Thursday, July 26, 2012

वीर भूमि का वीर पुत्र, प्यादा से बादशाहत तक

दोस्तों , 

यह कहानी नहीं सच्ची बात है पोलतू जब पैदा हुआ तो करोड़ो में एक था,फिर  करीब पैतीस साल बाद जब राज्य सभा का मेम्बर बना तो  वह  हजारो में एक था,उसके बाद जब मन्त्री  बना तो सैकड़ो में एक था लेकिन वही  पोलतू यानि प्रणव मुखर्जी आज जब देश के तेरहवे राष्ट्रपति बने तो तेरह में एक है . अब यदि शपथ ग्रहण समारोह में दादा ने अपने भाषण जो बाते कही तो वह यदि काम कर दे तो निश्चित एक में एक हो जायेंगे। भूतो न भविष्यती ! (पूरा भाषण पढने के लिए क्लिक करे )मसलन दादा ने कहा की भूख मानवता के लिये  सबसे बड़ा अपमान है यानि देश में किसी को भूखा नही रहना चाहिए. विचार अच्छा है लेकिन दादा अपने  ने वित्त मंत्री काल  के  आठ सालो में जो कुछ किया उससे तो जिनको दो समय खाना मिल जाता था उनको भी मिलना बंद होने की स्थिती है।हालाकि वोह इसके लिए कभी गठबंधन को और कभी अन्तराष्ट्रीय स्थितियो को दोषी ठहराते रहे है।लेकिन सच्चाई यही है की गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है और आम आदमी त्राहि-त्राहि कर रहा है।रही आतंकवाद से लड़ने की बात तो उससे कांग्रेस की सरकारपिछले 65 सालो से  केवल फायदा उठाने की नीतियो का पालन कर रही है.अब दादा के पास आतंकियों को सजा देने का अधिकार प्राप्त है, अतः इसको कितने प्रभावी ढंग से लागू करवा पाएंगे यह तो समय ही बताएगा।तीसरी महत्वपूर्ण बात दादा ने की  भ्रष्टाचार मिटाने  की  है , तो अभी तक दादा जिस सरकार में नंबर दो पर थे,  उस में कम से कम 15 मंत्री ऐसे है जिन पर सिरिअस भ्रष्टचार के आरोप है और सरकार उनकी जाच तक करवाने को तैआर नहीं है।मिटाना  तो बहुत दूर की बात है . यह देखना दिलचस्प होगा की राष्ट्रपति रहते हुए भ्रस्टाचार के विरुद्ध किस तरह और कितने प्रभावी ढंग से इसको ख़त्म करने में सफल होते है।


आज ही यहीं नई दिल्ली में संसद भवन से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर  भ्रष्टाचार का विरोध करने के  लिए   टीम अन्ना भी अनशन पर बैठ गयी  है लेकिन बा मुश्किल दिन भर में कोई समाचार इस बारे में आया . शाम होते-होते केवल इतनी खबर बताई गयी की पिछली बार से कम लोग आये थे।दूसरी महत्व पूर्ण बात नारायण सामी ने यह कही की अब सरकार  इनसे कोई बात नहीं करेगी , लेकिन सबसे ज्यादा मजेदार वक्तव्य दिया सलमान खुर्शीद साहेब ने.उन्होंने कहा की यदि ज्यादा परेशानी हो अन्ना को तो वह  यूनाइटेड नेशन क्यों नहीं जाते .शायद उत्साह में जनाब यह भूल गए की  कश्मीर मसले पर नेहरु  एक बार यू एन जा चुके है.और नतीजा सामने है पिछले 60 बर्षो से देश उसकी कीमत चूका रहा है  .लेकिन इन मदहोस मंत्रियो को तो कोई बात समझ में मुश्किल से ही आती है.आखिर देश और उसकी जनता चुनाव के बाद इनकी आखरी वरीयता क्यों हो जाती है.
 प्रणव दा यानि भारत के राष्ट्रपति और अन्ना दोनों भ्रष्टाचार मिटने की बात कर रहे है एक भूखे पेट टेंट के नीचे और दूसरे शान दार लिमोजीन की सवारी करते हुए. आश्चर्य  की बात है दोनों का उद्देश्य एक है. देश से भ्रष्टाचार को मिटाना।

शान्ति सुंदर राजन और पिंकी प्रमाणिक जैसे एथलीटो के विवाद पर यह लोग भारत में जैसे मजबूर कर दिए गये उन्ही हालात  में दक्षिण अफ्रीका की एथलीट  सैमेन्या के लिए उसने तीसरे विश्व युद्ध  की धमकी तक  दे डाली और अंतताः सेमेन्या को वोह अधिकार मिल गया जिसकी वोह हक़ दार थी. लेकिन भारत ऐसा करने और कहने का साहस नहीं दिखा सका और इसके पदक विजेता एथलीट ईंट भट्टे पर काम करने  को मजबूर है .(पूरा समाचार पढने को यहाँ क्लिक  करे). ऐसा देश है मेरा .


अजयसिंह "एकल"

Saturday, July 21, 2012

ये क्या हुआ ?

