Thursday, May 24, 2012

ये कहाँ आ गए हम........


प्रिय  मित्रो ,
पता  नहीं कहाँ आ  गए  है हम    पिछले  साठ सालो में .कोई परिपक्वता  नहीं, दशा  मे  कुछ   खास   सुधार नहीं, हालात  बद  से बदतर  .  बस  हमारे  लोकतंत्र  के भी  साठ  साल  पूरे होने  से  इसके     बाल  भी   उम्र  के साथ -साथ  सफेद हो गए है इसलिए  सिनिअर सिटीजन  की तरह  कुछ  रियायतों  और सम्मान  का अधिकारी हो गया  है  . वरना तो बस   गोल माल ही गोल माल  है सब जगह. अनगिनत  घोटाले, बेमिसाल  महंगाई, गरीब  जनता  का   मजाक  उड़ाया  जा रहा  है  तरह -तरह के तर्क  और सांख्यकी  देकर   और गरीब  के   नाम  पर  सरकार के पाले में  बैठे लोग  सुविधाओ  का   बेशर्मी  के साथ    उपभोग  कर रहे है  और यह ही इस   देश  की नियत बन  गयी है.   फर्क  बस  इतना है की पहले गौरी और गजनवी थे, फिर गोरे अंग्रेज  आए  और अब  काले  अंग्रेज  है देश  को लूटने के लिए . स्थिति  यह है की  एक  बार  किसी  भी  तरह  राजनीत  में पैर जम  जाये  तो  फिर  बस  मजे  ही मजे है .  और कही  पार्टी  आला  कमान  भी सेट हो    गए  तो फिर क्या पूछने. सात पीढियो को तारने की ताकत आ जाती  है ,जो चाहो कहो  जो चाहो करो . भगवान  जाने कहाँ आगये हम .

जरा याद कीजये राजेंद्र बाबू को जिन्होंने  संसद  में  अपने उद्घाटन  भाषण  में कहा था "यह  प्रथम    अवसर  है  की    जब   समस्त देश का शासन  एक  प्रजातंत्रीय  शासन  प्रणाली  के अंतर्गत  आया  है . देश के इतिहास  में यह समय अभूत पूर्व  है . इस  गणराज्य  और  संसद की स्थापना  स्वतंत्रता के बाद ही  हो सकती  थी, अतः  इस स्वतंत्रता  की रक्षा करना  प्रत्येक  भारतीय  का  कर्तव्य है . हमारे  गण राज्य  की नीव हमारे  संविधान में  निहित है .  आपके  ही एक  साथी    और स्वतंत्रता  के संघर्ष  में आपके कंधे से कन्धा  मिला कर चलने वाले  व्यक्ति  की हैसियत  से  मैं  आपको  आश्वासन  देता  हूँ  की  साधारण  व्यक्तियो  की उन्नति  ही  मेरा  सर्वप्रथम  कर्तव्य  होगा .मैं  अपने समस्त देशवासियो  से प्रार्थना करता हूँ  की वे मुझे अपने में से ही एक  समझे  और मुझे    शक्ति  भर  सेवा  कर सकने के  लिए उत्साहित  करते रहे . ईश्वर  मुझे  सर्वसाधारण  की सेवा की शक्ति दे".  लेकिन  अब  देश  में नेता बनना एक  व्यवसाय है और जैसे किसी कंपनी का मालिक केवल  पुत्र एवं पुत्रियों को ही  अपना  स्थान  देता है वैसे ही  नेता भी  क़ाबलियत  या सेवा करने के अपने जज्बे की वजह से न  होकर खानदान  की वजह से   पद  और प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे   है. फिर चाहे  वह  गाँधी परिवार हो या यादव परिवार या फिर  पंवार हो अथवा देश मुख  परिवार  कहाँ तक  गिनवाये लम्बी फेहरिश्त है . ये तो अच्छा  है कुछ  नेता कुंवारें  रह   इसलिए    वह  इस  परंपरा के अपवाद हो  गए है।  यह देखना वाकई  दिलचस्प  है  की हम  कहाँ से कहा  आ  गए    है।


कभी भद्र  जनों  का खेल  जाना जाने वाला खेल  क्रिकेट  अब  पूरी दुनिया में फसादों की जड़  बन  गया है . फिर  चाहे  पाकिस्तान  की बीना मालिक  हो या   इंग्लैंड  के    मजहर माजिद . और जब  मैच  दिलचस्प  हो  और पैसे के साथ शोहरत  मिलने की भी  संभावना  तो हिन्दुस्तानियों से मुकाबला मुश्किल  है . आइ पी एल  के नाम पर जब चार साल  पहले क्रिकेट का नया तमाशा  शुरू किया  गया  तब से ही यह  विवादों  का नया रिकार्ड  बना  रहा  है . ललित  मोदी से ले कर शरद पवार और राजीव शुक्ला  सब एक  से बढ़ कर एक  विवादों और  भ्रष्ट्राचार का रिकार्ड  खिलाड़ियो   से    भी  ज्यादा  बना रहे है। इसी कड़ी में एक  नया विवाद हाल  में  दिल्ली में  हुए मैच में सिद्धार्थ  मल्लया  और  अमरीका  से खास  तौर पर  विवाद खड़ा करने के लिए बुलवाई गयी  मोहतरमा  जोहल हामिद के  द्वारा किया गया और कई   दिनों  सुर्खियों में रहा .बात  यहाँ   तक  पहुच  गयी  की  आइ पी  एल  मतलब  इंडियन  फसाद  लीग   समझा  जाने  लगा , जिसमे "डी " कंपनी  "पी " कंपनी और न जाने कितनी "ए टू  जी"  कंपनिया पैसे लगा रही है और कमा  रही है .  और  मजे की बात  यह की सरकार  इन्हें हजारो करोड के टैक्स छूट भी दे रही  है     साथ ही  गरीबो  और मध्यम  वर्ग़  की सुविधाएँ  कैसे कम  की जाये पर अविरल  काम कर रही है .  अब  चिंता यह नहीं है की कहा आ  गए हम बल्कि यह  है की कहाँ तक  जायेंगे हम .

