Saturday, December 31, 2011

जो हुआ अच्छा हुआ ! अलविदा 2011

दोस्तों ,
जिन्दगी की कुछ और सांसे पूरी होगई. क्या खोया क्या पाया सोचते-सोचते  जिन्दगी का एक और साल निकलने को तैआर है .दुनिया का दस्तूर यही है जाने वाले को अलविदा आने वाले का स्वागत फिर चाहे वह  नया साल हो या हमारा आपका दुनिया में  आवागमन .जाने वाले के लिए कुछ रुकता नहीं आने वाले को कोई रोक पता नहीं.दरअसल यह  जिन्दगी की सच्चाई है ,यह मान ले तो सुखी नहीं माने तो  मर्जी आपकी जो चाहे   कर लो पर ये दुनिया तो ऐसे ही चलेगी . आइये जाने वाले साल में क्या कुछ घट गया एक नजर डाल  लेते है और फिर शुरू करते है  आने वाले का इन्तजार .


साल की शुरुवात  हुई राष्ट्र मंडल खेलो में हुए भ्रष्टाचार के शोर से. जाँच के लिए शुंगलू कमेटी  बनी रिपोर्ट आइ चेअरमैन कल्मांदी साहेब को जेल की हवा खानी पड़ी और फिर नंबर आया राजा साहेब और उनकी टीम का जो स्पेक्ट्रम घोटाले में कोर्ट द्वारा  दोषी पाए गए और  फिर अन्दर भेज  दिए गए , देश के लोगो को पहली बार पता चला की इस देश में  सत्ता में शामिल  और अकूत दौलत होने के बावजूद दोषी पाए जाने पर  जेल हो सकती . जनता को  एक अच्छा मैसेज गया, लोगो को कानून का भय भी हुआ और सम्मान भी .इसलिए ये जो हुआ  अच्छा हुआ.

इसके बाद अन्ना ने अप्रैल   महीने में भ्रस्टाचार के खिलाफ आन्दोलन शुरू करके लोगो में जनचेतना फ़ैलाने का काम बखूबी किया और बाबा रामदेव ने अथाह जन समूह  को एकत्र कर काले धन के खिलाफ अलख जगाई परन्तु सरकार में बैठे लोगो को लगा की एक बार जनता के वोट दे देने के बाद उसके पास कोई ताकत नहीं रहती और   सत्ताधारिओ को पांच साल लूटने  की छूट मिल जाती है इसलिए पहले बाबा रामदेव को और फिर अन्ना को डराने और पिटवाने की कोशिश की ,लेकिन रामलीला मैदान में जब हजारो की संख्या में जनता एकत्र  हो कर भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जूट दिखी तो नेताओ के होश फाक्ता हुए और इन्हें लगा की अति करने से मामला गड़बड़ हो सकता है.जनता केवल बेचारी नही है और जरुरत पड़ने पर जनार्दन बन जाती है इसलिए जरुरी है की संभल कर दुश्मनी करे .तो      सरकार के व्यहार से   बाबा को समझ आ गया  और अन्ना के आन्दोलन से   लगा की घमंड में चूर  सत्ता के नेताओ को भी कुछ -कुछ  समझ आ गया .चलो अच्छा हुआ दोनों को राह दिखी..

दस  साल पहले अमरीका की दादा गिरी से तंग आकर ओसामा ने अपने लोगो  से  ट्विन टावर पर  हमला करवा कर यह सिद्ध कर दिया की अभेद दुर्ग भी भेदे जा सकते है और  इन गुजरे  सालो में अमरीका अकूत सम्पति, हथियारों एवं अव्वल दर्जे  की तकनीकी  जान कारी होने के बावजूद जहर के घूँट पीता रहा और अंत में उसी के घर में घुस कर मार गिराया .इस साल ओसामा के अलावा हुसैन मुबारक को गद्दी छोडनी पड़ी और कर्नल गद्दाफी को उसी की सेना ने मार गिराया और ये एक बार फिर सिद्ध हो गया की दुनिया में आने पर स्वागत तो सबका होता है लेकिन जाने पर दुनिया रोती केवल उसी के लिए है जिसने अपनी जिन्दगी अपनी प्रजा के लिए जी हो जैसे किम जोंग इल जिसने दुनिया से दुश्मनी ले कर उत्तरी कोरिया की जनता के लिए काम किया और उसकी मृत्यु पर जनता ऐसे फूट फूट कर रोई मानो  उनका सगा सम्बन्धी दुनिया छोड़ गया हो .इस घटना ने दुनिया के शासको को अच्छे संकेत दिए .चलो अच्छा हुआ  किम की मौत लोगो को सबक सिखा गयी.

रूस की एक  अदालत में गीता पर प्रतिबन्ध लगाने का मुकदमा आया , बहुत से लोग जिन्होंने पहले नाम भी नहीं सुना था खरीद कर पढ़  डाला  . निर्णय देने वाले जज को भी प्रभु ने सद्बुधी दी और उसने प्रतिबन्ध लगाने से माना कर दिया .चलो अच्छा हुआ इस बहाने गीता के कुछ नए पाठक भी पैदा हुए और प्रसंशक भी

चलते चलते साल के अंत में अन्ना के आन्दोलन में भीड़ नहीं जुट सकी और जिसके डर से सरकार लोकपाल का बिल बना कर पास करवाने के लिए  सच्ची -झूंठी कोशिश करती दिखी वोह भी न बन सका .चलो अच्छा हुआ अन्ना को समझ आ गया की माजरा क्या है कौन किसके साथ मिला हुआ है और यह भी सारे राजनीतिज्ञ और राजनैतिक दल एक ही जैसे है  और सरकार को भी समझ आ गया की उसके  अपने साथी जो सत्ता का मजा तो ले रहे है पर जब सरकार की जरुरत आन पड़ी तो वोह दुसरे पाले में खड़े दिखाई दिए. चलो अच्छा हुआ कुछ के मनसूबे पुरे हुए बाक़िओं के पूरे करने को आ गया नया साल. यही तो है गीता का सन्देश "जो हुआ अच्छा हुआ,"

तो जिनके मनसूबे पूरे हो  गए उनको बधाई  और वोह अब नए मनसूबे बनाने के लिए तैआर हो जाएँ,   जिनके रह गए वोह जोर अजमाए  और उनके मनसूबे आने वाले साल में पूरे हो ,   नए वर्ष की  इस  शुभ  कामना के साथ ,

अजय सिंह "एकल"


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Sunday, December 18, 2011

पहचान कौन ?

प्रिय दोस्तों,

जी जनाब, सबसे मुश्किल काम है पहचानना .फिर चाहे वो अपने को पहचानना हो या  दूसरे  को .कभी -कभी तो ऐसा होता है की आदमी जिन्दगी भर जिनके साथ रहता है, अंत समय पता चलता है की एक दूसरे के साथ रहने के बावजूद पहचान नहीं हो पाई.और कभी आप को कोई एक मिनट के लिए मिलता है और आप उसको पहचान जाते है. जिन्दगी की पहेली ऐसी ही है.

कभी सोने की चिड़िया  कहा जाने वाला  भारत देश भिक्षुओ अर्थात भिखारिओ के लिए भी दुनिया में जाना जाता है .बौद्ध धर्म जो इस देश से प्रारंभ हुआ था ,  उसके प्रचारक विश्व में बौद्ध भिक्षु कहलाये .तथापि  इस शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर नकरात्मक  प्रतीक के तौर पर किया जाता है किन्तु  गुडं एवं दोष के आधार पर  इस शब्द की विवेचना करने पर पता चलेगा की यह उतना ख़राब नहीं है जितना आम तौर पर समझा जाता है.