प्रिय दोस्तों,
पिछले दिनों  फिल्मी दुनिया के  दो महान कलाकार रुस्तमे हिंद दारा सिंह  और राजेश खन्ना नहीं रहे .दारा सिंह  केवल फिल्मी कलाकार ही नहीं फ्री स्टाइल कुश्ती में  दुनिया में हिन्दुस्तान का नाम रोशन करने वाले प्रथम व्यक्ति थे।हिन्दुस्तान के सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय टी वी धारावाहिक में  वीर हनुमान का चरित्र निभा कर दारा सिंह जनता में अत्यंत प्रिय कलाकार भी हो गए और श्रद्धा के पात्र भी।


काका यानी  राजेश खन्ना जो हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार बने , लम्बी बीमारी के  बाद पार्थिव शरीर को छोड़ कर अपने पीछे  अच्छी और ख़राब लगने वाली तमाम  कहानिया छोड़ गए.अनेक अमर फिल्मो में अभिनय का लोहा मनवाने वाले राजेश ने जिन्दगी जितने उतार चढ़ाव देखे उतने उतार चढ़ाव बहुत कम लोगो की जिन्दगी में होते है .वोह राजेश जिनके सड़क पर निकलने पर जाम लगा करते थे आखरी दिनों में उसी राजेश से मिलने के लिए महीनो में कोई आता था  सिवाए डाक्टर  या सेवक के। एक सुपर स्टार से गुमनामी की जिन्दगी तक राजेश खन्ना का सफ़र अब सिर्फ यादो में सिमट जायेगा. एक ही जिदगी में उन्होंने बहुत कष्ट झेले. उन्होंने शोहरत की ऊंचाईयां भी छुई और उपेक्षा की सुनसान गलियो से भी गुजरे,लेकिन उन्होंने सबकुछ अपने सीने में छुपाये रखा. मगर एक अवार्ड फंक्सन में वोह बोल ही पड़े -इज्जते,शोहरते,चाहते,उल्फ़ते कोई भी चीज दुनिया में रहती नहीं.आज में जहाँ हूँ वहां कल कोई और था,ये भी एक दौर है वो भी एक दौर था।


सुना है एक बार फिर कांग्रेसियो ने फिर  राहुल को सरकार में आने के लिए उकसाया है,मैं  उकसाया इसलिए कह रहां हूँ क्योंकि समझाने  से  तो उन्होंने सरकार में कोई रोल किया नहीं .और संगठन के लिए के अबतक कुछ कर नहीं पाए. अब एक बार कांग्रेसी फिर राहुल के लिए बड़ा रोल माँग रहे है . अभी तक कांग्रेसियो को यह समझ नहीं आया जो आदमी आज तक अपनी शादी नहीं कर पाया, अपनी गर्ल फ्रेंड को हिंदुस्तान नहीं ला पाया उससे क्या रोल की उम्मीद की कांग्रेसियो ने लगा रखी है भगवान  जाने .लेकिन फिर भी राहुल के लिए बड़ा रोल चाहिए. राहुल ने भी कह दिया है अब कांग्रेस की अध्यक्षा यानी मम्मी जी रोल तय करेंगी की अमूल बेबी क्या रोल करेंगे और कितना बड़ा रोल करंगे।लेकिन  भारत की जनता को मालूम है  की राख  के ढेर मैं शोला है न चिंगारी हैं .

देश में एक नया बाबरी कांड होने  की भूमिका यही दिल्ली में निष्क्रिय केंद्र सरकार और शीला की राज्य सरकार  की नाक के नीचे सुभाष पार्क में बन गयी है , कोर्ट के आदेश के बावजूद नमाज पढने का सिलसिला जारी है . जमीन का मालिकाना हक़ और भारतीय पुरातत्व विभाग  की रिपोर्ट  अभी कोर्ट में आयी नहीं है किन्तु जबरदस्ती स्थान को 17वी  शताब्दी की अकबराबादी मस्जिद घोषित कर नमाज  पढवा कर देश मे एक नया विवाद देश के सेकुलरिस्टो ने खड़ा करवा कर अगले चुनाव की व्यूह रचना  शुरू करदी है. बहुसंख्य हिन्दू समाज को अपमानित करने  का कुचक्र कांग्रेस सरकार ने फिर शुरू कर दिया है .अब बात निकली है तो दूर तलक जायेगी . पूरा समाचार पढने के लिए यहाँ क्लिक   करे .


 और अंत में 

कान पर जूं रेंगने से, अब भला क्या फाएदा 
हर तरफ दाउद का घर ,हर तरफ अलकायदा ll 
अजय सिंह "एकल "

Saturday, June 23, 2012

गेट वेल सून

प्रिय मित्रो ,
कभी स्वास्थ्य लाभ की  शुभ कामना देने के लिए प्रयोग किया जाने वाले  शब्द अब यदि कोई किसी को कहता है तो स्वीकार करने वाले को यह सोचना पड़ जाता और जवाब में वोह पूछता है   "व्हाट   डू यू  मीन ". मुन्ना भाई  फिल्म मे इसका प्रयोग गाँधी गिरी के लिए किया गया था. यह स्थिति तब से और बिकट हो गयी  है जब से मोदी के लिए इस तरह के पोस्टर लगाये गएँ है . मुझे नहीं पता की मोदी के लिए ये पोस्टर क्यों और किसने लगाये है लेकिन जो समाचार आ रहे है उससे ऐसा लगता है की यह मोदी के द्वारा की जाने वाली कथित ज्यादितियो  के खिलाफ विरोधियो द्वारा उठाया गया एक  कदम है .