इतना ही नहीं,जया बच्चन   पिछले 10 सालो से मुलायम  सिंह  की कृपा से राज्य  सभा  की शोभा बढ़ा रही है, उसी  राज्य सभा में जब  उनकी पुरानी प्रतिद्वन्दी रेखा ने सोनिया  गाँधी की कृपा पा कर 20 मिनट के लिए माननीय  मेम्बर्सो को दर्शन  दिए तो पुराने  पारिवारिक  मित्रो एवं प्रतिद्वंदियों में सदभावना  नमस्कार भी नहीं हुआ. यानि पेशे की प्रतिद्वंदिता व्यक्तिगत   रिश्तो   पर भारी  पड़ गयी . "यानि  ये  कहाँ   आ  गए हम  यूँ ही साथ साथ चलते" .
                                                                                            और  अंत  में 

                                                             भूख  गरीबी  दीनता, होते जिनके पास 
                                                             सीमेंट  पाइप  उनके,  बन  जाते आवास 
राम   नहीं रावन  नहीं ,नहीं रही कैकई 
फिर बचपन  देश  का ,भोग रहा बनवास .
                          'राज कुमार सचान' 

आज  नगर में हो रहा चारो ओर  विकास 
बच्चो को भी मिल गया पाइप में आवास .
                                             ' डॉ. कमलेश  दिवेदी' 






अजय सिंह  "एकल" 









Tuesday, April 24, 2012

तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही ...

मित्रो,

क्या आपको याद है की  देश में आर्थिक सुधारो की शुरुवात १९९१ में  नरसिम्हा  राव की सरकार में आज के प्रधान मत्री और उस समय के वित्त मंत्री मनमोहन  सिंह के द्वारा की गई थी. पिछले ८ सालो से  यु पि ऐ सरकार के मुखिया प्रधान मंत्री के दौर में ही देश में आर्थिक  हालत फिर  वैसे  ही  हो गए है जैसे १९९१ में थे.विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से गिर रहा है रुपये का फिर तेजी से  अवमूल्यन  डालर के मुकाबले में हो गया  है,रिजर्व बैंक के आकंडे बताते है की भारत  का भुगतान संतुलन पिछले तीन सालो   में पहली बार घाटे में आ गया है यानि की देश के विदेशी मुद्रा के खजाने में पैसा कम है और देनदारिया ज्यादा . कुल मिला कर देश में आर्थिक हालत बहुत अच्छे नहीं है इस बात की तस्दीक सरकार के आर्थिक सलाहकार डॉ. कौशिक बासू ने अपनी अमरीका यात्रा के दौरान भी कर  दिया है, और आगाह भी, की  अब २०१४ के पहले इसकी उम्मीद भी न करे. अर्थात  जिस सरकार के सलाहकार वोह है उससे उन्हें भी कोई उम्मीद नहीं दिखती है,२०१४ का एक मतलब यह भी निकाला जा रहा है की लोकसभा चुनाव के बाद जब सरकार बदल जाये तो ही सुधारो के कामो में गति आ सकती है. कुल मिला कर देश को  दवा और दर्द दोनों की आशा डाक्टर मनमोहन की मन मोहनी टीम से ही है जो अब कुछ कर सकने की स्थिति में है ऐसा विश्वास किसी को नहीं है यानि सरकार के अन्दर और बाहर दोनों जगह  निराशा ही निराशा है.

लेकिन  ऐसा भी नहीं की सभी कांग्रेसी इतने ही निष्क्रिय है, पार्टी के प्रवक्ता और स्टैंडिंग  कमेटी के चेअरमैन डाक्टर अभिषेक मनु सिंघवी साहेब इतने सक्रिय है की लोगो को जज बना देते है रातोरात और जब बात जनता के बीच गयी और समाचार बन गया तो कोर्ट से उसको रुकवाने का आर्डर ले आये हाथो हाथ. है न कमाल अब आप ढूंढते रहिये आपको समाचार कही नहीं मिलेगा सब अख़बार और टी.वी.चैनल सिघवी साहब का साथ पूरी सिद्दत के साथ दे रहे है. आखिर यह कोई आम आदमी का मामला तो है नहीं की आपके घर में लुटेरे घुस जाये और मार पीट कर सामान भी लूट ले जाये और किसी टी.वी. चैनल का रिपोर्टर आ कर घर के मुखिया से पूछे की आप को कैसा लग रहा है?
  