पिछले कुछ दिनों में इस शब्द की विशेष चर्चा तब शुरू हुई जब राहुल गाँधी ने इलाहबाद   की एक सभा में उत्तर प्रदेश एवं बिहार के लोगो से कहा की वोह कब तक मुंबई जा कर भीख मांगते रहेंगे ? यानि राहुल जिनकी पहचान   कई लोगो ने  राज कुमार की तरह बना रखी है उनको उत्तर भारत के मेहनत कश लोग देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में भिखारी जैसे लगे. हालाँकि   बात जिस तरह से और सन्दर्भ में कही गयी थी उस से लोगो का गुस्सा होना स्वाभाविक ही था ,किन्तु मैंने जब इस बारे में सोचना शुरू किया तो निष्कर्ष बड़े विचित्र निकले और इनको मैं आप से साझा करने की कोशिश कर रहा हूँ.हालाँकि कई बार दिया गया तर्क -कुतर्क भी लग सकता है मेरे विचार से  इसको साधारण  व्यंग की तरह देखना भी उचित रहेगा.

हाल में मैंने यह  चुटकला कहीं पढ़ा था " पूजा स्थलों ( मंदिर ) के अन्दर बड़े आदमी  और बाहर गरीब लोग मांगते हुए मिलते है " अर्थात  मांगना आदमी की फितरत है और हर समय कुछ न कुछ मांगता  मिल जायेगा . दरअसल आम तौर पर यह समझा जाता है की जब आप किसी से कुछ मांगते है और उसके बदले में कुछ देते नहीं है तो उसे भीख कहा जा सकता है . किन्तु जब चौराहे पर खड़ा गरीब आदमी आप से कुछ मांगता है तो उसके बदले दुआ  देता है और दान लेता हुआ पुजारी आशीर्वाद देता है आप के दिए हुए दान  के बदले. तो फिर गली-गली और हर दरवाजे पर जा कर वोट मागने वाले नेता को क्या कहना उचित होगा?क्योंकि  वोट देने वाले को नेता भी कुछ देता तो है नहीं बदले में सिवा  आश्वासन   के और ये तो हर लेने वाला देता है चाहे वोह चौराहे का भिखारी हो या कोई शान से अट्टालिका में बैठा हुआ पुजारी, दर असल बदले में कुछ देना  क्रिया की प्रतिक्रिया है जो होगी ही चाहे वोह तुरंत  दिखाई पड़े या बाद में.  .

पंडित मदन मोहन मालवीय ने जब काशी हिन्दू विश्वविदयालय की शुरुवात की तो सारा धन  लोगो  से दान में ले कर ही इस पवित्र काम को अंजाम देने में सफल हुए.साथ ही मांगने की आदत से जो स्वाभाविक गुंड मनुष्य में  आ जाता है उसके बारे में उनका यह कहना था की इससे आदमी का अहंकार (मैं ) ख़तम हो जाता है ,इसलिए यदि उद्देश्य अच्छा हो तो  मांगने में भी  कोई बुराई नहीं  .

थोड़ा और सोचे तो पता चलेगा की वास्तव में मांगता कौन है जिसके पास वोह चीज कम हो या न हो ,इस बिंदु पर विचार करने पर पता चलेगा की अमीर वह  नहीं है जो   ज्यादा कमाता है बल्कि वोह है जिसे और नहीं चाहिए. इस कसौटी पर देखने पर आम तौर पर हम  सभी लोग धन, शोहरत या ऐसी ही दूसरी चीजो की ओर  भागते नजर आएंगे , कुल मिला कर सुबह से शाम तक और -और कर एक ऐसे बर्तन को भरने में लगे है जिसमे पेंदी (bottom) नहीं है तो फिर ये बर्तन तो भरेगा नहीं और हमारी जिन्दगी ऐसे ही निकल जाने वाली है. इसलिए सावधान राहुल बाबा भिखारी वोह नही है जिन्हें आप समझ रहे है कभी आत्म निरिक्षण करे तो पता लगेगा की आप कौन है.  यह सही है की आदमी अपने को ही पहचान ने में सबसे ज्यादा कठिनाई महसूस करता है.

अजय सिंह "एकल"  

और अंत में एक  जन  कवि को श्रधांजलि   :

देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बन्दर आ गए l
तथा
काजू भुने प्लेट में ,विह्स्की गिलास में,
उतरा है राम राज, विधायक निवास में.
  

Saturday, November 26, 2011

जादू की छड़ी

 जी जनाब ,
जिस जादू की छड़ी का इन्तजार मनमोहनी सरकार को पिछले दो सालो से था आखिर वह मिल ही गयी . नतीजतन यू पी ये टीम के सारे लोग एक सुर में रिटेल सेक्टर में ऍफ़ डी आइ के  स्वीकृत होने का स्वागत कर रहे है और तरह तरह के तर्क दे कर जनता को यह समझाना चाह रहे है की बस जनता महंगाई की  समस्या  जो सुरसा की तरह मुहं फैलाये जा रही थी और लोगो को परेशान कर रही  का समाधान हो गया . आखिर जिस जादू की छड़ी का जिक्र शरद पवार , प्रणव दादा तथा मनमोहन सिंह अपने बयानों और भाषणों   में पिछले बहुत दिनों से कर रहें है हाथ लग ही गयी है इसलिए बस अब महंगाई छू मंतर होने वाली है. इन सब लोगो को पता है की अब कम से कम इतना तो पक्का हो गया है जनता की समस्या कम हो न हो कांग्रेसियो की समस्या का तो हल निकल ही गया है.यदि विपक्षी  इसका विरोध करे तो कहो की हम ने तो उपाय  कर दिया लेकिन विरोधी कम नहीं होने दे रहे है और यदि न करे और तो फिर जवाब है न, की भाई समय लगता है  विदेशी स्टोर का लाभ  मिलने  में और उस से रोजगार मिलने में तो इंतजार करो  .तब तक अगले इलेक्शन आ जायेंगे तो हो गया न उद्देश्य पूरा. पिछला चुनाव परमाणु विद्युत के मुद्दे से जीता और अब अगले की तैयारी हो गयी है.

बस एक गड़बड़ हो गई इस बीच. कांग्रेस का हाथ  जो दो- ढाई साल से जनता की गर्दन कसता चला जा रहा था ने, बोउन्स बैक किया और यू पी ये सरकार के एक कद्दावर नेता जिनके बयानों ने भी खाने पीने की चीजो  के भाव बढ़ाये और आग में घी का काम किया ,की ओर घूम गया .अगले दिन संसद में सारे सदस्यों ने एक सुर में बयान दिए लोकतंत्र में हिंसा की जगह नहीं है. विरोध करना है  तो नारे लगाओ ,अनशन  करो ,अख़बार में निकालो   फिर ये हमारी मर्जी है की हम सुने या न सुने .अरे भाई हम न सुने तो अगले इलेक्शन  में दूसरे   को चुन लेना .लेकिन आप ने एक बार चुन के भेज दिया है तो पांच साल तो लूटने दो ,आप हमें ऐसे नहीं रोक सकते .और इतना ही नहीं यदि आप अनसन करोगे तो हम पुलिस भेज के आप को और आप के साथियो को पीटेंगे .आखिर आपने हम को चुन के भेजा है तो इतना अधिकार तो मिलना ही चाहिए.
.
लेकिन समस्या केवल इतनी ही नहीं है .तीन साल पहले विदर्भ के एक किसान की विधवा कलावती के घर राहुल ने  खाना  खा के ज़ब संसद में  बयान दिया तो उनकी शान में न जाने कितने कशीदे कांग्रेसी नेताओ ने गढ़ डाले ,लेकिन इतने दिन बाद भी कलावती उसी हाल में जी रही है और कपास किसानो के आन्दोलन की अगुवाई  इस उम्मीद में कर रही है की  शायद कोई चमत्कार हो जाये और विदर्भ के मरते किसानो को कोई राहत मिल जाये .जहाँ पिछले साल भी कम से कम ८०० किसानो ने गरीबी से हार कर आत्महत्या की है.पता नहीं राहुल को इस बात से गुस्सा आया की नहीं जो उत्तर प्रदेश में लोगो से जाकर यह पूँछ रहे है की उन लोगो को माया वती के राज में जो कुछ हो रहा है उस पर गुस्सा क्यों नहीं आता है.