लेकिन यह सबकुछ  समझने के बाद अब मैं भी थोड़ा उलझन मैं हूँ किस किस को गेट वेल सून  कहूँ।सत्ता मैं बैठे हुए सारे  लोग ही बीमार नजर आ रहें हैं। और आम जनता इनकी हरकतों से बीमार होने के कगार पर है लेकिन सत्ताधीशो के कान पर जूँ ने भी रेंगने से मना कर दिया है .

सरकार ने एक आदेश निकाल कर फजूल खर्ची पर रोक लगाने का प्रस्ताव किया, जिसमे मंत्री और अधिकारिओ द्वारा की जाने वाली विदेश यात्राएँ  भी शामिल  थी साथ ही  जरुरी यात्राओ  के लिए 46 करोड़ का इंतजाम भी बजट  में किया गया था .एक  आर  टी  आइ  प्रार्थना पत्र के जवाब मैं सरकार ने बताया की अब तक दस गुना ज्यादा यानि लगभग  500 करोड़ इस मद में खर्च हुए है . इसमें करीब 2.43 करोड़ केवल  जनाब मोंटेक  सिंह अहलुवालिया ने खर्च किये है .यह भारत  सरकार  के वही साहेब  हैं जिनका कहना है यदि  कोई 29 रूपये रोज  कमाता है तो वह  गरीबी रेखा के ऊपर है और सरकार ऐसे लोगो को दी जाने वाली  सब्सिडी का खर्च नहीं उठा सकती है .इसलिए  पेट्रोल  के ,खाद  के गैस  के यानि गरीबो द्वारा इस्तेमाल  की  सारी  चीजो से  सब्सिडी हटा  दी जाये ,यदि महंगाई बढती है तो बढ़ जाये सरकार गरीबो का बोझ नहीं उठा सकती है . ठीक ही है  सरकार केमंत्री और  अधिकारिओ की विदेश यात्राओं  में  ही इतना ज्यादा खर्च हो जाता है तो फिर दोहरा खर्च सरकार थोड़ी उठाएगी । अब आम आदमी क्या करे वोह तो मोंटेक सिंह और उनका भार उठानेवाली सरकार  को  गेट वेल  सून की दुआ ही कर सकता है ताकी गूंगी बहरी सरकार  को आम आदमी की आवाज सुनाई  पड़ने लगे।

यूँ तो महामहिम बनने के बाद प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने अपने कार्य काल  मैं अनेक मानदंड स्थापित किये है  जो वर्षो तक लोगो द्वारा याद किये जायेंगे. किन्तु एक काम ऐसा भी किया जो दुनिया मैं केवल वाही करसकती थी . आप भी आश्चर्य मैं पड़ गए होंगे मेरी बात सुन कर . क्योकीं  उनके कार्यकाल में कोई काम हुआ हो येसा  याद नहीं आता तो फिर ऐसा क्या काम उन्होंने कर दिया  है जो दुनिया मैं केवल वही कर सकी .जी हां महामहिम ने अपने कार्यकाल मैं जिन 35 लोग, जिन्हें   फाँसी की सजा  विभिन्न अदालतों ने दी थी को क्षमा दान दिया उनमे एक बंदू  बाबूराव  तिड़के नामक  सख्स ऐसा है जिसकी मृत्यु 2007 मैं हो चुकी हैं उसे महामहिम ने फांसी  की सजा माफ़ कर  जीवन  दान दे दिया है।अब आपको समझ  आ गया होगा की ऐसा केवल वही करसकती है।यदि महामहिम को बुरा न लगे तो मैं भी उनके लिए भारत के दूसरे आम नागरिको के साथ  यही दुआ कर सकता हूँ की भगवान महामहिम को जल्द ठीक करे यानि गेट वेल  सून ताकि अगला एक महीना ठीक से गुजर जाये और   जब वह कुर्सी से हटे तो  भूत पूर्व कहलाये अभूतपूर्व नहीं।



एक  और मजेदार समाचार यह है की आम आदमी जिसको एक गैस सिलिंडर 21दिन मैं मिलता है और जिस पर भारत सरकार सब्सिडी ख़तम करने की बात लगभग हर महीने करती है उसका उपयोग सरकार और उसके मंत्री सबसे ज्यादा करते है . उदाहरण के लिए उपराष्ट्रपति साहेब ने साल मैं 171 सिलिंडर इस्तेमाल कर लिए यानि हर दूसरे दिन एक .भाजपा के शाहनवाज साहब ने  56 यानि हर हफ्ते एक और विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर साहिबा ने 79 हर पांचवें दिन एक .और ये हाल तो तब है जब डाक्टर ने सबकुछ खाने पीने  पर प्रतिबन्ध लगा रखा .भगवान जाने अगर ये लोग स्वस्थ हो जाये और आम आदमी की तरह दो टाइम  खाने -पीने लगे तो  न जाने यह कितने सिलंडर खर्च करेंगे. हम लोगों को यानि आम आदमी को उसकी जरुरत भर गैस सिलिन्डर मिलते रहे इसलिए  हम तो यही दुआ करेंगे और  कहेंगे डू नाट  गेट वेल  सून  नहीं तो हमारा चूल्हा कैसे जलेगा .यानि देश हित मैं इनका बीमार होना ही अच्छा .
और अन्त में 