किसी भी आदमी का  नाम उसके माता पिता जब रखते है तो वह  नाम आदमी की केवल पहचान  न होकर परिवार की उस व्यक्ति से उम्मीदों   को भी दर्शाता है . इतना ही नहीं ऐसा माना जाता है की   नाम के अनुरूप व्यक्ति का व्यक्तित्व भी बनता है. लेकिन यह बात पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बारे में सत्य नहीं है . पिछले दो तीन महीनो में किये गए काम तो कम  से कम यही बताते है. रेल मंत्री  दिनेश त्रिवेदी को जिस तरह चलता किया गया और लोकतान्त्रिक देश में  जहाँ  ऍम अफ  हुसैन द्वारा हिन्दू  देवी देवताओं के निर्वस्त्र चित्र बनाने पर भी सरकार निष्क्रिय रहती है और विरोध   करने वालो को सम्प्रादाइक  करार देती है वही ममता नाम की नेता प्रोफ. अम्बिकेश महापात्र  को कार्टून  बनाने पर जेल  भेज रही है.इतना ही नहीं अब जनता अख़बार कौन सा पढेगी और टी.वी. चैनल कौन सा देखेगी भी ममता और उनकी सरकार में बैठे लोग तय  करेंगे. ठीक  कह रही है बंगाल की जनता अगर यह ममता है तो निर्ममता क्या है?


और  अंत में

उम्र भर ग़ालिब यही  भूल करता रहा........ 
धूल चेहरे पर थी और आइना साफ़ करता रहा l
अजय  सिंह  "एकल "  

Tuesday, April 10, 2012

मूर्ख मकान बनाते है और अकलमन्द उसमे ......

मित्रो ,

मुझे पता नहीं यह कहावत कब कही गई और क्यों कही गई पर इतनी जिन्दगी जी लेने के बाद यह समझ आ गया है कहने वाले ने ठीक ही कहा है. तीन कमरे के मकान का किराया ४ लाख सालाना और कीमत डेढ़ -दो करोड़ .यानि निवेश पर ब्याज भी न निकले .तो अर्थशात्र के हिसाब से तो यह निरी मुर्खता ही है,  समाज शास्त्र के हिसाब से भी अकलमंदी नहीं . यानि आपका पडोसी अगर ठीक न हो और पसंद न आये  तो  जिन्दगी भर साथ रहने की मज़बूरी नहीं घर बदल दो और चुन लो मन का पडोसी.

केवल इतना ही नहीं मूर्ख और भी कई काम करते है मसलन इंजिनिअर या डाक्टरी की पढाई करने में जिन्दगी के कीमती साल और पैसे ख़राब करते है, और फिर किसी अनपढ़ (बेवकूफ या गंवार नहीं) की नौकरी करके   अपनी शान बढ़ाते है, आज के इकनोमिक टाइम्स में छपी खबर पढ़ी मनोज भार्गव  (समाचार पढने के लिए नाम पर क्लिक करे)     के बारे में .प्रिन्सटन विश्वविद्यालय, अमरीका में पढाई छोड़ कर एनेर्जी ड्रिंक बेचते है और साल में बिलियन  डालर की बिक्री करके अमरीका में सबसे अमीर भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया है.और पिछले कई सालो से इस सिंहासन पर विराजमान आइ आइ टी दिल्ली से पढ़े और अमरीका में बढे वेंचर कैप्तालिस्ट विनोद खोसला को पीछे छोड़ दिया.


पढ़े लिखे अकलमंद और भी कई काम करते है जैसे पैसे को कमाने और बढ़ाने के साथ ही उसको ऐसे पकड़ कर रखते है जैसे वोह इस दुनिया में कमाई हुई जागीर के माली न होकर मालिक है और वह सदा ही उनके पास रहने वाली है . तभी तो मनोज भार्गव जैसे अनपढ़ लोगो ने पिछले  दस सालो में ५ हजार करोड़ की सम्पति समाज के काम के लिए दान की है . ऐसा ही  कुछ हाल और दूसरे  अमीरों   जैसे नरायण मूर्ति और अजीम प्रेम जी तथा बिल गेट जैसे स्कूल ड्रॉप आउट्स लोगो का भी है जिन्होंने अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज के काम के लिए दान कर दिया है.

 एक अनपढ़ संत कबीर दास ने  लिखा है -


पानी बाढ़े   नाव में ,जेब में बाढ़े दाम ,
दोउ हाथ उलीचिये ,यही सज्जन को काम l

और   इन अनपढ़ लोगो ने  कबीर  का कहना मान कर अपनी जीवन रूपी नाव को डूबने से बचा लिया वरना पढ़ा लिखा अकलमंद आदमी तो हर काम में लाजिक  खोजता है, और अनपढ़ जनता  है, दुनिया में चीजे लाजिक  से नहीं बुद्धि से चलती है जैसे मनोज भार्गव जी कहते है बड़े-बड़े कालिजो के पढ़े हुए लोग अव्याहरिक ज्ञान से युक्त होते  है जबकि सफलता के लिए  पढ़े होने के बजाये कढ़े होने की जरुरत है .

अजय सिंह  "एकल "


और अंत मैं  

किसने कहा, और मत भेधो हृदय वहिव्य के शर  से
भरो कुसुम का अंग कसुम  से ,कुमकुम से केसर से
कुमकुम किसे लगाऊ  ?सुनाऊं किसको कोमल गान ?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिंदुस्तान I 
                                     "राम धारी सिंह दिनकर" 




   

Wednesday, March 21, 2012

समझो बस अंत आ गया



प्रिय पाठको,

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री की घोषणा होने के साथ ऐसा लगता है अब उत्तर प्रदेश के दिन बदलने वाले है . समाज वादी पार्टी  को स्पष्ट बहुमत से भी ज्यादा सीटे मिलने के बाद सारी राजनैतिक  अटकले समाप्त हो गई है. अखिलेश एक तो जवान है ,पढ़े लिखे है, देश विदेश में पढ़े और बढे है आधी दुनिया  घूम चुके है और पूरी दुनिया का हाल जानते है , अतः कह सकते है की .प्र. में थोड़ी देर से ही सही पर बसंत गया है. सही कहा था अखिलेश ने की राहुल अभी तो पर्चे फाड़ रहे है और बाहें चढ़ा रहे है जब  नतीजे आयेंगे तो कही मंच से कूद जाये. प्रदेश की जनता जिसे कभी राहुल भैया  ने भिखारी कहने की हिमाकत की थी उसने दिखा दिया जनता सिर्फ बेचारी ही नहीं होती वक्त आने पर जनार्दन भी हो जाती है.