आज तीसरी बरसी है मुंबई में ताज होटल  पर हुए हमले की .फिर रसम अदाएगी हो गयी मुख्य मंत्री ने शहीदों  को याद किया ,सेना ने सलामी दी और विदेश मंत्री ने फिर वैसी ही  चेतावनी  पाकिस्तान को दे कर अपने कर्तव्य की इतश्री कर ली, न पहले कोई   एक्सन   कुछ हुआ न भविष्य में कुछ होने की उम्मीद है . बस एक बात  देश की जनता को पता चल गयी की भारत  सरकार ने कसाब को जिन्दा रखने में गरीब जनता के हिस्से का  कम से कम ५० करोड़ रुपियो  का खर्च कर दिया है.इतने पैसे में हिंदुस्तान के ५०० गांवो का क्या कल्प हो सकता था . लेकिन गाँधी के देश में  कोई अपराधी से कैसे घृणा कर सकता है ,घृणा तो अपराध से करनी है  न इसलिए सरकार में बैठे  गाँधी  के उत्तराधिकारी  और कुछ करे या न करे कसाब को हर हाल में जिन्दा रखने पर अमादा है इसके लिए चाहे १ अरब खर्च हो  या १०० अरब .आखिर भारत इतना गरीब तो नहीं है की पड़ोस के  एक आदमी को ज़िदा न रख सके.

अजय सिंह "एकल" 

  

Sunday, November 13, 2011

गुस्सा आता है ?

प्रिय दोस्तों ,
पहली बार इस देश के किसी नेता ने जनता से पूछा है की आपको व्यवस्था पर गुस्सा क्यों नहीं आता है .बहुत अच्छा लगा . सदा मुस्कराते रहने वाले राहुल गाँधी  जब गुस्सा करते है तो सारी मिडिया का ध्यान आकर्षित करते है और उनके पार्टी जन उनकी इस अदा पर फ़िदा हो जाते है .राहुल का दलित के घर जाना और वहां खाना ,कभी मेट्रो ट्रेन में जाना ,कभी मुंबई की लोकल में सफ़र करना राहुल की अदाओ में शुमार है और क्योंकि मीडिया में इस बहाने से चर्चा हो जाती है इसलिए समय -समय पर  ऐसा करना जरुरी है  . नेता गिरी करने के लिए मीडिया में बने रहना राहुल की जॉब प्रोफाइल का हिस्सा है .

मगर राहुल को यह पता नहीं है की गुस्सा करने के लिए दो आवश्यक बाध्यताए है जिनके बिना कोई गुस्सा कर ही नहीं सकता ,एक तो उसका पेट भरा होना चाहिए और दूसरा कोई गुस्सा देखने वाला होना चाहिए . तो जनाब राहुल के पास दोनों है और इस देश की ७० फीसदी जनता के पास दोनों नहीं है .इसी लिए मिर्जापुर में राहुल साहेब ने जब पूछा की आप लोगो को व्यवस्था पर गुस्सा क्यों नहीं आता  तो जनता को कोई जवाब नहीं सूझा.

लेकिन देश की ३० फीसदी जनता जो अपना  पेट किसी तरह भर लेती है और और जिसका गुस्सा भी कोई न कोई देखने वाला है को गुस्सा आता  है :

जब महंगाई बे हिसाब बढती और कमाई कम पड़ने लगती है .और अर्थशास्त्र के ज्ञाता   प्रधान मत्री जी कहते है की उनके पास जादू की छड़ी नहीं है.

जब हर दूसरे महीने पेट्रोल के दाम बढ़ जाते है और वित्त मंत्री जी कहते है की हम कुछ नहीं कर सकते है.

जब बेकसूर  जनता आतंक वादियो के द्वारा मारी जाती और देश के  गृह मंत्री का बयान आता है की ३२ महीने से कोई आतंकवादी घटना नहीं हुई  यह क्या कम है .और देश के युवराज राहुल कहते है आतंकी घटनाओ को १०० फीसदी रोक पाना असंभव है.

जब कोई मंत्री देश की जनता की गाढ़ी कमाई को लूट कर अपना और सम्बन्धीयो का घर भर लेता है और उसको जेल में भी घर जैसी सुविधाएँ प्राप्त होने की खबर आती है.

जब आपकी पार्टी के कानून मंत्री दागी कंपनियो के अधिकारियो को छोड़ देने की वकालत यह कह कर करते है की इससे देश में लोग व्यापार करने में झिझकेंगे .

जब संचार मंत्री ५० करोड़ के जुर्माने को ५ करोड़ कर देते है और विरोध करने पर जवाब आता है की फिर कोई मंत्री निर्णय नहीं ले सकेगा इसलिए आप  इसकी तारीफ करें या न करे लेकिन आलोचना तो बिलकुल न करे.

जब आपकी पार्टी हर उस आदमी को परेशान करने लगती है लो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठता है चाहे वोह बाबा राम देव हो या अन्ना हजारे .

जब देखता हूँ की मोंटेक सिंह अहलुवालिया जी का जी -२०  मीटिंग के बाद बयान आता है की यूरोप    को भारत बेल आउट पैकेज दे सकता है .

जब भारत के  प्रधान मंत्री भारत के खिलाफ अतंकवादियो की फ़ौज तैयार करने वाले देश पाकिस्तान के प्रधान मंत्री को  शांति का मसीहा बताते है.

कहाँ तक आपको  बताऊँ बड़ी लम्बी है फेहरिस्त .लेकिन अच्छा है  आप देखने को तैआर हो  तो जनता समय -समय पर आपको बताती रहेगी. इसकी एक बानगी आपको उत्तर प्रदेश के चुनाव के नतीजो में  पांच महीने बाद देखने को मिलेजाएगी    इसी आशा के साथ,

आपका 

अजय सिंह "एकल"




Wednesday, October 26, 2011

काजल की कोठरी

 प्रिय दोस्तों,

आपने ढपोर  संख की  कहानी तो सुनी ही  होगी. अरे वही जो हमेशा दूना देने की बात करता है . लेकिन वोह आपसे वोह बात कभी नहीं करेगा जो व्याहारिक हो और संभव हो.नतीजा बड़ी-बड़ी बाते और काम ,बस यही मत पूछो(कहानी पढने के लिए यहाँ क्लिक करे) .चलो अगर आपने अबतक न देखा और सुना हो तो हम आपको बताते है . आज के अनेक राजनीतिज्ञ भी ढपोर संखी है. आपने जन लोकपाल बिल माँगा तो उन्होंने संवैधानिक शक्तिओ से युक्त शक्तिशाली जन लोकपाल बनाने का वादा कर के जनता को ऐसा सपना दिखा कर बात टाली की अब बस करते रहो इंतिजार .क्योंकि इसकी संवेधानिक प्रक्रिया इतनी लम्बी होगी की यह एक सत्र तो छोडिये ४ में भी होने वाला नहीं तब तक चुनाव आ जायेंगे फिर आसान होगा जनता के सामने जाना और यह कहना  की हमने वादा तो कर दिया है लेकिन यह मिलीजुली सरकार में संभव नहीं तो हमें पूर्ण बहुमत दो फिर बनायेगे हम जन लोकपाल .बस फिर क्या अभी अगले तीन साल मौज मनाओ और अगले इलेक्शन  को जीतने की भी तैयारी हो गयी .क्या आप अब भी राहुल गाँधी को प्रधान मंत्री बनने के लायक नहीं मानते ?आप अब भी अमूल बेबी समझते है ? अमूल बड़ा हो कर  के अब मूल (मुख्य) हो गया है .