                          अभी जमीर में थोड़ी सी  जान बाकी है 
जो था वोह सब  ख़त्म हुआ,
बस कुछ निशान  बाकी है 
अभी तो सिर्फ आप परेशान है मुझसे 
जबकि पूरा हिन्दोस्तान बाकी है 






अजय सिंह"एकल "

Thursday, June 14, 2012

मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की

मित्रो ,
मर्ज  बढ़ता गया ज्यों-ज्यों  दवा की,यह बात जब मैंने अपने एक मित्र से कही तो वह तपाक से बोला क्या सरकारी अस्पताल मैं गए थे? मैं आश्चर्य में था और उससे   पूछा तुम्हे कैसे मालुम तो वह  बोला, देखो कैसे पहले इंजिनयरिंग  की दो प्रवेश परीक्षाये  होती थी, एक आइ आइ टी की और दूसरी ए आइ ई ई ई की . सरकार ने उसको हटा कर एक कर दिया नतीजा,  अब  करीब -करीब  सारे आइ आइ टी अपनी-अपनी  प्रवेश परीक्षा करंगे। कानपुर आइ आइ टी ने घोषणा कर दी  है बाकी  लाइन मे  है . नतीजा छात्रों की समस्याए कम होने के बजाय बढ गयी .पहले दो की तैयारी करने का दबाव था अब पन्द्रह का है और मर्ज  ऐसे ही बढ़ता रहा तो भगवान ही मालिक है.

यदि      आपको अभी   भी शक है तो सरकार के   कामन वेल्थगेम
 के समय शुरू हुए कनाट प्लेस के सुन्दरी करण का हाल देख लीजिये
 दो साल  ख़तम  होने को है लेकिन  वहां के  दुकान दारो  का दुकान में सीवर के पानी के घुसने का डर अभी भी बना हुआ  है  (You can read news by clicking on link) नतीजा सुन्दर होना तो दूर नए समस्या पैदा हो गयी है जिसका इलाज अब वहा के लोग धुड्ने  मैं लगे है. अब तो हो गया न विश्वास  की मर्ज बढ़ता गया ............


बचपन मैं एक कहानी सुना करते थे l एक मास्टर साहब  अपनी क्लास मैं बच्चो को पढ़ा रहे थे गंगा भोपाल होकर बहती है ,प्रिंसिपल साहब  को जब पता चला उन्होंने मास्टर से उसका स्पष्टी करण  को कहा तो उनका जवाब था की जितने पैसे आप देते हो उतने मैं तो गंगा भोपाल से ही बहेगी पूरे  पैसे दो तो मैं गंगा को कानपुर हो कर बहाऊंगा .बात मजाक की थी और चुटकुले की तरह सुनाई जाती  थी,पर अब इसको सच कर दिखाया है टेरी ने .दरअसल,पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने नेशनल गंगा रिवर  बेसिन अथारटी (NBRA) के लिए जो रिपोर्ट टेरी (Tata Energy Research Institute )  ने तैआर  की है उसमे पृष्ठ संख्या 124  पर गंगा नदी को बिहार के गया शहर से बहता बताया गया है (You can down load the report by clicking on link) मुझे नहीं पता  ऐसी  भूल गलती से हुयी है या जानबूझ कर .

भारत में  राष्ट्रपति का चुनाव इसबार काफी दिलचस्प है ,प्रणव दादा और हामिद अंसारी तो लाइन मैं थे ही, मुलायम और ममता की जुगल बंदी ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नाम को प्रस्तावित करके शायद यह बताने की कोशिश  की है की उनकी सही जगह राय सीना हिल्स पर है क्योंकि वहां पर आम तौर पर उन्ही लोगो को भेजा जाता है जो सत्ता पार्टी और उसके नेतृत्व के लिए  वफ़ादारी के साथ रबड़ की मोहर की तरह काम कर सके और मनमोहन सिंह इसके लिए बिलकुल उपुयुक्त है और इसका सबूत  उन्होंने पिछले 8 सालो में दे दिया है. प्रधान मंत्री रहते हुए अपनी वफ़ादारी पर कोई शक  करने  की  वजह  नहीं बनने  दी  और  रबर  स्टैम्प से  ज्यादा
कुछ करने कि बात  सपने मैं भी नहीं सोची .

