zindagi ke badlav ki soch ke liye ? Think ..........
regards
Pawan Kumar Singh

Sunil said...

I always enjoy your perspective & analogy around these things which can be complicated so simply :)

PKI said...

There is an old saying " Fools build houses and wise live in the same"

But reality is just the opposite. Look around every one is racing to buy 2nd, 3rd , 4th house ... and the quest continues.