दुनिया में ४२ साल राजाओ की तरह रहने और २०० अरब डालर का बैंक बैलेंस बनाने वाले  कर्नल गद्दाफी की दुनिया से बिदाई  जिस तरह से हुई उस से पैसे को भगवान मानने और पैसे से सबकुछ हो सकता है यह समझने वालो की समझ में कुछ परिवर्तन आए और इस दिवाली हमारे देश के ए राजा और रानी की तरह रहने वाली कनिमोझी और इनके जैसे लोग जो एन कें प्रकारेण धन कमाने की चेष्टा में है उनको इस दीपावली में भगवान सद्दबुधी प्रदान करे  मेरी येही प्रार्थना है . हालाँकि यह इतना आसान भी नहीं है क्योकिं विनाश के समय भगवान बुद्धि भी विपरीत कर देता है .यदि ऐसा नहीं होता तो जनाब  सलमान खुर्शीद  साहेब जो इस देश का कानून मंत्री भी है , देश के साथ विश्वाश घात करने वाले कॉर्पोरेट जगत के जेल में बंद दिग्गजों के साथ सहानभूति   यह दलील दे कर न दिखाते की यदि इन लोगो को जेल में रखा गया तो देश में लोग व्यापार करने में डरेंगे और विदेशो से भी धन का प्रवाह रुकेगा.

लेकिन श्रीमान दिग्विजय सिंह जी की हस्ती तो वास्तव में अद्वितीय है और उनसे किसी भी सद्दाम या गद्दाफी को भी रस्क हो सकता है क्योंकि उनके ऊपर अन्तराष्ट्रीय दबाव थे और अपने देश में राजा होते हुए भी दुनिया में चौधराहट करने वाले अमरीका से डरते थे  .लेकिन दिग्विजय सिंह को तो कोई डर नहीं . तभी तो  कलमान्दी जो ८ महीने से जेल में बंद है की तरफदारी करते हुए उनकी जमानत की वकालत की है और किरण बेदी जिनके ऊपर हवाई  टिकटों  के किराये में ज्यादा पैसे वसूलने का आरोप लगा है और उन्होंने उसे वापस करने का भी वादा  किया है के बारे में बयान    दिया है की वापस करने से भी गुनाह कम नहीं होता ऐसे तो राजा भी वापस करके के  गुनाह बन सकते है .वाह भाई वाह करवा दीजिये एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ इस गरीब मुल्क के जहाँ अभी भी एक तिहाई जनता केवल एक बार का खाना जुटा पाती है.

आखिर अन्ना  साहेब और उनकी टीम भी राजनीत  और राजनीतिज्ञों के चक्कर में आ ही गए . और अब इन पर इतने दाग यह  राजनीतिज्ञ  खिलाडी लगा देंगे की थोड़े दिन बाद इनको भी लगने लगेगा की मेरे गुनाह भी उतने ही है जितने इनके तो फिर किस बात का झगड़ा . इसको कहते है राजनीत .अगर मेरी कमीज तेरी कमीज  से ज्यादा साफ़ नहीं तो क्या ,मैं तेरी कमीज अपनी कमीज से ज्यादा गन्दी तो कर ही सकता हूँ . तो अन्ना जी अब आप राजनीत के अखाड़े में आगये है और ये तो है कोठरी काजल की ,इसमें कितना भी सयाना  आदमी जाये मुश्किल ही है यदि  बिना दाग के निकल आए .इसलिए तैयार हो जाइये अपनी कमीज को साफ़ करने के बजाये दूसरो की गन्दा करना शुरू कीजये तभी मुक्ति मिलेगी.

 एक और दिवाली आ गयी लोग फिर खुशिया मनाएंगे ,बच्चे पटाके बजायेंगे लेकिन देश की ७० प्रतिशत जनता की आवाज कैसे मुल्क के रहनुमाओ तक पहुचाई जाये यह प्रश्न अभी भी मुहं फाड़े खड़ा है .


और अंत में मुल्क के रहनुमाओ से प्रार्थना :

  अधेरे में जो बैठे है , नज़र उन पर भी कुछ डालो

अरे  ओ  रोशनी  वालो  
बुरे  हम  है  नहीं  इतने , ज़रा  देखो  हमें  भालो                        
अरे  ओ  रोशनी  वालो  ... 

कफ़न  से  ओढ़  कर  बैठे  है , हम  सपनों  की  लाशो  को  
जो  किस्मत  ने  दिखाए , देखते  है  उन  तमाशो  को  
हमें  नफ़रत  से  मत  देखो , ज़रा  हम  पर  रहम  खालो   
अरे  ओ  रोशनी  वालो  ... 

हमारे  भी  थे  कुछ  साथी , हमारे  भी   थे  कुछ  सपने  
सभी  वो  राह  में  छूटे , वो  सब  रूठे  जो  थे  अपने  
जो  रोते  है  कई  दिन  से , ज़रा  उनको  भी  समझा  लो  
अरे  ओ  रोशनी  वालो  ... 

दीपावली की शुभकामनाओ सहित,
अजय सिंह "एकल" 


   

Saturday, October 8, 2011

और रावन फिर मर गया

मित्रो,
एक और दशहरा मन गया देश में , एक और रावण मारा गया . सैकड़ो वर्षो से यह खेल चल रहा है फिर भी रावन मर नहीं रहा है . पौराणिक कथाये बताती है की रावण तभी मरेगा जब तीर रावण की नाभि में लगेगा लेकिन यह

अकेले राम  के बस की बात नहीं है , इसके लिए एक अदद विभीषण चाहिए जो राम को बता सके की अमृत कहाँ छुपा है . लेकिन अब समस्या यह है की विभिषनो को रावण ने पटा लिया है . रावण ने जो गलती सतयुग में विभीषण को अपने दरबार से निकाल कर की थी उसका नतीजा उसने भोग कर यह सीख लिया की अब विभिषनो को जैसे भी हो सके अपने साथ ही रखना है अन्यथा यह यदि दूसरी तरफ चले गए तो फिर भेद खुल जायेगा .पर राम और उनकी सेना अभी भी सतयुग में अजमाए हुए तरीके को कलयुग में यह सोच कर अपना रही है की शायद रावण विभीषण को फिर धक्के मार कर अपने दरबार से निकलेगा और वोह आकर रावण का भेद बता देगा .यही फर्क  है राम और रावण में. एक गलती कर के सीख गया और दूसरा कलयुग में भी   सतयुग के चमत्कार का इंतजार कर रहा है. श्री राम को पता ही नहीं की  समय के साथ खेल के नियम भी बदल गए है.


वैसे भी सुना है रावण ब्राह्मण था , विद्वान  था और शिव का परम भक्त भी.इसलिए हिमाचल से लगा कर सुदूर तमिल तक बहुत सी राम लीलाए है जहाँ रावण मारा नहीं जाता उलटे उसकी पूजा होती है . इसके बहुत से कारण होंगे शायद कुछ रावण वंशी होने की वजह से, तो कुछ ब्राह्मण होने की वजह से या फिर शायद विद्वान होने वजह से रावण की पूजा करते होंगे .रावण वंशी और ब्राहमण होने के कारण रावण पूजा जाये तो इसमें  कोई आपत्ती नहीं लेकिन विद्वान होने की वजह से पूजा जाये तो  यह बात कुछ अजीब लगती है .