 स्टैण्डर्ड एंड पुअर नामक साख रेटिंग अन्तराष्ट्रीय एजेंसी ने देश की साख जंक मैं परिवर्तित करने की बात कह कर सरकार और व्यापर जगत में भूचाल ला दिया है.उस पर एस  एंड  पी  का यह कहना  की   यू पी ऐ  की   संगठन  प्रमुख श्रीमती सोनिया के नेतृत्व वाले  समूह में निर्णय लेने की क्षमता नहीं है इसलिए देश का आर्थिक विकास रुक गया है,भारतीय   करेंसी  साख खो रही रही है,उद्योग, धंधे चौपट हो रहे है इसलिए  भारत की साख  दावं पर है. और यदि स्थिति  में सुधार  नहीं हुआ तो  बाकि रही सही भी साख  ख़तम हो जायेंगी .जंक  ग्रैड  होने से नया निवेश नहीं आयेगा और पुराना भी वापस हो जायेगा क्योंकि भारत  निवेश  के लिए सेफ  नहीं रहेगा कुल मिला कर बँटाधार होने की तैयारी है।  कहते है कि  नीरो   उस समय बंसी बजा रहा जब रोम मैं आग लगी थी,इसलिए इस  बन्टाधारी  मैं मुझे  नया कुछ नहीं दीखता है, यू पी ऐ की नेत्री जो रोम से ही आयी है  वह भी कुछ  स्वाभाविक  गुड़ नीरो के ले कर  आयी होंगी, क्योंकि  आग  लगी दिख  रही है और फायर  ब्रिगेड की घंटी (बांसुरी  का संगीत) भी सुनाई दे रही  है।


                                            और अंत मैं 


मर्जे इश्क पर रहमत खुदा की  

मर्ज बढ़ता ही गया ज्यो -ज्यो दवा  की 
                     
                                                 मोमिन खान मोमिन 






              अजय सिंह "एकल"

Thursday, May 24, 2012

ये कहाँ आ गए हम........


प्रिय  मित्रो ,
पता  नहीं कहाँ आ  गए  है हम    पिछले  साठ सालो में .कोई परिपक्वता  नहीं, दशा  मे  कुछ   खास   सुधार नहीं, हालात  बद  से बदतर  .  बस  हमारे  लोकतंत्र  के भी  साठ  साल  पूरे होने  से  इसके     बाल  भी   उम्र  के साथ -साथ  सफेद हो गए है इसलिए  सिनिअर सिटीजन  की तरह  कुछ  रियायतों  और सम्मान  का अधिकारी हो गया  है  . वरना तो बस   गोल माल ही गोल माल  है सब जगह. अनगिनत  घोटाले, बेमिसाल  महंगाई, गरीब  जनता  का   मजाक  उड़ाया  जा रहा  है  तरह -तरह के तर्क  और सांख्यकी  देकर   और गरीब  के   नाम  पर  सरकार के पाले में  बैठे लोग  सुविधाओ  का   बेशर्मी  के साथ    उपभोग  कर रहे है  और यह ही इस   देश  की नियत बन  गयी है.   फर्क  बस  इतना है की पहले गौरी और गजनवी थे, फिर गोरे अंग्रेज  आए  और अब  काले  अंग्रेज  है देश  को लूटने के लिए . स्थिति  यह है की  एक  बार  किसी  भी  तरह  राजनीत  में पैर जम  जाये  तो  फिर  बस  मजे  ही मजे है .  और कही  पार्टी  आला  कमान  भी सेट हो    गए  तो फिर क्या पूछने. सात पीढियो को तारने की ताकत आ जाती  है ,जो चाहो कहो  जो चाहो करो . भगवान  जाने कहाँ आगये हम .

जरा याद कीजये राजेंद्र बाबू को जिन्होंने  संसद  में  अपने उद्घाटन  भाषण  में कहा था "यह  प्रथम    अवसर  है  की    जब   समस्त देश का शासन  एक  प्रजातंत्रीय  शासन  प्रणाली  के अंतर्गत  आया  है . देश के इतिहास  में यह समय अभूत पूर्व  है . इस  गणराज्य  और  संसद की स्थापना  स्वतंत्रता के बाद ही  हो सकती  थी, अतः  इस स्वतंत्रता  की रक्षा करना  प्रत्येक  भारतीय  का  कर्तव्य है . हमारे  गण राज्य  की नीव हमारे  संविधान में  निहित है .  आपके  ही एक  साथी    और स्वतंत्रता  के संघर्ष  में आपके कंधे से कन्धा  मिला कर चलने वाले  व्यक्ति  की हैसियत  से  मैं  आपको  आश्वासन  देता  हूँ  की  साधारण  व्यक्तियो  की उन्नति  ही  मेरा  सर्वप्रथम  कर्तव्य  होगा .मैं  अपने समस्त देशवासियो  से प्रार्थना करता हूँ  की वे मुझे अपने में से ही एक  समझे  और मुझे    शक्ति  भर  सेवा  कर सकने के  लिए उत्साहित  करते रहे . ईश्वर  मुझे  सर्वसाधारण  की सेवा की शक्ति दे".  लेकिन  अब  देश  में नेता बनना एक  व्यवसाय है और जैसे किसी कंपनी का मालिक केवल  पुत्र एवं पुत्रियों को ही  अपना  स्थान  देता है वैसे ही  नेता भी  क़ाबलियत  या सेवा करने के अपने जज्बे की वजह से न  होकर खानदान  की वजह से   पद  और प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे   है. फिर चाहे  वह  गाँधी परिवार हो या यादव परिवार या फिर  पंवार हो अथवा देश मुख  परिवार  कहाँ तक  गिनवाये लम्बी फेहरिश्त है . ये तो अच्छा  है कुछ  नेता कुंवारें  रह   इसलिए    वह  इस  परंपरा के अपवाद हो  गए है।  यह देखना वाकई  दिलचस्प  है  की हम  कहाँ से कहा  आ  गए    है।