लेकिन जरा  पिछले चुनाव को याद करे जब मायावती को  बहुजन का मत मिला था पांच साल निर्विघन हो कर शासन चलाने के लिए ,सोशल इंजिनयारिंग  को नए आयाम देने के लिएतो भी बसंत आया था पर पांच साल के माया शासन से त्रस्त जनता ने बसंत को बस अंत में बदल दिया और  मायावती अब बगले झांक  रही है और राज्य सभा के जरिये अपने  को सुरक्षा कवर देने के जुगाड़ में लग गई हैI


इन सब के बीच रेल मंत्री के साथ ऐसी दुर्घटना हुई की उनका तो काम ही तमाम हो गया अभी लोग रेल बजट की तारीफ ही कर रहे थे की बेरहम ममता का बयान  आया और दिनेश त्रिवेदी के बजट में  किराया वृद्धी के प्रस्ताव  को   रोल बैक  करने  के साथ ही  उनका बोरिया और बिस्तर दोनों पैक करवा कर यह सिद्ध कर दिया की नागरिक शास्त्र का ज्ञान "प्रधान मंत्री अपनी पसंद से मंत्री मंडल तय करता है " गलत है अब ऐसा लगता है की देश का प्रधान मंत्री एक ऐसी कठपुतली है जिसकी  जो चाहे बांह मरोड़ सकता है. दिनेश त्रिवेदी को शहीद कर ममता ने बसंती रेल बजट पेश करने वाले मंत्री का बस अंत ही  कर दिया. 

चलो अच्छा हुआ सबको समझ आ गया गीता में भगवान कृष्ण द्वारा दिया गया  एक बेसिक सिद्धांत.   और वोह यह की जीवन शुरू होने के साथ ही मृत्यु यानि अंत भी शुरू हो जाता है अतः जीवन में बसंत आने  यानि सफलता मिलने के साथ ही सावधान, जरा सा चूके नहीं की बसंत बस अंत में बदल जाता है.इसलिए सफलता का आनंद उठाये लेकिन सर पर चढ़ कर न बोलने दे नहीं तो बसंत बस अंत में बदलते देर नहीं लगती है.

अजय सिंह "एकल"

Thursday, January 26, 2012

लो फिर आया चुनाव का मौसम


प्रिय जनता जनार्दन,

मैंने सुना है आप तो बड़े दयालु हो ,आपके सामने कोई हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाये तो आप उसका कल्याण कर देते हो ,तो  लो भैया  हम फिर आ गए है पांच साल मौज मस्ती करके ,अपना घर भर के और आप से निवेदन करते है की अबकी बार फिर जीता दो बस मजा आ जाये । अबकी बार तो पक्का मंत्री बन ने का पूरा चांस है अरे इसीलिए तो हम बिभीषण बने है नहीं तो राम का नाम तो हमारी जबान पर कभी भूल के भी नहीं  आया ये तो पता नहीं की हनुमान को क्या सुझा अचानक चुनाव घोषणा के बाद घर आ गये और बोले की चिंता न करो राम का मुझमे पूरा विश्वास है ,और में जिसको चाहे भीषण बना कर लंका का राजा बनवा सकता हूँ बस मैंने सोचा की मौका भी है और दस्तूर भी सो हम आपकी शरण में आ गए है बस अबकी वोट दे कर जीता दो ,जिन्दगी भर आपका आभारी और बाकी नेताओ पर भारी  रहूँगा बस एक बार और...

इस उम्मीद के साथ की नेता हम लोगो को ऐसे ही सपने दिखा कर ठगते रहेंगे, और हम ठगे जाते रहेंगे.

 सभी भारत वासियो को गणतंत्र के ६३ वी वर्षगांठ की बधाई .

अजय सिंह "एकल"
और अंत में    

पाप 
                                                                                                  गीतों के चितेरे भारत भूषण 
न जन्म लेता अगर कही मैं ,धरा नहीं ये मसान होती,
न मंदिरों में मृदंग बजते ,न मस्जिदों में अजान होती।
मुझे सुलाते रहे मसीहा ,मुझे मिटाने  रसूल आए,
कभी सुनी मोहनी मुरलिया ,कभी अयोध्या बजे बधाए  ।                   
मुझे दुआ दो ,बुला रहा हूँ हजार गौतम हजार गाँधी,
बना दिए देवता अनेको ,मुझे मगर तुम पूज न पाए।
मुझे रुला कर न स्रष्टि    हंसती ,न सूर,तुलसी ,कबीर आते ,
न क्रास का ये निशान होता ,न पाक पावन  कुरान होती ।
बुरा बताले मुझे मौलवी ,की दे पुरोहित हजार गाली,
सभी चितेरे शक्ल बना ले बहुत भयानक कुरूप काली ।                              
मगर वही  जब मिले अकेले सवाल पूंछो यही कहेंगे ,
की पाप ही जिन्दगी हमारी,वही ईद है वही दीवाली ।
न सींचता मैं अगर जड़ो को कभी जहाँ में न पुण्य फलता,
न रूप का यूँ बखान होता ,न प्यास इतनी जवान होती ।                                मृत्यु  १७ दिसंबर 2011