क्योकिं विद्वान तो इस देश का प्रधान मंत्री भी है और मोंटेक सिंह अहलुवालिया भी जो योजना आयोग   के उपाध्यक्ष है.  इनको  पूजने वाले कुछ विभीषण
तो हो  सकते है जिनको साथ रखना मनमोहन की मज़बूरी हो  और कुछ
विभीषण जो इनके राज जानते  है वोह इनकी तारीफ करते भी नजर आ सकते है पर देश की अधिसंख्य जनता  जिसको रोज कमा कर खाना पड़ता है और जो  जीने के लिए तिल तिल कर मर रही है इन विद्वानों की  पूजा नहीं कर सकती है . इसलिए  मनमोहन की टीम जिसमे ७०% लोग करोड़ पति है और  जिनके  लिए हवाई जहाज में इकोनोमी क्लास की यात्रा जानवर क्लास की यात्रा जैसा हो उनसे आप यदि इससे बेहतर व्यहार या नीति  निर्धारण की अपेक्षा कर रहे है तो   यह निश्चित ही गलती जनता की है जो विद्वान   रावण और स्वामिभक्त विभिषनो को अभी भी पहचान नहीं पा रही है.  

एक और फर्क  हो गया है सतयुग और कलयुग में . सतयुग में श्री हनुमान ने श्री राम की  सेवा की ,तो प्रसन्न  हो  प्रभु श्री राम ने आशीर्वाद दे दिया की मुझसे पहले तुम्हारी पूजा होगी  और तुम्हारे भजन  गाने वालो को भी मुझसे वैसा ही आशीर्वाद मिलेगा जैसा मेरी भक्ति करने वालो को .लेकिन कलयुग में जब अमर सिंह ने हनुमान बन मुलायम सिंह की तरफ से कांग्रेस पार्टी को अणु विद्युत् मसले पर दूसरी पार्टी के सांसदों को पैसे दे और मन मनौती कर तोड़ा और सरकार   बचवा दिया ,  तो राम ने   हनुमान को आशीर्वाद देने के बजाय उनको पहले तो पार्टी से निकाला और फिर जिनलोगो को  उनकी हनुमानगिरी से लाभ मिला उन्होंने अमर सिंह को    जेल भिजवाने का  इंतजाम  करवा दिया . यह है कलयुग का प्रभाव .इसका एक मतलब यह भी है की जो दावँ सतयुग में बड़े सफल रहे है वोह अब चलने वाले नहीं है . 

दरअसल सालो से हम यह भ्रम पाले हुए है रावण के मरने से रावणवत्व भी ख़तम हो जायेगा पर वास्तविकता यह है की  मर केवल रावण रहा और रावणवत्व जिसकी वजह से रावण ब्राहमण,विद्व्वान और भक्त होने के बावजूद मारे जाने योग्य माना गया  था वोह अभी भी जीवित है और विभीसनो ने भी यह समझ लिया है की राम का साथ देने से सोने की लंका तो भस्म हो जाएगी और जब सोना (धन- दौलत,चमक- धमक, मोहकता )   ही नहीं बचा तो फिर उस लंका का राजा अगर राम ने बना भी दिया तो क्या फायदा क्योंकि असली मजा लंका का राजा बन ने में नहीं बल्कि  सोने की लंका का राजा बन ने में है.इसलिए बेहतर है रावण का साथ दो और राजा भी उसे ही रहने दो अपन तो उसके मंत्री बन कर ही खुश  है. 
 और अंत में 

दरिया के किनारे गर,
 सिआसी लोग बस जाये ,
तो प्यासे लोग एक- एक,
 बूँद पानी को तरस जाये      
गनीमत है की मौसम पर,
इनकी  हुकूमत नहीं चलती
नहीं तो सारे बदल इनके,
 खेतो में बरस जाये.

अजय सिंह "एकल" 

Sunday, October 2, 2011

सूत न कपास जुलाहों का लट्ठम -लट्ठा

प्रिय दोस्तों ,

अगर आपने अबतक बिना सूत कपास के जुलाहों का लट्ठम -लट्ठा न देखा हो तो भाजपा के नेताओ में प्रधान मंत्री पद के लिए मचे घमासान को देख लीजिये ,हर कोई जल्दी  से जल्दी कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर खेले जा रहे खेल कौन बनेगा प्रधानमंत्री की हॉट सीट पर पहुँचने  के लिए जुगत में लगा हुआ है. कोई इन नेताओ से पूछे की जरा यह बताने का भी कष्ट करे की भूख ,आतंकवाद ,महंगाई से पीड़ित जनता को निजात दिलवाने में आप का  क्या योगदान  है . जनता को भय ,भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए आपके पास क्या योजनाए है इस पर कोई चर्चा ,कोई व्याहारिक नीत जिससे जनता को कोई राहत मिल सके   इस पर कोई श्वेत पत्र ,पर यह सब सोचने की फुर्सत कहाँ है ? यह तो केवल यह सोच -सोच कर खुश है जनता कांग्रेस से परेशान   है इसलिए इनको बहुमत मिल जायेगा.अब आखिर कर दूरदर्शन में बहस करने जिन नेताओ को बार -बार बुलाया जा रहा है उन्हें लगता की जनता बार-बार इनको देख रही है तो चुनते वक्त भूल थोड़ी जाएगी  . आडवानी जी को लगता है की अबकी नहीं तो कभी नहीं हालाँकि आला कमान ने संकेत दे दिए है, बयान आडवानी जी का भी आगया है लेकिन फिर भी लग रहा है की शायद रथ यात्रा से कुछ  बात बन जाये ,मोदी जी उपवास से शुरुवात  करके यात्रा भी कर लेना चाहते है कहीं ऐसा न हो रथ यात्रा के महारथी बाजी न मार ले जाये ,तो गडकरी जी सोचते है जब खुदा की मेहरबानी एक बार हो चुकी है तो दुबारा भी चमत्कार हो सकता है .डा. जोशी से लगा कर अरुण जेटली और सुषमा स्वराज मन ही मन गुलगुले पका रहे है और एक दुसरे को झटका देने को बेताब नजर आ रहे है.

सबसे बढ़िया खेल तो किया चिदम्बरम और प्रणव दादा ने. २ जी की आंच जब चिदम्बरम तक पहुंची तो मंत्री मंडल के वरिष्ठ  सहयोगी प्रणव दादा ने पहले तो तोप का मुंह चिदम्बरम की तरफ  घुमा  दिया ,लेकिन रिंग मालकिन सोनिया  ने जब दोनों को हंटर दिखाया तो दादा ने फटाफट बयान दे के चिदम्बरम की जान और अपनी लाज बचाई  .इस सारे खेल में जनता और विपक्ष देखते ही नहीं बल्कि  हाथ मलते रह गए मानो सारा झगड़ा २ जी घोटाले का न हो कर प्रणव और चिदम्बरम का रह गया हो, इसलिए इनका समझोता होते ही घोटाला भी ख़तम हो गया और जाँच की जरुरत भी. जनता हतप्रभ है बंदरो की लड़ाई में बिल्ली का रोल देख कर . चिदम्बरम तो इतने खुश है की उन्होंने सार्वजनिक बयान दे दिया है की अब उन्हें यह भी याद नहीं है की उन्होंने पद से इस्तीफा देने की पेशकश भी की थी,  है न कमाल आदमी ख़ुशी में सब कुछ भूल जाता है  और जनता  दुःख भरे दिन जो बेकाबू महगांई ,  आए दिन होने वाली       आतंकवादी घटनाओ और  रोज मर्रा की परेशानियों से निजात पाने के लिए एक-एक कर काट रही है और यह  सोच रही है की आधी तो कट गयी और  अब तो आधी ही बची है वोह भी जल्दी ही कट जाएगी .