कभी भद्र  जनों  का खेल  जाना जाने वाला खेल  क्रिकेट  अब  पूरी दुनिया में फसादों की जड़  बन  गया है . फिर  चाहे  पाकिस्तान  की बीना मालिक  हो या   इंग्लैंड  के    मजहर माजिद . और जब  मैच  दिलचस्प  हो  और पैसे के साथ शोहरत  मिलने की भी  संभावना  तो हिन्दुस्तानियों से मुकाबला मुश्किल  है . आइ पी एल  के नाम पर जब चार साल  पहले क्रिकेट का नया तमाशा  शुरू किया  गया  तब से ही यह  विवादों  का नया रिकार्ड  बना  रहा  है . ललित  मोदी से ले कर शरद पवार और राजीव शुक्ला  सब एक  से बढ़ कर एक  विवादों और  भ्रष्ट्राचार का रिकार्ड  खिलाड़ियो   से    भी  ज्यादा  बना रहे है। इसी कड़ी में एक  नया विवाद हाल  में  दिल्ली में  हुए मैच में सिद्धार्थ  मल्लया  और  अमरीका  से खास  तौर पर  विवाद खड़ा करने के लिए बुलवाई गयी  मोहतरमा  जोहल हामिद के  द्वारा किया गया और कई   दिनों  सुर्खियों में रहा .बात  यहाँ   तक  पहुच  गयी  की  आइ पी  एल  मतलब  इंडियन  फसाद  लीग   समझा  जाने  लगा , जिसमे "डी " कंपनी  "पी " कंपनी और न जाने कितनी "ए टू  जी"  कंपनिया पैसे लगा रही है और कमा  रही है .  और  मजे की बात  यह की सरकार  इन्हें हजारो करोड के टैक्स छूट भी दे रही  है     साथ ही  गरीबो  और मध्यम  वर्ग़  की सुविधाएँ  कैसे कम  की जाये पर अविरल  काम कर रही है .  अब  चिंता यह नहीं है की कहा आ  गए हम बल्कि यह  है की कहाँ तक  जायेंगे हम .

इतना ही नहीं,जया बच्चन   पिछले 10 सालो से मुलायम  सिंह  की कृपा से राज्य  सभा  की शोभा बढ़ा रही है, उसी  राज्य सभा में जब  उनकी पुरानी प्रतिद्वन्दी रेखा ने सोनिया  गाँधी की कृपा पा कर 20 मिनट के लिए माननीय  मेम्बर्सो को दर्शन  दिए तो पुराने  पारिवारिक  मित्रो एवं प्रतिद्वंदियों में सदभावना  नमस्कार भी नहीं हुआ. यानि पेशे की प्रतिद्वंदिता व्यक्तिगत   रिश्तो   पर भारी  पड़ गयी . "यानि  ये  कहाँ   आ  गए हम  यूँ ही साथ साथ चलते" .
                                                                                            और  अंत  में 

                                                             भूख  गरीबी  दीनता, होते जिनके पास 
                                                             सीमेंट  पाइप  उनके,  बन  जाते आवास 
राम   नहीं रावन  नहीं ,नहीं रही कैकई 
फिर बचपन  देश  का ,भोग रहा बनवास .
                          'राज कुमार सचान' 

आज  नगर में हो रहा चारो ओर  विकास 
बच्चो को भी मिल गया पाइप में आवास .
                                             ' डॉ. कमलेश  दिवेदी' 






अजय सिंह  "एकल" 









Tuesday, April 24, 2012

तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही ...

मित्रो,

क्या आपको याद है की  देश में आर्थिक सुधारो की शुरुवात १९९१ में  नरसिम्हा  राव की सरकार में आज के प्रधान मत्री और उस समय के वित्त मंत्री मनमोहन  सिंह के द्वारा की गई थी. पिछले ८ सालो से  यु पि ऐ सरकार के मुखिया प्रधान मंत्री के दौर में ही देश में आर्थिक  हालत फिर  वैसे  ही  हो गए है जैसे १९९१ में थे.विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से गिर रहा है रुपये का फिर तेजी से  अवमूल्यन  डालर के मुकाबले में हो गया  है,रिजर्व बैंक के आकंडे बताते है की भारत  का भुगतान संतुलन पिछले तीन सालो   में पहली बार घाटे में आ गया है यानि की देश के विदेशी मुद्रा के खजाने में पैसा कम है और देनदारिया ज्यादा . कुल मिला कर देश में आर्थिक हालत बहुत अच्छे नहीं है इस बात की तस्दीक सरकार के आर्थिक सलाहकार डॉ. कौशिक बासू ने अपनी अमरीका यात्रा के दौरान भी कर  दिया है, और आगाह भी, की  अब २०१४ के पहले इसकी उम्मीद भी न करे. अर्थात  जिस सरकार के सलाहकार वोह है उससे उन्हें भी कोई उम्मीद नहीं दिखती है,२०१४ का एक मतलब यह भी निकाला जा रहा है की लोकसभा चुनाव के बाद जब सरकार बदल जाये तो ही सुधारो के कामो में गति आ सकती है. कुल मिला कर देश को  दवा और दर्द दोनों की आशा डाक्टर मनमोहन की मन मोहनी टीम से ही है जो अब कुछ कर सकने की स्थिति में है ऐसा विश्वास किसी को नहीं है यानि सरकार के अन्दर और बाहर दोनों जगह  निराशा ही निराशा है.