Saturday, December 31, 2011

जो हुआ अच्छा हुआ ! अलविदा 2011

दोस्तों ,
जिन्दगी की कुछ और सांसे पूरी होगई. क्या खोया क्या पाया सोचते-सोचते  जिन्दगी का एक और साल निकलने को तैआर है .दुनिया का दस्तूर यही है जाने वाले को अलविदा आने वाले का स्वागत फिर चाहे वह  नया साल हो या हमारा आपका दुनिया में  आवागमन .जाने वाले के लिए कुछ रुकता नहीं आने वाले को कोई रोक पता नहीं.दरअसल यह  जिन्दगी की सच्चाई है ,यह मान ले तो सुखी नहीं माने तो  मर्जी आपकी जो चाहे   कर लो पर ये दुनिया तो ऐसे ही चलेगी . आइये जाने वाले साल में क्या कुछ घट गया एक नजर डाल  लेते है और फिर शुरू करते है  आने वाले का इन्तजार .


साल की शुरुवात  हुई राष्ट्र मंडल खेलो में हुए भ्रष्टाचार के शोर से. जाँच के लिए शुंगलू कमेटी  बनी रिपोर्ट आइ चेअरमैन कल्मांदी साहेब को जेल की हवा खानी पड़ी और फिर नंबर आया राजा साहेब और उनकी टीम का जो स्पेक्ट्रम घोटाले में कोर्ट द्वारा  दोषी पाए गए और  फिर अन्दर भेज  दिए गए , देश के लोगो को पहली बार पता चला की इस देश में  सत्ता में शामिल  और अकूत दौलत होने के बावजूद दोषी पाए जाने पर  जेल हो सकती . जनता को  एक अच्छा मैसेज गया, लोगो को कानून का भय भी हुआ और सम्मान भी .इसलिए ये जो हुआ  अच्छा हुआ.

इसके बाद अन्ना ने अप्रैल   महीने में भ्रस्टाचार के खिलाफ आन्दोलन शुरू करके लोगो में जनचेतना फ़ैलाने का काम बखूबी किया और बाबा रामदेव ने अथाह जन समूह  को एकत्र कर काले धन के खिलाफ अलख जगाई परन्तु सरकार में बैठे लोगो को लगा की एक बार जनता के वोट दे देने के बाद उसके पास कोई ताकत नहीं रहती और   सत्ताधारिओ को पांच साल लूटने  की छूट मिल जाती है इसलिए पहले बाबा रामदेव को और फिर अन्ना को डराने और पिटवाने की कोशिश की ,लेकिन रामलीला मैदान में जब हजारो की संख्या में जनता एकत्र  हो कर भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जूट दिखी तो नेताओ के होश फाक्ता हुए और इन्हें लगा की अति करने से मामला गड़बड़ हो सकता है.जनता केवल बेचारी नही है और जरुरत पड़ने पर जनार्दन बन जाती है इसलिए जरुरी है की संभल कर दुश्मनी करे .तो      सरकार के व्यहार से   बाबा को समझ आ गया  और अन्ना के आन्दोलन से   लगा की घमंड में चूर  सत्ता के नेताओ को भी कुछ -कुछ  समझ आ गया .चलो अच्छा हुआ दोनों को राह दिखी..

दस  साल पहले अमरीका की दादा गिरी से तंग आकर ओसामा ने अपने लोगो  से  ट्विन टावर पर  हमला करवा कर यह सिद्ध कर दिया की अभेद दुर्ग भी भेदे जा सकते है और  इन गुजरे  सालो में अमरीका अकूत सम्पति, हथियारों एवं अव्वल दर्जे  की तकनीकी  जान कारी होने के बावजूद जहर के घूँट पीता रहा और अंत में उसी के घर में घुस कर मार गिराया .इस साल ओसामा के अलावा हुसैन मुबारक को गद्दी छोडनी पड़ी और कर्नल गद्दाफी को उसी की सेना ने मार गिराया और ये एक बार फिर सिद्ध हो गया की दुनिया में आने पर स्वागत तो सबका होता है लेकिन जाने पर दुनिया रोती केवल उसी के लिए है जिसने अपनी जिन्दगी अपनी प्रजा के लिए जी हो जैसे किम जोंग इल जिसने दुनिया से दुश्मनी ले कर उत्तरी कोरिया की जनता के लिए काम किया और उसकी मृत्यु पर जनता ऐसे फूट फूट कर रोई मानो  उनका सगा सम्बन्धी दुनिया छोड़ गया हो .इस घटना ने दुनिया के शासको को अच्छे संकेत दिए .चलो अच्छा हुआ  किम की मौत लोगो को सबक सिखा गयी.