भारत देश आज अपने दो महान सपूतो को याद कर रहा है .महात्मा गाँधी जो पैदा तो भारत में हुए लेकिन अपने काम से  विश्व धरोहर बन गए . गाँधी द्वारा पढाया गया  अहिंसा  का पाठ पूरे  विश्व में एक मिसाल बन गया है और इसकी ताकत समझ कर दुनिया में अनेक देशो ने अहिंसात्मक  तरीको  को अपना कर  सत्ता परिवर्तन किया है.और  भारत  में तो गाँधी नाम की ब्रांड इक्विटी इतनी है की यह नाम पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता पाने  की  गारंटी हो  गया है. खैर गाँधी  ने इस देश को जो दिया है वोह इस देश के लोग कभी भुला नहीं सकेंगे .

भारत के द्वितीय   प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दे कर देश की  खादान्य जरूरतों में भी  आत्मनिर्भर बनाया और सैन्य जरूरतों में भी .नतीजतन भारत १९६५ के युद्ध के बाद कोई युद्ध नहीं हारा. एक बात जो शास्त्री जी के प्रधान मंत्री बनने से सिद्ध हुई वोह यह की साधारण परिवार में पैदा हुआ और साधारण कद काठी का भी कोई आदमी यदि दृढ निश्चय के साथ कुछ करना चाहता है तो उसकी सहायता भगवान भी करते है और देश की जनता भी.

 हम सब भारत वासी शास्त्री जी के मार्ग दर्शन के लिए आभारी है और चाहते है की फिर शास्त्री जी जैसा साधारण लेकिन देश हित की बात सोचने वाला ,देश के लिए परिवार त्यागने वाला और देश हितो पर मर मिटने के तैआर व्यक्ति फिर देश का नेतृत्व करे .

और अंत में 
समय समय की बात है,समय समय का योग 
लाखो में बिकने लगे ,दो कौड़ी  के लोग 
अजय सिंह "एकल"

Sunday, September 25, 2011

हंगामा है क्यों बरपा

प्रिय मित्रो,

पिछले   कई   सप्ताहों से  देश और दुनिया में हंगामा मचा हुआ है .पहले एक भारतीय  ने जो  स्टैण्डर्ड और पुअर नामक अमरीकी संस्था के प्रमुख हुआ करते थे ,ने अमरीका में रहते और  अमरीकी कम्पनी में काम करते हुए उसकी रेटिंग कम कर के  कालीदास       की तरह उस डाली को ही निशाना बना दिया जिस पर वोह खुद  भी बैठे हुए थे और महाकवी कालीदास  की तरह ही अपना नाम इतिहास में दर्ज करा दिया .फिर बाबा रामदेव ने काले लोगो के धन (धन काला या सफ़ेद नहीं होता) को निशाना बनाया तो कई हफ्ते इस चर्चा में निकल गए . पिछले महीने अन्ना हजारे जी के आन्दोलन और अनशन  ने  भारत में  ही नहीं  दुनिया भर  में  हंगामा मचाया और लोगो को फिर गुजरात  में पैदा हुए  गाँधी की  याद दिला दी .

इस क्रम में सबसे ताजा हंगामा मचाया है गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेन्द्र मोदी के उपवास ने .कुछ कहते की यह उपवास प्रधानमंत्री बन ने के लिए मोदी का नाटक है और कुछ की निगाह में यह २०१२ के चुनाव में दुबारा सत्ता हासिल करने का हथकंडा .देश  के नेताओ  द्वारा तरह -तरह से देश का तमाम  धन खाने से भी  शायद इतना हंगामा नहीं मचा होगा जितना मोदी के उपवास से. कोई कहता है की इससे कलंक नहीं धुलेगा और कोई कहता है की नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को जा रही है. कोई इन बुद्धजीविओं     से पूछे की भाई बिल्ली चूहे खा कर भी अगर हज को चली जाये तो क्या बुराई है , इनके हिसाब से  तो बिल्ली को जिन्दगी भर चूहे ही खाते रहना चाहिए और गलती समझ आ जाये तो भी करते रहना चाहिए  क्योंकि इन नेताओ में इतना साहस नहीं है की जो दिखता महसूस होता है उसको भी स्वीकार कर सके  . नहीं तो पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की महबूबा मोदी  गुजरात में हुए विकास की  तारीफ  कर फिर मुकर न जाती और अब्दुल्ला को ट्विट करके उन्हें याद न दिलाना पड़ता.वैसे  इस तरह की बाते करने वालो में वही लोग आगे है जिनका पेट साठ साल देश को लूट के अपना और अपने रिश्तेदारों के  घर भरने  के बाद  भी नहीं भरा है और वह खाली  का  खाली है बिलकुल लैटर बॉक्स की तरह जो  सुबह से शाम तक भरने के बाद भी  अगले दिन फिर खाली का खाली ही रहता है. 

ये तो अच्छा हुआ ये कांग्रेसी नेता भगवान राम के ज़माने में नहीं हुए,  नहीं तो महर्षि   बाल्मीकि जो अपने आरम्भिक दिनों में लूटपाट किया करते थे और ज्ञान मिलने के बाद  राम-राम जप करके अपने समय के सबसे बड़े ऋषि भी कहलाये और राम कथा लिखने के साथ ही राम के दोनों पुत्रो और सीता माता  का भरण पोषण भी  किया और लव कुश को युद्ध में इतना कुशल बनाया की वोह दोनों बच्चे भगवान राम के अश्वमेधयुद्ध के घोड़े को पकड़ कर राम जो पुरषोत्तम भी थे और भगवान भी की  सत्ता को  चेलेंज कर सके और सीता माता के साथ हुए अन्याय   का एहसास भी  करवा दिया . ऐसे अनेक उदहारण इतिहास में मिल जायंगे जहाँ नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को भी गयी  और लोगो के लिए आदर्श भी रखा आखिर ये उनसे तो अच्छे ही  है जो नौसो क्या नौ हजार खाने के बाद भी हज नहीं जाना  चाहते है.


इस क्रम में एक और बात जिसने हंगामा मचाया है वोह है लाल कृष्ण अडवाणी की यात्रा .वैसे तो कृष्ण का एक नाम ही पार्थ सारथी है. पार्थ यानि अर्जुन के सारथी अर्थात  रथ को चलाने वाले .इस नाते से तो लाल कृष्ण अडवाणी जी का रथ यात्रा एक विशेषा अधिकार है (यथा नाम तथा गुण ) , और जब उन्होंने पार्थ सारथी की तरह अर्जुन रूपी  धर्म का रथ चलाया तो मोक्ष यानि सत्ता भी प्राप्त की और खूब आन्नद भी उठाया लेकिन यह बात तब की है जब एक तरफ कौरव थे और दूसरी तरफ पांडव .परन्तु  अब समस्या यह है की इस देश के पांडव (अर्थात धर्म मार्ग पर चलने वाले )  तो अज्ञात वास में  है इसलिए लड़ाई अब कौरव और पांडवो के बीच न होकर केवल  कौरवो के बीच है यानि दोनों ही तरफ कौरव है तो अब भगवान ही बता सकते है अबकी लाल कृष्ण किसका रथ हाकेंगे दुर्योधन का या फिर दुशाशन का. और अबकी बार युद्ध में विजय के बावजूद मोक्ष यानि प्रधान मंत्री की कुर्सी नहीं मिलेगी यह भी पहले ही  तय हो गया है तो रथ यात्रा और रथ यात्री का क्या होगा भगवान जाने.