लेकिन  ऐसा भी नहीं की सभी कांग्रेसी इतने ही निष्क्रिय है, पार्टी के प्रवक्ता और स्टैंडिंग  कमेटी के चेअरमैन डाक्टर अभिषेक मनु सिंघवी साहेब इतने सक्रिय है की लोगो को जज बना देते है रातोरात और जब बात जनता के बीच गयी और समाचार बन गया तो कोर्ट से उसको रुकवाने का आर्डर ले आये हाथो हाथ. है न कमाल अब आप ढूंढते रहिये आपको समाचार कही नहीं मिलेगा सब अख़बार और टी.वी.चैनल सिघवी साहब का साथ पूरी सिद्दत के साथ दे रहे है. आखिर यह कोई आम आदमी का मामला तो है नहीं की आपके घर में लुटेरे घुस जाये और मार पीट कर सामान भी लूट ले जाये और किसी टी.वी. चैनल का रिपोर्टर आ कर घर के मुखिया से पूछे की आप को कैसा लग रहा है?
  

किसी भी आदमी का  नाम उसके माता पिता जब रखते है तो वह  नाम आदमी की केवल पहचान  न होकर परिवार की उस व्यक्ति से उम्मीदों   को भी दर्शाता है . इतना ही नहीं ऐसा माना जाता है की   नाम के अनुरूप व्यक्ति का व्यक्तित्व भी बनता है. लेकिन यह बात पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बारे में सत्य नहीं है . पिछले दो तीन महीनो में किये गए काम तो कम  से कम यही बताते है. रेल मंत्री  दिनेश त्रिवेदी को जिस तरह चलता किया गया और लोकतान्त्रिक देश में  जहाँ  ऍम अफ  हुसैन द्वारा हिन्दू  देवी देवताओं के निर्वस्त्र चित्र बनाने पर भी सरकार निष्क्रिय रहती है और विरोध   करने वालो को सम्प्रादाइक  करार देती है वही ममता नाम की नेता प्रोफ. अम्बिकेश महापात्र  को कार्टून  बनाने पर जेल  भेज रही है.इतना ही नहीं अब जनता अख़बार कौन सा पढेगी और टी.वी. चैनल कौन सा देखेगी भी ममता और उनकी सरकार में बैठे लोग तय  करेंगे. ठीक  कह रही है बंगाल की जनता अगर यह ममता है तो निर्ममता क्या है?


और  अंत में

उम्र भर ग़ालिब यही  भूल करता रहा........ 
धूल चेहरे पर थी और आइना साफ़ करता रहा l
अजय  सिंह  "एकल "  

Tuesday, April 10, 2012

मूर्ख मकान बनाते है और अकलमन्द उसमे ......

मित्रो ,

मुझे पता नहीं यह कहावत कब कही गई और क्यों कही गई पर इतनी जिन्दगी जी लेने के बाद यह समझ आ गया है कहने वाले ने ठीक ही कहा है. तीन कमरे के मकान का किराया ४ लाख सालाना और कीमत डेढ़ -दो करोड़ .यानि निवेश पर ब्याज भी न निकले .तो अर्थशात्र के हिसाब से तो यह निरी मुर्खता ही है,  समाज शास्त्र के हिसाब से भी अकलमंदी नहीं . यानि आपका पडोसी अगर ठीक न हो और पसंद न आये  तो  जिन्दगी भर साथ रहने की मज़बूरी नहीं घर बदल दो और चुन लो मन का पडोसी.

केवल इतना ही नहीं मूर्ख और भी कई काम करते है मसलन इंजिनिअर या डाक्टरी की पढाई करने में जिन्दगी के कीमती साल और पैसे ख़राब करते है, और फिर किसी अनपढ़ (बेवकूफ या गंवार नहीं) की नौकरी करके   अपनी शान बढ़ाते है, आज के इकनोमिक टाइम्स में छपी खबर पढ़ी मनोज भार्गव  (समाचार पढने के लिए नाम पर क्लिक करे)     के बारे में .प्रिन्सटन विश्वविद्यालय, अमरीका में पढाई छोड़ कर एनेर्जी ड्रिंक बेचते है और साल में बिलियन  डालर की बिक्री करके अमरीका में सबसे अमीर भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया है.और पिछले कई सालो से इस सिंहासन पर विराजमान आइ आइ टी दिल्ली से पढ़े और अमरीका में बढे वेंचर कैप्तालिस्ट विनोद खोसला को पीछे छोड़ दिया.