रूस की एक  अदालत में गीता पर प्रतिबन्ध लगाने का मुकदमा आया , बहुत से लोग जिन्होंने पहले नाम भी नहीं सुना था खरीद कर पढ़  डाला  . निर्णय देने वाले जज को भी प्रभु ने सद्बुधी दी और उसने प्रतिबन्ध लगाने से माना कर दिया .चलो अच्छा हुआ इस बहाने गीता के कुछ नए पाठक भी पैदा हुए और प्रसंशक भी

चलते चलते साल के अंत में अन्ना के आन्दोलन में भीड़ नहीं जुट सकी और जिसके डर से सरकार लोकपाल का बिल बना कर पास करवाने के लिए  सच्ची -झूंठी कोशिश करती दिखी वोह भी न बन सका .चलो अच्छा हुआ अन्ना को समझ आ गया की माजरा क्या है कौन किसके साथ मिला हुआ है और यह भी सारे राजनीतिज्ञ और राजनैतिक दल एक ही जैसे है  और सरकार को भी समझ आ गया की उसके  अपने साथी जो सत्ता का मजा तो ले रहे है पर जब सरकार की जरुरत आन पड़ी तो वोह दुसरे पाले में खड़े दिखाई दिए. चलो अच्छा हुआ कुछ के मनसूबे पुरे हुए बाक़िओं के पूरे करने को आ गया नया साल. यही तो है गीता का सन्देश "जो हुआ अच्छा हुआ,"

तो जिनके मनसूबे पूरे हो  गए उनको बधाई  और वोह अब नए मनसूबे बनाने के लिए तैआर हो जाएँ,   जिनके रह गए वोह जोर अजमाए  और उनके मनसूबे आने वाले साल में पूरे हो ,   नए वर्ष की  इस  शुभ  कामना के साथ ,

अजय सिंह "एकल"


Suggested resolution for New year read here: http://newhope2020.blogspot.com/



Sunday, December 18, 2011

पहचान कौन ?

प्रिय दोस्तों,

जी जनाब, सबसे मुश्किल काम है पहचानना .फिर चाहे वो अपने को पहचानना हो या  दूसरे  को .कभी -कभी तो ऐसा होता है की आदमी जिन्दगी भर जिनके साथ रहता है, अंत समय पता चलता है की एक दूसरे के साथ रहने के बावजूद पहचान नहीं हो पाई.और कभी आप को कोई एक मिनट के लिए मिलता है और आप उसको पहचान जाते है. जिन्दगी की पहेली ऐसी ही है.

कभी सोने की चिड़िया  कहा जाने वाला  भारत देश भिक्षुओ अर्थात भिखारिओ के लिए भी दुनिया में जाना जाता है .बौद्ध धर्म जो इस देश से प्रारंभ हुआ था ,  उसके प्रचारक विश्व में बौद्ध भिक्षु कहलाये .तथापि  इस शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर नकरात्मक  प्रतीक के तौर पर किया जाता है किन्तु  गुडं एवं दोष के आधार पर  इस शब्द की विवेचना करने पर पता चलेगा की यह उतना ख़राब नहीं है जितना आम तौर पर समझा जाता है.

पिछले कुछ दिनों में इस शब्द की विशेष चर्चा तब शुरू हुई जब राहुल गाँधी ने इलाहबाद   की एक सभा में उत्तर प्रदेश एवं बिहार के लोगो से कहा की वोह कब तक मुंबई जा कर भीख मांगते रहेंगे ? यानि राहुल जिनकी पहचान   कई लोगो ने  राज कुमार की तरह बना रखी है उनको उत्तर भारत के मेहनत कश लोग देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में भिखारी जैसे लगे. हालाँकि   बात जिस तरह से और सन्दर्भ में कही गयी थी उस से लोगो का गुस्सा होना स्वाभाविक ही था ,किन्तु मैंने जब इस बारे में सोचना शुरू किया तो निष्कर्ष बड़े विचित्र निकले और इनको मैं आप से साझा करने की कोशिश कर रहा हूँ.हालाँकि कई बार दिया गया तर्क -कुतर्क भी लग सकता है मेरे विचार से  इसको साधारण  व्यंग की तरह देखना भी उचित रहेगा.

हाल में मैंने यह  चुटकला कहीं पढ़ा था " पूजा स्थलों ( मंदिर ) के अन्दर बड़े आदमी  और बाहर गरीब लोग मांगते हुए मिलते है " अर्थात  मांगना आदमी की फितरत है और हर समय कुछ न कुछ मांगता  मिल जायेगा . दरअसल आम तौर पर यह समझा जाता है की जब आप किसी से कुछ मांगते है और उसके बदले में कुछ देते नहीं है तो उसे भीख कहा जा सकता है . किन्तु जब चौराहे पर खड़ा गरीब आदमी आप से कुछ मांगता है तो उसके बदले दुआ  देता है और दान लेता हुआ पुजारी आशीर्वाद देता है आप के दिए हुए दान  के बदले. तो फिर गली-गली और हर दरवाजे पर जा कर वोट मागने वाले नेता को क्या कहना उचित होगा?क्योंकि  वोट देने वाले को नेता भी कुछ देता तो है नहीं बदले में सिवा  आश्वासन   के और ये तो हर लेने वाला देता है चाहे वोह चौराहे का भिखारी हो या कोई शान से अट्टालिका में बैठा हुआ पुजारी, दर असल बदले में कुछ देना  क्रिया की प्रतिक्रिया है जो होगी ही चाहे वोह तुरंत  दिखाई पड़े या बाद में.  .

पंडित मदन मोहन मालवीय ने जब काशी हिन्दू विश्वविदयालय की शुरुवात की तो सारा धन  लोगो  से दान में ले कर ही इस पवित्र काम को अंजाम देने में सफल हुए.साथ ही मांगने की आदत से जो स्वाभाविक गुंड मनुष्य में  आ जाता है उसके बारे में उनका यह कहना था की इससे आदमी का अहंकार (मैं ) ख़तम हो जाता है ,इसलिए यदि उद्देश्य अच्छा हो तो  मांगने में भी  कोई बुराई नहीं  .