 यानि और कुछ हो न हो हंगामा तो बरपे गा ही और कुछ दिन  और निकल जायेंगे भूखे पेट लोगो के इस हंगामे के बीच, जिनकी आमदनी 32 रुपये रोज से ज्यादा है और पेट भर के खाना भी नहीं खा  पाते है  और सरकारी सुविधाएँ  भी नहीं क्योंकि सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत में हलफनामा दाखिल कर दिया है की इतने रुपये कमाने वाले को इसमें जितना मिलता है उतना ही खाना चाहिए तो  सरकार की जिम्मेदारी खतम हो गयी  ,गरीबी  रेखा से नीचे लोगो की  जीवन की मूल आवश्यकताओं  की पूर्ति में सर खपाने की जिसका अधिकार उन्हें भारत के संविधान से मिला है . इसलिए अब सरकार के मुखिया और अधिकारी आराम से अपनी गरीबी दूर करने में अपना दिमाग और  श्रम लगा सकते है .
  और अंत में 
तब्दीलिया बस इतनी हुई,इन्क़लाब से 
कुछ नाम हट गए पुरानी किताब से .

अजय सिंह "एकल"









Sunday, September 18, 2011

जाके पैर न फटी बिवाई

प्रिय दोस्तों ,

ठीक समझा आपने ,इस देश ७० प्रतिशत लोग गरीब है और देश की संसद में ७० प्रतिशत करोड़पति है यानि संसद में ७० प्रतिशत जनता को ३० प्रतिशत संसद रिप्रेजेंट करते है और ३० प्रतिशत जनता को ७० प्रतिशत .और संसद में तो खेल नम्बरों का है यानि जिसके पाले में ज्यादा लोग वह ही जीतेगा और निर्णय उसके पक्ष में ही होंगे .मतलब  यह  की  जिनके हाथो में जिम्मेदारी है गरीबों  के  लिए पालसी बनाने की और उसको  लागू करवाने  की उन्हें न तो यह पता है की गरीबी क्या होती है और न यह की  वह  अपना जीवन चलाने के लिए कितना संघर्ष करता है  . तभी तो प्लानिंग कमीशन  के उप प्रधान श्री मोंटेक सिंह जो वर्ल्ड बैंक के पेंसनर भी है ,फरमाते है की २० रुपये रोज कमाने वाला आदमी गरीबी रेखा के ऊपर है यानि सरकार की कसौटियो  पर गरीब नहीं माना जाना चाहिए. ठीक ही तो है जिन लोगो की कमाई डालर में होती है और जीवन की सारी जरूरते   सरकारी सुविधाओ से मुफ्त में प्राप्त हो,एयर कंडीशन  दफ्तर से निकल कर एयर कंडीशन घर शानदार   एवं  आरामदेय लाल बत्ती लगी काली शीशे वाली विदेशी कार से  घर जाते है उन्हें  सड़क पर पैदल चलती और न पब्लिक वाहनों  में  धक्के खाती जनता  नजर आती है और न सब्जी या पेट्रोल के दाम बढ़ने का असर .ठीक ही तो कहा है की "जाके पैर न फटी बेवाई सो क्या जाने पीर पराई"

 कितनी विचित्र बात है  और  सबको पता है की  अमीर आदमी अपनी ताकत या तो धन बढाने में लगता है या फिर उसको बचाने   में. हाँ यदि इस उद्देश्य की पूर्ति में कुछ धन और समय खर्च हो जाये तो उतना वह इन्वेस्टमेंट  कर देता है लेकिन यह सूद समेत कैसे वापस आएगा इसकी व्यवस्था भी साथ -साथ करता जाता है. तो जब इनके हाथ खजाना लग गया तो फिर दूसरे लोगो को  लाभ क्यों लेने देंगे ,इसीलिए अन्ना हजारे को  अपने भ्रष्टाचार के खिलाफ  आन्दोलन  में मंच से यह घोषणा करनी पड़ी की जो आज मंत्री और सांसद बन बैठे है लुटेरे भी इन्ही में से है.अब यह बात जिनके लिए कही गयी  उन्हें बुरा तो लगना ही था .क्योकिं अब तक सार्वजनिक मंच पर यह चर्चा नहीं हुई थी इसलिए कहने वालो को नोटिस भी दी जा रही है और उत्पीड़न भी किया जा रहा है नहीं तो जनता इसको नेताओ की मौन स्वीकृत मान लेगी.

अब यह तो मानना तर्क संगत ही होगा की यदि माननीय सांसद करोड़ो रुपये  खर्च कर के संसद में पहुचेंगे तो उसको सूद सहित वापस प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.इसलिए चुनाव सुधार को अन्ना ने जन लोकपाल के बाद प्राथमिकता दी है.इस सम्बन्ध में कुछ सुझावों नीचे दे रहा ,इनमे  जो उचित लगे उनपर विस्तृत चर्चा की जा सकती है:



  1. ५०-७० प्रतिशत सीटे उनलोगों के आरक्षित हो जिनकी सालाना आमदनी २-३ लाख से ज्यादा न हो,ताकि यह अपने और अपनों को लाभ देने वाली योजनाये बनाये और उसका प्रभाव भी जल्द से जल्द पता लग सके.
  2. जो लोग एक से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हो उन्हें अतरिक्त  सीट पर होने वाले  खर्च को चुनाव आयोग के पास जमा करवा देने का विधान बने. पिछले चुनाव में लोकसभा की ५४२ सीटों पर करीब १० हजार करोड़ खर्च हुए थे इस हिसाब से प्रति सीट खर्च २० करोड़ के औसत से जमा करने से दुबारा होने वाले चुनाव का खर्चा सरकार को  नहीं उठाना पड़ेगा. और किसी की  व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का बोझ देश के कर देने वाले लोगो की जेब पर नहीं पड़ेगा .
  3. राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे को कर मुक्त करने के बजाये इसे  पार्टी की कर योग्य  आए माना जाये और उस पर टैक्स लगना चाहिए . आखिर अब राजनीत करने वाले लोग पेशेवर है और पार्टिया कंपनी की तरह तनख्वा भी देती है और अतिरिक्त सुविधाए भी, इसलिए इन्हें कर मुक्त करना न तो तर्क संगत है न न्याय संगत.
  4. जो कॉर्पोरेट घराने पार्टियों को चंदा देते है वह  वास्तव में कंपनी के खातो से होता है,जिसकी मालिक शेयर होल्डर जनता है न की कुछ शेयर ज्यादा होने की वजह से बने हुए मालिक ,इसलिए इन्हें अपनी मर्जी से उन उद्देश्यों के लिए पैसे खर्च करने का अधिकार नहीं है जो कंपनी के मूल उद्देश्यों  से मेल नहीं खाते है.इतना ही नहीं इनकी पहली जिम्मेदारी  नियमानुसार कानून के मुताबिक टैक्स भरने की है न की राजनैतिक पार्टियो को चंदा देकर उस से  किसी तरह बचने की.  इसलिए जिन कंपनियो ने सरकार के करोड़ो रुपये  आय कर, एक्साइज ड्यूटी ,कस्टम ड्यूटी इत्यादि न चुकाए हो उन्हें चन्दा देने के पहले टैक्स चुकाना चाहिए तथा  चंदा देने वाली कंपनियों को अनापत्ति प्रमाण पत्र चंदे के साथ देना चाहिए अन्यथा इनके द्वारा दिया जाने वाला पैसा टैक्स बचाने की नियत का हिस्सा बन जाता है और इस खर्चे को आय कर विभाग ख़ारिज कर ,कर योग्य आय मन सकता है,इस खर्चे  की स्वीकृत शेयर धारको  से भी ली जानी चाहिए.
  5. राजनैतिक पार्टियों का आय -व्यय खाता भी आम जनता के लिए इनकी वेब साईट पर  हो और इससे सम्बंधित प्रश्न सूचना  के अधिकार नियम के तहत दिए जाये.
  6. सार्वजनिक जीवन में काम करने  वाले सभी  व्यक्तियों की  सालाना आए व्यय जानकारी भी सार्वजनिक हो और इस से सम्बंधित जानकारी भी सूचना के अधिकार के तहत दी जानी चाहिए. सूचना गलत दिए जाने पर कड़े दंड का प्राविधान हो. उदहारण के लिए जिन मंत्रियो की संपत्ति में २०० से १००० प्रतिशत की वृधि दो सालो में हुई है वह यह बताये की इस आए का श्रोत क्या है और क्या इस पर नियम अनुसार टैक्स दिया गया है.इसमें कुछ भी अवैधानिक नहीं है आम आदमी को ऐसा करना पड़ता है तो सांसदों और मंत्रियो को इस से छूट देने का कोई कारण नजर नहीं आता है.
  7. राइट  टू रीकाल लागु हो और इसको प्रभावी एवं इकोनोमिकल बनाने के लिए मतदान में एक के बजाये दो उम्मीदवारों को  वरीयता के क्रम से विजयी घोषित किया जाये ,यानि किसी क्षेत्र के सांसद या विधायक को यदि उस इलाके की जनता वापस बुला ले तो दूसरी वरीयता प्राप्त विजेता को पहले के स्थान पर नियुक्ति मिले ,ताकि तुरंत दुबारा चुनाव करवाने के खर्च एवं प्रशासनिक कार्यो की जरुरत न पड़े.