पढ़े लिखे अकलमंद और भी कई काम करते है जैसे पैसे को कमाने और बढ़ाने के साथ ही उसको ऐसे पकड़ कर रखते है जैसे वोह इस दुनिया में कमाई हुई जागीर के माली न होकर मालिक है और वह सदा ही उनके पास रहने वाली है . तभी तो मनोज भार्गव जैसे अनपढ़ लोगो ने पिछले  दस सालो में ५ हजार करोड़ की सम्पति समाज के काम के लिए दान की है . ऐसा ही  कुछ हाल और दूसरे  अमीरों   जैसे नरायण मूर्ति और अजीम प्रेम जी तथा बिल गेट जैसे स्कूल ड्रॉप आउट्स लोगो का भी है जिन्होंने अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज के काम के लिए दान कर दिया है.

 एक अनपढ़ संत कबीर दास ने  लिखा है -


पानी बाढ़े   नाव में ,जेब में बाढ़े दाम ,
दोउ हाथ उलीचिये ,यही सज्जन को काम l

और   इन अनपढ़ लोगो ने  कबीर  का कहना मान कर अपनी जीवन रूपी नाव को डूबने से बचा लिया वरना पढ़ा लिखा अकलमंद आदमी तो हर काम में लाजिक  खोजता है, और अनपढ़ जनता  है, दुनिया में चीजे लाजिक  से नहीं बुद्धि से चलती है जैसे मनोज भार्गव जी कहते है बड़े-बड़े कालिजो के पढ़े हुए लोग अव्याहरिक ज्ञान से युक्त होते  है जबकि सफलता के लिए  पढ़े होने के बजाये कढ़े होने की जरुरत है .

अजय सिंह  "एकल "


और अंत मैं  

किसने कहा, और मत भेधो हृदय वहिव्य के शर  से
भरो कुसुम का अंग कसुम  से ,कुमकुम से केसर से
कुमकुम किसे लगाऊ  ?सुनाऊं किसको कोमल गान ?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिंदुस्तान I 
                                     "राम धारी सिंह दिनकर" 




   

Wednesday, March 21, 2012

समझो बस अंत आ गया



प्रिय पाठको,

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री की घोषणा होने के साथ ऐसा लगता है अब उत्तर प्रदेश के दिन बदलने वाले है . समाज वादी पार्टी  को स्पष्ट बहुमत से भी ज्यादा सीटे मिलने के बाद सारी राजनैतिक  अटकले समाप्त हो गई है. अखिलेश एक तो जवान है ,पढ़े लिखे है, देश विदेश में पढ़े और बढे है आधी दुनिया  घूम चुके है और पूरी दुनिया का हाल जानते है , अतः कह सकते है की .प्र. में थोड़ी देर से ही सही पर बसंत गया है. सही कहा था अखिलेश ने की राहुल अभी तो पर्चे फाड़ रहे है और बाहें चढ़ा रहे है जब  नतीजे आयेंगे तो कही मंच से कूद जाये. प्रदेश की जनता जिसे कभी राहुल भैया  ने भिखारी कहने की हिमाकत की थी उसने दिखा दिया जनता सिर्फ बेचारी ही नहीं होती वक्त आने पर जनार्दन भी हो जाती है.

लेकिन जरा  पिछले चुनाव को याद करे जब मायावती को  बहुजन का मत मिला था पांच साल निर्विघन हो कर शासन चलाने के लिए ,सोशल इंजिनयारिंग  को नए आयाम देने के लिएतो भी बसंत आया था पर पांच साल के माया शासन से त्रस्त जनता ने बसंत को बस अंत में बदल दिया और  मायावती अब बगले झांक  रही है और राज्य सभा के जरिये अपने  को सुरक्षा कवर देने के जुगाड़ में लग गई हैI


इन सब के बीच रेल मंत्री के साथ ऐसी दुर्घटना हुई की उनका तो काम ही तमाम हो गया अभी लोग रेल बजट की तारीफ ही कर रहे थे की बेरहम ममता का बयान  आया और दिनेश त्रिवेदी के बजट में  किराया वृद्धी के प्रस्ताव  को   रोल बैक  करने  के साथ ही  उनका बोरिया और बिस्तर दोनों पैक करवा कर यह सिद्ध कर दिया की नागरिक शास्त्र का ज्ञान "प्रधान मंत्री अपनी पसंद से मंत्री मंडल तय करता है " गलत है अब ऐसा लगता है की देश का प्रधान मंत्री एक ऐसी कठपुतली है जिसकी  जो चाहे बांह मरोड़ सकता है. दिनेश त्रिवेदी को शहीद कर ममता ने बसंती रेल बजट पेश करने वाले मंत्री का बस अंत ही  कर दिया. 

चलो अच्छा हुआ सबको समझ आ गया गीता में भगवान कृष्ण द्वारा दिया गया  एक बेसिक सिद्धांत.   और वोह यह की जीवन शुरू होने के साथ ही मृत्यु यानि अंत भी शुरू हो जाता है अतः जीवन में बसंत आने  यानि सफलता मिलने के साथ ही सावधान, जरा सा चूके नहीं की बसंत बस अंत में बदल जाता है.इसलिए सफलता का आनंद उठाये लेकिन सर पर चढ़ कर न बोलने दे नहीं तो बसंत बस अंत में बदलते देर नहीं लगती है.

अजय सिंह "एकल"