थोड़ा और सोचे तो पता चलेगा की वास्तव में मांगता कौन है जिसके पास वोह चीज कम हो या न हो ,इस बिंदु पर विचार करने पर पता चलेगा की अमीर वह  नहीं है जो   ज्यादा कमाता है बल्कि वोह है जिसे और नहीं चाहिए. इस कसौटी पर देखने पर आम तौर पर हम  सभी लोग धन, शोहरत या ऐसी ही दूसरी चीजो की ओर  भागते नजर आएंगे , कुल मिला कर सुबह से शाम तक और -और कर एक ऐसे बर्तन को भरने में लगे है जिसमे पेंदी (bottom) नहीं है तो फिर ये बर्तन तो भरेगा नहीं और हमारी जिन्दगी ऐसे ही निकल जाने वाली है. इसलिए सावधान राहुल बाबा भिखारी वोह नही है जिन्हें आप समझ रहे है कभी आत्म निरिक्षण करे तो पता लगेगा की आप कौन है.  यह सही है की आदमी अपने को ही पहचान ने में सबसे ज्यादा कठिनाई महसूस करता है.

अजय सिंह "एकल"  

और अंत में एक  जन  कवि को श्रधांजलि   :

देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बन्दर आ गए l
तथा
काजू भुने प्लेट में ,विह्स्की गिलास में,
उतरा है राम राज, विधायक निवास में.
  

Saturday, November 26, 2011

जादू की छड़ी

 जी जनाब ,
जिस जादू की छड़ी का इन्तजार मनमोहनी सरकार को पिछले दो सालो से था आखिर वह मिल ही गयी . नतीजतन यू पी ये टीम के सारे लोग एक सुर में रिटेल सेक्टर में ऍफ़ डी आइ के  स्वीकृत होने का स्वागत कर रहे है और तरह तरह के तर्क दे कर जनता को यह समझाना चाह रहे है की बस जनता महंगाई की  समस्या  जो सुरसा की तरह मुहं फैलाये जा रही थी और लोगो को परेशान कर रही  का समाधान हो गया . आखिर जिस जादू की छड़ी का जिक्र शरद पवार , प्रणव दादा तथा मनमोहन सिंह अपने बयानों और भाषणों   में पिछले बहुत दिनों से कर रहें है हाथ लग ही गयी है इसलिए बस अब महंगाई छू मंतर होने वाली है. इन सब लोगो को पता है की अब कम से कम इतना तो पक्का हो गया है जनता की समस्या कम हो न हो कांग्रेसियो की समस्या का तो हल निकल ही गया है.यदि विपक्षी  इसका विरोध करे तो कहो की हम ने तो उपाय  कर दिया लेकिन विरोधी कम नहीं होने दे रहे है और यदि न करे और तो फिर जवाब है न, की भाई समय लगता है  विदेशी स्टोर का लाभ  मिलने  में और उस से रोजगार मिलने में तो इंतजार करो  .तब तक अगले इलेक्शन आ जायेंगे तो हो गया न उद्देश्य पूरा. पिछला चुनाव परमाणु विद्युत के मुद्दे से जीता और अब अगले की तैयारी हो गयी है.

बस एक गड़बड़ हो गई इस बीच. कांग्रेस का हाथ  जो दो- ढाई साल से जनता की गर्दन कसता चला जा रहा था ने, बोउन्स बैक किया और यू पी ये सरकार के एक कद्दावर नेता जिनके बयानों ने भी खाने पीने की चीजो  के भाव बढ़ाये और आग में घी का काम किया ,की ओर घूम गया .अगले दिन संसद में सारे सदस्यों ने एक सुर में बयान दिए लोकतंत्र में हिंसा की जगह नहीं है. विरोध करना है  तो नारे लगाओ ,अनशन  करो ,अख़बार में निकालो   फिर ये हमारी मर्जी है की हम सुने या न सुने .अरे भाई हम न सुने तो अगले इलेक्शन  में दूसरे   को चुन लेना .लेकिन आप ने एक बार चुन के भेज दिया है तो पांच साल तो लूटने दो ,आप हमें ऐसे नहीं रोक सकते .और इतना ही नहीं यदि आप अनसन करोगे तो हम पुलिस भेज के आप को और आप के साथियो को पीटेंगे .आखिर आपने हम को चुन के भेजा है तो इतना अधिकार तो मिलना ही चाहिए.
.
लेकिन समस्या केवल इतनी ही नहीं है .तीन साल पहले विदर्भ के एक किसान की विधवा कलावती के घर राहुल ने  खाना  खा के ज़ब संसद में  बयान दिया तो उनकी शान में न जाने कितने कशीदे कांग्रेसी नेताओ ने गढ़ डाले ,लेकिन इतने दिन बाद भी कलावती उसी हाल में जी रही है और कपास किसानो के आन्दोलन की अगुवाई  इस उम्मीद में कर रही है की  शायद कोई चमत्कार हो जाये और विदर्भ के मरते किसानो को कोई राहत मिल जाये .जहाँ पिछले साल भी कम से कम ८०० किसानो ने गरीबी से हार कर आत्महत्या की है.पता नहीं राहुल को इस बात से गुस्सा आया की नहीं जो उत्तर प्रदेश में लोगो से जाकर यह पूँछ रहे है की उन लोगो को माया वती के राज में जो कुछ हो रहा है उस पर गुस्सा क्यों नहीं आता है.