और अंतिम बात:

ये तो तय था की मंजर बदल जायेंगे 
हालत जो बे काबू थे सुधर जायेंगे 
इक तुम जो खालो कसम इन्कलाब की 
वतन में हर तरफ बस अन्ना नजर आएंगे l 

अजय सिंह "एकल"
  












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Monday, August 15, 2011

डंडा ऊँचा रहे तुम्हारा

प्रिय पाठको,
६५वे  स्वतंत्रता दिवस  की बधाई देने में हर्ष भी हो रहा है और दुःख भी.हर्ष इसलिए की६४ वर्ष हो गए अंग्रेजो  को भारत छोड़े हुए और हमने इतनी उन्नत कर ली है की ऊंट और सपेरो का देश समझा जाने वाला  भारत आज दुनिया में एक आर्थिक महाशक्ति बन कर उभर रहा है.शिक्षा के क्षेत्र मे ,रक्षा के क्षेत्र में,सेवा के क्षेत्र में भारत ने नए मानदंड स्थापित कर दिए है .परन्तु शर्म इसलिए आ रही है आज भी  अन्ना हजारे  और स्वामी रामदेव को सरकार से उसी तरह लड़ना पड़ रहा  है  जैसे कभी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए महत्मा गाँधी ने  अंग्रेजो के खिलाफ जनमत तेयार   कर लड़ाई लड़ी थी . सरकार में बैठे लोगो को ऐसा लग रहा है जैसे अन्ना हजारे की लड़ाई देश हित में न होकर उनकी सरकार के खिलाफ है इसलिए पुलिसिया हथकंडे अपना कर और इनके खिलाफ दुष्प्रचार करके ही इनका अस्तित्व बना रहेगा .एक साधारण सी बात जो इनकी समझ के बाहर है की ये सदा के लिए न तो सरकार है और न हमेशा के लिए  मंत्री .अतः ऐसी बाते जो  तुम्हे अपने लिए अच्छी  न लगती हो वोह दूसरो  को कैसे कह सकते है.

 परन्तु सच है की आदमी को चीजे दो स्थितियो में छोटी दिखाई देती है एक जब वोह दूर से देखता है और दूसरा जब गरूर से देखता है. रावन को जब श्री हनुमान जी ने सीता माता को सम्मान पूर्वक  प्रभु  श्री राम के पास भेजने की बात कही  तो रावन ने अपने  मंत्रियो से सलाह  करने  के बाद श्री हनुमान की पूछ में आग लगवा दिया .जब सोने की लंका जल गयी तब पता चला की यह कोई मामूली बन्दर नहीं बल्कि प्रभु श्री राम का सेवक श्री हनुमान है .कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी और माननीय मंत्री एवं प्रमुख रणनीतिकार  श्री कपिल सिब्बल को भी मामूली बन्दर एवं श्री हनुमान का फर्क नजर नहीं आ रहा है और पद के प्रभाव में इतने मदांध हो चले है की लगता ही नहीं की यह भी इस देश के साधारण नागरिक है जिनको कुछ समय के लिए देश के मंत्री पद की जिम्मेदारी इस देश की आम जनता ने ही दी है और यह सदा के लिए नहीं है.इसलिए हे मानव श्रेष्ठ मंत्री जी स्वतंत्रता की६५वे वर्षगांठ पर झंडा ऊँचा रहे हमारा का ही गीत गाइये और डंडा ऊँचा रहे हमारा को भूल  जाइये .नहीं तो याद रखियेगा समय बड़ा निर्दयी होता है .
प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले की प्राचीर से  झंडा फिर फहरा दिया और कुछ वादे भी कर दिए ,साथ में यह भी बताना नहीं भूले की वह जादूगर नहीं,जो पिछले कई सालो से सरकार के वित् मंत्री और स्वयं प्रधानमंत्री भारत की जनता को अपनी सरकार की विफलताओ के दोष से बचाने के लिए कहते आ रहे है. तो जनता इनको जादूगर न मान कर सपेरा मानने लग गई है जिसके पिटारे में हर क़िस्म के साँप है जो अभी जनता को डस रहे है और मौका लगते ही मंत्री परिषद् में भी अपना हुनर दिखा सकते है.अतः जनता को तैआर रहना होगा इन सापों से डँसे जाने से.

स्वतंत्रता संग्राम में जिन लोगो ने तरह -तरह की आहूतिया दी उनमे एक नाम श्री श्याम लाल गुप्त का है जिन्होंने एक प्रसिद्ध गीत तिरंगे झंडे पर लिखा था .यह गीत १९३८  में कांग्रेस के अधिवेशन में प्रेरक गीत की तरह गाया गया था.इस अवसर पर उन्हें याद कर में देशवासियो की ओर से श्रधांजली देना चाहता हूँ .साथ ही आंध्र प्रदेश केश्री प.वेंकैया जिन के बनाये हुए तिरंगे को इस देश ने राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार किया किया है ऐसे दोनों स्वतंत्रता सेनानियो को मेरा नमन.

                                             विजयी  विश्व तीरगा   प्यारा 
                                              झंडा ऊंचा रहे  हमारा!!
         सदा  शक्ति  सरसाने  वाला , प्रेम  सुधा  बरसाने वाला
वीरों  को हरषाने  वाला, मातृभूमि  का  तन -मन   सारा ;
विजयी विश्व तिरंगा  प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे  हमारा!!
आओ  प्यारे  वीरों आओ , देश -धर्म  पर  बलि  बलि जाओ 
एक  साथ  सब  मिलकर  गाओ , प्यारा भारत  देश हमारा;
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा!!
शान  न  इसकी  जाने  पाए , चाहे  जान  भले  ही जाए 
सत्य  की विजय  कर  दिखलाये , तब  होवे  प्रण पूर्ण   हमारा

विजयी  विश्व तीरगा   प्यारा ,
झंडा  ऊंचा  रहें   हमारा ;

लेखक : श्री श्याम लाल गुप्त, कानपुर
             


अजय सिंह "एकल"