आज तीसरी बरसी है मुंबई में ताज होटल  पर हुए हमले की .फिर रसम अदाएगी हो गयी मुख्य मंत्री ने शहीदों  को याद किया ,सेना ने सलामी दी और विदेश मंत्री ने फिर वैसी ही  चेतावनी  पाकिस्तान को दे कर अपने कर्तव्य की इतश्री कर ली, न पहले कोई   एक्सन   कुछ हुआ न भविष्य में कुछ होने की उम्मीद है . बस एक बात  देश की जनता को पता चल गयी की भारत  सरकार ने कसाब को जिन्दा रखने में गरीब जनता के हिस्से का  कम से कम ५० करोड़ रुपियो  का खर्च कर दिया है.इतने पैसे में हिंदुस्तान के ५०० गांवो का क्या कल्प हो सकता था . लेकिन गाँधी के देश में  कोई अपराधी से कैसे घृणा कर सकता है ,घृणा तो अपराध से करनी है  न इसलिए सरकार में बैठे  गाँधी  के उत्तराधिकारी  और कुछ करे या न करे कसाब को हर हाल में जिन्दा रखने पर अमादा है इसके लिए चाहे १ अरब खर्च हो  या १०० अरब .आखिर भारत इतना गरीब तो नहीं है की पड़ोस के  एक आदमी को ज़िदा न रख सके.

अजय सिंह "एकल" 

  

Sunday, November 13, 2011

गुस्सा आता है ?

प्रिय दोस्तों ,
पहली बार इस देश के किसी नेता ने जनता से पूछा है की आपको व्यवस्था पर गुस्सा क्यों नहीं आता है .बहुत अच्छा लगा . सदा मुस्कराते रहने वाले राहुल गाँधी  जब गुस्सा करते है तो सारी मिडिया का ध्यान आकर्षित करते है और उनके पार्टी जन उनकी इस अदा पर फ़िदा हो जाते है .राहुल का दलित के घर जाना और वहां खाना ,कभी मेट्रो ट्रेन में जाना ,कभी मुंबई की लोकल में सफ़र करना राहुल की अदाओ में शुमार है और क्योंकि मीडिया में इस बहाने से चर्चा हो जाती है इसलिए समय -समय पर  ऐसा करना जरुरी है  . नेता गिरी करने के लिए मीडिया में बने रहना राहुल की जॉब प्रोफाइल का हिस्सा है .

मगर राहुल को यह पता नहीं है की गुस्सा करने के लिए दो आवश्यक बाध्यताए है जिनके बिना कोई गुस्सा कर ही नहीं सकता ,एक तो उसका पेट भरा होना चाहिए और दूसरा कोई गुस्सा देखने वाला होना चाहिए . तो जनाब राहुल के पास दोनों है और इस देश की ७० फीसदी जनता के पास दोनों नहीं है .इसी लिए मिर्जापुर में राहुल साहेब ने जब पूछा की आप लोगो को व्यवस्था पर गुस्सा क्यों नहीं आता  तो जनता को कोई जवाब नहीं सूझा.

लेकिन देश की ३० फीसदी जनता जो अपना  पेट किसी तरह भर लेती है और और जिसका गुस्सा भी कोई न कोई देखने वाला है को गुस्सा आता  है :

जब महंगाई बे हिसाब बढती और कमाई कम पड़ने लगती है .और अर्थशास्त्र के ज्ञाता   प्रधान मत्री जी कहते है की उनके पास जादू की छड़ी नहीं है.

जब हर दूसरे महीने पेट्रोल के दाम बढ़ जाते है और वित्त मंत्री जी कहते है की हम कुछ नहीं कर सकते है.

जब बेकसूर  जनता आतंक वादियो के द्वारा मारी जाती और देश के  गृह मंत्री का बयान आता है की ३२ महीने से कोई आतंकवादी घटना नहीं हुई  यह क्या कम है .और देश के युवराज राहुल कहते है आतंकी घटनाओ को १०० फीसदी रोक पाना असंभव है.

जब कोई मंत्री देश की जनता की गाढ़ी कमाई को लूट कर अपना और सम्बन्धीयो का घर भर लेता है और उसको जेल में भी घर जैसी सुविधाएँ प्राप्त होने की खबर आती है.

जब आपकी पार्टी के कानून मंत्री दागी कंपनियो के अधिकारियो को छोड़ देने की वकालत यह कह कर करते है की इससे देश में लोग व्यापार करने में झिझकेंगे .

जब संचार मंत्री ५० करोड़ के जुर्माने को ५ करोड़ कर देते है और विरोध करने पर जवाब आता है की फिर कोई मंत्री निर्णय नहीं ले सकेगा इसलिए आप  इसकी तारीफ करें या न करे लेकिन आलोचना तो बिलकुल न करे.

जब आपकी पार्टी हर उस आदमी को परेशान करने लगती है लो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठता है चाहे वोह बाबा राम देव हो या अन्ना हजारे .

जब देखता हूँ की मोंटेक सिंह अहलुवालिया जी का जी -२०  मीटिंग के बाद बयान आता है की यूरोप    को भारत बेल आउट पैकेज दे सकता है .

जब भारत के  प्रधान मंत्री भारत के खिलाफ अतंकवादियो की फ़ौज तैयार करने वाले देश पाकिस्तान के प्रधान मंत्री को  शांति का मसीहा बताते है.

कहाँ तक आपको  बताऊँ बड़ी लम्बी है फेहरिस्त .लेकिन अच्छा है  आप देखने को तैआर हो  तो जनता समय -समय पर आपको बताती रहेगी. इसकी एक बानगी आपको उत्तर प्रदेश के चुनाव के नतीजो में  पांच महीने बाद देखने को मिलेजाएगी    इसी आशा के साथ,

आपका 

अजय सिंह "एकल"